Reservation is our constitutional right

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हरियाणा मे जाटों की आरक्षण की मांग कैबिनेट ने स्वीकार कर ली हैं इसके लिए हुड्डा जी का धन्यवाद दिया हैं और आंदोलन खापों का था उन लोगो ने भी हुड्डा जी से मुलाक़ात के बाद आंदोलन वापिस ले लिया | कल जो मीटिंग बुलाई हैं वह केंद्र की मांग पर चर्चा के लिए बुलाई हैं | सारे ब्यान यही हैं एक बार फिर पढ़ लो | आप जैसा पढ़ा लिखा भी अगर कनफ्यूज हैं तो फिर कोई इलाज भी नहीं | और जो लोग कन्फ़्यूजन की बात कर रहे हैं उनकी वो जाने किस बात पर कनफ्यूज हैं , जबकि हर समझदार आदमी को पता हैं की जो हमारी मांग हैं वह कुछ आगे ही बढ़ी हैं और जब हमारी मांग की सुनवाई हो रही हैं तो अड़ियल रवैया क्यू अपनाए | काम काम के तरीके से होता हैं खामखा लोग मरवाने जरूरी हैं ?
वैसे यह आंदोलन तो खापों की तरफ से था जो की उन्होने मुख्यमंत्री से बातचीत के बाद वापिस ले लिया परंतु मुझे यह समझ नहीं आया की दूसरी संघर्ष समिति के धर्मपाल छोत ने मीटिंग के बाद यह बात मीडिया के सामने क्यू नहीं कही की हम सहमत नहीं हैं ? अगले दिन उनको ध्यान आई की वो इस फैसले से सहमत नहीं हैं | वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दु की ऐसी हरकतों के कारण ही खाप ने छोत से लिखित मे लिया था की आगे से आंदोलन खाप चलाएंगी | ऐसे लोग सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए समाज को कनफ्यूज कर रहे हैं | और यह बेल्म गेम नहीं जो हक़ीक़त हैं वहीं बताई जा रही हैं |
रजनीश जी आप एक बात का जवाब दे दो की आंदोलन हर बार हरियाणा की तरफ से क्यों शुरुआत होता हैं जबकि यू पी की मांग केंद्र से वह क्यों कुछ नहीं होता ? अब भी हरियाणा की खापों की तरफ से आंदोलन किया गया था , हरियाणा मे मांग पूरी होने की वजह से वापिस ले लिया पर उत्तर प्रदेश मे क्या ??? दो साल मे तीन बार आंदोलन हो लिया , पहला आंदोलन हरियाणा यू पी के जाटों ने मिलके शुरू किया था परंतु एक बात का जवाब दे दो की यू पी वाले बीच मे ही क्यों उठ गए थे ? दूसरी बार की शुरुआत भी हरियाणा से आर-पार की बोलके शुरू किया जिसमे एक लड़का शहीद हुआ जबकि यू पी मे कुछ भी नहीं किया , बड़ी बड़ी बाते की थी की हरियाणा मे कुछ हुआ तो देश जाम हो जाएगा | तीसरी बार की शुरुआत भी हरियाणा से ही हुई इस बार आंदोलन की तारीख 16 की थी परंतु सरकार ने 12 को ही आयोग की सिफ़ारिश मान ली इसलिए आंदोलन वापिस ले लिया परंतु आप लोगो ने क्या किया ????
थाम कर लो आंदोलन कौन मना करता हैं ????
 
