Devendra Jhajharia: Difference between revisions

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*Devendra can be contacted at - 9414665925
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*Vill. - [[Dhani Jaipuria Khalasa]], Teh. - [[Rajgarh Churu]], [[Churu]],
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== देवेन्द्र झाझडिया का जीवन परिचय ==
== देवेन्द्र झाझड़िया का जीवन परिचय ==
देवेन्द्र झाझड़िया का जन्म गाँव [[झाझड़िया की ढाणी]], तहसील राजगढ़, जिला चुरू राजस्थान में हुआ. आपके पिता का नाम रामसिंह झाझड़िया तथा माता का नाम जीवनी देवी है. जब वह 7-8 वर्ष के थे तो उनका बायाँ हाथ बिजली दुर्घटना में गमाना पड़ा. आपके पिता ने पढ़ने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग-65 पर स्थित [[रतनपुरा]] गाँव में भेजा. रतनपुरा को हडियाल स्टेशन के नाम से जाना जाता है. वहां से आपने 10 वीं तक की पढाई की.
देवेन्द्र झाझड़िया का जन्म गाँव [[Jhajharia Ki Dhani|झाझड़िया की ढाणी]], तहसील [[Rajgarh Churu|राजगढ़]], जिला चुरू राजस्थान में हुआ. आपके पिता का नाम रामसिंह झाझड़िया तथा माता का नाम जीवनी देवी है. जब वह 7-8 वर्ष के थे तो उनका बायाँ हाथ बिजली दुर्घटना में गमाना पड़ा. आपके पिता ने पढ़ने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग-65 पर स्थित '''[[Ratanpura Churu|रतनपुरा]]''' गाँव में भेजा. रतनपुरा को हडियाल स्टेशन के नाम से जाना जाता है. वहां से आपने 10 वीं तक की पढाई की.


देवेन्द्र के विकलांग होते हुए भी उनके मन में कुछ कर गुजरने के जज्बात थे. पढाई के साथ-साथ आपको अभावपूर्ण तथा सुविधाहीन स्थिति में भी रेत के धोरों के बीच भाला फैंकने का सनक सवार हुआ. पहले खेत से सरकंडे तोड़ उन्हें भाले की तरह फैंकना शुरू किया, फिर उसके साथ -साथ खेजड़ी पेड़ की लकड़ियों से भाला बनाकर एकलव्य की भांति अभ्यास शुरू किया. गाँव के स्कूल में भाला नहीं था. पिता रामसिंह की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि भला खरीद सकें. देवेन्द्र रोजाना स्थानीय रूप से बनाया गया भाला फैंकने का 5 -6 घंटे  प्रयास करने लगा. धीरे-धीरे वह भाला फेंकने में पारंगत हो गया  और कक्षा 10 वीं में ही जिलास्तरीय एथलेटिक्स टूर्नामेंट में पहली बार स्वर्ण पदक हासिल किया. प्रथम बार स्वर्ण पदक हासिल करने के बाद उसने कभी भी पीछे मुड़कर  नहीं देखा. देवेन्द्र के 10 वीं परीक्षा उत्तीर्ण होते ही आर.डी. सिंह कोच उसको अपने साथ ले गए और हनुमानगढ़ कस्बे की नेहरू कालेज में भर्ती कराया और कोच ने तैयारी शुरू करवादी. यहाँ से देवेन्द्र नें बी.ए. वाई. एम.डी.एस. अजमेर यूनिवर्सिटी से सन 2001 में पास की.
देवेन्द्र के विकलांग होते हुए भी उनके मन में कुछ कर गुजरने के जज्बात थे. पढाई के साथ-साथ आपको अभावपूर्ण तथा सुविधाहीन स्थिति में भी रेत के धोरों के बीच भाला फैंकने का सनक सवार हुआ. पहले खेत से सरकंडे तोड़ उन्हें भाले की तरह फैंकना शुरू किया, फिर उसके साथ -साथ खेजड़ी पेड़ की लकड़ियों से भाला बनाकर एकलव्य की भांति अभ्यास शुरू किया. गाँव के स्कूल में भाला नहीं था. पिता रामसिंह की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि भला खरीद सकें. देवेन्द्र रोजाना स्थानीय रूप से बनाया गया भाला फैंकने का 5-6 घंटे  प्रयास करने लगा. धीरे-धीरे वह भाला फेंकने में पारंगत हो गया  और कक्षा 10 वीं में ही जिलास्तरीय एथलेटिक्स टूर्नामेंट में पहली बार स्वर्ण पदक हासिल किया. प्रथम बार स्वर्ण पदक हासिल करने के बाद उसने कभी भी पीछे मुड़कर  नहीं देखा. देवेन्द्र के 10 वीं परीक्षा उत्तीर्ण होते ही आर.डी. सिंह कोच उसको अपने साथ ले गए और हनुमानगढ़ कस्बे की नेहरू कालेज में भर्ती कराया और कोच ने तैयारी शुरू करवादी. यहाँ से देवेन्द्र नें बी.ए. वाई. एम.डी.एस. अजमेर यूनिवर्सिटी से सन 2001 में पास की.


