Corporates aur Naye Krishi Kanoon: Difference between revisions
(Created page with "=कॉरपोरेट्स और नए कृषि कानून= ---- वास्तविक भारत गांवों में बसता है और...") Tags: mobile edit mobile web edit |
mNo edit summary |
||
(4 intermediate revisions by 2 users not shown) | |||
Line 1: | Line 1: | ||
= | |||
<center> | |||
{| class="wikitable" style="text-align:center"; border="5" | |||
|align=center colspan=13 style="background: #FFD700"| <small>''' लेखक : [[Hanumana Ram Isran|प्रो. एचआर ईसराण]], पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राजस्थान '''</small> | |||
|- | |||
|}</center> | |||
---- | ---- | ||
=<center>'''कॉरपोरेट्स और नए कृषि कानून'''</center>= | |||
वास्तविक भारत गांवों में बसता है और खेती-किसानी से जुड़ा हुआ है। देश की सत्ता तथा प्रशासनिक बागडोर शहरों में पले- बढ़े और पूंजीपतियों की सरपरस्ती वाले अफ़सरों के हाथों में सिमटी हुई है जो न तो गांवों की समस्याओं से परिचित हैं, न ही उनकी जरूरतों तथा ग्रामीणों के मनोविज्ञान को समझते हैं। | वास्तविक भारत गांवों में बसता है और खेती-किसानी से जुड़ा हुआ है। देश की सत्ता तथा प्रशासनिक बागडोर शहरों में पले- बढ़े और पूंजीपतियों की सरपरस्ती वाले अफ़सरों के हाथों में सिमटी हुई है जो न तो गांवों की समस्याओं से परिचित हैं, न ही उनकी जरूरतों तथा ग्रामीणों के मनोविज्ञान को समझते हैं। | ||
विडंबना है कि गमलों में उगे हुये कांटेदार "केक्टस".. छायादार व फलदार ''दरख्तों'' के लिये कानून बनाते हैं ! | विडंबना है कि गमलों में उगे हुये कांटेदार "केक्टस".. छायादार व फलदार ''दरख्तों'' के लिये कानून बनाते हैं ! | ||
Line 6: | Line 14: | ||
कृषि वस्तुतः भारतीय अर्थव्यवस्था की मेरुदण्ड है। जहां एक ओर यह प्रमुख रोजगार प्रदाता क्षेत्र है, वहीं सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। 1947 में भारत की आज़ादी के वक्त देश की जीडीपी में कृषि का हिस्सा 52 प्रतिशत था तथा हमारी आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा तब सीधे कृषि से जुड़ा था। 1991 में जब नई आर्थिक नीतियां लागू की गई थीं तो उस समय जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 34.9 प्रतिशत था। वर्तमान में हमारी आबादी का क़रीब 55 प्रतिशत हिस्सा अपनी आजीविका हेतु कृषि पर ही निर्भर है और जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगभग 14 प्रतिशत बचा है। | कृषि वस्तुतः भारतीय अर्थव्यवस्था की मेरुदण्ड है। जहां एक ओर यह प्रमुख रोजगार प्रदाता क्षेत्र है, वहीं सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। 1947 में भारत की आज़ादी के वक्त देश की जीडीपी में कृषि का हिस्सा 52 प्रतिशत था तथा हमारी आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा तब सीधे कृषि से जुड़ा था। 1991 में जब नई आर्थिक नीतियां लागू की गई थीं तो उस समय जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 34.9 प्रतिशत था। वर्तमान में हमारी आबादी का क़रीब 55 प्रतिशत हिस्सा अपनी आजीविका हेतु कृषि पर ही निर्भर है और जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगभग 14 प्रतिशत बचा है। | ||
कृषि की विकास दर | '''कृषि की विकास दर''' | ||
प्रधानमन्त्री बनने पर डा. मनमोहन सिंह ने अपने पहले बजट में गांवों में सिंचाई सुविधाओं से लेकर आधारभूत भंडारण क्षमता के निर्माण की तरफ ध्यान दिया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान लागू की गई किसान क्रेडिट कार्ड योजना का विस्तार करते हुए किसानों को खेती के अलावा अपनी अन्य जरूरतों के लिए भी बैंकों से लोन लेने की सुविधा का विस्तार किया। वर्तमान मोदी सरकार सिर्फ भारी उद्योगों को ही अपनी आर्थिक नीतियों में तरजीह दे रही है। मोदी सरकार के पिछले बजट में तो सिंचाई बजट में लगभग 65 प्रतिशत की कटौती की गई है। | प्रधानमन्त्री बनने पर डा. मनमोहन सिंह ने अपने पहले बजट में गांवों में सिंचाई सुविधाओं से लेकर आधारभूत भंडारण क्षमता के निर्माण की तरफ ध्यान दिया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान लागू की गई किसान क्रेडिट कार्ड योजना का विस्तार करते हुए किसानों को खेती के अलावा अपनी अन्य जरूरतों के लिए भी बैंकों से लोन लेने की सुविधा का विस्तार किया। वर्तमान मोदी सरकार सिर्फ भारी उद्योगों को ही अपनी आर्थिक नीतियों में तरजीह दे रही है। मोदी सरकार के पिछले बजट में तो सिंचाई बजट में लगभग 65 प्रतिशत की कटौती की गई है। | ||
Line 12: | Line 20: | ||
