Shayri (Part 1)

Status
Not open for further replies.
[h=6]पूर्व-
दर-ओ-दीवार तमन्ना की सब ज़माने में
हमको चाहत न हो, इतनी दुआ, और कोई नहीं...
मध्य-
दर-ओ-दीवार तमन्ना की चारों फलकों पे
घिरा हूँ और निकलने का सबब कोई नहीं...
अंत-
दर-ओ-दीवार तमन्ना की सारे फलकों पे
इसमें बस बस तू ही तू है, और यहाँ कोई नहीं..
[/h]
 
छेडती है कभी लबो को कभी तेरे रुखसारों को
इन जुल्फों को तुमने बडा सिर चढा रखा है
 
काश कुछ दिनो के लिए दुनिया से चले जाना मुमकिन होता
सुना है लोग याद करते है चले जाने के बाद
 
Dhadkan bina dil ka matlab hi kya
roshani bina diye ka matlab hi kya
kyu kehte hai log ki mohabbat na kar dard milta hai
wo kya jane ki dard bina mohabbat ka matlab hi kya…
​
 
Har khamoshi ka matlab inkaar nahi hota
Har nakamyabi ka matlab haar nahi hota
Toh kya hua agar hum tume na paa sake
Sirf paane ka matlab pyar nahi hota…
​
 
[h=6]"Deedar ki talab ho toh nazre jamaye rakhiye Ghalib"....

Kyuki.....

"Dupatta" ho ya "Naseeb"

Sarakta zaroor hai......!!!
[/h]
 
Hum To Fanaa Ho Gaye Uski Ankhen Dekh Kar Ghalib
Na Jane Woh Aaina Kiase Dekhte Honge ...!

वहाँ से इक पानी की बूँद न निकल सकी 'फ़राज़'

तमाम उम्र जिन आँखों को हम झील लिखते रहे !!!
 
Dil ki baat aankhon se keh gaye,
Wo rakhe hue jahar ko apne haathon se peela gaye….
Karte kaise inkaar ham unhe maut se,
jab unki pehli nazar pe hi ham mar gaye…..
​
 
वहाँ से इक पानी की बूँद न निकल सकी 'फ़राज़'

तमाम उम्र जिन आँखों को हम झील लिखते रहे !!!

ये आँखें बंद हो गयी तुम्हारा इंतज़ार करते करते 'ग़ालिब'
और तुम इनसे पानी निकलने का इंतज़ार करते रहे !!
 
रोज रोते हुए कहती है... ज़िन्दगी मुझसे 'फ़राज़'
सिर्फ एक शख्श की खातिर मुझे बर्बाद न कर !!
 
रोज रोते हुए कहती है... ज़िन्दगी मुझसे 'फ़राज़'
सिर्फ एक शख्श की खातिर मुझे बर्बाद न कर !!

आज तो बरबाद हो के मानोगे कति
सारे जुलमी शेर लिखण लाग रे हैं !
 
आज तो बरबाद हो के मानोगे कति
सारे जुलमी शेर लिखण लाग रे हैं !

ज़िन्दगी का एक गहरा राज़ छुपा है यहाँ
'शेर' कहकर इसकी तोहिन ना कर !!
 
"Deedar ki talab ho toh nazre jamaye rakhiye Ghalib"....

Kyuki.....

"Dupatta" ho ya "Naseeb"

Sarakta zaroor hai......!!!


तेरे हुस्न को परदे की ज़रूरत ही क्या है ग़ालिब
कौन होश में रहता है, तुझे देखने के बाद
 
अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ
थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ
छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रोशनी हो, घर जलाना चाहता हूँ
आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ........
 
न शर्म है, न लाज ,
फिर भी खफा है हमसे, जिन्हें हो हमसे नाज !
वजह होती तो ढूंड भी लेते इलाज़ ,
सुर्ख बैठी चिन्ह से.....भला जज्बात भी बन पाते राज !!​
 
बेवजह की ये बारिशे...
भिगो देती है
अरमानो को...
यू मेरे...
ख्यालों में
तुम, आया जाया ना करो.​
 
ए खुदा, यूँ तो अधूरी खवाहिशें, बहुत रही है मेरी जिंदगी में ....
मगर उसे ना लिख के मेरी तक़दीर में, तुमने गुनाह कर दिया​
 
एक मुद्दत बाद मिली क़ैद से आज़ादी ,
पर किस्मत तो देखो , जब आज़ादी मिल्ली तो पिंजरे से प्यार हो गया .​
 
तेरी आँखों में आंसू थे मेरी खातिर .....

वोही इक लम्हा मुझे जिंदगी से पियारा लगा ..​
 
Status
Not open for further replies.
Back
Top