Live in relationships ..?

Are you in favour of Live-in relationships

  • yes

    Votes: 17 16.8%
  • no

    Votes: 77 76.2%
  • may be yes..may be no

    Votes: 7 6.9%

  • Total voters
    101
ना| जी मैं तो बेरा न के-के आजा|
जिसको जो "सही" लगे वो करो| "सही" और गलत की कोई परिभाषा नही है|

अरविन्द जी, परिभाषा हे ,सही और गलत की ,आप ऊपर वाली मेरी डाक देखें और उचित प्रत्युतर दें |
 
ठीक और गलत समय, स्थान और समाज के अनुसार होता हे | किसी भी घटना को सही या गलत ठहराने के लिए ये तीन घटक हैं | एक ही समाज में अलग-अलग समय पर अलग-अलग मान्यताएं हो सकती हैं | वेसे ही एक ही समय पर अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग मान्याताएँ हो सकती हैं | सही और गलत समाज की सोच होती हे उस समाज की आवश्यकताओं के अनुसार | जिस प्रकार एक गाँव में विभिन जातियों के लोग रहते हैं ब्राह्मण विधवा विवाह नहीं करता, परन्तु जाट करता हे | दोनों का स्थान और समय भेद नहीं हे पर दोनों के समाज भिन्न-भिन्न हैं ,इसलिए दोनों की मान्न्य्ताएं भी भिन्न-भिन्न हैं ,इस प्रकार एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो जाता हे |
एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक ही समाज मैं एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो सकता है|

गाँव/खाप पंचायत इसीलिए बुलाई जाती हैं| और निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है, "सही" और "गलत" की परिभाषा पर नही| इतिहास गवाह ह की बहुमत का आधार हमेशा "सही" साबित नही हुवा|
 
Last edited:
ठीक और गलत समय, स्थान और समाज के अनुसार होता हे | |
बात तो एक दम ठीक सै पर न्यू बताओ बिना फेरे लिए छोरे छोरी का एक साथ रहना म्हारे हिन्दुस्तान मैं आर खासकर ग्रामीण समाज मैं ठीक सै के ??
 
एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक ही समाज मैं एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो सकता है|

गाँव/खाप पंचायत इसीलिए बुलाई जाती हैं|
इस तर्क के हिसाब तैं तो फेर मनोज आर बबली बेक़सूर थे i भाई हिन्दू विवाह कानून मैं संशोधन की मांग नै ले के आप नै क्यों इतना जोर ला राख्या था i
 
Last edited:
इस तर्क के हिसाब तैं तो फेर तो मनोज आर बबली बेक़सूर थे i भाई फेर हिन्दू विवाह कानून मैं संशोधन की मांग नै ले के आप नै क्यों इतना जोर ला राख्या था i
हिन्दू विवाह कानून एक सविधानिक विषय है| मेरे अनुसार सविधान मैं सामाजिक कानून होने ही नहीं चाहियें| और अगर हैं तो जाट समाज को भी विवाह कानून मैं संशोधन का हक है| It was a question of equality and discrimination, not about "right" or "wrong".
 
एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक ही समाज मैं एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो सकता है|

गाँव/खाप पंचायत इसीलिए बुलाई जाती हैं| और निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है, "सही" और "गलत" की परिभाषा पर नही| इतिहास गवाह ह की बहुमत का आधार हमेशा "सही" साबित नही हुवा|