यूपीए-एक के शासन में भारत की औसत कृषि विकास दर 3.1 प्रतिशत और यूपीए-दो के शासन में 4.3 प्रतिशत थी। भारत के किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का दम्भ भरने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के शासन के वर्ष 2019 में भारत की कृषि विकास दर 2.7 प्रतिशत पर आ गई। वित्त वर्ष 2020-21 में कृषि एवं संबंधित क्षेत्र की आर्थिक विकास दर 2.8 फीसदी रहने का अनुमान है ( आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 का अनुमान। ) | यूपीए-एक के शासन में भारत की औसत कृषि विकास दर 3.1 प्रतिशत और यूपीए-दो के शासन में 4.3 प्रतिशत थी। भारत के किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का दम्भ भरने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के शासन के वर्ष 2019 में भारत की कृषि विकास दर 2.7 प्रतिशत पर आ गई। वित्त वर्ष 2020-21 में कृषि एवं संबंधित क्षेत्र की आर्थिक विकास दर 2.8 फीसदी रहने का अनुमान है ( आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 का अनुमान। ) | ||
=कृषि क्षेत्र का महत्व= | ==कृषि क्षेत्र का महत्व== | ||
कृषि के माध्यम से खाद्यान्न तो उपलब्ध होता ही है, साथ ही अनेक प्रमुख उद्योगों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध होता है। कृषि पर बड़ी संख्या में लोगों की निर्भरता तो है ही, साथ में औद्योगिकीकरण में कृषि क्षेत्र की महत्ती भूमिका है। देश में कई महत्त्वपूर्ण उद्योग कृषि उपज पर निर्भर हैं, जैसे कि सूती वस्त्र उद्योग, जुट उद्योग, चीनी उद्योग, चाय उद्योग, तम्बाकू उद्योग या फिर लघु व ग्रामीण उद्योग, जिनके अंतर्गत तेल मिलें, दाल मिलें, आटा मिलें और बेकरी आदि आते कृषिजन्य उत्पाद का व्यापार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ है। दरअसल, कृषि राष्ट्रीय आय का मुख्य स्रोत है। | कृषि के माध्यम से खाद्यान्न तो उपलब्ध होता ही है, साथ ही अनेक प्रमुख उद्योगों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध होता है। कृषि पर बड़ी संख्या में लोगों की निर्भरता तो है ही, साथ में औद्योगिकीकरण में कृषि क्षेत्र की महत्ती भूमिका है। देश में कई महत्त्वपूर्ण उद्योग कृषि उपज पर निर्भर हैं, जैसे कि सूती वस्त्र उद्योग, जुट उद्योग, चीनी उद्योग, चाय उद्योग, तम्बाकू उद्योग या फिर लघु व ग्रामीण उद्योग, जिनके अंतर्गत तेल मिलें, दाल मिलें, आटा मिलें और बेकरी आदि आते कृषिजन्य उत्पाद का व्यापार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ है। दरअसल, कृषि राष्ट्रीय आय का मुख्य स्रोत है। | ||
=कॉरपोरेट्स पर कृपा बरसाने वाले कृषि कानून= | ==कॉरपोरेट्स पर कृपा बरसाने वाले कृषि कानून== | ||
भारतीय कृषि अपने अब तक के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। इस कृषि संकट ने हमारे पूरे ग्रामीण समाज को अपनी चपेट में ले लिया है। कॉरपोरेट घरानों की गोदी सरकार की नीतियां किसान को खेती से बेदख़ल करने की रही हैं। कृषि सुधार के नाम पर लागू किए गए तीन कानून खेती-किसानी को बर्बाद करने वाले, किसानों को कार्पोरेटस् का गुलाम बनाने वाले तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ध्वस्त करने वाले हैं। कैसे? ये पहले विस्तार से बताया जा चुका है। | भारतीय कृषि अपने अब तक के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। इस कृषि संकट ने हमारे पूरे ग्रामीण समाज को अपनी चपेट में ले लिया है। कॉरपोरेट घरानों की गोदी सरकार की नीतियां किसान को खेती से बेदख़ल करने की रही हैं। कृषि सुधार के नाम पर लागू किए गए तीन कानून खेती-किसानी को बर्बाद करने वाले, किसानों को कार्पोरेटस् का गुलाम बनाने वाले तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ध्वस्त करने वाले हैं। कैसे? ये पहले विस्तार से बताया जा चुका है। | ||
Line 32: | Line 40: | ||
कोरोना पैकेज के नाम पर किसानों के लिए जो एक लाख करोड़ के कर्ज देने का प्रावधान किया गया है, वो एग्रीकल्चर के लिए नहीं, बल्कि एग्रो कम्पनी वाले इन कॉरपोरेट घरानों ने कृषि कारोबार के नाम पर हड़प लिया है। किसान को इस पेटे कुछ नहीं मिला। कॉरपोरेटस् पर कृपा बरसाई जा रही है और नाम लिया जा रहा है किसान का। | कोरोना पैकेज के नाम पर किसानों के लिए जो एक लाख करोड़ के कर्ज देने का प्रावधान किया गया है, वो एग्रीकल्चर के लिए नहीं, बल्कि एग्रो कम्पनी वाले इन कॉरपोरेट घरानों ने कृषि कारोबार के नाम पर हड़प लिया है। किसान को इस पेटे कुछ नहीं मिला। कॉरपोरेटस् पर कृपा बरसाई जा रही है और नाम लिया जा रहा है किसान का। | ||
2. कॉन्ट्रैक्ट | 2. '''कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग''' | ||
