samarkadian
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न हारी है मोहब्बत, न थकी है दुनिया !
हवा चल रही है , दिया जल रहा है !!
हवा चल रही है , दिया जल रहा है !!
Guys, tham toh ghane serious sher-shar maran lag ge ... gimme some "sadak-chaap" fun sher the kinda one sees behind auto and trucks
Tinku, pinku te tinku di gaddi
hans mat pagli, pyar ho jayega
Jat di gaddi jandi hai chalanga mardi
etc etc
न हारी है मोहब्बत, न थकी है दुनिया !
हवा चल रही है , दिया जल रहा है !!
भैंस अगर हाथल जो जाए उसे बेचना बेहतर
जिस ताले की चाबी खो जाए उसे तोडना अच्छा
ना साकी ना शबाब, ना पाजेब की झंकार जहां,
उस महफ़िल को तो 'मासूम' छोड़ना अच्छा
भैंस अगर हाथल जो जाए उसे बेचना बेहतर
जिस ताले की चाबी खो जाए उसे तोडना अच्छा
ना साकी ना शबाब, ना पाजेब की झंकार जहां,
उस महफ़िल को तो 'मासूम' छोड़ना अच्छा
Singh Saheb!
"न तुम होश में हो, न हम होश में हैं
चलो मयकदे में , वहीं बात होगी"
ठीक फरमाया आपने प्रदीप साहब, महकदे से बेहतर जगह गुफ्तगू के लिए हो ही नहीं सकती क्योंकि:
जब भी ज़िक्र हुआ ज़न्नत का तो याद महकदा आया,
क्यों ज़हमत करें सफ़र की जब ज़न्नत धरती पर आया
हम भी होंगे मदहोश वहां, ना उन्हें होश कोई होगा,
हसीन बेखुदी के आलम में हर लम्हा खामोश रहेगा
शोख हसीना के नाज़ुक हाथों से प्याला अपनी और बढेगा
साकी होगा चारागर तो 'मासूम' दवा का दुगना नशा चढ़ेगा
फिरदोश साहब ने भी महकदे की काफी तारीफ की है :
कौन ज़न्नत तक मुसाफ़त तय करे
महकदा फिरदोश के नज़दीक है
बेशक थोड़ी सी लंबी है, मगर ये नज़्म मुझे बहुत अच्छी लगी। Unfortunately इसके Writer का नाम भी मैं पता नहीं कर पाया। मगर हम इसका लुत्फ जरूर उठा सकते हैं। पेश है. . . . .
"उठके कपडे बदल, बाहर निकल
जो हुआ सो हुआ
रात के बाद दिन, आज के बाद कल
जो हुआ सो हुआ
जब तलक सांस है, भूख है प्यास है
ये ही इतिहास है
रख काँधे पै हल, खेत की और चल
जो हुआ सो हुआ
खून से तर-ब-तर करके हर रहगुजर
थक चुके जानवर
लकड़ियों की तरह, फिर से चूल्हे में जल
जो हुआ सो हुआ
जो मरा क्यों मरा, जो जला क्यों जला
जो लुटा क्यों लुटा
मुद्दतों से है गुम, इन सवालों के हल
जो हुआ सो हुआ
मंदिरों में भजन, मस्जिदों में अजां
आदमी है कहाँ????????????
आदमी के लिए एक ताजा गजल
जो हुआ सो हुआ"
बेशक थोड़ी सी लंबी है, मगर ये नज़्म मुझे बहुत अच्छी लगी। unfortunately इसके writer का नाम भी मैं पता नहीं कर पाया। मगर हम इसका लुत्फ जरूर उठा सकते हैं। पेश है. . . . .
"उठके कपडे बदल, बाहर निकल
जो हुआ सो हुआ
रात के बाद दिन, आज के बाद कल
जो हुआ सो हुआ "
जिन्हें मंजिल पर जाना है वो शिकवे नहीं करते !
जो शिकवो में उलझे हैं वो कभी पहुंचा नहीं करते !!
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