[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]आप मेरी परिभाषा को समझे नहीं अरविन्द जी ,मेने केवल तीन घटक बताये हैं ,सही और गलत के लिए | यहाँ पर समाज एक घटक हे ,व्यक्ति या परिवार नहीं |इस लिए समाज जो सही या गलत कहे जिस से व्यक्ति या परिवार जुड़ा हे | सही या गलत हे |इसीलिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता जब उस समाज के स्थापित नियमों का उल्लंघन करती हे तो उछस्र्न्खाल्ता कहलाती हे और समाज उसका विरोध करता हे | [/FONT][FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]
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[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]इसका एक ही तोड़ हे उस व्यक्ति के लिए ,जो समाज के साथ नहीं चलना चाहता ,उस्से कोई दो घटक छोड़ने होंगे अपनी मर्जी करने के लिए | एक तो वो उस समाज को छोड़ दे ,जिस से वो सम्बंधित हे ,और दुसरा वो स्थान छोड़ दे | समय को छोड़ना किसी के बस की बात नहीं हे |और वहां जाए जहां पर या तो उस के विचारों से मिलता जुलता समाज और स्थान हे या फिर कोई भी समाज ना हो एसा स्थान हो | [/FONT]
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[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हे ,और अगर उस्से समाज के साथ रहना हे, तो जिस समाज में भी वो रहता हो, उस समाज के नियमों का पालन करना होगा ,नहीं तो जंगल में या निर्जन स्थान पर रहे, और जो चाहे करे, वहां कुछ भी गलत और सही नहीं हे |[/FONT]
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[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]सही और गलत मानसिक अवस्था हे जिसको व्यक्ति का समाज निर्धारित करता हे |[/FONT]
 
बात तो एक दम ठीक सै पर न्यू बताओ बिना फेरे लिए छोरे छोरी का एक साथ रहना म्हारे हिन्दुस्तान मैं आर खासकर ग्रामीण समाज मैं ठीक सै के ??


[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]विजयपाल जी ,यहाँ पर ग्रामीण स्थान का घटक और समाज मान्यताओं का दुसरा घटक हे | और इन् दोनों घटकों में से अगर एक भी लड़का-लड़की, का बिना फेरों के पति-पत्नी के रूप में साथ रहना गलत या सही जो भी उनकी मान्यता हो वो उन् पर भी लागू होगी | बाकी मेने पहले वाली डाक में विवेचित किया हे | [/FONT][FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]
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[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]मध्य परदेश ,छतीस गढ़ में आदिवासियों के लड़के लडकियां मेले में एक दुसरे को पसंद करते हैं फिर वे जंगल में एक हफ्ते के लिए रहने चले जाते हैं | और वो पति-पत्नी के रूप में एक दुसरे को खुश कर देते हैं तो उनके घर वाले उनका विवाह कर देते हैं ,अगर नहीं कर पाते तो दुसरे मेले की तेयारी | वहां पर किसी लड़की का किसी लड़के के साथ विवाह पूर्व एक हफ्ते तक पति-पत्नी के रूप में रहना गलत नहीं माना जाता | जब की जाट समाज में कतल हो जाते हैं |और दोनों समाज अपनी-अपनी जगह सही हैं |एक कार्य एक स्थान पर सही हे वो ही कार्य दुसरे स्थान पर गलत हो जाता हे |यहाँ पर भी दो घटक काम कर रहे हैं एक स्थान दुसरा समाज |जब की समय का घटक यहाँ पर निश्किर्य हे |[/FONT]
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[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]सिरसा में एक ही गाँव में शादी होती हे, रोहतक में नहीं ,यहाँ पर स्थान और समाज का भेद के घटक काम कर रहे हैं जब की समय के घटक वही हैं |[/FONT]
[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]क्योंकि समाज वही हे ,समय वही हे पर स्थान भेद हे ,इस लिए मान्यताएं बदल गई हैं |[/FONT]
 
आप मेरी परिभाषा को समझे नहीं अरविन्द जी ,मेने केवल तीन घटक बताये हैं ,सही और गलत के लिए | यहाँ पर समाज एक घटक हे ,व्यक्ति या परिवार नहीं |इस लिए समाज जो सही या गलत कहे जिस से व्यक्ति या परिवार जुड़ा हे | सही या गलत हे |इसीलिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता जब उस समाज के स्थापित नियमों का उल्लंघन करती हे तो उछस्र्न्खाल्ता कहलाती हे और समाज उसका विरोध करता हे |

