piush_tomar
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Jat reservation or harit pradesh
अजित सिंह शुरू से विरासत में मिली राजनीती और जाट वोटरों के समर्थन से पिछले 30 सालों से सांसद बनते आ रहे हैं, मगर जब आज जाट आरक्षण का मुद्दा एक तूफान की तरह पूरे भारत में फैला हुआ है, ऐसे में अजित सिंह का ‘हरित प्रदेश’ का बयां एक घटिया राजनीति के सिवा कुछ नहीं है। इसका असर उनके आने वाले राजनीतिक जीवन पर साफ़ तौर पर पड़ता नज़र आता है। जब बिहार में अंध भक्त जनता ने लालू जैसे नेता का धूल चटा दी, तो अजित सिंह जैसे नेता की तो कुछ बिसात ही नहीं है, जो एक ‘बेपेंदी के लोटे’ के नाम से मशहूर हैं।
वह 28 जनवरी को बागपत में एक जाट गांव में अचानक जाते हैं और वहां जाकर ‘हरित प्रदेश’ के संघर्ष की घोषणा करते हैं। और, वो भी ठीक उसी अंदाज में जैसे ‘अखिल भारतीय जाट संघर्ष समिति’ के ‘दिल्*ली मार्च’ की घोषणा हुई थी। जैसाकि हम सभी जानते हैं कि जाट संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्*यक्ष यशपाल मलिक ने 8 फरवरी को दिल्*ली के रामलीला मैदान में एक विशाल रैली के आयोजन की घोषणा की है। इसमें देश भर से जाट समुदाय के करीब 10 लाख लोगों के आने की संभवना है।
जाट आरक्षण के इस आन्दोलन से अजित सिंह इतने विचलित हैं कि उन्*हें अचानक ‘हरित प्रदेश’ का मुद्दा याद आ गया। मगर, यह जनता सब जानती है और शायद यही डर अजित सिंह को सता रहा है। आज तक उन्होंने baghpat jile mein जाट जाति को हमेशा एक गुलाम ही समझा है, जो उनके पिता चौधरी चरण सिंह के कारण उन्*हें संसद में भेजती रही है। लेकिन, आने वाले समय में क्या वही जनता अजित सिंह के पुत्र जयंत को भी संसद में भेजती रहेगी, यह एक बहुत बड़ा सवाल है।
चौधरी अजित सिंह ने हमेशा अपनी जातिवाद की राजनीति से सिर्फ अपना फायदा उठाया है, न कि अपने जाट समाज का फायदा पहुंचाया है। उन्होंने जाट जाति के वोटों को कभी समाजवादी पार्टी, तो कभी बीजेपी को बेचा। कभी उनही जाट वोटों को मायावती केय दर्वाजेय पर जाकर बेच हेय (Yaad hain aap logon ko)लेकिन, कभी भी अपनी जनता से नहीं पूछा उपरोक्त फेसले के बारे में ?। आज अगर संसद का रिकॉर्ड देखें, तो उन्होंने कभी भी जाट आरक्षण के बारे में एक भी सवाल संसद में नहीं उठाया है। ऐसा वो क्यों कर रहे हैं, यह समझ के परे है। आज अगर उनके संसदीय क्षेत्र बागपत- जो दिल्ली से 20 सिर्फ किलोमीटर दूर है- को देखें, तो यह NCR का सबसा backward क्षेत्र है। न यहां उद्योग-धंधे है, न शिक्षा है, न चिकित्सा सुविधा है। यहां की 90 फीसदी जाट जाति सिर्फ खेती पर निर्भर है। परिवार बढ़ने के बाद खेती की जमीन भी कम हो रही है, इसलिए इस क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का न होना एक काफी बड़ी समस्या बन गया है। बागपत लोकसभा क्षेत्र देश की अपराध की राजधानी बन गया है। इन सभी समस्*याओं से अजित सिंह भली-भांति परिचित हैं। मगर, वो जानबूझ कर इन समस्*याओं को जिन्दा रखना चाहते हैं, जिससे हर आने वाले चुनावों में वो जाटों के वोट लेते रहें। क्या वो पुरे हरित प्रदेश को “बाघपत ” जैसा अविकसित बनाना चाहते है। अजित सिंह की जाट आरक्षण की खिलाफत यही दर्शाती है कि वो जाट जाति के उत्थान के लिए कुछ नहीं करना चाहते। इस्लिएये बाघपत के जाटों को समजना चाहिये के अजित के भविष्ये कि चिंता न करे पेहेले अपनी चिंता करे क्योकि अगर पुरे राष्ट्रीये राजधानी चेत्र के जाटों को आर्थिक आधार पार देखेय तो इस्की तुम्हे हे सबसे जायदा जरूरत