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वरिष्ठ संवाददाता, रोहतक : अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति की इकलौती मांग जाटों को आरक्षण दिलवाना है। लेकिन कुछ स्वयंभू जाट नेता राजनीति कर रहे हैं। राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए विवादास्पद बयानबाजी कर जाट आरक्षण के आंदोलन को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन समाज के लोगों को द्रोपदी स्वयंवर की तरह मछली की आंख की तरफ आरक्षण पर फोकस करने की जरुरत हैं। यह तभी संभव है, जब जाट बिरादरी एकजुट होकर संघर्ष करेंगी।इस तरह की बातें मीटिंग में विचार रखने वाले प्रत्येक वक्ता ने कही। हालांकि किसी भी गुट व नेता का सीधे नाम नहीं लिया गया। इससे स्पष्ट हो गया है कि जाट आरक्षण को लेकर भी कहीं न कहीं मतभेद हैं, जिसके कारण जाट समाज में संशय बना हुआ है। मतभेद उजागर होने का पुख्ता प्रमाण 16 दिसंबर को दिल्ली के लिए जत्थे रवाना होने से मिल गया है। क्योंकि 14 दिसंबर को रोहतक में खापों की बैठक हुई थी, जिसमें फैसला लिया गया था कि 17 दिसंबर को प्रदेश के मुख्यमंत्री से मिलने के बाद आंदोलन का निर्णय लिया जाएगा। लेकिन खापों के कुछ स्वयं-भू नेताओं ने खापों के फैसले पर ध्यान नहीं दिया और 16 दिसंबर को ही जत्थे रवाना कर दिए। इसके बाद 17 दिसंबर को चंडीगढ़ में सीएम से मुलाकात कर आंदोलन खत्म करने की घोषणा भी जत्थों तक नहीं पहुंचाई गई, जिसके कारण जाट आरक्षण को लेकर भ्रमित रहे। इससे स्पष्ट है कि कुछ जाट नेता राजनीति पार्टियों के इशारे पर काम कर रहे। संघर्ष समिति के राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष रामकरण हुड्डा ने कहा कि निकट भविष्य में सर्वखाप पंचायतें होगी, जिसमें खापें आंदोलन संबंधी गलत फैसलों की समीक्षा करेंगी।दिल्ली में मजबूती के लिए समिति का विस्तार : हरियाणा में तो अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति सक्रिय भूमिका में काम कर रही है, लेकिन दिल्ली में सरकार पर दबाव बनाने के लिए समिति का विस्तार करने का निर्णय लिया। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लेते हुए अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी झाड़सा -360 से श्याम सिंह ठाकरान को सौंपी गई है। इसके अलावा राष्ट्रीय सचिव के लिए पालम-360 से किशन चंद सौंलकी को नियुक्त किया गया है।
मीटिंग मे इन खापों ने लिया हिस्सा -पालम खाप 360 , झाड़सा खाप 360 , अहलावत खाप 17 , कादियान खाप , दलाल खाप , धनखड़ खाप , जाटू खाप 84 , जाखड़ खाप , लोवा खाप 17 , सांगवान खाप , श्योराण खाप , बहू खाप 17 , बावल खाप 84 , रोहतक खाप 84 |
 
