Chaupal ke Chamouley

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dndeswal

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अभी-अभी फुटबाल वर्ल्ड-कप देखकर जाटलैंड पर आया हूं - यहां यूरोप में लोग जश्न मना रहे हैं । रात हो गई है, पर दिल किया कि कि थोड़ा सा लिखकर सोया जाये - वैसे भी कई हफ्ते हो गये हैं इस Humor फोरम में लिखे हुए ।


जिस इटली को लोग माफिया गिरोहों के रूप में जानते थे, आज उसकी खेल के मैदान में भी तूती बोल रही है । और एक अपने वाले हैं - वे तो क्रिकेट का 'वर्ल्ड' कप जानते हैं, अपना शौक पूरा करने के लिए ! पता ना हमारे देश से इस क्रिकेट की बीमारी का अन्त कब होगा? यूरोप, अमरीका, पूरे लैटिन अमेरिका और रूस, चीन जैसे बड़े देशों में इस सुसरे क्रिकेट का कोई नाम तक नहीं जानता । एक ब्रिटेन में ही है यह - जो वैसे भी यूरोप भूभाग से अलग-थलग कटा हुआ है । अपने यहां तो यही सुसरे अंग्रेज आये थे जो खुद तो भारत से भाग आये पर औलाद छोड़ आये ।


अपने यहां एक क्रिकेट के स्टेडियम में दो गांव के ताऊ भी बैठे थे । बैट्समैन ने छक्का मारा और तालियां बजने लगीं । एक ताऊ दूसरे से बोला - अरै के हुया, गोळ हो-ग्या के? दूसरा बोला - "बावळा हो रहया सै के, देखता नहीं वे तीनूं डंडे तै न्यूं के न्यूं खड़े सैं ! गोळ तै जिब हुया करै जिब कोए-सा डंडा तळे-नै पड़ ज्या।"


एक-दो किस्से जो पहले लिख चुका हूं, फिर लिख रहा हूं ।

* * * * *

"ताऊ, के हाल सै?"


"भाई, मौज हो रही सै । पहल्यां ३०० रुपये में ब्याह हो जाया करते, ईब तै मैं ३०० रुपये का कुर्ता पहर रहया सूं ! इस तैं घणी मौज और कित होगी ।"


* * * * *


ताऊ ने चौपाल में एक छोहरा देख्या जो दूसरे गांव का था और उससे उसका नाम पूछा । छोहरे ने थोड़ी-सी बोर में आकर अपना नाम बताया - "सतबीर सिंह"।


ताऊ - अरै भाई, इसे नाम तै सरदारां के हुया करैं ।


छोहरा फिर बोर में आ-कै बोल्या - किसनै कह दी, म्हारे गाम मैं तै घणे सारे छोहरां के नाम 'सिंह' सैं ।


ताऊ - पर भाई, न्यूं बता तू कच्चा 'सिंह' सै, आक पक्का ?


छोहरा (छाती फुला कर) - कच्चा क्यूं, मैं तै पक्का सूं !


ताऊ - भाई, फेर तू इस गाम मैं के करै सै ? पक्के सिंह तै जंगलां मैं हुया करैं !!"


* * * * *


अब रूपी का लिखा हुआ एक धागा ( besuri lugai ! ) याद आ रहा है :


एक बाबा आटा मांगण चल्या गया - बाबा नै एक घर मैं जा-कै रूका मारा । बाबा नैं देख्या सारा घर खिंढ्या पड़्या था - कितै बर्तन पड़े, कितै चप्पल-जूते, कितै कपड़े पड़े थे । फेर एक बेसूहरी सी लुगाई बाहर आई ।


लुगाई - बाबा, न्यूं आटा मांगता हांडै सै ईब, घर क्यूं ना बसाया ?