इसका एक ही तोड़ हे उस व्यक्ति के लिए ,जो समाज के साथ नहीं चलना चाहता ,उस्से कोई दो घटक छोड़ने होंगे अपनी मर्जी करने के लिए | एक तो वो उस समाज को छोड़ दे ,जिस से वो सम्बंधित हे ,और दुसरा वो स्थान छोड़ दे | समय को छोड़ना किसी के बस की बात नहीं हे |और वहां जाए जहां पर या तो उस के विचारों से मिलता जुलता समाज और स्थान हे या फिर कोई भी समाज ना हो एसा स्थान हो |


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हे ,और अगर उस्से समाज के साथ रहना हे, तो जिस समाज में भी वो रहता हो, उस समाज के नियमों का पालन करना होगा ,नहीं तो जंगल में या निर्जन स्थान पर रहे, और जो चाहे करे, वहां कुछ भी गलत और सही नहीं हे |


सही और गलत मानसिक अवस्था हे जिसको व्यक्ति का समाज निर्धारित करता हे |

आप की बात मेरी समझ मैं आ गयी| आप सही कह रहें हैं|

लेकिन अगर घटक हों:-

समय: - आज का युग
स्थान: - दिल्ली, मुम्बई
, बंगलुरु जैसे बड़े सहर
समाज: - पड़ा लिखा नोकरी परस्त

और lir की इन घटको मैं बात करें तो इसमें बुराई का फर्क बस इतना ही ह की जो सामाजिक बुराई आज के समाज मैं लुक-छिप कर, चोरी से होती है वही सामाजिक बुराई lir मैं सार्वजनिक है|
यह सामाजिक बुराई समाज मैं सदियों से होती आई है, और ऐसा मंसूबा ह की यह आने वाले समय मैं काफी बड़ेगी| और अगर यह काफी बड़ेगी तो इसे नियंत्रित करना भी गरुरी हो जाता है| और नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक|
 
सही और गलत मानसिक अवस्था हे जिसको व्यक्ति का समाज निर्धारित करता हे |
 
अगर किसी बड़े सहर का समाज अल. आई. आर.को आज के समय मान्यता देता हे तो वो सही हे| पर जेसा की मेने पहले कहा था एक ब्राह्मण और एक जाट के उदाहरण के रूप में ,क्या उस व्यक्ति का अपना समाज उस को मान्यता देता हे क्या ? क्योंकि भारत में, बड़े शहरों में , एक ही भवन में (शहर, गली, प्रदेश तो छोड़ दीजिये ) अलग -अलग समुदाय के लोग रहते हैं | मुंबई में में जहां पर रहता हूँ ,वो एक ऊंच्च माध्यम वर्गीय मिश्रित समाज हे,और यहाँ पर इस प्रकार के सम्बन्ध को मान्यता नहीं हे |



लोखंड वाला में हो सकती हे इस प्रकार के रिश्तों को मान्यता ,जहां पर कोई समाज नहीं हे और केवल कंक्रीट का जंगल हे ,वहां पर कोई किसी के भी साथ किस्सी भी तरीके से रह सकता हे | वहां पर ये कोई सामाजिक बुराई नहीं हे ,कयोंकि वहां पर कोई समाज नहीं हे |यहाँ पर स्थान और समय के घटक मौजूद हैं जो उसको मान्यता देते हैं समाज का घटक सिथिल हे |
 
सही और गलत मानसिक अवस्था हे जिसको व्यक्ति का समाज निर्धारित करता हे |
समाज का एक अंग होता है "वातावरण"| और जब वातावरण की परिस्तिथि बदल रही हैं तो क्या समाज मैं बदलाव नही आएगा?
 