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6 मार्च को जाट आंदोलन पर पुनर्विचार होगा
रोहतक। आज दिनांक 30 दिसंबर, रविवार को चौ. छोटूराम धर्मशाला में अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति की एक बैठक चौ. हरदीप सिंह अहलावत की अध्यक्षता में संपन्न हुई, जिसमें जाट आरक्षण पर विस्तार से चर्चा एवं समीक्षा की गई। संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष पूर्व कमांडेंट हवासिंह सांगवान ने जाट आरक्षण पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जाट समाज ने अपनी आरक्षण की मांग के लिए मार्च, 2011 में 21 दिनों तक 15 जगह हरियाणा में रेलों को रोककर एक सफल आंदोलन का उदाहरण पेश किया, जिसमें किसी प्रकार की तोडफ़ोड़ व हिंसा नहीं हुई और जाटों ने अपनी एकता और अनुशासन का अनुकरणीय उदाहरण पेश किया, जो पूरे देश में एक मिसाल है। इसी आंदोलन में खापों ने बढ़-चढक़र सहयोग दिया। इसी आंदोलन की बदौलत हरियाणा में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया तथा केंद्र में राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग को जाटों के आरक्षण से संबंधित पुनर्विलोकन का अधिकार दिलवाया गया। हरियाणा पिछड़ा वर्ग आयोग ने दिनांक 13 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट हरियाणा सरकार को सौंपी, जिसमें जाट व अन्य तीन जातियों को पिछड़ी जाति में शामिल किए जाने की सिफारिश की, जिसे हरियाणा सरकार ने सिद्धांतिक रूप से स्वीकार किया। जाट व अन्य तीन जातियों को अलग से दस प्रतिशत के आरक्षण का प्रावधान किया तथा साथ-साथ उच्च जातियों को आर्थिक आधार पर अलग से दस प्रतिशत आरक्षण देने के लिए भी सर्वे करने की बात कही गई है, जिस पर बैठक में सर्वसम्मति से सहमति जताई गई तथा हरियाणा के मुख्यमंत्री तथा हरियाणा पिछड़ा आयोग को धन्यवाद दिया। साथ-साथ हरियाणा सरकार से यह भी अपील की गई कि जल्दी से जल्दी इस रिपोर्ट पर अधिसूचना जारी कर दी जाए तथा इसमें और अधिक विलंब न किया जाए।
बैठक में इस विषय पर भी विचार तथा समीक्षा की गई कि सितंबर माह में जींद जिले के दिनौदा गांव में हुई जाट रैली में सभी खापों व जाट संगठनों ने यह फैसला लिया था कि यदि 15 दिसंबर तक जाटों को आरक्षण नहीं मिलता है तो 16 दिसंबर से आंदोलन शुरू कर दिया जाएगा, लेकिन इसी बीच 13 दिसंबर को हरियाणा पिछड़ा आयोग ने जाटों को राज्य स्तर पर अलग से दस प्रतिशत आरक्षण देने की रिपोर्ट दी और इसे हरियाणा सरकार ने स्वीकार किया, जिस पर 14 दिसंबर को रोहतक में खापों की बैठक हुई, जिसमें फैसला लिया गया कि 17 दिसंबर को हरियाणा के मुख्यमंत्री से मिलने के बाद ही आंदोलन का फैसला लिया जाएगा, लेकिन खापों के कुछ स्वयंभू नेताओं ने खापों के फैसले पर कोई ध्यान नहीं दिया और दो-तीन जगहों से 16 दिसंबर से ही जत्थे रवाना करवा दिए और स्वयं कुछ खापों को लेकर 17 दिसंबर को अलग से चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री से मिलने पर आरक्षण पर अपनी सहमति जताई और आंदोलन वापिस लेने की घोषणा की। लेकिन इस घोषणा की सूचना जत्थों तक नहीं पहुंचाई जिस कारण जाट हैरान, परेशान और भ्रमित रहे। इसके लिए पूर्णतया वे जाट चौधरी जिम्मेवार हैं जो समय पर कोई फैसला नहीं ले पाए और किसी राजनीतिक पार्टी के इशारे पर काम करते रहे। इस प्रकार की कार्रवाइयां पूरे जाट समाज को भ्रमित करने वाली होती हैं तथा समाज को गुमराह करने वाली ऐसी शक्तियों से सावधान रहना होगा। चौधरी रामकरण हुड्डा, राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष ने बतलाया कि निकट भविष्य में सर्वखाप पंचायत होगी, जिसमें खापें आंदोलन संबंधी गलत फैसलों की समीक्षा करेंगी।
बैठक में सर्वसम्मति से यह फैसला लिया कि भविष्य में यदि जाट आरक्षण के लिए आंदोलन की आवश्यकता पड़ती है तो इसके लिए संघर्ष समिति अपनी रूपरेखा तैयार करेगी तथा खापें संघर्ष समिति का सहयोग करेंगी, जिस प्रकार मार्च, 2011 के आंदोलन में किया था। यह भी फैसला लिया गया कि केंद्र सरकार को पांच मार्च, 2013 तक का समय दिया जाता है। यदि समय रहते केंद्र सरकार जाटों को केंद्र में आरक्षण नहीं देती है, तो छह मार्च को चौ. छोटूराम स्मारक, गढ़ी सांपला में संघर्ष समिति की कार्यकारिणी की मीटिंग होगी, जिसमें खापों को भी निमंत्रण दिया जाएगा तथा अगर आवश्यकता पड़ी तो आम सहमति से आगामी आंदोलन की तिथि की घोषणा की जाएगी। इसके लिए पहले से ही राष्ट्रीय अध्यक्ष भगतसिंह दलाल समिति के पदाधिकारियों एवं खापों के प्रधानों से विचार विमर्श करके रूपरेखा बनाएंगे।
 
