आओ! अरविन्द केजरीवाल समझें कि डोमिनेंट कम&
आओ! अरविन्द केजरीवाल समझें कि डोमिनेंट कम्युनिटी क्या होती है:
अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी कहती है कि हम हरियाणा में दिल्ली की मोहल्ला सभा (पता नहीं दिल्ली में अभी तक बनी भी कि नहीं) की तर्ज पर मोहल्ला व् ग्राम सभाएं तो बनायेंगे पर डोमिनेंट कम्युनिटी की नहीं सुनेंगे?
ताज्जुब है, पहली तो बात यह डोमिनेंट कम्युनिटी होती क्या है? ये बनती कैसे हैं और कहाँ से ऊठ के आती है? अरविन्द केजरीवाल या आप वालो पता है आप लोगों को? नहीं पता हो तो आओ मैं बताता हूँ!
1) कोई कम्युनिटी डोमिनेंट तब बनती है जब वो मिटटी की लकीरों से अन्न उगा तुम्हारा पेट भर तुम्हारी अन्नपूर्णा कहलाती है! एक चिप्स के पैकेट से ले बालों के तेल तक उसके हलों की बनाई लकीरों से निकल जब तुम्हारे माथे की चमक बनते हैं, तब वो कम्युनिटी डोमिनेंट कहलाती है|
2) कोई कम्युनिटी डोमिनेंट तब बनती है जब वो हल की फालों के बीच से रूई निकाल, तुम्हारा तन ढांपने को कपडा देती है| तुम्हें नंग-धड़ंग से एक ढका-लिपटा सुन्दर इंसान बना समाज की गलियों में चलाने का जरिया बनती है!
3) कोई कम्युनिटी डोमिनेंट तब कहलाती है, जब वो पोह-माह की हाड कंपकपाती सर्दियों की भूतहा काली-रातों में साँपों-बिच्छुओं के मुंहों पे पैर रख, घुटने-घुटने तक की ऐसी अंधियारी घासों में जहां यह तक पता नहीं होता कि अगला कदम किसी सांप के बिल पे पड़ेगा या चूहे के खोदे हुए तागड़ी तक गहरे गर्क जाने वाले बिलों में धंसेगा, में पड़ता-गिरता वो गन्ना उगाता है जिससे तुम्हारी रसोई की मिठास संपन्न होती है| और तो छोड़ो, तुम्हारी चाय तक की मिठास ये लोग साँपों-बिच्छुओं के फनों को कुचल तुम्हारे जीवन में भरते हैं, तब ये डोमिनेंट कहलाते हैं|
4) कोई कम्युनिटी डोमिनेंट तब कहलाती है जब वो पशुओं के गोबर-मूत से लथपथ हो तुम्हारी चाय के काले रंग को भूरा कर देती है| तुमारे जीवन के रंगों के लिए वो अपने रंग बेनूर करते हैं, तब वो डोमिनेंट कम्युनिटी कहलाते हैं, केजरीवाल बाबू|
5) कोई कम्युनिटी डोमिनेंट तब कहलाती है अरविन्द केजरीवाल और आप वालो, जब तुम घरों में चादर तान के सो रहे होते हो और उस कम्युनिटी के सबसे अधिक वीर-बांकुरे तुम्हारे लिए शरहदों पे अपने शीश कटवाते हैं| तुम्हारे सुकून से सोने के बदले जब वो अपनी नींद और शीश त्यागते हैं तब वो डोमिनेंट कहलाते हैं|
6) कोई कम्युनिटी डोमिनेंट तब कहलाती है जब उसको देख के धर्म के प्रवर्त्तकों तक में होंसला बनता है कि जब तक ये जिन्दा हैं, तब तक उनके धर्म और संस्कृति की तरफ कोई आँख उठा के नहीं देख सकता| और वो भी बावजूद इस कड़वी सच्चाई का जहर पी कि वो धर्म के प्रवर्त्तक इनकी प्रशंसा पे ना कभी किताबें लिखते हैं, ना ही अपने लेखों में इनको सराहते हैं| ऐसे यथार्थ के कड़वे घूँट पी के कोई कम्युनिटी डोमिनेंट बनती है|
7) कोई कम्युनिटी डोमिनेंट तब कहलाती है, जब बाबर तक उसके दर पे आ के शीश नवाता है!