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में किसान की बज़ाय खरीदार का पक्ष हमेशा मज़बूत रहता है, क्योंकि खरीदने वाला कोई एक आम खरीदार ना होकर बड़ी कंपनी होती है, जिसके पास धन-छल-बल सभी कुछ होता है। कई जगह करार करने के बाद भी किसान से फसल ना खरीदना या पहले से तय दाम से कम दाम पर फसल खरीदना इन कम्पनियों की आम आदत है। करार में फसल की गुणवत्ता और मात्रा आदि कई शर्तें बीमा कंपनियों की तर्ज़ पर थोपी हुई होती हैं, जिनकी बारीकियों को समझना आमजन के लिए संभव नहीं है। पंजाब और गुजरात में किसान ये सब झेल चुके हैं। एक बार करार हो जाने के बाद किसान कम्पनी के चंगुल में चला जाता है और फिर उसे कम्पनी के मुताबिक ही फसल और खेती करनी होती है। करार हमेशा कम्पनी के पक्ष का ही होता है और कम्पनी किसी भी बहाने से (जिसमे फसल की गुणवत्ता कम्पनी के मुताबिक ना होने का बहाना ) करार को तोड़ सकती है। | कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में किसान की बज़ाय खरीदार का पक्ष हमेशा मज़बूत रहता है, क्योंकि खरीदने वाला कोई एक आम खरीदार ना होकर बड़ी कंपनी होती है, जिसके पास धन-छल-बल सभी कुछ होता है। कई जगह करार करने के बाद भी किसान से फसल ना खरीदना या पहले से तय दाम से कम दाम पर फसल खरीदना इन कम्पनियों की आम आदत है। करार में फसल की गुणवत्ता और मात्रा आदि कई शर्तें बीमा कंपनियों की तर्ज़ पर थोपी हुई होती हैं, जिनकी बारीकियों को समझना आमजन के लिए संभव नहीं है। पंजाब और गुजरात में किसान ये सब झेल चुके हैं। एक बार करार हो जाने के बाद किसान कम्पनी के चंगुल में चला जाता है और फिर उसे कम्पनी के मुताबिक ही फसल और खेती करनी होती है। करार हमेशा कम्पनी के पक्ष का ही होता है और कम्पनी किसी भी बहाने से (जिसमे फसल की गुणवत्ता कम्पनी के मुताबिक ना होने का बहाना ) करार को तोड़ सकती है। | ||
Line 38: | Line 46: | ||
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट के जरिए किसान को अब कॉन्ट्रेक्ट में बांध कर कॉरपोरेट निर्देशित करेगा कि किसान को कौन से प्रकार की फसल उगानी है। इसे भी किसान को मोदी जी का दिया तोहफ़ा कह कर प्रचारित किया जा रहा है। | कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट के जरिए किसान को अब कॉन्ट्रेक्ट में बांध कर कॉरपोरेट निर्देशित करेगा कि किसान को कौन से प्रकार की फसल उगानी है। इसे भी किसान को मोदी जी का दिया तोहफ़ा कह कर प्रचारित किया जा रहा है। | ||
3. बाजार आधारित खरीद- फरोख्त व्यवस्था | 3. '''बाजार आधारित खरीद- फरोख्त व्यवस्था''' | ||
प्रधानमंत्री और उनके सभी मंत्री ये कह रहे हैं कि किसानों को अपनी फसल देश मे कहीं भी बेचने की छूट नए कानून में दी गई है। इससे बड़ा कोई झूठ हो नहीं सकता। तथ्यों की सरकार गलतबयानी कर रही है। ये छूट तो पहले से है। किसान को अपना उत्पाद मंडी से बाहर बेचने पर पहले भी कोई रोक नहीं थी। क्या अब से पहले पंजाब का गेहूं राजस्थान में, कश्मीर का सेब दिल्ली-जयपुर में, नागपुर के संतरे उत्तरप्रदेश में या मलिहाबाद के आम मुंबई में नही बिकते थे ? | प्रधानमंत्री और उनके सभी मंत्री ये कह रहे हैं कि किसानों को अपनी फसल देश मे कहीं भी बेचने की छूट नए कानून में दी गई है। इससे बड़ा कोई झूठ हो नहीं सकता। तथ्यों की सरकार गलतबयानी कर रही है। ये छूट तो पहले से है। किसान को अपना उत्पाद मंडी से बाहर बेचने पर पहले भी कोई रोक नहीं थी। क्या अब से पहले पंजाब का गेहूं राजस्थान में, कश्मीर का सेब दिल्ली-जयपुर में, नागपुर के संतरे उत्तरप्रदेश में या मलिहाबाद के आम मुंबई में नही बिकते थे ? | ||
Line 53: | Line 61: | ||
कृषि कानूनों की बारीकियों की समझ रखने वाले श्री सुबेसिंह यादव ( रिटायर्ड आईएएस, पूर्व मंडी विपणन बोर्ड प्रशासक एवं निदेशक, विपणन निदेशालय, राजस्थान ) इन किसान विरोधी इन कृषि सुधार कानूनों के निहितार्थ को इस तरह समझाया है: | कृषि कानूनों की बारीकियों की समझ रखने वाले श्री सुबेसिंह यादव ( रिटायर्ड आईएएस, पूर्व मंडी विपणन बोर्ड प्रशासक एवं निदेशक, विपणन निदेशालय, राजस्थान ) इन किसान विरोधी इन कृषि सुधार कानूनों के निहितार्थ को इस तरह समझाया है: | ||
" राजस्थान एपीएमसी एक्ट राजस्थान 1961 व भारत सरकार का मंडी एक्ट 2020 में मुख्य अंतर यह है कि इस एक्ट के द्वारा देश की कृषि उपज मंडियों को उनके मंडी यार्ड तक सीमित कर दिया गया है। इससे पूर्व देश की मंडियों का क्षेत्र निर्धारित था ,जो कि लगभग एक तहसील के बराबर होता था। उस क्षेत्र में मंडी यार्ड के अलावा भी वे किसी जींस के व्यापार के लिए लाइसेंस जारी कर सकती थी और व्यापार को नियंत्रित कर सकती थी... इस नए एक्ट में जिसका किसान विरोध कर रहे हैं ,एक खास बात यह है कि इससे मंडी का मंडी यार्ड के बाहर लाइसेंस जारी करने और मंडी फीस वसूलने का अधिकार खत्म हो गया है। इसका परिणाम यह होगा की मंडी क्षेत्र से बाहर कृषि व्यापार पर मंडी फीस खत्म हो जाने से जो लगभग 1 से 2 परसेंट तक होती है, व्यापारी बिना मंडी लाइसेंस के कृषि जिंस का व्यापार करना पसंद करेगें। इससे जब मंडी में क्रेता नहीं आएगा तो वहां किसान का अनाज बिकेगा कैसे ? मंडी क्षेत्र का किसान इस बात को समझता है तथा वह यह भी समझता है की उसका कृषि उत्पाद बेचने का प्लेटफार्म खत्म हो गया तो वह बिचौलियों के चंगुल में फंस जाएगा और जो खुली बोली नीलामी का की व्यवस्था मंडी की है वह मंडी से बाहर के बिचौलियों के द्वारा खत्म कर दी जाएगी। उसकी स्थित, मंडी स्थापना से पूर्व की हो जायेगी। जब बिचोलियों द्वारा किसान को लूटा जाता था...