(नव-वर्ष 2013 के शुभ आगमन पर)
हरियाणा प्रदेश की गुजरात प्रदेश से तुलना करना हरियाणवी के लिए कष्टदायक : सांगवान
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष पूर्व कमांडेंट हवासिंह सांगवान ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए बतलाया कि हरियाणा प्रदेश की गुजरात प्रदेश से तुलना करना न्यायोचित नहीं है। हरियाणा प्रदेश में लगभग हर गांव के किनारे देश की रक्षा करने और सुरक्षा में शहीद होने वाले शहीदों की प्रतिमाएं स्वयं बयान कर रही हैं कि हरियाणा प्रदेश का देश की सुरक्षा में भारी योगदान है। भारतीय सेना में हर दसवा सिपाही हरियाणा प्रदेश का है, लेकिन गुजरात प्रदेश में इस प्रकार शहीद वीरों की प्रतिमाएं ढूंढऩे से ही मिल सकती हैं। यहां तक कि गुजरात प्रदेश की स्वयं की आंतरिक सुरक्षा में अभी तक राजस्थानी व हरियाणवी लोगों का भी महान योगदान रहा है क्योंकि वहां आज भी गुजरात शस्त्र पुलिस तथा गुजरात पुलिस में इनकी बहुतायत है। हरियाणा प्रदेश गेहूं उत्पादन में देश में प्रथम है तथा केंद्रीय भंडार में इसका योगदान सर्वोपरि है अर्थात देश के लोगों का पेट भरने में हरियाणा प्रदेश अग्रणीय है। इसी प्रकार प्रति व्यक्ति आय में हरियाणा, गोवा के बाद दूसरे नंबर पर है, जबकि गोवा की आमदनी केवल पर्यटन पर निर्भर है, तो वहीं दूसरी ओर प्रति व्यक्ति निवेश में भी हरियाणा प्रथम नंबर पर है, जबकि गुजरात तीसरे नंबर तक भी नहीं है। पशुधन में गुजरात का हरियाणा से कोई मुकाबला नहीं। हरियाणा दूध उत्पादन में भारत का प्रथम प्रदेश है। जहां तक खेलों की बात है, हरियाणा विश्व भर में विख्यात हो चुका है, जबकि गुजरात प्रदेश का इस क्षेत्र में कहीं भी नाम नहीं। इस प्रकार हरियाणा प्रदेश की गुजरात से बार-बार तुलना करना हरियाणा वासियों के लिए बहुत ही कष्ट और अनादर की बात है। गुजरात हजारों गांधी पैदा कर सकता है, लेकिन आज तक एक भी नाहरसिंह, गुलाब सिंह सैनी, राव तुलाराम व कर्नल होशियार सिंह पैदा नहीं कर पाया।
विख्यात इतिहासकार प्रो. केसी यादव ने सत्य कहा है कि सन् 1920 से लेकर 2012 तक भारत वर्ष में चौधरी छोटूराम जैसा मजदूर और किसानों का नेता पैदा नहीं हुआ। उनकी जन्म स्थली भी हरियाणा ही है। जहां तक भारत के लौह पुरुष कहे जाने वाले सरदार पटेल की बात है, तो याद रखने की बात है कि उनके पूर्वज दवाबा के रहने वाले थे, न कि गुजरात के। इसमें कोई दूसरी राय नहीं कि हरियाणा भारत वर्ष का प्रथम राज्य बनने की ओर बड़ी तेजी से अग्रसर है। इसीलिए गुजरात से उसकी तुलना करना सूरज से चांद की तुलना करने के समान है।
 
(नव-वर्ष 2013 के शुभ आगमन पर) हरियाणा प्रदेश की गुजरात प्रदेश से तुलना करना हरियाणवी के लिए कष्टदायक : सांगवान अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष पूर्व कमांडेंट हवासिंह सांगवान ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए बतलाया कि हरियाणा प्रदेश की गुजरात प्रदेश से तुलना करना न्यायोचित नहीं है। हरियाणा प्रदेश में लगभग हर गांव के किनारे देश की रक्षा करने और सुरक्षा में शहीद होने वाले शहीदों की प्रतिमाएं स्वयं बयान कर रही हैं कि हरियाणा प्रदेश का देश की सुरक्षा में भारी योगदान है। भारतीय सेना में हर दसवा सिपाही हरियाणा प्रदेश का है, लेकिन गुजरात प्रदेश में इस प्रकार शहीद वीरों की प्रतिमाएं ढूंढऩे से ही मिल सकती हैं। यहां तक कि गुजरात प्रदेश की स्वयं की आंतरिक सुरक्षा में अभी तक राजस्थानी व हरियाणवी लोगों का भी महान योगदान रहा है क्योंकि वहां आज भी गुजरात शस्त्र पुलिस तथा गुजरात पुलिस में इनकी बहुतायत है। हरियाणा प्रदेश गेहूं उत्पादन में देश में प्रथम है तथा केंद्रीय भंडार में इसका योगदान सर्वोपरि है अर्थात देश के लोगों का पेट भरने में हरियाणा प्रदेश अग्रणीय है। इसी प्रकार प्रति व्यक्ति आय में हरियाणा, गोवा के बाद दूसरे नंबर पर है, जबकि गोवा की आमदनी केवल पर्यटन पर निर्भर है, तो वहीं दूसरी ओर प्रति व्यक्ति निवेश में भी हरियाणा प्रथम नंबर पर है, जबकि गुजरात तीसरे नंबर तक भी नहीं है। पशुधन में गुजरात का हरियाणा से कोई मुकाबला नहीं। हरियाणा दूध उत्पादन में भारत का प्रथम प्रदेश है। जहां तक खेलों की बात है, हरियाणा विश्व भर में विख्यात हो चुका है, जबकि गुजरात प्रदेश का इस क्षेत्र में कहीं भी नाम नहीं। इस प्रकार हरियाणा प्रदेश की गुजरात से बार-बार तुलना करना हरियाणा वासियों के लिए बहुत ही कष्ट और अनादर की बात है। गुजरात हजारों गांधी पैदा कर सकता है, लेकिन आज तक एक भी नाहरसिंह, गुलाब सिंह सैनी, राव तुलाराम व कर्नल होशियार सिंह पैदा नहीं कर पाया। विख्यात इतिहासकार प्रो. केसी यादव ने सत्य कहा है कि सन् 1920 से लेकर 2012 तक भारत वर्ष में चौधरी छोटूराम जैसा मजदूर और किसानों का नेता पैदा नहीं हुआ। उनकी जन्म स्थली भी हरियाणा ही है। जहां तक भारत के लौह पुरुष कहे जाने वाले सरदार पटेल की बात है, तो याद रखने की बात है कि उनके पूर्वज दवाबा के रहने वाले थे, न कि गुजरात के। इसमें कोई दूसरी राय नहीं कि हरियाणा भारत वर्ष का प्रथम राज्य बनने की ओर बड़ी तेजी से अग्रसर है। इसीलिए गुजरात से उसकी तुलना करना सूरज से चांद की तुलना करने के समान है।
Mr Ravinder, where, when, for what and by whom the comparison has been done, also your aim of putting this statement of mr Hawa singh on this thread, is not understood, will you oblige us by putting more light please, regards
 