सन 1995 में आल इण्डिया यूनिवर्सिटी गेम्स में 67 मीटर की दूरी तक भाला फेंकने का रिकार्ड बनाया तो एक नयी पहचान मिली. उसके बाद 1998 तक विश्वविद्यालय स्तर पर प्रथम रहने से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक की विकलांग स्पर्धाओं तथा वर्ष 2002 में 8 वें बुसान एसियाड में स्वर्ण जीतकर भारत का परचम लहराया. वर्ष 2003 में ब्रिटिश थ्रो, ट्रिपल जम्प और शाट-फूट तीनों स्पर्धाओं में तीन स्वरण पदक जीते.
सन 1995 में आल इण्डिया यूनिवर्सिटी गेम्स में 67 मीटर की दूरी तक भाला फेंकने का रिकार्ड बनाया तो एक नयी पहचान मिली. उसके बाद 1998 तक विश्वविद्यालय स्तर पर प्रथम रहने से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक की विकलांग स्पर्धाओं तथा वर्ष 2002 में 8 वें बुसान एसियाड में स्वर्ण जीतकर भारत का परचम लहराया. वर्ष 2003 में ब्रिटिश थ्रो, ट्रिपल जम्प और शाट-फूट तीनों स्पर्धाओं में तीन स्वरण पदक जीते.


पिछले दो वर्षों में देवेन्द्र के उत्कृष्ट प्रदर्शन से ही उनका चयन ओलम्पिक खेलों के लिए हुआ था. देवेन्द्र के पिता कहते हैं कि अच्छी रेंज की प्रतियोगिता के लिए उपयोग किया जाने वाला भाला 4 -5 लाख रुपये में आता है जिसे खरीद पाना हमारे बस में नहीं है. देवेन्द्र का यह दुर्भाग्य रहा कि उसने शुरू में सहायता के लिए प्रयास किये परन्तु न तो राजस्थान सरकार ने और न खेल संस्थाओं ने उसको सगयोग किया.
पिछले दो वर्षों में देवेन्द्र के उत्कृष्ट प्रदर्शन से ही उनका चयन ओलम्पिक खेलों के लिए हुआ था. देवेन्द्र के पिता कहते हैं कि अच्छी रेंज की प्रतियोगिता के लिए उपयोग किया जाने वाला भाला 4 -5 लाख रुपये में आता है जिसे खरीद पाना हमारे बस में नहीं है. देवेन्द्र का यह दुर्भाग्य रहा कि उसने शुरू में सहायता के लिए प्रयास किये परन्तु न तो राजस्थान सरकार ने और न खेल संस्थाओं ने उसको सगयोग किया.
रामस्वरूप जी आर्य ने प्रथम  बार 2002 के बुसान एसियाड में खेलने जाने के लिए 75 हजार रुपये की सहायता भेजी. बुसान स्वर्ण पदक पाने के बाद अमेरिका प्रवासी खेल प्रेमी रामस्वरूप आर्य, कालीरावण,  हरयाणा ने देवेन्द्र के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का भाला भेजा.  जिसे 26 सितम्बर 2002 को रुस्तमे हिंद दारा सिंह ने यह भाला देवेन्द्र को राजगढ़ में भेंट किया. देवेन्द्र ने ब्रिटिश ओलम्पिक 2003 और एथेंस ओलम्पिक 2004 में इस भाले की लाज रखी.
'''रामस्वरूप जी आर्य''' ने प्रथम  बार 2002 के बुसान एसियाड में खेलने जाने के लिए 75 हजार रुपये की सहायता भेजी. बुसान स्वर्ण पदक पाने के बाद अमेरिका प्रवासी खेल प्रेमी '''रामस्वरूप आर्य''', [[Kalirawana|कालीरावण]][[हरयाणा]] ने देवेन्द्र के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का भाला भेजा.  जिसे 26 सितम्बर 2002 को [[Dara Singh|रुस्तमे हिंद दारासिंह]] ने यह भाला देवेन्द्र को राजगढ़ में भेंट किया. देवेन्द्र ने ब्रिटिश ओलम्पिक 2003 और एथेंस ओलम्पिक 2004 में इस भाले की लाज रखी.


