न्यू लव टॉनिक (New Love Tonic)
जो ये new trends के love का चक्कर आया है ये वास्तव में पनपनता कैसे है? क्या है कि इसमें parents की चुप्पी सबसे बड़ी दोषी है, क्योंकि वो जानते हैं कि आज के हरयाणा में एक average जमीन-जायदाद, average शैक्षणिक योग्यता और औकात के साथ एक ऐसे वक्त में जब लड़कियों की पहले से ही कमी है, ऐसे में उनके लड़कों की शादियाँ होना मुहाल हो गया है| इसलिये कुछ parents को सही रास्ते दिख नहीं रहे जिससे वो लड़कों को सही मार्ग-दर्शन देने में विफल हो रहे हैं। क्योंकि कुछ भी हो उनकी प्राथमिकता तो हरियाणवी बहु की ही होती है वो नहीं चाहते कि अंत में उन्हें भी दूसरे राज्यों से बहु लानी पड़ें और उनकी इस असम्भव सी आस कहो या चिंता कहो इसमें वो लड़कों पर ध्यान नहीं दे पाते, उनको रोकते नहीं हैं या कहो की सही मार्ग-दर्शन और समझ नहीं दे पाते हैं।
अब अगर इन दो अपवादों वाले केस जैसे कि मनोज-बबली और धर्मेन्द्र-निधि को देखा जाए तो दोनों में यही हुआ है। लड़की के परिवार धनि-समृद्ध रहे हैं जबकि लड़कों के परिवारों की हालत दयनीय रही है। टी. वी. से देखा कि कैसे धर्मेन्द्र-निधि के मामले में तीन साल से चल रहे उनके रिश्ते के दौरान, लड़की वालों की तरफ से उनके माता-पिता को बार-बार चेता दिया गया था, लेकिन उनकी किसी भी हथकंडे से बहु पाने की लालसा यह भी भूल गई थी कि जिस समाज में तुम पले-बड़े हुए हो उसकी भी कोई परिभाषा है वरना ऐसे खुले तो जानवर भी विचरते हैं फिर समाज-सभ्यता की क्या आवश्यकता ?
और फिर इतना ही विचरना है तो धर्म-परिवर्तन कर लो, ऐसे भी धर्म हैं समाज में जिनमें जा के
हरियाणा के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तक अपने प्यार की ढींगे पेलने के रास्ते ढून्ढ लेते हैं। हाँ वो अलग चर्चा का विषय है कि वो समुन्द्र के ज्वार-भाटों सा उफान मारता प्रतीत होता उनका प्यार वास्तव में प्यार था या शारीरिक आकर्षण में बंधी वासना मात्र। देखा लोग तो यहाँ धर्म तक को वासना पूरी करने का जरिया बना लेते हैं वरना आज चाँद की फिजा भी फिजाओं में झूम रही होती वो ऐसे अंजाम को नहीं पहुँचती जो जमाने ने देखा। काश टी. वी. पे खापों का धर्मेन्द्र-निधि के मामले से दूर-दूर तक का रिश्ता ना होने पर भी खापों को बंद करवाने के एवज में
माननीय कुलदीप बिश्नोई जी बिश्नोई पन्थ को भी बंद करवाने की वकालत कर जाते, क्योंकि अपनी वासना की पूर्ती के लिए दूसरे धर्म का कैसे इस्तेमाल हो सकता है वो इन्हीं के बड़े भाई ने तो जमाने को सिखाया है|
खैर हम जिधर बढ़ रहे थे उधर ही बढ़ते हैं, तो बावजूद सामने वाले की warning के लड़के को समझाया नहीं गया, वासना की जगह आध्यात्म की उम्र में अध्यात्म का रास्ता नहीं दिखाया गया, क्यों कि मेरा मानना है कि 10 से 15 साल की उम्र के बीच अगर बच्चे को 1-2 साल अध्यात्म पे लगवा के इन्द्रिय नियन्त्रण सिखा दिया जाए (जो कि आजकल नहीं होता) तो ना सिर्फ वो ऐसे अपवादों से बचेंगे बल्कि शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए जो उत्तम आत्मा और दिमाग चाहिए वो भी पा लेंगे और उत्तम शिक्षा मिली तो मतलब उत्तम नौकरी भी और माँ-बाप को उत्तम बहु भी, जी हाँ वही बहु जिसके पीछे ये कोतुक बजा|