समाज का एक अंग होता है "वातावरण"| और जब वातावरण की परिस्तिथि बदल रही हैं तो क्या समाज मैं बदलाव नही आएगा?

[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]समाज अपने नियम अपनी आवश्यकता के अनुसार बदलता हे | पहले जट्टों में नानी के गोत में शादी नहीं हो सकती थी पर समाज ने अपनी मान्यता बदली आवश्कता के अनुसार ,पहले वो बात गलत थी अब ठीक हे ,यहाँ पर समय और समाज के घटक किर्याशील हैं और स्थान सिथिल हे |अब१०-१२ साल पहले तक दादी का गोतर भी वर्जित था पर अब अगर दादी ज़िंदा हे तो शादी नहीं करनी अगर गुजर गई हे तो कर सकते हैं | यहाँ पर फिर से समाज ने अपनी आवश्यकता के अनुसार नियम बदल दिए और जो कार्य १० साल पहले गलत था वो अब सही हे | यहाँ पर भी [/FONT]समय और समाज के घटक किर्याशील हैं और स्थान सिथिल हे | अगर कल को समाज की आवश्यकता हुई तो अल आई आर को मान्यता दे देता हे तो वो कार्य भी सही हो जाएगा | जेसे की मध्य प्रदेश के आदिवासियों में सही हे |
 
समाज का एक अंग होता है "वातावरण"| और जब वातावरण की परिस्तिथि बदल रही हैं तो क्या समाज मैं बदलाव नही आएगा?

अकेला व्यक्ति वातावरण नहीं बना सकता |उसके लिए समाज में परिस्थियां बननी अनिवार्य हैं |और समाज में वातावरण बनता हे आवश्यकता के अनुसार |और आवश्यकता नियम का निर्माण करवाती हे |
 
समाज अपने नियम अपनी आवश्यकता के अनुसार बदलता हे | पहले जट्टों में नानी के गोत में शादी नहीं हो सकती थी पर समाज ने अपनी मान्यता बदली आवश्कता के अनुसार ,पहले वो बात गलत थी अब ठीक हे ,यहाँ पर समय और समाज के घटक किर्याशील हैं और स्थान सिथिल हे |अब१०-१२ साल पहले तक दादी का गोतर भी वर्जित था पर अब अगर दादी ज़िंदा हे तो शादी नहीं करनी अगर गुजर गई हे तो कर सकते हैं | यहाँ पर फिर से समाज ने अपनी आवश्यकता के अनुसार नियम बदल दिए और जो कार्य १० साल पहले गलत था वो अब सही हे | यहाँ पर भी समय और समाज के घटक किर्याशील हैं और स्थान सिथिल हे | अगर कल को समाज की आवश्यकता हुई तो अल आई आर को मान्यता दे देता हे तो वो कार्य भी सही हो जाएगा | जेसे की मध्य प्रदेश के आदिवासियों में सही हे |
समाज हम से ही तो बना है | यह मान्यता हमें ही तो देनी है|
 
समाज हम से ही तो बना है | यह मान्यता हमें ही तो देनी है|


यहाँ पर मतदान हुआ हे जाटलैंड पर | अल आई आर को १४ वय्क्तिओं ने समर्थन किया हे और विरोध ५८ ने | यानी अल आई आर समाज को मान्य नहीं हे | समाज बहुमत से चलता हे | जिस दिन ये मत एक दुसरे की जगह ले लेंगे उस दिन अल आई आर को मान्यता मिल जायेगी |यानी समाज को आवश्यकता होगी और उस के अनुसार नियम बन जायेंगे |जिस को अल आई आर की आवश्यकता हे वो या तो इन्तजार करें या लोह्खंड वाला में जा कर रहें |
 
अकेला व्यक्ति वातावरण नहीं बना सकता |उसके लिए समाज में परिस्थियां बननी अनिवार्य हैं |और समाज में वातावरण बनता हे आवश्यकता के अनुसार |और आवश्यकता नियम का निर्माण करवाती हे |

Nuclear Family, growing work pressure, growing competition और बडती इन्टरनेट की दुनिया, क्या ये सब आवश्यकता को नहीं बढ़ा रहे?
 
