भूमि अधिग्रहण : किसी भी परियोजना के विस्थापितों को नहीं मिली स्थायी नौकरी
Knowledge Bhaskar Editorial By Poonam Kaushik at
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विकास का पहिया तेज चलाने के नाम पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम में केंद्र द्वारा प्रस्तावित संशोधन के पहले पिछले साल सरकार इस संबंध में अध्यादेश भी ला चुकी थी। इसमें
किसानों की सिंचित जमीन भी ली जा सकेगी। साथ ही इसमें
किसानों की अनुमति की जरूरत नहीं होगी। हालांकि 2013 के कानून में फसल देने वाली सिंचित जमीन का अधिग्रहण प्रतिबंधित था। भूमि अधिग्रहण का कानून देश में 1894 से है। जानते हैं, नए अधिनियम में क्या है-
केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन का देशभर में विरोध हो रहा है। इससे पहले लाए गए अध्यादेश के आते ही देशभर में किसान संगठनों द्वारा व्यापक विरोध जताया जाने लगा था। इस अध्यादेश को समझने से पूर्व पिछले कानूनों को जानना आवश्यक है।
भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894
औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान बनाए गए इस कानून से मनमाने ढंग से किसानों की जमीन छीनी जाती थी, जबरन विस्थापन की स्थितियां पैदा की जाती थी। यह कानून विस्थापितों को बहुत कम अधिकार देता था। 1947 के बाद भी किसानों की जमीन इसी कानून के तहत ली जाती रही।
विभिन्न सड़क परियोजनाओं, बांध परियोजनाओं के लिए विभिन्न राज्यों में हुए अधिग्रहणों में किसी में भी विस्थापित को स्थायी नौकरी नहीं दी गई। दोगुना या चौगुना मुआवजा कृषि भूमि दर पर दिया जाता है, जो
व्यावसायिक दर से 20 से 30 गुना कम होता है।
जबरन विस्थापन को झेल रहे गरीब किसानों, आदिवासियों ने वर्ष 2006 में कलिंग नगर आंदोलन के माध्यम से जबरन विस्थापन के विरुद्ध बिगुल बजा दिया। 2 जनवरी 2006 को ओडिशा के कलिंग नगर में जबरन भूमि अधिग्रहण का विरोध करने पर पुलिस द्वारा गोली चलाई गई, जिसमें कुल 14 आदिवासी मारे गए। नतीजतन सिंगूर, नियामगिरी, जगतसिंहपुर, भट्टा पारसौला, सरदना आदि जबरन विस्थापन विरोधी आंदोलन देश के विभिन्न भागों में फट पड़े। जबरन विस्थापन विरोधी संघर्षों से संप्रग सरकार ने एकमत से (पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन तथा उचित मुआवजा का अधिकार- 2013) सितंबर 2013 में पारित किया।
2013 के अधिनियम द्वारा अधिग्रहण के विरोध में किसानों को अपनी आपत्ति दर्ज करवाने का अधिकार दिया गया। मुआवजा बढ़ाने की राहत भी दी गई। पर्यावरण रक्षा व देश में खाद्य सुरक्षा के लिए भूमि अधिग्रहण पर कुछ रोक के प्रावधान भी किए गए।
दिसंबर 2014 में शीतकालीन सत्र समाप्त होते ही भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ले आया गया। यह नया अध्यादेश उन सभी परियोजनाओं पर लागू होता है, जो ग्रामीण व औद्योगिक अधिरचनाओं, ग्रामीण व शहरी गरीबों के आवास, विद्युतीकरण, औद्योगिक कॉरिडोर निर्माण से संबंधित है। यह अध्यादेश पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप से चलने वाली योजनाओं पर लागू होगा। इन दोनों में इस अध्यादेश के परिणामस्वरूप
80 फीसदी प्रभावित किसानों से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी तथा कई फसल देने वाली सिंचित जमीन को लेने की पूरी छूट होगी। सन 2013 के कानून की धारा 10 के तहत अनेक फसल वाली सिंचित जमीन के अधिग्रहण पर पूरी तरह प्रतिबंध था।
इस अध्यादेश का एक मुख्य प्रावधान है कि