और ऐसे हालातों में जब बहुओं-दुल्हनों के लिए मारा-मारी छिड़ी हुई है, उसपे आग में घी डालने को तमाम तरह का (films-electronic-print-daily soap opera) मीडिया और NGO तो बैठे ही हैं। एक तो spiritual digestion की कमी में बच्चों का पहले ही अपनी इन्द्रियों पे कम नियंत्रण रह गया होता है फिर उसपे ऐसे में कोई हरयाणवी culture से non-related मूवी देख ली तो बस हो गई जय राम जी की| इससे भावनाओं का सागर ऐसा छलकता कि मयखानों के पैमाने भी शर्मा जाएँ और शुरू होती है विकृत आधुनिकता की दौड़ में अपने आपको गैर-जिम्मेदार और अनजान रास्तो पे ले जाने की दास्ताँ। विकृत आधुनिकता के बन्दर (बिना सोचे-समझे डालों पे कूदने की बन्दर ही सोचा करते हैं, सभ्य समाज के इंसान नहीं) बनने की चाह में जा बैठते हैं उसी डाल पे जो कि संस्कारो, अध्यात्म, मार्गदर्शन और वैचारिक क्षमता की खाद के अभाव में सूख कर पहले ही टूटने को हो रही होती है|
तो संकट बहुत भारी है, नजरों में लिए कटारी है,
संभल के ओ आज के युवा, ये तलवार दुधारी है।
अंत में एक मिथक दूर जरूर करना चाहूँगा कि मीडिया एक समाज विशेष को चाहे जितना इन चीजों में घसीटे पर इसी समाज में सबसे ज्यादा लव-मैरिज होती हैं। यह वही समाज है जिसने वीरता के साथ-साथ प्यार में भी सबसे ज्यादा झंडे गाड़े हैं और यकीन नहीं हो तो यह देख लीजिये:
हीर-राँझा से ले शशि-पन्नू, शीरी-फरहाद से ले शाहीबा-मिर्जा, लीलो-चमन से ले धर्मेन्द्र-हेमामालिनी(हाँ जी कुलदीप बिश्नोई जी जरा अपने भाई को बताइए कि धर्म परिवर्तन करके प्यार कैसे निभाये जाते हैं वो सीखें उन्हीं खापों के इस कालजयी अनुयायी से जिनको आप बंद करवाने की वकालत करते हैं) तक के किस्से भी इसी समाज में हुए और गाये जाते हैं। बाकायदा रागनियों के किस्से हैं इनपे।
जमाने ने भले ही इनको पुचकारा हो या दुत्कारा या व्यक्तिगत रंजिस
(हीरा-राँझा का प्यार अख्खन काणे की व्यक्तिगत रंजिश के चलते परवान नहीं चढ़ पाया था) की भेंट चढवा दिया, लेकिन ये आज भी गाये जाते हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि इन्होनें जानवरों की तरह भावनाओं के वेश में अंधे हो समाज की मान-मर्यादाएं तोड़ के प्यार नहीं किया बल्कि इनको निभाते हुए प्यार किया, इसलिए ये आज भी अमर हैं।
सो अगर आज के युवा को इन्हीं से सीख मिलती है तो सीख लीजिये कि समाज की मान्यताओं को कत्ल करने वाले प्यारों पे कभी रांझे नहीं गाये जाते, वो कभी अमरत्व को प्राप्त नहीं होते। ये तो उन्हीं पे गाये जायेंगे जो प्यार करते वक़्त इतना जरूर देख सके कि तुम जंगल में नहीं इंसानों की बस्ती में जन्मे हो|
इसलिए अंधे हो मत भागो, क्योंकि जो भगा दे वो प्यार नहीं अपितु वासना होती है, प्यार तो इंसान को मोर्चा लेने का साहस देता है, कायरों की तरह भागने का नहीं|
और नहीं तो अपने अगलों-बगलों में ही झाँक लो तुम्हें कहीं बाहर देखने की जरूरत नहीं| तुम्हारे अपने ही समाज में आज सैंकड़ों में ऐसी शादियाँ स्वीकार्य हो रही हैं जो लव मैरिज भी हैं पर ऐसी लव मैरिज जिनमें सभ्यता झलकती है, जो अपने प्यार के साथ-साथ समाज की भावनाओं को भी सहेजती हैं।
उपाय क्या हों:
- दिखती सी बात है कि उत्तरी भारत की हिन्दू धर्म की 36 की 36 जातियां गोत्र के तन्त्र को मानती आई हैं। सो ऐसे में जब ऐसे मामले हो रहे हैं या तो पुजारियों-पुरोहितों-पंडितों की एक महापंचायत बुला के उसमें फैसले करवाए जाएँ (यहाँ जो भी खापों के पीछे पड़े रहते हैं वो याद रखें, खापें सिर्फ धर्म और समाज की पालना करवाती हैं, वो अपने से कोई नियम नहीं बनाती, उनके नियमों के 2 जरिये होते हैं एक तो धर्म और दूसरा समाज की आम राय और यहाँ बात धर्म पे आती है जिसपे कोई मीडिया वाला किसी धर्म के पैरोकार को नहीं बुलवाता चर्चा करने) कि या तो गोत्र रख लो या छोड़ दो या फिर जो ऐसे मामले आते हैं उनमें धर्म परिवर्तन करवा दो। यहाँ यह ध्यान रहे कि कुछ जातियों में ऐसे मामलों में लड़की को मामा का गोत्र दिलवा के उनकी शादी करवा दी जाती है लेकिन यह रास्ता नहीं अपितु पुरुष-प्रधानता की दूसरी मिसाल है क्योंकि मैंने आज तक ऐसे मामलों में यह कभी नहीं सुना कि किसी ने लड़की की बजाए लड़के का गोत्र बदलवाया हो, इसलिए ऐसा रास्ता जो एक बुराई को ख़त्म करके दूसरी को जन्म दे वो सभ्यता नहीं हो सकती|