अजित सिंह शुरू से विरासत में मिली राजनीती और जाट वोटरों के समर्थन से पिछले 30 सालों से सांसद बनते आ रहे हैं, मगर जब आज जाट आरक्षण का मुद्दा एक तूफान की तरह पूरे भारत में फैला हुआ है, ऐसे में अजित सिंह का ‘हरित प्रदेश’ का बयां एक घटिया राजनीति के सिवा कुछ नहीं है। इसका असर उनके आने वाले राजनीतिक जीवन पर साफ़ तौर पर पड़ता नज़र आता है। जब बिहार में अंध भक्त जनता ने लालू जैसे नेता का धूल चटा दी, तो अजित सिंह जैसे नेता की तो कुछ बिसात ही नहीं है, जो एक ‘बेपेंदी के लोटे’ के नाम से मशहूर हैं।
वह 28 जनवरी को बागपत में एक जाट गांव में अचानक जाते हैं और वहां जाकर ‘हरित प्रदेश’ के संघर्ष की घोषणा करते हैं। और, वो भी ठीक उसी अंदाज में जैसे ‘अखिल भारतीय जाट संघर्ष समिति’ के ‘दिल्*ली मार्च’ की घोषणा हुई थी। जैसाकि हम सभी जानते हैं कि जाट संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्*यक्ष यशपाल मलिक ने 8 फरवरी को दिल्*ली के रामलीला मैदान में एक विशाल रैली के आयोजन की घोषणा की है। इसमें देश भर से जाट समुदाय के करीब 10 लाख लोगों के आने की संभवना है।
जाट आरक्षण के इस आन्दोलन से अजित सिंह इतने विचलित हैं कि उन्*हें अचानक ‘हरित प्रदेश’ का मुद्दा याद आ गया। मगर, यह जनता सब जानती है और शायद यही डर अजित सिंह को सता रहा है। आज तक उन्होंने baghpat jile mein जाट जाति को हमेशा एक गुलाम ही समझा है, जो उनके पिता चौधरी चरण सिंह के कारण उन्*हें संसद में भेजती रही है। लेकिन, आने वाले समय में क्या वही जनता अजित सिंह के पुत्र जयंत को भी संसद में भेजती रहेगी, यह एक बहुत बड़ा सवाल है।
चौधरी अजित सिंह ने हमेशा अपनी जातिवाद की राजनीति से सिर्फ अपना फायदा उठाया है, न कि अपने जाट समाज का फायदा पहुंचाया है। उन्होंने जाट जाति के वोटों को कभी समाजवादी पार्टी, तो कभी बीजेपी को बेचा। कभी उनही जाट वोटों को मायावती केय दर्वाजेय पर जाकर बेच हेय (Yaad hain aap logon ko)लेकिन, कभी भी अपनी जनता से नहीं पूछा उपरोक्त फेसले के बारे में ?। आज अगर संसद का रिकॉर्ड देखें, तो उन्होंने कभी भी जाट आरक्षण के बारे में एक भी सवाल संसद में नहीं उठाया है। ऐसा वो क्यों कर रहे हैं, यह समझ के परे है। आज अगर उनके संसदीय क्षेत्र बागपत- जो दिल्ली से 20 सिर्फ किलोमीटर दूर है- को देखें, तो यह NCR का सबसा backward क्षेत्र है। न यहां उद्योग-धंधे है, न शिक्षा है, न चिकित्सा सुविधा है। यहां की 90 फीसदी जाट जाति सिर्फ खेती पर निर्भर है। परिवार बढ़ने के बाद खेती की जमीन भी कम हो रही है, इसलिए इस क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का न होना एक काफी बड़ी समस्या बन गया है। बागपत लोकसभा क्षेत्र देश की अपराध की राजधानी बन गया है। इन सभी समस्*याओं से अजित सिंह भली-भांति परिचित हैं। मगर, वो जानबूझ कर इन समस्*याओं को जिन्दा रखना चाहते हैं, जिससे हर आने वाले चुनावों में वो जाटों के वोट लेते रहें। क्या वो पुरे हरित प्रदेश को “बाघपत ” जैसा अविकसित बनाना चाहते है। अजित सिंह की जाट आरक्षण की खिलाफत यही दर्शाती है कि वो जाट जाति के उत्थान के लिए कुछ नहीं करना चाहते। इस्लिएये बाघपत के जाटों को समजना चाहिये के अजित के भविष्ये कि चिंता न करे पेहेले अपनी चिंता करे क्योकि अगर पुरे राष्ट्रीये राजधानी चेत्र के जाटों को आर्थिक आधार पार देखेय तो इस्की तुम्हे हे सबसे जायदा जरूरत
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