वास्तव में यह व्यवस्था बिचौलियों को खत्म करने के लिए नहीं वरन लुटेरा पैदा करने के लिए की गई है। | :" राजस्थान एपीएमसी एक्ट राजस्थान 1961 व भारत सरकार का मंडी एक्ट 2020 में मुख्य अंतर यह है कि इस एक्ट के द्वारा देश की कृषि उपज मंडियों को उनके मंडी यार्ड तक सीमित कर दिया गया है। इससे पूर्व देश की मंडियों का क्षेत्र निर्धारित था ,जो कि लगभग एक तहसील के बराबर होता था। उस क्षेत्र में मंडी यार्ड के अलावा भी वे किसी जींस के व्यापार के लिए लाइसेंस जारी कर सकती थी और व्यापार को नियंत्रित कर सकती थी... इस नए एक्ट में जिसका किसान विरोध कर रहे हैं ,एक खास बात यह है कि इससे मंडी का मंडी यार्ड के बाहर लाइसेंस जारी करने और मंडी फीस वसूलने का अधिकार खत्म हो गया है। इसका परिणाम यह होगा की मंडी क्षेत्र से बाहर कृषि व्यापार पर मंडी फीस खत्म हो जाने से जो लगभग 1 से 2 परसेंट तक होती है, व्यापारी बिना मंडी लाइसेंस के कृषि जिंस का व्यापार करना पसंद करेगें। इससे जब मंडी में क्रेता नहीं आएगा तो वहां किसान का अनाज बिकेगा कैसे ? मंडी क्षेत्र का किसान इस बात को समझता है तथा वह यह भी समझता है की उसका कृषि उत्पाद बेचने का प्लेटफार्म खत्म हो गया तो वह बिचौलियों के चंगुल में फंस जाएगा और जो खुली बोली नीलामी का की व्यवस्था मंडी की है वह मंडी से बाहर के बिचौलियों के द्वारा खत्म कर दी जाएगी। उसकी स्थित, मंडी स्थापना से पूर्व की हो जायेगी। जब बिचोलियों द्वारा किसान को लूटा जाता था...वास्तव में यह व्यवस्था बिचौलियों को खत्म करने के लिए नहीं वरन लुटेरा पैदा करने के लिए की गई है। | ||
नए कानून से छोटे व्यापारियों व मंडी में रोजगार पा रहे मजदूर भी बेरोजगार हो जायेंगे। व्यापारियों का मंडी में दुकानों में करोड़ों रुपये का इन्वेस्टमेंट बेकार हो | :नए कानून से छोटे व्यापारियों व मंडी में रोजगार पा रहे मजदूर भी बेरोजगार हो जायेंगे। व्यापारियों का मंडी में दुकानों में करोड़ों रुपये का इन्वेस्टमेंट बेकार हो जायेगा। कुछ राज्य सरकारों ने केंद्र के कानूनों की काट में अपने नए कानून बनाकर एमएसपी का प्रावधान तो कर दिया है लेकिन, भारत सरकार द्वारा बनाये गए कानून के विरुद्ध होने से, राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना इसे लागू नहीं किया जा सकता है।" | ||
सरकार ने इन कानूनों में संशोधन का जो प्रस्ताव भेजा था, उसमें बड़ी चालाकी से ये लिखा है कि "राज्य सरकार चाहें तो" मंडी के बाहर खरीदार पर टैक्स लगा सकती है। संसद में इन कानूनों को पास करवाकर कृषि के मामले में राज्यों के अधिकारों पर केंद्र सरकार ने पहले से ही अतिक्रमण कर लिया है। केंद्र सरकार के लाडले कॉरपोरेट्स पर कोई टैक्स राज्य सरकार लगाने की हिम्मत कर सकें, ये होने वाला नहीं है। | सरकार ने इन कानूनों में संशोधन का जो प्रस्ताव भेजा था, उसमें बड़ी चालाकी से ये लिखा है कि "राज्य सरकार चाहें तो" मंडी के बाहर खरीदार पर टैक्स लगा सकती है। संसद में इन कानूनों को पास करवाकर कृषि के मामले में राज्यों के अधिकारों पर केंद्र सरकार ने पहले से ही अतिक्रमण कर लिया है। केंद्र सरकार के लाडले कॉरपोरेट्स पर कोई टैक्स राज्य सरकार लगाने की हिम्मत कर सकें, ये होने वाला नहीं है। | ||
Line 64: | Line 71: | ||
कृषि क्षेत्र में सुधार की मांग करने का मतलब किसान हितों के विरोधी कानून लागू करवाना नहीं होता। किसी किसान संगठन ने ऐसे कानूनों की मांग भी नहीं की है। मंडी व्यवस्था में निःसंदेह कुछ खामियां हैं। उनकी संख्या बढ़ाने और उनकी व्यवस्था में सुधार करने की मांग करने का मतलब मंडी व्यवस्था को ध्वस्त कर उसे सुधार का नाम देना कहाँ तक ज़ायज़ है। | कृषि क्षेत्र में सुधार की मांग करने का मतलब किसान हितों के विरोधी कानून लागू करवाना नहीं होता। किसी किसान संगठन ने ऐसे कानूनों की मांग भी नहीं की है। मंडी व्यवस्था में निःसंदेह कुछ खामियां हैं। उनकी संख्या बढ़ाने और उनकी व्यवस्था में सुधार करने की मांग करने का मतलब मंडी व्यवस्था को ध्वस्त कर उसे सुधार का नाम देना कहाँ तक ज़ायज़ है। | ||
=कृषि संकट का समाधान= | ==कृषि संकट का समाधान== | ||