रेतीले धोरों पर नंगे पैरों के अभ्यस्त देवेन्द्र के लिए केवल भाले का अभाव ही समस्या नहीं थी उसके लिए जूते  पहन कर सिंथेटिक टर्फ पर दौड़ लगाना भी बहुत बड़ी बाधा थी.  लेकिन सभी अभाओं और बाधाओं के बावजूद भी कुछ कर दिखाया, नया रिकार्ड बनाया, राष्ट्र के लिए स्वर्ण पदक जुटाया, और देश का नाम रोशन किया.
रेतीले धोरों पर नंगे पैरों के अभ्यस्त देवेन्द्र के लिए केवल भाले का अभाव ही समस्या नहीं थी उसके लिए जूते  पहन कर सिंथेटिक टर्फ पर दौड़ लगाना भी बहुत बड़ी बाधा थी.  लेकिन सभी अभाओं और बाधाओं के बावजूद भी कुछ कर दिखाया, नया रिकार्ड बनाया, राष्ट्र के लिए स्वर्ण पदक जुटाया, और देश का नाम रोशन किया.


देवेन्द्र ने 21 सितम्बर 2004 में एथेंस ओलम्पिक  में जेवलियन थ्रो में नया विश्व रिकार्ड बनाया, राष्ट्र के लिए पहली बार ओलम्पिक में 1945 के बाद पिछले 50 वर्ष में स्वर्ण पदक दिलाकर राष्ट्र को गौरवानित किया. पूर्व के अपने ही रिकार्ड 59.77 मीटर को तोड़कर पांचवें राऊंड में 62.15 मीटर भाला फेंका. राष्ट्रीय धुन के साथ वहां उपस्थित भारतीय मूल के लोग ख़ुशी के मारे झूम उठे. देवेन्द्र  के  एथेंस पैरा ओलम्पिक 2004 में स्वर्ण  पदक  पाने  के  समाचार की पहले पहल बीबीसी ने खबर प्रसारित की थी, लेकिन भारतीय मीडिया सोया रहा. राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री, खेलमंत्री सुनीलदत्त आदि ने बधाई सन्देश भेजे.
'''एथेंस ओलम्पिक में स्वर्ण पदक''' - देवेन्द्र ने '''21 सितम्बर 2004''' में एथेंस ओलम्पिक  में जेवलियन थ्रो में नया विश्व रिकार्ड बनाया, राष्ट्र के लिए पहली बार ओलम्पिक में 1945 के बाद पिछले 50 वर्ष में स्वर्ण पदक दिलाकर राष्ट्र को गौरवान्वित किया. पूर्व के अपने ही रिकार्ड 59.77 मीटर को तोड़कर पांचवें राऊंड में 62.15 मीटर भाला फेंका. राष्ट्रीय धुन के साथ वहां उपस्थित भारतीय मूल के लोग ख़ुशी के मारे झूम उठे. देवेन्द्र  के  एथेंस पैरा ओलम्पिक 2004 में स्वर्ण  पदक  पाने  के  समाचार की पहले पहल बीबीसी ने खबर प्रसारित की थी, लेकिन भारतीय मीडिया सोया रहा. राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री, खेलमंत्री सुनीलदत्त आदि ने बधाई सन्देश भेजे.


