Aaj Bhaskar mein khap samarthan mein ek article padha tha wo nahi mila par is se milta julta tha kuch
खाप का राज
हवासिंह सांगवान
बात अब गोत्र विवादों से आगे जाकर हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन तक जा पहुंची है। कहा जा रहा है अगर वोट चाहिए तो हमारी बात मानो। खापों के जन्म और आज की स्थिति पर कैसे क्या बदल गया है इस पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
अपने गोत्र में विवाह पर पूर्णतया प्रतिबंध हो, एक गांव मंे विवाह वर्जित हो और जिन गांव की सीमाएं आपस में मिलती हों उनमें भाईचारे का रिश्ता हो। इनमें किसी तरह विवाह को रजामंदी न दी जाए। साथ ही हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन किया जाए ताकि सगोत्रीय विवाह न हों। अगर इतना सब हो जाए तो समाज में व्यापक बदलाव आ सकते हैं।
अगर हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन होता है तो उससे सबसे बड़ा फायदा होगा कि ऑनर किलिंग यानी इज्जत के नाम पर खून बहाना रोका जा सकेगा। और अगर ऐसा नहीं हुआ तो सरकारों को बगावत के लिए तैयार रहना चाहिए। वैसे भी किसी भी कानून में संशोधन जनता की मांग पर होता है। संविधान जनता के लिए है और जनता का है। हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन भी मुश्किल नहीं है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति होना बेहद जरूरी है।
उन्हें अगर वोट लेने हैं तो जनता का ध्यान रखना ही होगा।
हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन गोत्र आधारित हर समाज की मांग है। कोई भी कानून समाज से ऊपर नहीं है, बल्कि कानून समाज की मर्यादाओं के अनुकूल बनाए जाते हैं। हरियाणा में कांग्रेस और इनेलो दोनों राजनीतिक दलों ने खापों की मांग का समर्थन किया है, यह सही है। राजनीतिक पार्टियां लोगों के बूते चलती हैं और अगर इन पार्टियों ने लोगों की इच्छा का सम्मान किया है तो अच्छी बात है।
उत्तर भारत की गोत्र आधारित सभी जातियां हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन की पक्षधर हैं। राजनीतिक दलों का दायित्व है कि वे जनता के हित में कानून बनाएं और जनता की मांग पर उनमें संशोधन भी करें। खापों के लिए कोई अलग से कानून बनाने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि सभी खापें गोत्र आधारित हैं। गोत्र और खाप एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन से पूरे समाज में भाईचारा, सद्भावना और राष्ट्रीय हित की भावना प्रबल होगी।
सर्वखाप के अभिलेखों में इसका वर्णन है कि सर्वखाप सेना में युवा मल्ल योद्धा और महिलाएं भी भाग लेती रही हैं। यानी खाप सबके लिए है। सर्वखाप की पुस्तक राष्ट्रीय पराक्रम और डॉ. एमसी प्रधान की शोध पुस्तक ‘नॉर्दर्न इंडियन जाट्स’ में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। डॉ. मोन फोर्ट, डॉ. जीसी द्विवेदी और डॉ. बालकृष्ण डबास आदि ने भी सर्वखाप पंचायत के अभिलेखों पर शोध करके पीएचडी की है।
कुछ वर्षो से चैनल संस्कृति से युवावर्ग खाप पंचायतों से थोड़ा विमुख हुआ है, लेकिन आरक्षण मंचों के साथ जुड़कर युवा दोबारा अपनी जड़ों से जुड़ गए हैं। आज हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन की सबसे ज्यादा मांग युवा वर्ग ही कर रहा है।
लेखक सीआरपीएफ के पूर्व कमांडेंट हैं। उनकी कृतियां असली लुटेरे कौन, अयोध्या में अयोद्धा। छोटूराम को किसने मारा (प्रकाशनार्थ) हैं।
खाप पंचायतों की कोई कानूनी वैधानिकता नहीं हैं। वे एनजीओ जैसी औपचारिक संस्था मात्र हैं। समाज के हित में जो काम हैं उनका हम स्वागत करते हैं, लेकिन कानून हाथ में लेने की इजाजत किसी को नहीं है।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा, सीएम हरियाणा
एक ही गोत्र में शादियां की मुखालफत का वैज्ञानिक आधार है। मैं ऑनर किलिंग के खिलाफ हूं। लेकिन खाप के हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन की मांगों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह भी विचारणीय है।
ओम प्रकाश चौटाला, नेता इनेलो
फिलहाल खापों की हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन की मांग पर कोई विचार नहीं हो रहा है। हर किसी को अपनी बात कहने का हक है लेकिन किसी भी हालत में ऑनर किलिंग को जायज नहीं ठहराया जा सकता।