खेती के कॉरपोरेटीकरण की राह को तिलांजलि देकर किसानों को कर्ज से मुक्ति देनी होगी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप फसलों की सम्पूर्ण लागत में 50 प्रतिशत मुनाफ़ा जोड़कर समर्थन मूल्य देने से ही किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सकेगा। बाजार में किसान के मोलभाव की ताकत को बढ़ाने के लिए इस मूल्य पर हर कृषि उत्पाद की सरकारी खरीद सुनिश्चित करने के लिए देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत तथा और भी विस्तारित करना होगा। बटाईदार किसानों को किसान का दर्जा देने के लिए कानून लाना होगा। कृषि में लागत कम करने के लिए बीज, कीटनाशक, उर्वरक और कृषि यंत्रों की कीमतों के जरिये किसानों की भारी कॉरपोरेट लूट को नियंत्रित करना होगा। बीज कंपनियों की लूट से बचने के लिए अपने परम्परागत बीजों को खोजने, संजोने और विकसित करने तथा अपनी परम्परागत जैविक खेती को पुनर्जीवित व परिष्कृत करने पर अपने वैज्ञानिकों व शोध संस्थानों को लगाना होगा ताकि हम साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मकड़जाल से बच सकें | खेती के कॉरपोरेटीकरण की राह को तिलांजलि देकर किसानों को कर्ज से मुक्ति देनी होगी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप फसलों की सम्पूर्ण लागत में 50 प्रतिशत मुनाफ़ा जोड़कर समर्थन मूल्य देने से ही किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सकेगा। बाजार में किसान के मोलभाव की ताकत को बढ़ाने के लिए इस मूल्य पर हर कृषि उत्पाद की सरकारी खरीद सुनिश्चित करने के लिए देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत तथा और भी विस्तारित करना होगा। बटाईदार किसानों को किसान का दर्जा देने के लिए कानून लाना होगा। कृषि में लागत कम करने के लिए बीज, कीटनाशक, उर्वरक और कृषि यंत्रों की कीमतों के जरिये किसानों की भारी कॉरपोरेट लूट को नियंत्रित करना होगा। बीज कंपनियों की लूट से बचने के लिए अपने परम्परागत बीजों को खोजने, संजोने और विकसित करने तथा अपनी परम्परागत जैविक खेती को पुनर्जीवित व परिष्कृत करने पर अपने वैज्ञानिकों व शोध संस्थानों को लगाना होगा ताकि हम साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मकड़जाल से बच सकें | ||
Line 72: | Line 79: | ||
भारत की खेती को लाभकारी बनाने के लिए जरूरी है की मूल्य निर्धारण में जोखिम उठाने का पारिश्रमिक भी जोड़ा जाए और किसानों के जीवन यापन के तत्व को भी उसमें समाहित किया जाए। | भारत की खेती को लाभकारी बनाने के लिए जरूरी है की मूल्य निर्धारण में जोखिम उठाने का पारिश्रमिक भी जोड़ा जाए और किसानों के जीवन यापन के तत्व को भी उसमें समाहित किया जाए। | ||
सरकार, गोदी मीडिया और भक्तजन किसान आंदोलन को माओइस्ट का आंदोलन कहकर इसे बदनाम कर रहे हैं। कभी इसे लेफ्ट की साजिश बता रहे हैं। इससे पहले इस आंदोलन को खालिस्तानियों की ,कभी पाकिस्तान की तो कभी काँग्रेस की साजिश कहकर बदनाम करने का प्रयास किया गया। विदेशी फंडिंग जैसी अफवाहों को भी फैलाया गया है। सरकार ने अब नया पैंतरा चला है। आंदोलनकारियों की भीड़ में सरकार अपने कुछ गुर्गे घुसा रही है। उनसे देश विरोधी नारे लगवाकर इस शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है। कृषि मंत्री बंगले के गमलों में फर्जी किसान संगठन उगा रहे हैं। किसान संगठनों में फूट डालने का परखा हुआ अस्त्र काम में ले रही है। किसान संगठनो को सावचेती बरतनी होगी। | सरकार, गोदी मीडिया और भक्तजन किसान आंदोलन को माओइस्ट का आंदोलन कहकर इसे बदनाम कर रहे हैं। कभी इसे लेफ्ट की साजिश बता रहे हैं। इससे पहले इस आंदोलन को खालिस्तानियों की, कभी पाकिस्तान की तो कभी काँग्रेस की साजिश कहकर बदनाम करने का प्रयास किया गया। विदेशी फंडिंग जैसी अफवाहों को भी फैलाया गया है। सरकार ने अब नया पैंतरा चला है। आंदोलनकारियों की भीड़ में सरकार अपने कुछ गुर्गे घुसा रही है। उनसे देश विरोधी नारे लगवाकर इस शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है। कृषि मंत्री बंगले के गमलों में फर्जी किसान संगठन उगा रहे हैं। किसान संगठनों में फूट डालने का परखा हुआ अस्त्र काम में ले रही है। किसान संगठनो को सावचेती बरतनी होगी। | ||
------------------------------------------------------------- | ------------------------------------------------------------- | ||
Line 81: | Line 88: | ||
दिनांक: 15 दिसम्बर, 2020 | दिनांक: 15 दिसम्बर, 2020 | ||
------------------------------------------- | ------------------------------------------- | ||
== चित्र गैलरी == | |||
<gallery> | |||
File:Article by Sompal Shastri in Jagran Newspaper dated 21 December 2020.jpg|दैनिक जागरण दिनांक 21 दिसंबर 2020 में सोमपाल शास्त्री जी का एक लेख | |||
</gallery> | |||
== संदर्भ == | |||
<references/> | |||
[[Category:General Articles]] | |||
[[Category:General]] |
Latest revision as of 11:57, 14 February 2021
लेखक : प्रो. एचआर ईसराण, पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राजस्थान |
कॉरपोरेट्स और नए कृषि कानून
वास्तविक भारत गांवों में बसता है और खेती-किसानी से जुड़ा हुआ है। देश की सत्ता तथा प्रशासनिक बागडोर शहरों में पले- बढ़े और पूंजीपतियों की सरपरस्ती वाले अफ़सरों के हाथों में सिमटी हुई है जो न तो गांवों की समस्याओं से परिचित हैं, न ही उनकी जरूरतों तथा ग्रामीणों के मनोविज्ञान को समझते हैं। विडंबना है कि गमलों में उगे हुये कांटेदार "केक्टस".. छायादार व फलदार दरख्तों के लिये कानून बनाते हैं !