लेकिन राजस्थान सरकार ने इसका कष्ट नहीं उठाया. देवेन्द्र झाझडिया को बधाई तो दूर की बात है देश के प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी एक अक्षर तक नहीं लिखा जबकि एक अन्य उच्च  खानदानी  'रजत पदक' विजेता के घर, परिवार, गाँव, शयन-कक्ष आदि के चित्र छापकर गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोडी. देवेन्द्र झाझडिया एक गाँव का किसान का बेटा था. उसको स्वर्ण पदक लाने पर जो सुविधाएँ मिलनी चाहिए  थीं वे नहीं मिली तब प्रिंट मीडिया, महानगर टाइम्स, इवनिंग पोस्ट जयपुर ने अपने सम्पादकीय में लिखा 'झाझडिया को क्यों भूली सरकार' . तब राजस्थान सरकार चेती और वहां के खेलमंत्री युनूस खान ने 133 देशों में पैरा ओलम्पिक में 50 साल बाद पहली बार स्वर्ण पदक दिलाने वाले देवेन्द्र झाझडिया को 21 अक्टूबर 2004 को 11 लाख रुपये का चेक दिया और सम्मानित किया . बाद में उसको अर्जुन अवार्ड भी दिया गया.
'''झाझड़िया को क्यों भूली सरकार''' - लेकिन राजस्थान सरकार ने बधाई सन्देश का कष्ट नहीं उठाया. देवेन्द्र झाझड़िया को बधाई तो दूर की बात है देश के प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी एक अक्षर तक नहीं लिखा जबकि एक अन्य उच्च  खानदानी  'रजत पदक' विजेता के घर, परिवार, गाँव, शयन-कक्ष आदि के चित्र छापकर गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोडी. देवेन्द्र झाझडिया एक गाँव का किसान का बेटा था. उसको स्वर्ण पदक लाने पर जो सुविधाएँ मिलनी चाहिए  थीं वे नहीं मिली तब प्रिंट मीडिया, महानगर टाइम्स, इवनिंग पोस्ट जयपुर ने अपने सम्पादकीय में लिखा 'झाझड़िया को क्यों भूली सरकार'. तब राजस्थान सरकार चेती और वहां के खेलमंत्री युनूस खान ने 133 देशों में पैरा ओलम्पिक में 50 साल बाद पहली बार स्वर्ण पदक दिलाने वाले देवेन्द्र झाझडिया को '''21 अक्टूबर 2004''' को 11 लाख रुपये का चेक दिया और सम्मानित किया. बाद में उसको अर्जुन अवार्ड भी दिया गया.




राष्ट्रपति भवन में देवेन्द्र झाझडिया को अर्जुन अवार्ड 29 अगस्त 2005 में राष्ट्रपति  ए.पी.जे अब्दुल कलाम द्वारा दिया गया. महाराणा प्रताप पुरस्कार-स्टेट स्पोर्ट्स अवार्ड 2004 तथा पीसीआई आउट स्टैंडिंग स्पोर्ट्स पर्सन अवार्ड 2005 भी मिला.
'''अर्जुन अवार्ड''' - राष्ट्रपति भवन में देवेन्द्र झाझडिया को अर्जुन अवार्ड 29 अगस्त 2005 में राष्ट्रपति  ए.पी.जे अब्दुल कलाम द्वारा दिया गया. महाराणा प्रताप पुरस्कार-स्टेट स्पोर्ट्स अवार्ड 2004 तथा पीसीआई आउट स्टैंडिंग स्पोर्ट्स पर्सन अवार्ड 2005 भी मिला.