यहाँ पर मतदान हुआ हे जाटलैंड पर | अल आई आर को १४ वय्क्तिओं ने समर्थन किया हे और विरोध ५८ ने | यानी अल आई आर समाज को मान्य नहीं हे | समाज बहुमत से चलता हे | जिस दिन ये मत एक दुसरे की जगह ले लेंगे उस दिन अल आई आर को मान्यता मिल जायेगी |यानी समाज को आवश्यकता होगी और उस के अनुसार नियम बन जायेंगे |जिस को अल आई आर की आवश्यकता हे वो या तो इन्तजार करें या लोह्खंड वाला में जा कर रहें |
मतदान से पहले बहस जरुरी है | यहाँ मतदान पहले हुवा है और बहस बाद मैं|
 
इस तर्क के हिसाब तैं तो फेर मनोज आर बबली बेक़सूर थे i भाई हिन्दू विवाह कानून मैं संशोधन की मांग नै ले के आप नै क्यों इतना जोर ला राख्या था i
भाईसाहब थोडा गौर से पढो अरविन्द का तर्क
" एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक ही समाज मैं एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो सकता है,
गाँव/खाप पंचायत इसीलिए बुलाई जाती हैं
"
इस तर्क के मायने तादाद से हैं , और तादाद मनोज बबली जैसो के हक में नहीं हैं , वो दोनों तो सिर्फ खुद की जाण में ठीक थे बस |
 
Nuclear Family, growing work pressure, growing competition और बडती इन्टरनेट की दुनिया, क्या ये सब आवश्यकता को नहीं बढ़ा रहे?

इन् सब का अल. आई. आर. से क्या सम्बन्ध हे ?पहले सम्बन्ध स्थापित कीजिये |
 
भाईसाहब थोडा गौर से पढो अरविन्द का तर्क
" एक कार्य,एक ही स्थान ,एक ही समय पर एक ही समाज मैं एक के लिए सही और दुसरे के लिए गलत हो सकता है,
गाँव/खाप पंचायत इसीलिए बुलाई जाती हैं
"
इस तर्क के मायने तादाद से हैं , और तादाद मनोज बबली जैसो के हक में नहीं हैं , वो दोनों तो सिर्फ खुद की जाण में ठीक थे बस |
इसीलिए तो मैं भी कह रह्या सूँ कि म्हारे समाज मै यो बिना ब्याह करे एक छत के नीचे रहण का रिवाज़ इसलिए ठीक कोन्या कि ज्यादातर लोग इसको ठीक ना मानते i नहीं तो इसमें खूब सुवाद सै, हींग लगे न फिटकड़ी, रंग चोखो आ जाए i ना टेंट का खर्चा, ना दहेज़ का, ना बालकां का झंझट i जब तक जीवो ऐश करो i काल किसने देख्या सै i पर समाज तो ठीक ना मानता, इसने कौन समझावे, आर इस सारे समाज तैं बगावत तो सिर्फ बॉलीवुड फिल्म की कहानी में ही हो सकती है i जै यो समाज बीच मैं भांजी ना मारता तो मैं तो खुद बेरा ना इब ताएँ कितने सहवास कर लेता i भाई , जी तो म्हारा सब का ए करै सै, पर इस समाज तैं डरना पडे सै, आर इसीलिए आज की परिश्थिति में म्हारी बिरादरी मै ( खासकर गामां मै) तो ब्याह/मुकलावे पाछे ए यो काम हो सके सै. पर जो छोरे छोरी इसा काम ब्याह बिना करना चाह्वैं सें, उनके प्रति कोई दुर्भावना नहीं, हम तो अपनी सोच बता रहे हैं सिर्फ.
 
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