कृषि वस्तुतः भारतीय अर्थव्यवस्था की मेरुदण्ड है। जहां एक ओर यह प्रमुख रोजगार प्रदाता क्षेत्र है, वहीं सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। 1947 में भारत की आज़ादी के वक्त देश की जीडीपी में कृषि का हिस्सा 52 प्रतिशत था तथा हमारी आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा तब सीधे कृषि से जुड़ा था। 1991 में जब नई आर्थिक नीतियां लागू की गई थीं तो उस समय जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 34.9 प्रतिशत था। वर्तमान में हमारी आबादी का क़रीब 55 प्रतिशत हिस्सा अपनी आजीविका हेतु कृषि पर ही निर्भर है और जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगभग 14 प्रतिशत बचा है।
कृषि की विकास दर
प्रधानमन्त्री बनने पर डा. मनमोहन सिंह ने अपने पहले बजट में गांवों में सिंचाई सुविधाओं से लेकर आधारभूत भंडारण क्षमता के निर्माण की तरफ ध्यान दिया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान लागू की गई किसान क्रेडिट कार्ड योजना का विस्तार करते हुए किसानों को खेती के अलावा अपनी अन्य जरूरतों के लिए भी बैंकों से लोन लेने की सुविधा का विस्तार किया। वर्तमान मोदी सरकार सिर्फ भारी उद्योगों को ही अपनी आर्थिक नीतियों में तरजीह दे रही है। मोदी सरकार के पिछले बजट में तो सिंचाई बजट में लगभग 65 प्रतिशत की कटौती की गई है।
यूपीए-एक के शासन में भारत की औसत कृषि विकास दर 3.1 प्रतिशत और यूपीए-दो के शासन में 4.3 प्रतिशत थी। भारत के किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का दम्भ भरने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के शासन के वर्ष 2019 में भारत की कृषि विकास दर 2.7 प्रतिशत पर आ गई। वित्त वर्ष 2020-21 में कृषि एवं संबंधित क्षेत्र की आर्थिक विकास दर 2.8 फीसदी रहने का अनुमान है ( आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 का अनुमान। )
कृषि क्षेत्र का महत्व
कृषि के माध्यम से खाद्यान्न तो उपलब्ध होता ही है, साथ ही अनेक प्रमुख उद्योगों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध होता है। कृषि पर बड़ी संख्या में लोगों की निर्भरता तो है ही, साथ में औद्योगिकीकरण में कृषि क्षेत्र की महत्ती भूमिका है। देश में कई महत्त्वपूर्ण उद्योग कृषि उपज पर निर्भर हैं, जैसे कि सूती वस्त्र उद्योग, जुट उद्योग, चीनी उद्योग, चाय उद्योग, तम्बाकू उद्योग या फिर लघु व ग्रामीण उद्योग, जिनके अंतर्गत तेल मिलें, दाल मिलें, आटा मिलें और बेकरी आदि आते कृषिजन्य उत्पाद का व्यापार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ है। दरअसल, कृषि राष्ट्रीय आय का मुख्य स्रोत है।
कॉरपोरेट्स पर कृपा बरसाने वाले कृषि कानून
भारतीय कृषि अपने अब तक के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। इस कृषि संकट ने हमारे पूरे ग्रामीण समाज को अपनी चपेट में ले लिया है। कॉरपोरेट घरानों की गोदी सरकार की नीतियां किसान को खेती से बेदख़ल करने की रही हैं। कृषि सुधार के नाम पर लागू किए गए तीन कानून खेती-किसानी को बर्बाद करने वाले, किसानों को कार्पोरेटस् का गुलाम बनाने वाले तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ध्वस्त करने वाले हैं। कैसे? ये पहले विस्तार से बताया जा चुका है।
तीनों कानून किसान-हितों पर कुठाराघात करते हुए कॉरपोरेट घरानों को कई छूट देते हैं। कॉरपोरेट्स पर कृपा बरसाने वाले कानून हैं। ये कानून बाजार आधारित खरीद फरोख्त व्यवस्था, असिमित स्टॉक और कॉन्ट्रैक्ट खेती के जरिए खेती को कॉरपोरेट घरानों के हवाले करने की राह आसान करने वाले हैं।
अडानी और अम्बानी ने रिटेल में घुसकर अपना नेटवर्क तैयार कर रखा है। अब नज़र खाद्यान्न बाजार पर टिकी हुई है। पहले की सरकारों द्वारा बनाये गए कुछ कानून इन कॉरपोरेटस् की राह में अड़चन खड़ी कर रहे थे। इसलिए कॉपोरेट्स को खुश करने के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों के अधिकार को हड़पते हुए पूरे देश के लिए नए एक्ट बना दिए। नाम किसान का, असली एजेंडा है कॉरपोरेट्स पर कृपा बरसाना।
1. पूर्व की सरकारों द्वारा जमाखोरी रोकने के लिये बनाया गया जमाखोरी विरोधी कानून Essential Commodity Act (आवश्यक वस्तु अधिनियम) जमाखोरों की राह में रोड़ा बना हुआ था। कॉरपोरेट्स पर कृपालु दृष्टि रखने वाली मोदी सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर आम उपभोग की आवश्यक वस्तुओं के असीमित भंडारण की छूट दे दी है। कॉरपोरेटस् को अब खाद्यान्न व कृषि जिंसों की अपार मात्रा लंबे समय तक स्टोर करने की आज़ादी मिल गई है। अब खाद्यान्न एवं आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी कितनी भी मात्रा तक और कितने भी समय तक करना अपराध नहीं रह गया है। जमाखोरी को कानूनी जामा पहनाने के लिए सरकार ने जमाखोरी विरोधी कानून में संशोधन किया है। सबको पता है कि आवश्यक वस्तुओं की बेरोकटोक जमाखोरी से कीमतें बढ़ती हैं और इसकी मार सभी उपभोक्ताओं पर पड़ती है।
असीमित स्टोर करने की आज़ादी और छूट जमाखोरों को, नाम लिया जा रहा है किसान का! क्या यह सब किसानों के हित में है ? इस जमाखोरी का सीधा असर खाद्य पदार्थों की महंगाई पर पड़ना तय है। इस जमाखोरी से किसान को कोई फायदा नहीं होना क्योंकि उसके पास तो भंडारण की क्षमता ही नही है।
आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन का बिल संसद में पेश होने से पहले ही देश भर में अडाणी ने लाखों टन भंडारण की क्षमता वाले बड़े-बड़े गोदाम बना लिए। एग्रो कंपनियां बना ली गई गयी हैं। कृषि कानूनों का अध्यादेश आया जून में, कानून बना सितंबर में और कॉरपोरेटस् के गोदाम एक साल पहले से ही बन कर तैयार हो रहे हैं।
कोरोना पैकेज के नाम पर किसानों के लिए जो एक लाख करोड़ के कर्ज देने का प्रावधान किया गया है, वो एग्रीकल्चर के लिए नहीं, बल्कि एग्रो कम्पनी वाले इन कॉरपोरेट घरानों ने कृषि कारोबार के नाम पर हड़प लिया है। किसान को इस पेटे कुछ नहीं मिला। कॉरपोरेटस् पर कृपा बरसाई जा रही है और नाम लिया जा रहा है किसान का।
2. कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में किसान की बज़ाय खरीदार का पक्ष हमेशा मज़बूत रहता है, क्योंकि खरीदने वाला कोई एक आम खरीदार ना होकर बड़ी कंपनी होती है, जिसके पास धन-छल-बल सभी कुछ होता है। कई जगह करार करने के बाद भी किसान से फसल ना खरीदना या पहले से तय दाम से कम दाम पर फसल खरीदना इन कम्पनियों की आम आदत है। करार में फसल की गुणवत्ता और मात्रा आदि कई शर्तें बीमा कंपनियों की तर्ज़ पर थोपी हुई होती हैं, जिनकी बारीकियों को समझना आमजन के लिए संभव नहीं है। पंजाब और गुजरात में किसान ये सब झेल चुके हैं। एक बार करार हो जाने के बाद किसान कम्पनी के चंगुल में चला जाता है और फिर उसे कम्पनी के मुताबिक ही फसल और खेती करनी होती है। करार हमेशा कम्पनी के पक्ष का ही होता है और कम्पनी किसी भी बहाने से (जिसमे फसल की गुणवत्ता कम्पनी के मुताबिक ना होने का बहाना ) करार को तोड़ सकती है।
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट के जरिए किसान को अब कॉन्ट्रेक्ट में बांध कर कॉरपोरेट निर्देशित करेगा कि किसान को कौन से प्रकार की फसल उगानी है। इसे भी किसान को मोदी जी का दिया तोहफ़ा कह कर प्रचारित किया जा रहा है।
3. बाजार आधारित खरीद- फरोख्त व्यवस्था
प्रधानमंत्री और उनके सभी मंत्री ये कह रहे हैं कि किसानों को अपनी फसल देश मे कहीं भी बेचने की छूट नए कानून में दी गई है। इससे बड़ा कोई झूठ हो नहीं सकता। तथ्यों की सरकार गलतबयानी कर रही है। ये छूट तो पहले से है। किसान को अपना उत्पाद मंडी से बाहर बेचने पर पहले भी कोई रोक नहीं थी। क्या अब से पहले पंजाब का गेहूं राजस्थान में, कश्मीर का सेब दिल्ली-जयपुर में, नागपुर के संतरे उत्तरप्रदेश में या मलिहाबाद के आम मुंबई में नही बिकते थे ?