देवेन्द्र झाझडिया बिलासपुर (छत्तीसगढ़)  रेलवे में ओ.एस. कर्मचारी लगे हैं. बिलासपुर रेलवे ने देवेन्द्र को एक लाख रुपये, निशुल्क क्वार्टर तथा खेलों की तैयारी की पूरी छोट दे रखी है.
देवेन्द्र झाझडिया बिलासपुर (छत्तीसगढ़)  रेलवे में ओ.एस. कर्मचारी लगे हैं. बिलासपुर रेलवे ने देवेन्द्र को एक लाख रुपये, निशुल्क क्वार्टर तथा खेलों की तैयारी की पूरी छोट दे रखी है.


== पद्मश्री अवार्ड ==
== पद्मश्री अवार्ड ==

Revision as of 16:52, 1 July 2012

Devendra Jhajharia

Devendra Jhajharia (देवेन्द्र झाझड़िया) is the only Indian to have won the gold at an ‘‘Paraolympics’’. He is the one-armed javelin thrower from Rajasthan. He was born in the family of Ram Singh Jhajharia and Jiwani Devi in village Jhajharian Ki Dhani, Panchayat Ratanpura in Rajgarh Tahsil in Churu district Rajasthan on 10th June 1981.

On September 21, 2004 he had hurled the javelin to a distance of 62.15 metres at the Paralympic Games in Athens, creating a world record. Before him, no Indian had won a medal at the competition. Devendra is a Class IV employee with the Indian Railways. He had lost his left hand in an accident.

He also won the gold medal in the 8th FESPIC Games in Korea, 2002. He is trained by Dronacharya Awardee coach Mr. R.D. Singh.

Jat Parivesh (Masik Pattar), December, 2011 writes: Notwithstanding physical challenges to his body, he has shown rare grit and courage to rise as a promising star as is proved by his achievements starting right from his school days to University and so on.

His main achievements include standing runners up and winning silver medal in Javellin throw in 1998 in MDS University, Ajmer; Winning three times (in 1999, 2000 and 2001) first position in the MDS University, Ajmer and also participating in Inter University All India Athletic Meets.

He has also won gold and silver medals in The British Handicapped Meet, National Handicapped Athletic Meet in addition to winning medal in Athens Olympics.

Honour

Devendra Jhajharia has been awarded 'Arjuna Award' by the President of India, on the occasion of republic day 2012. Devendra Jhajharia was honoured by the Governor of Rajasthan on 10 June 2005 with the award of Maharana Pratap Puraskar, the highest award for games in Rajasthan. The award carries a cash prize of Rs 10000/-.

Contact

देवेन्द्र झाझड़िया का जीवन परिचय

देवेन्द्र झाझड़िया का जन्म गाँव झाझड़िया की ढाणी, तहसील राजगढ़, जिला चुरू राजस्थान में हुआ. आपके पिता का नाम रामसिंह झाझड़िया तथा माता का नाम जीवनी देवी है. जब वह 7-8 वर्ष के थे तो उनका बायाँ हाथ बिजली दुर्घटना में गमाना पड़ा. आपके पिता ने पढ़ने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग-65 पर स्थित रतनपुरा गाँव में भेजा. रतनपुरा को हडियाल स्टेशन के नाम से जाना जाता है. वहां से आपने 10 वीं तक की पढाई की.

देवेन्द्र के विकलांग होते हुए भी उनके मन में कुछ कर गुजरने के जज्बात थे. पढाई के साथ-साथ आपको अभावपूर्ण तथा सुविधाहीन स्थिति में भी रेत के धोरों के बीच भाला फैंकने का सनक सवार हुआ. पहले खेत से सरकंडे तोड़ उन्हें भाले की तरह फैंकना शुरू किया, फिर उसके साथ -साथ खेजड़ी पेड़ की लकड़ियों से भाला बनाकर एकलव्य की भांति अभ्यास शुरू किया. गाँव के स्कूल में भाला नहीं था. पिता रामसिंह की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि भला खरीद सकें. देवेन्द्र रोजाना स्थानीय रूप से बनाया गया भाला फैंकने का 5-6 घंटे प्रयास करने लगा. धीरे-धीरे वह भाला फेंकने में पारंगत हो गया और कक्षा 10 वीं में ही जिलास्तरीय एथलेटिक्स टूर्नामेंट में पहली बार स्वर्ण पदक हासिल किया. प्रथम बार स्वर्ण पदक हासिल करने के बाद उसने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा. देवेन्द्र के 10 वीं परीक्षा उत्तीर्ण होते ही आर.डी. सिंह कोच उसको अपने साथ ले गए और हनुमानगढ़ कस्बे की नेहरू कालेज में भर्ती कराया और कोच ने तैयारी शुरू करवादी. यहाँ से देवेन्द्र नें बी.ए. वाई. एम.डी.एस. अजमेर यूनिवर्सिटी से सन 2001 में पास की.

