upendersingh
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अपने मूल्यों और परंपराओं को बचाने के लिए जाटों का एकजुट होना बहुत जरूरी है. इस लगभग पूरी दुनिया का नैतिक पतन हो चुका है. केवल
जाटों में ही थोड़ा-बहुत स्वाभिमान बचा है. जो लोग ये कहते हैं कि ये जाति-धर्म सब बेकार की बातें हैं और ये तो इंसान की बनाई हुई हैं तो ऐसे लोग बकवास करते हैं. इस दुनिया को बनाने वाले ने एक को हब्शी बनाया, एक को अंग्रेजों जैसी शक्ल का बनाया और एक को जापानी या भारतीय जैसी शक्ल का. भेद तो उसने यहीं पर कर दिया. भेदभाव की नींव तो यहीं से पड़ गई. इस दुनिया को बनाने वाले ने सबको एक जैसा ही क्यों नहीं बना दिया?
दरअसल यदि सबको एक जैसा बना दिया जाता तो इस दुनिया में स्पर्द्धा की भावना ना बन पाती. भारत ने हॉकी में दबदबा बनाया तो पाकिस्तान ने भी बनाया, भारत ने क्रिकेट में अच्छा किया तो पाकिस्तान ने भी किया. हम खेलों में अच्छा करने की सोच रहे हैं, क्योंकि चीन उसमें अच्छा करता है. ओलिंपिक खेल इस दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन है, क्योंकि इसमें अलग-अलग देश विभिन्न खेलों में मुकाबला करते हैं. यदि इस दुनिया में अलग-अलग देश, जातियां और धर्म ना होते तो इंसान इतनी तरक्की नहीं कर सकता था, जितनी उसने कर ली है. तो जो लोग ये कहते हैं कि ये जाति-धर्म सब बेकार की बातें हैं, तो वे बकवास करते हैं और यहाँ कुछ अच्छा करना नहीं चाहते. जाति-धर्म स्पर्द्धा की भावना पैदा करते हैं.
मुझे यह खबर पढ़कर बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा कि हरियाणा में 5 जाटों को फांसी की सजा सुनाई गई है. मुझे पूरा यकीन है कि ऐसा नहीं होगा और हरियाणा सरकार और वहाँ के प्रबुद्ध लोग चाहे जिस कीमत पर ऐसा नहीं होने देंगे. जो लोग प्यार का नाम बदनाम करते हैं और हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए गए नियमों को धता बताते हैं, उन्हें सजा देना इसलिए जरूरी है, क्योंकि यदि उन्हें सजा नहीं दी गई तो फिर दूसरे भी ऐसा करने के लिए प्रेरित होंगे. ऐसे प्रेमियों को मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ. मैंने और यहाँ पर बहुत से सदस्यों ने भी ऐसे बहुत-से किस्से देखे और सुने होंगे कि एक लड़का और लड़की आपस में प्यार करने का दावा करते हैं और फिर घरवालों और समाज को नसीहत देते हुए शादी कर लेते हैं. कुछ दिनों बाद जब जिंदगी की कड़वी सच्चाई सामने आती है तो उनके प्यार का भूत भी उतर चुका होता है और वे अलग-अलग हो जाते हैं. क्या इसके लिए उन्होंने समाज के नियम तोड़े थे? ऐसा नहीं है तो बताओ आप लोगों ने ऐसे लोग ज्यादा देखें हैं, जिनका प्रेमविवाह सफल रहा या फिर ऐसे लोग ज्यादा देखे हैं, जिनका प्रेमविवाह सफल नहीं रहा. मैंने तो असफल ही ज्यादा देखे हैं. ये समान गोत्र में विवाह करने वाले भी अधिकतर ऐसे ही प्रेमी होते हैं. समान गोत्र में विवाह की यह समस्या दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है. युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं. कुछ-न-कुछ हल खोजा जाना जरूरी है. युवाओं को मारना भी इस समस्या का हल नहीं है. बिरादरी के सर्वोच्च लोगों को मिल-बैठकर इस विषय में मंत्रणा करनी ही होगी, अन्यथा आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है.
एक ही गोत्र में विवाह करने वालों को जाट समाज से बाहर निकाल देना चाहिए. उन्हें गाँव की अपनी संपत्ति को बेचकर वहाँ से कहीं और चले जाने के लिए कह देना चाहिए और उनसे ये वचन भी लेना चाहिए कि वे अपने आपको जाट नहीं कहेंगे और यदि ऐसा पाया गया तो फिर वे सजा के अधिकारी होंगे.
समान गोत्र में विवाह करने वालों से वचन लिया जाना चाहिए कि वे अब खुद को जाट नहीं, जाटव कहेंगे. दूसरे शब्दों में ऐसे लोगों की जाति बदलकर जाटव कर देनी चाहिए.
