ravinderjeet
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ना| जी मैं तो बेरा न के-के आजा|
जिसको जो "सही" लगे वो करो| "सही" और गलत की कोई परिभाषा नही है|
अरविन्द जी, परिभाषा हे ,सही और गलत की ,आप ऊपर वाली मेरी डाक देखें और उचित प्रत्युतर दें |
ना| जी मैं तो बेरा न के-के आजा|
जिसको जो "सही" लगे वो करो| "सही" और गलत की कोई परिभाषा नही है|
एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक ही समाज मैं एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो सकता है|ठीक और गलत समय, स्थान और समाज के अनुसार होता हे | किसी भी घटना को सही या गलत ठहराने के लिए ये तीन घटक हैं | एक ही समाज में अलग-अलग समय पर अलग-अलग मान्यताएं हो सकती हैं | वेसे ही एक ही समय पर अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग मान्याताएँ हो सकती हैं | सही और गलत समाज की सोच होती हे उस समाज की आवश्यकताओं के अनुसार | जिस प्रकार एक गाँव में विभिन जातियों के लोग रहते हैं ब्राह्मण विधवा विवाह नहीं करता, परन्तु जाट करता हे | दोनों का स्थान और समय भेद नहीं हे पर दोनों के समाज भिन्न-भिन्न हैं ,इसलिए दोनों की मान्न्य्ताएं भी भिन्न-भिन्न हैं ,इस प्रकार एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो जाता हे |
बात तो एक दम ठीक सै पर न्यू बताओ बिना फेरे लिए छोरे छोरी का एक साथ रहना म्हारे हिन्दुस्तान मैं आर खासकर ग्रामीण समाज मैं ठीक सै के ??ठीक और गलत समय, स्थान और समाज के अनुसार होता हे | |
इस तर्क के हिसाब तैं तो फेर मनोज आर बबली बेक़सूर थे i भाई हिन्दू विवाह कानून मैं संशोधन की मांग नै ले के आप नै क्यों इतना जोर ला राख्या था iएक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक ही समाज मैं एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो सकता है|
गाँव/खाप पंचायत इसीलिए बुलाई जाती हैं|
हिन्दू विवाह कानून एक सविधानिक विषय है| मेरे अनुसार सविधान मैं सामाजिक कानून होने ही नहीं चाहियें| और अगर हैं तो जाट समाज को भी विवाह कानून मैं संशोधन का हक है| It was a question of equality and discrimination, not about "right" or "wrong".इस तर्क के हिसाब तैं तो फेर तो मनोज आर बबली बेक़सूर थे i भाई फेर हिन्दू विवाह कानून मैं संशोधन की मांग नै ले के आप नै क्यों इतना जोर ला राख्या था i
एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक ही समाज मैं एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो सकता है|
गाँव/खाप पंचायत इसीलिए बुलाई जाती हैं| और निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है, "सही" और "गलत" की परिभाषा पर नही| इतिहास गवाह ह की बहुमत का आधार हमेशा "सही" साबित नही हुवा|
बात तो एक दम ठीक सै पर न्यू बताओ बिना फेरे लिए छोरे छोरी का एक साथ रहना म्हारे हिन्दुस्तान मैं आर खासकर ग्रामीण समाज मैं ठीक सै के ??
आप मेरी परिभाषा को समझे नहीं अरविन्द जी ,मेने केवल तीन घटक बताये हैं ,सही और गलत के लिए | यहाँ पर समाज एक घटक हे ,व्यक्ति या परिवार नहीं |इस लिए समाज जो सही या गलत कहे जिस से व्यक्ति या परिवार जुड़ा हे | सही या गलत हे |इसीलिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता जब उस समाज के स्थापित नियमों का उल्लंघन करती हे तो उछस्र्न्खाल्ता कहलाती हे और समाज उसका विरोध करता हे |
इसका एक ही तोड़ हे उस व्यक्ति के लिए ,जो समाज के साथ नहीं चलना चाहता ,उस्से कोई दो घटक छोड़ने होंगे अपनी मर्जी करने के लिए | एक तो वो उस समाज को छोड़ दे ,जिस से वो सम्बंधित हे ,और दुसरा वो स्थान छोड़ दे | समय को छोड़ना किसी के बस की बात नहीं हे |और वहां जाए जहां पर या तो उस के विचारों से मिलता जुलता समाज और स्थान हे या फिर कोई भी समाज ना हो एसा स्थान हो |
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हे ,और अगर उस्से समाज के साथ रहना हे, तो जिस समाज में भी वो रहता हो, उस समाज के नियमों का पालन करना होगा ,नहीं तो जंगल में या निर्जन स्थान पर रहे, और जो चाहे करे, वहां कुछ भी गलत और सही नहीं हे |
सही और गलत मानसिक अवस्था हे जिसको व्यक्ति का समाज निर्धारित करता हे |
समाज का एक अंग होता है "वातावरण"| और जब वातावरण की परिस्तिथि बदल रही हैं तो क्या समाज मैं बदलाव नही आएगा?सही और गलत मानसिक अवस्था हे जिसको व्यक्ति का समाज निर्धारित करता हे |
समाज का एक अंग होता है "वातावरण"| और जब वातावरण की परिस्तिथि बदल रही हैं तो क्या समाज मैं बदलाव नही आएगा?