8) कोई कम्युनिटी डोमिनेंट तब कहलाती है, जब इकलौते उसी कम्युनिटी के राजे-रजवाड़े ऐसे होते हैं जिन्होनें समझौतों की टेबलों पे अंग्रेजों से "ट्रीटी ऑफ इक्वलिटी" साइन करवाई हों और अंग्रेजों से संधि करने हेतु हाथों में सफ़ेद झंडे उठवा दिए हों|
कुछ पड़ी पल्ले कि नहीं, जनाब? लेकिन शायद तुमने गली-चौराहों पर इक्का-दुक्का छुट-पुट गुंडागर्दी करने वालों को डोमिनेंट समझ लिया है; अगर ऐसा है तो अपनी सोच बदलो| और असली डोमिनांसी ढूंढ़नी है तो जाओ उन खेतों-खलिहानों में, जाओ उन सीमा के कंदराओं में जहां इसी डोमिनेंट कम्युनिटी के लोग तुम्हें डोमिनांसी में मिलेंगे|
सो तुम किसी से ये गली-चौराहों की डोमिनांसी तो भले ही छीन लो, पर क्या वो डोमिनांसी छीन पाओगे जो हर पल तुम्हारे पेट में दौड़ती है इनकी वजह से? तुम्हारे तन पे फब्ती है, इनकी वजह से| तुम्हें पीस ऑफ़ माइंड देती है इनकी वजह से? पा पाओगे या पा सकते हो निजात उनकी इस डोमिनांसी से?
इन वाली डोमिनांसी किसी मनियार के पिटारे का खिलौना नहीं अरविन्द बाबू, कि दो-चार रूपये दे के खरीद लिया| इन वाली डोमिनांसी किसी गली-चौराहे की छेड़खानी नहीं कि दो-चार वारदातें करी और डोमिनेंट कहलवाने लगे| इन वाली डोमिनांसी किसी मंच से खड़े हो के बख्त में बेबख्त के बोल बोलना नहीं कि खड़े हो के भीड़ों को उकसा दिया, और फिर जब ऐन मैदान छिड़ा तो दूम दबा के भाग लिए| इन वाली डोमिनांसी कोई झंडे उठा के दो बोल बोलना नहीं कि अपने आपको छद्म अवतारी समझ, हो गए डोमिनेंट| इन वाली डोमिनांसी कोई डेढ़-दो एकड़ की वो जमीन नहीं जो सरकारें कुछ जातियों को देती हैं किसान बनाने को और वो उसको बेच के वापिस वहीँ ढर्रे पे रेंगते हैं|
इन वाली डोमिनांसी बड़े जिगर का काम है, ऐसी डोमिनांसी पल-पल का मरना मांगती है, वो मरना जो ये डोमिनेंट कम्युनिटी वाले ऊपर दिए उदाहरणों में पल-पल कदम-कदम पे जीते हैं| और ये वाली डोमिनांसी को रिटेन करना सबके बस की बात भी नहीं, क्योंकि होती, तो आज हरियाणा के गाँव-के-गाँवों से कुछ मानव जातियां लुप्त ना हो जाती|
और जिस तरीके का रवैय्या आप डोमिनेंट कम्युनिटी के प्रति दिखा रहे हो, उसके चलते खुदा-ना-खास्ता अगर इन्होनें एक बार सामाजिक चक्कर रोक दिया तो आदम के जमाने की तरह घास-फूस खा के तो पेट भरते दिखोगे और पत्ते-टहनियों से तन ढांपते| इनके घरों में तो आज भी चरखे-करघे रखे हैं (भले ही टाँडों पे टांग रखे हों, जिनको उतारने में इनको देर नहीं लगेगी) सो ये तो चरखे उतार के तन ढकने को कपडे बुन भी लेंगे, अपनी सोच लेना कि तुम्हारा क्या होगा? और समाज को ऐसी दुर्गति की गर्त में धकेलने की राजनीति ही ले के आनी है तो भला होगा आपका कि अपनी सोच बदलें|
उम्मीद करता हूँ कि ये कहीं की ईंट - कहीं के रोड़े जमा करके जो भानमति का कुनबा जोड़ा हुआ है आपने, उसमें से कोई समझाए आपको कि डोमिनेंट कम्युनिटी होती क्या है!
ये लेफ्टिस्ट की भाषा छोड़ के अपनी भाषा अख्तियार करो आप वालो, ये डोमिनांसी की पॉलिटिक्स तो लेफ्ट वाले करते हैं| उनके जैसी पॉलिटिक्स की वर्कशॉप लगाने की जरूरत नहीं, एक बार जा के पश्चिमी बंगाल के हालात ही देख आओ, कि इन महारथियों ने पैंतीस साल के राज में वहाँ क्या हाल बना दिए उस प्रदेश के| पैंतीस साल के राज में ये लोग वहाँ वो गरीबी तक नहीं मिटा पाये, जिससे मजबूर हो वहाँ के माँ-बाप अपनी बेटियां तक बेचने को मजबूर होते हैं| और वो वाकई में कितने मजबूर हैं वो देखने के लिए तो आपको बंगाल जाने की भी जरूरत नहीं, इधर हरियाणा में ही वहाँ से हर रोज दो-चार "मोल की" आने वालियों के रूप में देख सकते हो|
इसलिए जो ये लकीर पकड़ी हैं ना ईंट-रोड़े जोड़ के भानमती का कुनबा बनाने की, बहुत घातक साबित होगी आप लोगो के लिए| इधर-उधर हर तरफ हड़फाड़ने की बजाये अपनी नई विचारधारा को उभारो वरना, इस भानमती के कुनबे की खिचड़ी में खुद के दाने भी नहीं पहचान पाओगे| - Phool Kumar Malik