सन 1995 में आल इण्डिया यूनिवर्सिटी गेम्स में 67 मीटर की दूरी तक भाला फेंकने का रिकार्ड बनाया तो एक नयी पहचान मिली. उसके बाद 1998 तक विश्वविद्यालय स्तर पर प्रथम रहने से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक की विकलांग स्पर्धाओं तथा वर्ष 2002 में 8 वें बुसान एसियाड में स्वर्ण जीतकर भारत का परचम लहराया. वर्ष 2003 में ब्रिटिश थ्रो, ट्रिपल जम्प और शाट-फूट तीनों स्पर्धाओं में तीन स्वरण पदक जीते.

पिछले दो वर्षों में देवेन्द्र के उत्कृष्ट प्रदर्शन से ही उनका चयन ओलम्पिक खेलों के लिए हुआ था. देवेन्द्र के पिता कहते हैं कि अच्छी रेंज की प्रतियोगिता के लिए उपयोग किया जाने वाला भाला 4 -5 लाख रुपये में आता है जिसे खरीद पाना हमारे बस में नहीं है. देवेन्द्र का यह दुर्भाग्य रहा कि उसने शुरू में सहायता के लिए प्रयास किये परन्तु न तो राजस्थान सरकार ने और न खेल संस्थाओं ने उसको सगयोग किया. रामस्वरूप जी आर्य ने प्रथम बार 2002 के बुसान एसियाड में खेलने जाने के लिए 75 हजार रुपये की सहायता भेजी. बुसान स्वर्ण पदक पाने के बाद अमेरिका प्रवासी खेल प्रेमी रामस्वरूप आर्य, कालीरावण, हरयाणा ने देवेन्द्र के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का भाला भेजा. जिसे 26 सितम्बर 2002 को रुस्तमे हिंद दारासिंह ने यह भाला देवेन्द्र को राजगढ़ में भेंट किया. देवेन्द्र ने ब्रिटिश ओलम्पिक 2003 और एथेंस ओलम्पिक 2004 में इस भाले की लाज रखी.

रेतीले धोरों पर नंगे पैरों के अभ्यस्त देवेन्द्र के लिए केवल भाले का अभाव ही समस्या नहीं थी उसके लिए जूते पहन कर सिंथेटिक टर्फ पर दौड़ लगाना भी बहुत बड़ी बाधा थी. लेकिन सभी अभाओं और बाधाओं के बावजूद भी कुछ कर दिखाया, नया रिकार्ड बनाया, राष्ट्र के लिए स्वर्ण पदक जुटाया, और देश का नाम रोशन किया.

एथेंस ओलम्पिक में स्वर्ण पदक - देवेन्द्र ने 21 सितम्बर 2004 में एथेंस ओलम्पिक में जेवलियन थ्रो में नया विश्व रिकार्ड बनाया, राष्ट्र के लिए पहली बार ओलम्पिक में 1945 के बाद पिछले 50 वर्ष में स्वर्ण पदक दिलाकर राष्ट्र को गौरवान्वित किया. पूर्व के अपने ही रिकार्ड 59.77 मीटर को तोड़कर पांचवें राऊंड में 62.15 मीटर भाला फेंका. राष्ट्रीय धुन के साथ वहां उपस्थित भारतीय मूल के लोग ख़ुशी के मारे झूम उठे. देवेन्द्र के एथेंस पैरा ओलम्पिक 2004 में स्वर्ण पदक पाने के समाचार की पहले पहल बीबीसी ने खबर प्रसारित की थी, लेकिन भारतीय मीडिया सोया रहा. राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री, खेलमंत्री सुनीलदत्त आदि ने बधाई सन्देश भेजे.

