Depressing view :
Returning back from a seminar on Digital Divide I see a a depressing sight
from the window of the train of Humans defecating and Pigs wallowing all in public view . What DIVIDE one would name the spectacle? The
divide between those in the cool comfort of the train and those outside and quickly falling behind from view or between the
pigs and the
Human beings, still facing each other outside.

ट्रेन की खिड़की से और भी बहुत दीखता है सर ! या यूँ कहिये ,जो आप देखना चाहते हैं वही दीखता है ! या उससे देख आपको पीड़ा हुई और वही याद रहा, लिखने के लिए !
दरअसल ट्रेन की खिड़की से हम बहुत कुछ देख सकते हैं !
भेड़ चराता हुआ गडरिया !
सरसों, जवार , बाजरे के लहराते हुए खेत !
हल चलाता हुआ किसान !
कुंए पर जाती हुई पनिहारन !
मिटटी में खेलते हुए बच्चे !
लकड़ियों का गठा सर पर उठाये ग्रामीण महिला !
मुंबई के नजदीक पहुँचने पर, विशाल नदी , और उसमे तैरती हुई मछुआरों की कश्तियाँ !
शिर पर लोगों के लिए खाने के डिब्बे ढोते हुए कुछ मजदूर !
रेवड़ी, चाय व् अन्य खाद्य पदार्थ बेचते और आवाज लगाते हाकर !
वडा पाव से लदे स्टाल और उन पर नास्ता करते लोगों के हजूम !
और भी बहुत कुछ दीखता है ट्रेन की उन खिडकियों से !
बस, पटरी के किनारे शोच करते लोगों ने अपना आत्मसम्मान खो दिया है जिसे देख आपका कोमल हृदय विचलित और शोकाकूल हो गया !
यानी की ट्रेन की की खिड़की, केवल बहार झाँकने और तजा हवा खाने का माध्यम ही नहीं बल्कि एक भरा पूरा जीवन दर्शन झरोंखा है !
और ये सब कतई भी आपके निरादर में नहीं है श्र्धये ब्रिगेडियर साहेब !
सादर सम्मान सहित !