- माँ-बाप ऐसे रूह को कंपा देने वाले हॉनर-किलिंग निर्णयों से पहले एक बार तमाम उन सामाजिक संस्थाओं, धार्मिक पैरोकारों और आधुनिक मीडिया के साथ-साथ खुद से भी पूछें कि क्या बच्चों को मारना ही इसका अंतिम विकल्प है? सम्भवत: नहीं होगा| इसपे जवाबदेही निर्धारित हों, क्योंकि समाज में ऐसे हालात यूं ही पैदा नहीं जाते, समाज की तमाम तरह की इकाइयाँ इसमें भागीदार होती हैं|
- गाँव-क़स्बा स्तर पर ऐसी कमेटियां बनाई जाएँ जो टी. वी. पे प्रसारित हो रहे तमाम सीरियलों-फिल्मों पे नजर रखें कि कहीं वो आधुनिकता और खुलेपन के नाम पे समाज की मान्यताओं से खिलवाड़ तो नहीं कर रहे। और ऐसी कमेटियां फिर ब्लाक और जिला स्तर पर जुड़ती हों और जिला स्तर से राज्य-स्तर जाती हों। और राज्य स्तर वाली कमेटी में ऐसी शिकायतें जो गाँव-क़स्बा स्तर की कमेटियां करेंगी उनको कानून के दायरे में रख के जांचे और फिर उसकी शिकायत पहले फिल्म-सिरिअल से सम्बन्धित को भेजें, उनसे उम्मीद अनुरूप उत्तर ना मिले तो राष्ट्रीय प्रसारण मंत्रालय को उनकी शिकायत की जाए|
- ऐसे ही यह कमेटी भिन्न-भिन्न टी. वी. एंकरों पर भी नजर रखे और जो भी एंकर भावावेश हो "जीना है तो जाग जाइये" जैसे समाज को आतंकित कर देने वाले डायलॉग्स प्रयोग कर भिन्न-भिन्न टी. वी. चैनलों पे समाज पे चढ़ने को हुए रहते हैं उनकी शिकायर की जाए। क्योंकि ये कईयों के ब्लड-प्रेशर बढ़ा देते हैं, रक्त-चाप रुकवा देते हैं, जिसका इंसान के स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। ऐसे चिल्लाते है कि ऐसे तो कोई जानवरों का पाली भी जानवारों को हांकने के लिए आवाज नहीं लगाता, एक दम असभ्य तरीका| और अगर उनकी डिबेटों में वो पूर्वाभास से ग्रषित हो एक बुराई के नाम पर पूरे के पूरे समाज को घसीट लेते हैं जिससे ना सिर्फ बाकी के समाज का मनोबल डांवाडोल होता है अपितु संशय की स्थिति भी पैदा होती है, ऐसे एंकरों पर कार्यवाही हो। और खापें चाहें तो यहाँ मोर्चा संभाल सकती हैं, लगने दो मीडिया को भी पता कि जब तुम किसी मिशन पे चलते हो तो हालात और सभ्यताएं सब बदल जाती हैं|
- कन्या-भ्रूण हत्या और समाज में लड़कियों की गिरती संख्या पर विचार करके, कड़े-से-कड़े कदम उठाने होंगे। उन तमाम दुर्भावनाओं-प्रभावनाओं, मिथकों-अथकों और रिवाजों-ख़्वाबों को तिलांजली दिलवानी होंगी जो एक लड़की की भ्रूण हत्या और लड़की को बोझ समझने की प्रवृति को जन्म देती हैं|
- खापों और जाटों को उनकी आध्यात्मिकता पर विचारना होगा: आर्य समाज द्वारा बदलते परिवेश के अनुरूप अपने-आपको ना ढालने की अक्षमता से खाप और जाट में रिक्त हुई अध्यात्म की जगह को भरने के लिए जाट और खाप समाज को बैठ के विचार करने होंगे। क्योंकि आध्यात्मिकता एक ऐसी चीज है जो इंसान में इन्द्रिय नियन्त्रण ला, उसकी आत्मा-बुद्धि और दिल की सुद्धि कर, तीव्र और कुशाग्र बनाती है, जिससे वैचारिक शुद्धता बनती है। और यही वैचारिक शुद्धता फिर इंसान को समाज में भलाई-बुरे में फर्क करना सिखाती है। समाज के लिए प्रेम, जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व को सुदृढ़ बनाती है। जिससे स्वत: ही समाज में ऐसी चीजों से बचा जा सकता है जो आज अध्यात्म के अभाव में हो रही हैं|
Phool Kumar Malik