कृषि जींस में वे फसलें जो मिनिमम स्पोर्ट प्राइस पर सरकार खरीदती है उन्हें ही संबंधित मंडी में किसान बेचते थे ताकि उन्हें न्यूनतम मूल्य मिल सके। मंडी के बाहर खुले बाज़ार में व्यापारी किसान की उपज एमएसपी से कम पर ही खरीदता है। हर इलाके में मंडी व्यवस्था नहीं होने या मंडी में धान खरीदी नहीं होने पर किसान मजबूरी में बाजार में एमएसपी से कम दाम पर फसल बेचता है। हक़ीक़त तो ये है कि मंडी के बाहर खुले बाज़ार में व्यापारी किसान की उपज एमएसपी से कम पर ही खरीदता है। बता दें कि मंडी फीस भी किसान को नहीं देनी होती है। सिर्फ व्यापारी को मंडी फीस का भुगतान करना होता है। यह मंडी फीस पूरे मंडी क्षेत्र में मंडी यार्ड के अलावा भी ग्रामीण सड़कों को बनाने वह अन्य विकास कार्यों में काम आती है।
प्रधानमंत्री कहते हैं कि किसान बिल से मंडियां ख़त्म नहीं होगी। जब नए कानून के अनुसार मंडी में खरीदने- बेचने पर टैक्स लगेगा, और बाहर टैक्स फ्री खेल चलेगा तो मंडियां कब तक टिक पाएंगी ? अन्य सरकारी उपक्रमों की तरह आखिर में इन मंडियों को कौड़ियों में कॉरपोरेट्स को बेचने की यह एक सुविचारित योजना है।
साल-दो साल में APMC मंडियों और MSP की हालत वही होगी जो आज BSNL की है। MSP की गारंटी बहुत जरूरी है और हर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर बाज़ार में उससे कम कीमत पर खरीद का कानूनी प्रावधान किए बिना नए कानून का किसानों के लिए कोई मतलब नहीं है।
नये कृषि कानून में पूंजीपतियों का हितसाधने के लिए किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) देने की बंदिश नहीं लगाई गई है। MSP के नीचे फसल बिकना गैरकानूनी होगा, यह एक लाइन इस बिल में जोड़ने से आनाकानी कर रही है। किसानों को एमएसपी का लिखित आश्वासन नहीं बल्कि इस बाबत कानूनी गारंटी चाहिए।
कृषि कानूनों की बारीकियों की समझ रखने वाले श्री सुबेसिंह यादव ( रिटायर्ड आईएएस, पूर्व मंडी विपणन बोर्ड प्रशासक एवं निदेशक, विपणन निदेशालय, राजस्थान ) इन किसान विरोधी इन कृषि सुधार कानूनों के निहितार्थ को इस तरह समझाया है:
- " राजस्थान एपीएमसी एक्ट राजस्थान 1961 व भारत सरकार का मंडी एक्ट 2020 में मुख्य अंतर यह है कि इस एक्ट के द्वारा देश की कृषि उपज मंडियों को उनके मंडी यार्ड तक सीमित कर दिया गया है। इससे पूर्व देश की मंडियों का क्षेत्र निर्धारित था ,जो कि लगभग एक तहसील के बराबर होता था। उस क्षेत्र में मंडी यार्ड के अलावा भी वे किसी जींस के व्यापार के लिए लाइसेंस जारी कर सकती थी और व्यापार को नियंत्रित कर सकती थी... इस नए एक्ट में जिसका किसान विरोध कर रहे हैं ,एक खास बात यह है कि इससे मंडी का मंडी यार्ड के बाहर लाइसेंस जारी करने और मंडी फीस वसूलने का अधिकार खत्म हो गया है। इसका परिणाम यह होगा की मंडी क्षेत्र से बाहर कृषि व्यापार पर मंडी फीस खत्म हो जाने से जो लगभग 1 से 2 परसेंट तक होती है, व्यापारी बिना मंडी लाइसेंस के कृषि जिंस का व्यापार करना पसंद करेगें। इससे जब मंडी में क्रेता नहीं आएगा तो वहां किसान का अनाज बिकेगा कैसे ? मंडी क्षेत्र का किसान इस बात को समझता है तथा वह यह भी समझता है की उसका कृषि उत्पाद बेचने का प्लेटफार्म खत्म हो गया तो वह बिचौलियों के चंगुल में फंस जाएगा और जो खुली बोली नीलामी का की व्यवस्था मंडी की है वह मंडी से बाहर के बिचौलियों के द्वारा खत्म कर दी जाएगी। उसकी स्थित, मंडी स्थापना से पूर्व की हो जायेगी। जब बिचोलियों द्वारा किसान को लूटा जाता था...वास्तव में यह व्यवस्था बिचौलियों को खत्म करने के लिए नहीं वरन लुटेरा पैदा करने के लिए की गई है।
- नए कानून से छोटे व्यापारियों व मंडी में रोजगार पा रहे मजदूर भी बेरोजगार हो जायेंगे। व्यापारियों का मंडी में दुकानों में करोड़ों रुपये का इन्वेस्टमेंट बेकार हो जायेगा। कुछ राज्य सरकारों ने केंद्र के कानूनों की काट में अपने नए कानून बनाकर एमएसपी का प्रावधान तो कर दिया है लेकिन, भारत सरकार द्वारा बनाये गए कानून के विरुद्ध होने से, राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना इसे लागू नहीं किया जा सकता है।"