जाटों में ही थोड़ा-बहुत स्वाभिमान बचा है. जो लोग ये कहते हैं कि ये जाति-धर्म सब बेकार की बातें हैं और ये तो इंसान की बनाई हुई हैं तो ऐसे लोग बकवास करते हैं. इस दुनिया को बनाने वाले ने एक को हब्शी बनाया, एक को अंग्रेजों जैसी शक्ल का बनाया और एक को जापानी या भारतीय जैसी शक्ल का. भेद तो उसने यहीं पर कर दिया. भेदभाव की नींव तो यहीं से पड़ गई. इस दुनिया को बनाने वाले ने सबको एक जैसा ही क्यों नहीं बना दिया?
दरअसल यदि सबको एक जैसा बना दिया जाता तो इस दुनिया में स्पर्द्धा की भावना ना बन पाती. भारत ने हॉकी में दबदबा बनाया तो पाकिस्तान ने भी बनाया, भारत ने क्रिकेट में अच्छा किया तो पाकिस्तान ने भी किया. हम खेलों में अच्छा करने की सोच रहे हैं, क्योंकि चीन उसमें अच्छा करता है. ओलिंपिक खेल इस दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन है, क्योंकि इसमें अलग-अलग देश विभिन्न खेलों में मुकाबला करते हैं. यदि इस दुनिया में अलग-अलग देश, जातियां और धर्म ना होते तो इंसान इतनी तरक्की नहीं कर सकता था, जितनी उसने कर ली है. तो जो लोग ये कहते हैं कि ये जाति-धर्म सब बेकार की बातें हैं, तो वे बकवास करते हैं और यहाँ कुछ अच्छा करना नहीं चाहते. जाति-धर्म स्पर्द्धा की भावना पैदा करते हैं.
मुझे यह खबर पढ़कर बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा कि हरियाणा में 5 जाटों को फांसी की सजा सुनाई गई है. मुझे पूरा यकीन है कि ऐसा नहीं होगा और हरियाणा सरकार और वहाँ के प्रबुद्ध लोग चाहे जिस कीमत पर ऐसा नहीं होने देंगे. जो लोग प्यार का नाम बदनाम करते हैं और हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए गए नियमों को धता बताते हैं, उन्हें सजा देना इसलिए जरूरी है, क्योंकि यदि उन्हें सजा नहीं दी गई तो फिर दूसरे भी ऐसा करने के लिए प्रेरित होंगे. ऐसे प्रेमियों को मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ. मैंने और यहाँ पर बहुत से सदस्यों ने भी ऐसे बहुत-से किस्से देखे और सुने होंगे कि एक लड़का और लड़की आपस में प्यार करने का दावा करते हैं और फिर घरवालों और समाज को नसीहत देते हुए शादी कर लेते हैं. कुछ दिनों बाद जब जिंदगी की कड़वी सच्चाई सामने आती है तो उनके प्यार का भूत भी उतर चुका होता है और वे अलग-अलग हो जाते हैं. क्या इसके लिए उन्होंने समाज के नियम तोड़े थे? ऐसा नहीं है तो बताओ आप लोगों ने ऐसे लोग ज्यादा देखें हैं, जिनका प्रेमविवाह सफल रहा या फिर ऐसे लोग ज्यादा देखे हैं, जिनका प्रेमविवाह सफल नहीं रहा. मैंने तो असफल ही ज्यादा देखे हैं. ये समान गोत्र में विवाह करने वाले भी अधिकतर ऐसे ही प्रेमी होते हैं. समान गोत्र में विवाह की यह समस्या दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है. युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं. कुछ-न-कुछ हल खोजा जाना जरूरी है. युवाओं को मारना भी इस समस्या का हल नहीं है. बिरादरी के सर्वोच्च लोगों को मिल-बैठकर इस विषय में मंत्रणा करनी ही होगी, अन्यथा आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है.
एक ही गोत्र में विवाह करने वालों को जाट समाज से बाहर निकाल देना चाहिए. उन्हें गाँव की अपनी संपत्ति को बेचकर वहाँ से कहीं और चले जाने के लिए कह देना चाहिए और उनसे ये वचन भी लेना चाहिए कि वे अपने आपको जाट नहीं कहेंगे और यदि ऐसा पाया गया तो फिर वे सजा के अधिकारी होंगे.
समान गोत्र में विवाह करने वालों से वचन लिया जाना चाहिए कि वे अब खुद को जाट नहीं, जाटव कहेंगे. दूसरे शब्दों में ऐसे लोगों की जाति बदलकर जाटव कर देनी चाहिए.
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