वीरप्पा मोइली, कानून मंत्री
खाप पंचायतें एक सामाजिक बुराई के सिवाय और कुछ भी नहीं है। ये पंचायतें ऐसी सामाजिक बुराई के तौर पर सामने आती हैं जो अपनी मर्जी से शादी करने के मौलिक अधिकारों का हनन करती हैं।
शरद यादव, जद यू नेता
खाप पंचायतों के फैसलों से निपटने के लिए किसी अलग कानून की जरूरत नहीं है। ऑनर किलिंग के मामलों में खाप के फैसलों में शामिल लोगों पर हत्यारों के मददगार मानकर कार्रवाई होनी चाहिए।
पी.चिदंबरम, गृह मंत्री
मैं खाप के बुजुर्ग नेताओं के लिए बेटे के समान हूं। जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि के तौर पर मेरा कर्तव्य है कि मैं खाप की सकारात्मक भूमिका को सरकार तक पहुंचाऊं ताकि लोगों की आवाज को सही दिशा मिले।
नवीन जिंदल, सांसद कांग्रेस
यूं उठते हैं सवाल
सामाजिक संगठनों की व्यवस्था का महत्व इसलिए है कि वे हमारे जीवन को बेहतर दिशा दे सकें। लेकिन जब पति-पत्नी को भाई बहन की तरह रहने का आदेश दिया जाने लगे, सामाजिक दबाव मे भाई बहन का कत्ल कर डाले और अपनी मर्जी से ब्याह करने वाले जोड़ों को सरेआम कत्ल किया जाने लगे तो ऐसी व्यवस्थाओं पर सवाल उठने लगते हैं।
आज की स्थितियों में ये सवाल और जोरदार तरीके से उठ रहे हैं ऐसे में अपेक्षा की जाती है कि पंचायतों की भूमिका लोगों का जीवन आसान बनाने में हो सके। खासतौर पर महिलाओं के प्रति उनका दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है। साथ ही यह भी देखना होगा कि अगर नई पीढ़ी बुजुर्गो जैसी नहीं है तो इसका ये कतई मतलब नहीं कि उसे गलत ही घोषित कर दिया जाए। सभी फैसलों में उनकी भागीदारी न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि जरूरी भी है।
खाप के संदर्भ में एक और खास बात देखने में आती है कि महिलाओं, युवाओं और कुछ जातियों की भागीदारी न के बराबर ही नजर आती है और शायद इसीलिए फैसले इनके खिलाफ ही होते हैं। जरूरी है कि ये संस्थाएं प्रजातांत्रिक होकर काम करें और राजनीतिक व आर्थिक आजादी के साथ-साथ मानसिक आजादी को व्यवहार में लाएं। टकराव, बगावत व कानून अपने हाथ में लेने से किसी बात का समाधान नहीं हो सकेगा। इससे अविश्वास की भावना बढ़ती जाएगी और उसका नुकसान पूरे समाज को होगा।
डॉ. संदीप सिंह राणा, को-ऑर्डिनेटर सेंटर फॉर बिहेवियरल रिसर्च एंड इंटरवेंशन गुरु जम्भेश्वर विज्ञान व प्रौद्योगिकी विवि हिसार (हरियाणा)
बहुत पुरानी है खाप की कहानी
खाप की उत्पत्ति गण शब्द से हुई है। शुरू में लोग छोटे-छोटे कबीलों में रहता थे, हर कबीले के कुछ नियम और कानून भी होते थे। ये लोग एक सरदार को भी चुना करते थे। खापों की शुरुआत इन्हीं कबीलों की सरदारी प्रथा से हुई। थानेसर में राजा हर्षवर्धन ने 643 ई. में खापों का सरकारीकरण कर दिया गया। इसके चलते अंतिम बौद्धिक सभा में पहली बार सर्वखाप पंचायतों पर सरकारी मुहर लगी।
इसके बाद सामाजिक तानेबाने को मजबूत रखने में खापें अपना महत्वपूर्ण योगदान निभाने लगीं। इस दौरान मुगल बादशाह औरंगजेब के हिंदुओं से वसूले जाने वाले जजिया कर का भी इन्हीं खापों ने विरोध किया था। जाटों में खापों की जड़ों के मजबूत होने का सबसे अहम कारण उनका शुरू से इसके नियमों को मानना है जिसके चलते पीढ़ी-दर-पीढ़ी खापों का महत्व बढ़ता गया। जाट खुद को वैदिक मानते हैं, इसके बाद हिंदू। ऐसे में इनकी यही सोच उन्हें हिंदुओं से अलग करती है।
देश की राजधानी दिल्ली पर जब भी आक्रमण हुआ तो बाहरी शक्तियों से लड़ने का काम भी जाटों ने ही किया। इसके चलते दिल्ली और उससे सटे क्षेत्रों में जाटों की संख्या अधिक है। इतिहास में अगर हम जाएं तो जाट क्षत्रिय कौम से हैं, ऐसे में उनका देश की सबसे प्रमुख जगह पर काबिज होना भी लाजिमी है। अगर हम आर्य समाज की बात करें तो आर्य समाज खापों का विरोध नहीं करता बल्कि उसका समर्थन करता है। आर्य समाज जीवन जीने की पद्धति है, वर्तमान में कई लोग आर्य समाज को दोहरे रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जोकि सही नहीं है। मैंने इस पर शोध करते हुए पाया कि खाप पंचायतें समाज के तानेबाने को जोड़ने के लिए और एक सिस्टम बनाने के लिए विकसित हुई थी, जिसके चलते उन्होंने समाज उत्थान के लिए सराहनीय कार्य किए हैं।
भले राम बैनीवाल
लेखक पूर्व प्राचार्य और वैदिक हरियाणा की सर्वखाप पंचायत और वैदिक हरियाणा का इतिहास किताबों के लेखक हैं।