सरकार ने इन कानूनों में संशोधन का जो प्रस्ताव भेजा था, उसमें बड़ी चालाकी से ये लिखा है कि "राज्य सरकार चाहें तो" मंडी के बाहर खरीदार पर टैक्स लगा सकती है। संसद में इन कानूनों को पास करवाकर कृषि के मामले में राज्यों के अधिकारों पर केंद्र सरकार ने पहले से ही अतिक्रमण कर लिया है। केंद्र सरकार के लाडले कॉरपोरेट्स पर कोई टैक्स राज्य सरकार लगाने की हिम्मत कर सकें, ये होने वाला नहीं है।
किसान आंदोलन सिर्फ किसानों के अपने हितों के लिए रक्षा के लिए नहीं बल्कि सभी उपभोक्ताओं के हितों से जुड़ा हुआ है। अगर किसान को अपनी उपज के लिए 10 रू मिले और उसके लिए उपभोक्ता को बिचौलियों के अधीन बाज़ार में 100 रू देने पड़ें तो क्या यह सभी उपभोक्ताओं का शोषण नहीं है। इसी के खिलाफ किसान आंदोलनरत हैं।
कृषि क्षेत्र में सुधार की मांग करने का मतलब किसान हितों के विरोधी कानून लागू करवाना नहीं होता। किसी किसान संगठन ने ऐसे कानूनों की मांग भी नहीं की है। मंडी व्यवस्था में निःसंदेह कुछ खामियां हैं। उनकी संख्या बढ़ाने और उनकी व्यवस्था में सुधार करने की मांग करने का मतलब मंडी व्यवस्था को ध्वस्त कर उसे सुधार का नाम देना कहाँ तक ज़ायज़ है।
कृषि संकट का समाधान
खेती के कॉरपोरेटीकरण की राह को तिलांजलि देकर किसानों को कर्ज से मुक्ति देनी होगी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप फसलों की सम्पूर्ण लागत में 50 प्रतिशत मुनाफ़ा जोड़कर समर्थन मूल्य देने से ही किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सकेगा। बाजार में किसान के मोलभाव की ताकत को बढ़ाने के लिए इस मूल्य पर हर कृषि उत्पाद की सरकारी खरीद सुनिश्चित करने के लिए देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत तथा और भी विस्तारित करना होगा। बटाईदार किसानों को किसान का दर्जा देने के लिए कानून लाना होगा। कृषि में लागत कम करने के लिए बीज, कीटनाशक, उर्वरक और कृषि यंत्रों की कीमतों के जरिये किसानों की भारी कॉरपोरेट लूट को नियंत्रित करना होगा। बीज कंपनियों की लूट से बचने के लिए अपने परम्परागत बीजों को खोजने, संजोने और विकसित करने तथा अपनी परम्परागत जैविक खेती को पुनर्जीवित व परिष्कृत करने पर अपने वैज्ञानिकों व शोध संस्थानों को लगाना होगा ताकि हम साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मकड़जाल से बच सकें
जब किसी प्राकृतिक संसाधन व कृषि उत्पाद के व्यापार पर उद्योगपतियों का कब्ज़ा हो जाता है तो वस्तुओं को मनमर्जी की ऊंची कीमतों पर बेचकर उपभोक्ता का शोषण करते हैं। उदाहरण हमारे सामने हैं। नमक 50 पैसे प्रति किलो बिका करता था। अब आयोडीन युक्त नमक के नाम से नमक व्यवसाय उद्योगपतियों के हाथ में सिमट चुका है और यह ₹20 प्रति किलो बिक रहा है। धरती के गर्भ से पानी का दोहन कर बोतल में बंद कर इसे दूध से भी महंगे दामों पर ₹20 लीटर बेचा जा रहा है। कॉरपोरेट घरानों का कृषि क्षेत्र में कब्ज़ा जम जाने के बाद कृषि उत्पादों की मनमानी क़ीमतें वसूली जाएंगी।
भारत की खेती को लाभकारी बनाने के लिए जरूरी है की मूल्य निर्धारण में जोखिम उठाने का पारिश्रमिक भी जोड़ा जाए और किसानों के जीवन यापन के तत्व को भी उसमें समाहित किया जाए।
सरकार, गोदी मीडिया और भक्तजन किसान आंदोलन को माओइस्ट का आंदोलन कहकर इसे बदनाम कर रहे हैं। कभी इसे लेफ्ट की साजिश बता रहे हैं। इससे पहले इस आंदोलन को खालिस्तानियों की, कभी पाकिस्तान की तो कभी काँग्रेस की साजिश कहकर बदनाम करने का प्रयास किया गया। विदेशी फंडिंग जैसी अफवाहों को भी फैलाया गया है। सरकार ने अब नया पैंतरा चला है। आंदोलनकारियों की भीड़ में सरकार अपने कुछ गुर्गे घुसा रही है। उनसे देश विरोधी नारे लगवाकर इस शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है। कृषि मंत्री बंगले के गमलों में फर्जी किसान संगठन उगा रहे हैं। किसान संगठनों में फूट डालने का परखा हुआ अस्त्र काम में ले रही है। किसान संगठनो को सावचेती बरतनी होगी।
✍️✍️ हनुमानाराम ईसराण
पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राज.
दिनांक: 15 दिसम्बर, 2020
चित्र गैलरी
-
दैनिक जागरण दिनांक 21 दिसंबर 2020 में सोमपाल शास्त्री जी का एक लेख