Jat Reservation is not only in the Interest of the Jats but the Nation also : Sangwan
Ex. Commandant Hawa Singh Sangwan, President of Akhil Bhartiya Jat Arakshan Sangharsh Samittee, Haryana Unit stated before the Press Reporters that the demand of Jats for conferment of their community into the OBC fold is completely judicious and constitutional. Mandal Commission has clearly mentioned in his report that any caste if left out from the list of OBC castes should be included later on by the Central Govt as well as State Govts. The Jats had refused to consider them as an OBC at their own and now they have visualized the utility of being an OBC, as other farming castes such as Ahir, Gurjar and Saini etc. who are par with the Jat community in social, educational and economical status have already been included in the OBC fold.
Sangwan further stated that conferment of OBC status to the Jats is not only in the interest of Jats, but for the Nation also. If the Jats are considered OBC at Central level also, there would be no loss to the Govt or the Nation or to either any community, In case, they are deprived of their legitimate and judicious right for a long time, they would certainly go on rampage in near future, because the Jat community has already been awoke for their right. During the past stirs, three lives and huge loss to Govt. property have already been occurred which is not repairable. Inordinate delay to meet their demand is likely to cause more demage to the Govt. property as well as to the community. Honestly speaking the Jat history reveals that whenever the Jats determind to retrieve their rights they had been never gone on footback. For an example, the Jats had struggled during the Mugal period causing sacrifice of Gokula Jat, Maru Jat, Raja Ram, Ramkichahar and Chooraman etc. Similarly, during the British period, Raja Nahar Singh, Kartar Singh Grewal alias Saraba , Bhagat Singh, Raja Mahender Partap, Sardar Ram Singh, Banta Singh, Ranga Singh, Beer Singh, Baba Basakha Singh and Har Kishan were also secrified for the cause of the country. Now the cause stands for their own community. Sangwan strongly mentioned that this note may be considered as an input for record not as a threat.
 
जाट आरक्षण केवल जाटों के हित में ही नहीं, बल्कि राष्ट्र हित में भी : सांगवान
भिवानी। अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष हवासिंह सांगवान ने जाट धर्मशाला, भिवानी में समिति की एक बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि जाट समाज को अपने पिछड़े वर्ग में शामिल करना एक कानूनी और सवैंधानिक मांग है, जो हर पहलू पर खरी उतरती है। मंडल आयोग ने बड़ा साफ लिखा है कि यदि कोई जाति अपने इस अधिकार से किसी कारण से सूची में आने पर रह गई है, तो उसको मिलाने की जिम्मेवारी केंद्र सरकार व राज्य सरकार की है।
सांगवान ने आगे बतलाया कि जो जातियां सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से जाट समाज के समान हैं, जैसे कि अहीर, गुज्जर व सैनी आदि, उसी वर्ग में जाट समाज को बगैर किसी विलंब के सम्मिलित कर लिया जाए, ऐसा करने पर सरकार को किसी प्रकार का नुकसान नहीं है। लेकिन इसमें देरी होने से केवल जाट समाज को ही नहीं, राष्ट्र को भी हानि होने वाली है क्योंकि हमने पहले ही देख लिया है कि जाट आंदोलन के दौरान तीन लोगों की जानें गईं तथा सरकार को भी करोड़ों रूपए की हानि हुई है और यदि समय रहते जाटों को यह अधिकार नहीं दिया गया तो यह लाजमी है कि जाट भविष्य में अपने अधिकार की लड़ाई अवश्य लड़ेगा, चाहे कुछ भी हो जाए, क्योंकि जाट समाज अपने इस अधिकार के लिए खड़ा हो चुका है और पीछे हटने का कोई प्रश्र ही पैदा नहीं होता।
सांगवान ने आगे कहा कि जाट इतिहास से यह स्पष्ट है कि जाटों ने अपने अधिकारों की लड़ाई मुगलकाल से ही आरंभ की थी, जिसमें औरंगजेब के काल में गोकुला जाट और माडूसिंह जाट किसानों की अगुवाई करते हुए शहीद हुए। इसके बाद इन्हीं के पदचिन्हों पर चलते हुए राजाराम, रामकीचाहर व चूड़ामण आदि ने अपनी शहीदी दी। इसी प्रकार ब्रिटिश काल में राजा नाहरसिंह, करतार सिंह ग्रेवाला उर्फ सराबा, भगतसिंह, राजा महेंद्र प्रताप, सरदार रामसिंह, बंता सिंह, रंगा सिंह, बीर सिंह, बाबा बैसाखा सिंह तथा हरकिशन जैसे अनेक जाटों ने अपनी शहादत देकर अपने उद्देश्य को पूरा किया। इसलिए ईमानदारी से कहा जाए, तो सरकार को जाटों का अधिकार बगैर विलंब के दे देना चाहिए, इसी में जाट और राष्ट्र का हित है। इस पर एक सूचना के तौर पर अमल किया जाए, न कि धमकी के तौर पर।
 