समाज का एक अंग होता है "वातावरण"| और जब वातावरण की परिस्तिथि बदल रही हैं तो क्या समाज मैं बदलाव नही आएगा?
समाज हम से ही तो बना है | यह मान्यता हमें ही तो देनी है|समाज अपने नियम अपनी आवश्यकता के अनुसार बदलता हे | पहले जट्टों में नानी के गोत में शादी नहीं हो सकती थी पर समाज ने अपनी मान्यता बदली आवश्कता के अनुसार ,पहले वो बात गलत थी अब ठीक हे ,यहाँ पर समय और समाज के घटक किर्याशील हैं और स्थान सिथिल हे |अब१०-१२ साल पहले तक दादी का गोतर भी वर्जित था पर अब अगर दादी ज़िंदा हे तो शादी नहीं करनी अगर गुजर गई हे तो कर सकते हैं | यहाँ पर फिर से समाज ने अपनी आवश्यकता के अनुसार नियम बदल दिए और जो कार्य १० साल पहले गलत था वो अब सही हे | यहाँ पर भी समय और समाज के घटक किर्याशील हैं और स्थान सिथिल हे | अगर कल को समाज की आवश्यकता हुई तो अल आई आर को मान्यता दे देता हे तो वो कार्य भी सही हो जाएगा | जेसे की मध्य प्रदेश के आदिवासियों में सही हे |
समाज हम से ही तो बना है | यह मान्यता हमें ही तो देनी है|
अकेला व्यक्ति वातावरण नहीं बना सकता |उसके लिए समाज में परिस्थियां बननी अनिवार्य हैं |और समाज में वातावरण बनता हे आवश्यकता के अनुसार |और आवश्यकता नियम का निर्माण करवाती हे |
मतदान से पहले बहस जरुरी है | यहाँ मतदान पहले हुवा है और बहस बाद मैं|यहाँ पर मतदान हुआ हे जाटलैंड पर | अल आई आर को १४ वय्क्तिओं ने समर्थन किया हे और विरोध ५८ ने | यानी अल आई आर समाज को मान्य नहीं हे | समाज बहुमत से चलता हे | जिस दिन ये मत एक दुसरे की जगह ले लेंगे उस दिन अल आई आर को मान्यता मिल जायेगी |यानी समाज को आवश्यकता होगी और उस के अनुसार नियम बन जायेंगे |जिस को अल आई आर की आवश्यकता हे वो या तो इन्तजार करें या लोह्खंड वाला में जा कर रहें |
भाईसाहब थोडा गौर से पढो अरविन्द का तर्कइस तर्क के हिसाब तैं तो फेर मनोज आर बबली बेक़सूर थे i भाई हिन्दू विवाह कानून मैं संशोधन की मांग नै ले के आप नै क्यों इतना जोर ला राख्या था i
Nuclear Family, growing work pressure, growing competition और बडती इन्टरनेट की दुनिया, क्या ये सब आवश्यकता को नहीं बढ़ा रहे?
इसीलिए तो मैं भी कह रह्या सूँ कि म्हारे समाज मै यो बिना ब्याह करे एक छत के नीचे रहण का रिवाज़ इसलिए ठीक कोन्या कि ज्यादातर लोग इसको ठीक ना मानते i नहीं तो इसमें खूब सुवाद सै, हींग लगे न फिटकड़ी, रंग चोखो आ जाए i ना टेंट का खर्चा, ना दहेज़ का, ना बालकां का झंझट i जब तक जीवो ऐश करो i काल किसने देख्या सै i पर समाज तो ठीक ना मानता, इसने कौन समझावे, आर इस सारे समाज तैं बगावत तो सिर्फ बॉलीवुड फिल्म की कहानी में ही हो सकती है i जै यो समाज बीच मैं भांजी ना मारता तो मैं तो खुद बेरा ना इब ताएँ कितने सहवास कर लेता i भाई , जी तो म्हारा सब का ए करै सै, पर इस समाज तैं डरना पडे सै, आर इसीलिए आज की परिश्थिति में म्हारी बिरादरी मै ( खासकर गामां मै) तो ब्याह/मुकलावे पाछे ए यो काम हो सके सै. पर जो छोरे छोरी इसा काम ब्याह बिना करना चाह्वैं सें, उनके प्रति कोई दुर्भावना नहीं, हम तो अपनी सोच बता रहे हैं सिर्फ.भाईसाहब थोडा गौर से पढो अरविन्द का तर्क
" एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक ही समाज मैं एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो सकता है,
गाँव/खाप पंचायत इसीलिए बुलाई जाती हैं "
इस तर्क के मायने तादाद से हैं , और तादाद मनोज बबली जैसो के हक में नहीं हैं , वो दोनों तो सिर्फ खुद की जाण में ठीक थे बस |
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