सामाजिक प्रभाव आकलन करने की बाध्यता उपरोक्त में से किसी भी क्षेत्र में नहीं होगी। 2013 के कानून की धारा 4 अध्याय 2 में दिए गए सामाजिक प्रभाव आकलन के द्वारा निम्न अधिकारों की सुनिश्चतता की गई थी :-
मूल्यांकन करने की प्रक्रिया में ग्राम सभाओं व पंचायत प्रतिनिधियों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त था। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आम लोगों के उपयोग या सार्वजनिक उपयोग के लिए उक्त परियोजना को मूर्तरूप दिया जाए। परियोजना के लिए न्यूनतम भूमि ही अधिग्रहीत की जा रही है। अधिग्रहण से प्रभावित हो रहे परिवारों, कुल भूमि व संपत्तियों व उनकी कीमत, उनके निदान के लिए उठाए जाने वाले कदमों का मूल्यांकन पहले हो जाए। यह सुनिश्चित करना कि उक्त परियोजना के लिए खेती की जमीन की बजाय कोई और वैकल्पिक जमीन नहीं है।
सामाजिक प्रभाव और उसकी कुल कीमत का आकलन तथा जीविका को होने वाले नुकसान। इस अध्यादेश में यह सारी सुनिश्चितताएं छीन ली गई हैं। पर्यावरण प्रभाव का मूल्यांकन भी सामाजिक प्रभाव के आकलन के साथ-साथ होना था। अब वह भी व्यर्थ हो जाएगा।
यह अध्यादेश देश की जनता को अपनी प्राकृतिक संपदा से वंचित करता है। इससे
किसानों की दशा और खराब हो जाएगी। समय-समय पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत देश के अलग-अलग राज्यों में हुए भूमि अधिग्रहण को न्यायपालिका के समक्ष चुनौती दी गई। अक्सर अधिनियम में मौजूदा आपातकालीन धारा का उपयोग कर जमीन का अधिग्रहण किया जाता रहा है।
जस्टिस जी.एस. सिंघवी व जस्टिस ए.के. गांगुली की दो सदस्यीय पीठ ने नवंबर 2011 में ग्रेटर नोएडा के शाबरी गांव के किसानों की जमीनों का अधिग्रहण रद्द कर दिया था। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में किसानों से 156 हैक्टेयर जमीन औद्योगिक परियोजना के लिए अधिग्रहीत की थी। यह अधिग्रहण इस आधार पर रद्द किया गया, क्योंकि जमीन को अधिक मुनाफा कमाने के लिए व्यावसायिक डेवलपर्स को दे दिया गया था। शीर्ष अदालत के फैसले के बाद किसानों को उनकी जमीन वापस देने का फैसला ले लिया गया।
अप्रैल 2013 में ओडिशा खनन निगम बनाम पर्यावरण व वन मंत्रालय व अन्य के मामले दायर याचिका में उच्चतम न्यायालय ने उड़ीसा के नियामगिरी पहाड़ियों में वेदांता को बॉक्साइट खनन की अनुमति दिए जाने के संदर्भ में माननीय उच्चतम न्यायालय ने ग्राम सभाओं को अधिकार दिया कि वे इस संदर्भ में निर्णय लें। उच्चतम न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी की ग्राम परिषदों को तीन महीने में यह निर्णय करने का अधिकार दिया कि प्रोजेक्ट चल सकता है या नहीं। इस क्षेत्र के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के सांस्कृतिक, धार्मिक, सामूहिक एवं व्यक्तिगत आधारों पर प्रभाव की कसौटी पर प्रोजेक्ट चलने या ना चलने का निर्णय लिया जाएगा। उच्चतम न्यायालय के जस्टिस पी. सतशिवम और ए. के. पटनायक की पीठ ने टिप्पणी की कि राज्य सरकारों के अधिकारी कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं।
किसानों की उपजाऊ जमीन लेकर निजी क्षेत्रों को मुनाफा कमाने के लिए दी जा रही है।
ग्रेटर नोएडा व नोएडा प्राधिकरणों द्वारा दायर की गई लगभग 1000 से अधिक याचिकाओं को रद्द कर दो माह में मुआवजा देने को कहा है।
फैक्ट- फरवरी 2015 में उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस निर्णय को कायम रखा, जिसमें नोएडा के किसानों को 64.7 फीसदी की दर से अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश दिया गया है।
पूनम कौशिक
अधिवक्ता, दिल्ली हाईकोर्ट