जाट नेता यशपाल मलिक का ऐलान
कांग्रेस को जयपुर में घेरेंगे जाट
अमरोहा। कड़ाके की ठंड में जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक ने यह ऐलान करके राजनीतिक गरमाहट ला दी कि 19 जनवरी को जाट जयपुर में ही चिंतन शिविर लगाकर कांग्रेस को उसी के चिंतन शिविर में घेरेंगे।
अग्रवाल धर्मशाला में मंडलीय पंचायत में मलिक ने स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण के लिए योजनाबद्ध आंदोलन की तैयारी पूरी कर ली गई है। फिलहाल 19 जनवरी को जयपुर में जाट भी विशाल दो दिवसीय चिंतन शिविर करेंगे। जिसमें भारी तादात में जाट अगले कदम का फैसला लेंगे। कांग्रेस को घेरने का जाटों के पास इससे बेहतर मौका हो नहीं सकता।
उन्होंने मुरादाबाद व बरेली मंडल के जाटों से शिविर सफल बनाने का आह्वान किया। जिलाध्यक्ष चौ. वीरेंद्र प्रधान ने ऐलान किया कि फरवरी में काफूरपुर की महापंचायत में आंदोलन पर फैसला सुनाएंगे। पंचायत में राष्ट्रीय महासचिव बीएस अहलावत, प्रदेशाध्यक्ष चौ. उम्मेद सिंह, जिलाध्यक्ष मुरादाबाद सतवीर सिंह, बिजनौर के जिलाध्यक्ष चौ. यशवीर सिंह, रूमाल सिंह, रामपाल सिंह, भगत सिंह बोबी, सुशील प्रधान, विकास चौधरी, बिन्नू चौधरी, नरेश प्रधान, मेवाराम सिंह, राविंद्र रहे।
सिंह, धर्मवीर सिंह, भगवंत सिंह, जयपाल सिंह, सुनील चौधरी, महीपाल सिंह, रमेश सिंह ने हिस्सा लिया।


I am a little less knowledged on this topic, but why cant Jats be together?
 
doosri baat mere jaise jaat bahut hai jo apne jaankaar n relatives politicians ko shaadi mai bbula ke khush hote hai but tere jaise jaato ki bhi koi kami nahi hai jo doosro ko deekh ke jalte hai ki uskii itni tadgi approach kyukar hogi:).....bhaiyaaa tee chidaa naa karte:)......but yee jaaan kar acha laga ki taane bhi merii tarah samaj ke logo mai uthna baitha pasand seee......last baat harr koi teri tarahhhh apne aaap ko saab ka dada samjhe hee...n yee dikhaaan ki koshish karee hee kee maaane eee saab cheejaaaa kaa gyaaan see......enjoy bro

Tagdi approach banaye rakhiye bhai kaam aawegi tere n manne khusi hogi tere kaam aai to n rahi baat meri to main khud teri approach jitni bargi appoach sun so chidan aale baat e koni balki khusi hui jaankar ki aap apni approach banakr khus ho :)

Manne sab chiz ka gyan hota to tere tai jo tanne kahi wah thodi puchta , gyani hone mein n curious hone mein farak hai n main curious hun bas. Baki Ab tak tune bhai ye confirm nhi kia ki Sangwan sahab apna ladka klagwaya hai vo afwah hai ya sach? proof nhi dia jaisa aapne claim kia tha dene ka?
 
Itni Nafrat Achi nahi Ke kal ko mile to afsos na ho..

अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

आओ शहर में नए दोस्त बनाये, आस्तीनों में चलो सांप ही पाले जाए
 
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Mr Ravinder, where, when, for what and by whom the comparison has been done, also your aim of putting this statement of mr Hawa singh on this thread, is not understood, will you oblige us by putting more light please, regards

Mr Ravinder Sura, Is my question very difficult to answer or you do not have answer, if you post some topic be ready to answer questions also,
 
जाट आरक्षण केवल जाटों के हित में ही नहीं, बल्कि राष्ट्र हित में भी : सांगवान
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''' इसलिए ईमानदारी से कहा जाए, तो सरकार को जाटों का अधिकार बगैर विलंब के दे देना चाहिए, इसी में जाट और राष्ट्र का हित है। इस पर एक सूचना के तौर पर अमल किया जाए, न कि धमकी के तौर पर।

What is new!

Does he think that the authorities are unaware of the fact that Jats are as important component of Indian nation as others are !
 
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What is new!

Does he think that the authorities are unaware of the fact that Jats are as important component of Indian nation as others are !

Dear Sir,
I think that might be the case, Jats have ceased to fight for their rights and things they want to achieve as a community. Other communities are coming forth in the perspective very fast. The force of agitation and getting their rights have decreased due to increase in education, less children in families and rapid urbanization.

In perspective of being an Indian, i am an Indian first and a Jat second but i hold on to my Jat culture, values, ethics more stronger than any other values. I still remember as a kid i was offered milk in a big glass made out of copper which had lot of beautiful carvings on it. As a kid it was a big glass indeed but it was not just a glass and not just some milk in it. It was my ancestors methods, customs and way of life. I will like to pass on those values, traditions, customs and thoughts to my future generations and will like to see other fellow Jats doing the same. As an Indian, i might share many values, customs, traditions etc. with other fellow Indians but as a family person and community person, coming from certain area and specific community of people, i will always cherish such memories and put them ahead of any other values.
 
Dear Sir,
I think that might be the case, Jats have ceased to fight for their rights and things they want to achieve as a community. Other communities are coming forth in the perspective very fast. The force of agitation and getting their rights have decreased due to increase in education, less children in families and rapid urbanization.

In perspective of being an Indian, i am an Indian first and a Jat second but i hold on to my Jat culture, values, ethics more stronger than any other values. I still remember as a kid i was offered milk in a big glass made out of copper which had lot of beautiful carvings on it. As a kid it was a big glass indeed but it was not just a glass and not just some milk in it. It was my ancestors methods, customs and way of life. I will like to pass on those values, traditions, customs and thoughts to my future generations and will like to see other fellow Jats doing the same. As an Indian, i might share many values, customs, traditions etc. with other fellow Indians but as a family person and community person, coming from certain area and specific community of people, i will always cherish such memories and put them ahead of any other values.

I think, i took this issue at a very personal level. Some content in above matter is out of context. These are just some thoughts about having an Indian Identity and still retaining a person identity that i inherited from my ancestors.
 
Mr Ravinder Sura, Is my question very difficult to answer or you do not have answer, if you post some topic be ready to answer questions also,
फतेह सिंह जी , यह तो आजकल हम आए दिन यहा मीडिया मे देखते पढ़ते सुनते हैं और कुछ राजनीतिक नेता भी इसकी चर्चा करते दिख जाएंगे शायद इसी लिए यह ब्यान दिया गया होगा , वैसे मेरे ख्याल से इस ब्यान मे बताए गए तथ्य या आकडे गलत नहीं हैं | मुझे इसे पोस्ट करने के लिए कोई ढंग की थ्रेयड नजर नहीं आई और ना ही मैं इसके लिए कोई नई थ्रेयड शुरू करना चाहता था सो इसे यहा पोस्ट कर दिया अगर आपको यह ब्यान इस थ्रेयड मे अखरता हो तो मैं इसके लिए नई थ्रेयड शुरू कर लूँगा |
 
What is new!

Does he think that the authorities are unaware of the fact that Jats are as important component of Indian nation as others are !
कई बार पता होते हुए भी अंजान बने रहते हैं इसलिए याद दिलाते रहना चाहिए |
 
