आज टाइम मिला है तो सोचता हूँ कि इस Platform से इतनी लंबी गैर-हाजिरी का सुकून पाते आप सज्जनों को कुछ Extra बोर करूँ। एक नज़्म है:
"हुस्न बाज़ार हुआ, क्या कि हुनर ख़त्म हुआ
आया पलको पे, तो आँसू का सफ़र ख़त्म हुआ
उम्र भर तुझसे बिछड़ने की कसक ही न गयी ,
कौन कहता है कि मुहब्बत का असर ख़त्म हुआ
नयी...