झाझड़िया को क्यों भूली सरकार - लेकिन राजस्थान सरकार ने बधाई सन्देश का कष्ट नहीं उठाया. देवेन्द्र झाझड़िया को बधाई तो दूर की बात है देश के प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी एक अक्षर तक नहीं लिखा जबकि एक अन्य उच्च खानदानी 'रजत पदक' विजेता के घर, परिवार, गाँव, शयन-कक्ष आदि के चित्र छापकर गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोडी. देवेन्द्र झाझडिया एक गाँव का किसान का बेटा था. उसको स्वर्ण पदक लाने पर जो सुविधाएँ मिलनी चाहिए थीं वे नहीं मिली तब प्रिंट मीडिया, महानगर टाइम्स, इवनिंग पोस्ट जयपुर ने अपने सम्पादकीय में लिखा 'झाझड़िया को क्यों भूली सरकार'. तब राजस्थान सरकार चेती और वहां के खेलमंत्री युनूस खान ने 133 देशों में पैरा ओलम्पिक में 50 साल बाद पहली बार स्वर्ण पदक दिलाने वाले देवेन्द्र झाझडिया को 21 अक्टूबर 2004 को 11 लाख रुपये का चेक दिया और सम्मानित किया. बाद में उसको अर्जुन अवार्ड भी दिया गया.


अर्जुन अवार्ड - राष्ट्रपति भवन में देवेन्द्र झाझडिया को अर्जुन अवार्ड 29 अगस्त 2005 में राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम द्वारा दिया गया. महाराणा प्रताप पुरस्कार-स्टेट स्पोर्ट्स अवार्ड 2004 तथा पीसीआई आउट स्टैंडिंग स्पोर्ट्स पर्सन अवार्ड 2005 भी मिला.

देवेन्द्र झाझडिया बिलासपुर (छत्तीसगढ़) रेलवे में ओ.एस. कर्मचारी लगे हैं. बिलासपुर रेलवे ने देवेन्द्र को एक लाख रुपये, निशुल्क क्वार्टर तथा खेलों की तैयारी की पूरी छोट दे रखी है.

पद्मश्री अवार्ड

पद्मश्री अवार्ड दिए जाने की सूचना देवेन्द्र को 25 जनवरी 2012 को 2 बजे दोपहर भारत सरकार गृह मंत्रालय से दूरभास पर मिली. गुरुवार 22 मार्च 2012 को महामहिम श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली में शाम को आयोजित समारोह में खेल के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए देवेन्द्र झाझडिया को पद्मश्री से सम्मानित किया गया. समारोह में राष्ट्रपति महोदया देवेन्द्र की पत्नी मंजू श्री को राजस्थानी वेशभूषा में देखकर बेहद खुश हुई. शाम को टी.वी. पर समारोह का कार्यक्रम दिखाया गया तो उसके पैतृक गाँव झाझडिया की ढाणी मेंउत्सव का माहौल था और मिठाइयाँ बांटी गयीं.

30 लाख का पुरस्कार

नई दिल्ली के शास्त्री भवन में पैरा ओलम्पिक खिलाड़ी देवेन्द्र झाझडिया को 30 लाख का पुरस्कार खेल विभाग भारत सरकार के संयुक्त सचिव आई. श्री निवास ने प्रदान किया. एथेंस पैरा ओलम्पिक-2004 में भारत को विश्व रिकोर्ड के साथ स्वर्ण पदक दिलवाने वाले खिलाड़ी को यह पुरस्कार 2004 में न मिलकर 6 वर्ष बाद वर्ष 2010 में मिला !!!

सन्दर्भ - यह लेख मुख्य रूप से श्री लक्ष्मणराम महला, जाट कीर्ति संसथान चुरू, के जाट बन्धु पत्र आगरा, दिनांक 25 जून 2012 को प्रकाशित लेख 'चुरू जनपद के जाट गौरव' पर आधारित है.

References

External link


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