जाट नेता यशपाल मलिक का ऐलान
कांग्रेस को जयपुर में घेरेंगे जाट
अमरोहा। कड़ाके की ठंड में जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक ने यह ऐलान करके राजनीतिक गरमाहट ला दी कि 19 जनवरी को जाट जयपुर में ही चिंतन शिविर लगाकर कांग्रेस को उसी के चिंतन शिविर में घेरेंगे।
अग्रवाल धर्मशाला में मंडलीय पंचायत में मलिक ने स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण के लिए योजनाबद्ध आंदोलन की तैयारी पूरी कर ली गई है। फिलहाल 19 जनवरी को जयपुर में जाट भी विशाल दो दिवसीय चिंतन शिविर करेंगे। जिसमें भारी तादात में जाट अगले कदम का फैसला लेंगे। कांग्रेस को घेरने का जाटों के पास इससे बेहतर मौका हो नहीं सकता।
उन्होंने मुरादाबाद व बरेली मंडल के जाटों से शिविर सफल बनाने का आह्वान किया। जिलाध्यक्ष चौ. वीरेंद्र प्रधान ने ऐलान किया कि फरवरी में काफूरपुर की महापंचायत में आंदोलन पर फैसला सुनाएंगे। पंचायत में राष्ट्रीय महासचिव बीएस अहलावत, प्रदेशाध्यक्ष चौ. उम्मेद सिंह, जिलाध्यक्ष मुरादाबाद सतवीर सिंह, बिजनौर के जिलाध्यक्ष चौ. यशवीर सिंह, रूमाल सिंह, रामपाल सिंह, भगत सिंह बोबी, सुशील प्रधान, विकास चौधरी, बिन्नू चौधरी, नरेश प्रधान, मेवाराम सिंह, राविंद्र रहे।
सिंह, धर्मवीर सिंह, भगवंत सिंह, जयपाल सिंह, सुनील चौधरी, महीपाल सिंह, रमेश सिंह ने हिस्सा लिया।


I am a little less knowledged on this topic, but why cant Jats be together?
सबका मुद्दा एक हैं बस तरीका अलग अलग हैं |
 
कुछ जाट चौधरियों में नेतृत्व की कमी और सही समय पर सही फैसला लेने की योग्यता नहीं : सांगवान
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष पूर्व कमांडेंट हवासिंह सांगवान ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए बतलाया कि जाट आरक्षण पर कुछ लोग राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं क्योंकि जिस कमेटी से मुझे निकालने की बात की जा रही है, उस 21 सदस्यीय कमेटी में मैं कभी था ही नहीं। दूसरा, 17 दिसंबर को मुख्यमंत्री से मिलने के बाद इन लोगों ने स्वयं मीडिया के सामने बयान दिया था कि कमेटी को भंग कर दिया गया है। 12 दिसंबर को हरियाणा पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट जाट समाज के हक में आने के बाद खापों ने तुरंत ही 14 दिसंबर को रोहतक में फैसला लिया था कि वे 17 दिसंबर को मुख्यमंत्री से मिलने के बाद ही आगे का फैसला लेंगे, लेकिन जींद जिले के कुछ चौधरी समय पर फैसला नहीं ले पाए, जिस कारण कुछ जगह से आंदोलन के लिए 16 दिसंबर को ही जत्थे निकल पड़े थे और जब यही चौधरी 17 दिसंबर को मुख्यमंत्री से मिलें तो इन्होंने अपनी संतुष्टि जाहिर की तथा आंदोलन को वापिस लेने की घोषणा भी की। लेकिन जत्थे इनके आदेश का इंतजार करते रहे, मगर इन चौधरियों में कोई भी जत्थों से जाकर नहीं मिला, इस कारण जत्थों के लोग हैरान और परेशान रहे। इससे यह साबित होता है कि ऐसे चौधरियों में नेतृत्व की कमी और सही समय पर सही फैसला लेने की योग्यता नहीं है जिस कारण आम जाट को तकलीफ उठानी पड़ी तथा ऐसे ही लोग खापों को बदनाम करवाने के जिम्मेवार हैं।

सांगवान ने आगे बतलाया कि ................................. हमारी संघर्ष समिति ने 14 हजार से अधिक कागज जाट आरक्षण की मांग के लिए विभिन्न स्तर पर दिए हैं और हमें हरियाणा सरकार पर पूरा विश्वास है कि कमेटी के एक सदस्य मंत्री रणदीप सिंह सुरजेवाला विदेश से आने के बाद अधिसूचना जारी कर दी जाएगी तथा केंद्र में भी समय आने पर हमारी मांग को पूरा करवाएगी। ...........।

I think there was no need of raising the expectations of the people sky high by issuing statement contained in the last two lines of the post [dated 22nd Dec. 2012] in view of the fact that even layman knew the compulsion of the Government that had to cross certain legal and legislative measures/formalities before implementing the recent reservation commission report.

No doubt the leaders of the reservation movement and the government seem to be moving in right direction, this is time consuming procedural matter which must also be taken into consideration and told in plain words to all concerned so that unnecessary controversies could be avoided.

Even now, it would be better if restraint is kept in mind while issuing statements by one and all the groups/leaders spearheading this very sensitive demand and emotive issue concerning our community.
 
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