राना जी कविता मैं थोडा सुधर करके पोस्ट करूँ हूँ कोई गलती हो तो माफ़ कर दियो जी
लठ मार जुबान पै ना जा ...तू इस छोरे की यारी देख,
खुड-खुड की के सोचे इब भर दूँगा प्यार की क्यारी देख,
कदे नुए निरा मौल्ल्ड समझ के धोरै-धोरै हो जांदी हो,
एक बार घरां चाल ५२४५ की करवा दूँगा खूब सवारी...