बाबा - "बेबे, सुथरा घर कदे बस्सया कोनी, और तेरे बरगा वसावण का जी कोनी करया ।"


* * * * *


एक भाई ने मेरे को ई-मेल भेजी कि आपने तो इस Humor फोरम में आना ही छोड़ दिया । मन्नै जवाब दिया:


"भाई, देसी आदमियों में ऊठ बैठ कोनी आड़ै, आगै-सी भारत का एक गेड़ा मारूंगा, आपणे गाम मैं ताऊ बदले धौरै बैठ-कै दो-चार चमौले सुण-कै आऊंगा और लिखूंगा । आजकल देसी आदमियों से बात ना होती, संता-बंता के बंद हो-गे, और थारे बरगे लिक्खण का मेरा जी कोनी करता ।"
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Last edited:
Aap kehna ke chaho so????:D :D ;) :p arr e-mail karaniya ka naam tai ger dyo
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एक भाई ने मेरे को ई-मेल भेजी कि आपने तो इस Humor फोरम में आना ही छोड़ दिया । मन्नै जवाब दिया:


"भाई, देसी आदमियों में ऊठ बैठ कोनी आड़ै, आगै-सी भारत का एक गेड़ा मारूंगा, आपणे गाम मैं ताऊ बदले धौरै बैठ-कै दो-चार चमौले सुण-कै आऊंगा और लिखूंगा । आजकल देसी आदमियों से बात ना होती, संता-बंता के बंद हो-गे, और थारे बरगे लिक्खण का मेरा जी कोनी करता ।"
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छोहरा (छाती फुला कर) - कच्चा क्यूं, मैं तै पक्का सूं !


ताऊ - भाई, फेर तू इस गाम मैं के करै सै ? पक्के सिंह तै जंगलां मैं हुया करैं !!"


थारे बरगे लिक्खण का मेरा जी कोनी करता ।"
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haahahahah pakkey too gaam mein hoya karein.,,,,,,,,,,,,,,,, good deswal sir..............:) :D :p ;)
 
Theek kahya

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अभी-अभी फुटबाल वर्ल्ड-कप देखकर जाटलैंड पर आया हूं - यहां यूरोप में लोग जश्न मना रहे हैं । रात हो गई है, पर दिल किया कि कि थोड़ा सा लिखकर सोया जाये - वैसे भी कई हफ्ते हो गये हैं इस Humor फोरम में लिखे हुए ।


जिस इटली को लोग माफिया गिरोहों के रूप में जानते थे, आज उसकी खेल के मैदान में भी तूती बोल रही है । और एक अपने वाले हैं - वे तो क्रिकेट का 'वर्ल्ड' कप जानते हैं, अपना शौक पूरा करने के लिए ! पता ना हमारे देश से इस क्रिकेट की बीमारी का अन्त कब होगा? यूरोप, अमरीका, पूरे लैटिन अमेरिका और रूस, चीन जैसे बड़े देशों में इस सुसरे क्रिकेट का कोई नाम तक नहीं जानता । एक ब्रिटेन में ही है यह - जो वैसे भी यूरोप भूभाग से अलग-थलग कटा हुआ है । अपने यहां तो यही सुसरे अंग्रेज आये थे जो खुद तो भारत से भाग आये पर औलाद छोड़ आये ।


अपने यहां एक क्रिकेट के स्टेडियम में दो गांव के ताऊ भी बैठे थे । बैट्समैन ने छक्का मारा और तालियां बजने लगीं । एक ताऊ दूसरे से बोला - अरै के हुया, गोळ हो-ग्या के? दूसरा बोला - "बावळा हो रहया सै के, देखता नहीं वे तीनूं डंडे तै न्यूं के न्यूं खड़े सैं ! गोळ तै जिब हुया करै जिब कोए-सा डंडा तळे-नै पड़ ज्या।"


एक-दो किस्से जो पहले लिख चुका हूं, फिर लिख रहा हूं ।

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"ताऊ, के हाल सै?"


"भाई, मौज हो रही सै । पहल्यां ३०० रुपये में ब्याह हो जाया करते, ईब तै मैं ३०० रुपये का कुर्ता पहर रहया सूं ! इस तैं घणी मौज और कित होगी ।"


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ताऊ ने चौपाल में एक छोहरा देख्या जो दूसरे गांव का था और उससे उसका नाम पूछा । छोहरे ने थोड़ी-सी बोर में आकर अपना नाम बताया - "सतबीर सिंह"।


ताऊ - अरै भाई, इसे नाम तै सरदारां के हुया करैं ।


छोहरा फिर बोर में आ-कै बोल्या - किसनै कह दी, म्हारे गाम मैं तै घणे सारे छोहरां के नाम 'सिंह' सैं ।


ताऊ - पर भाई, न्यूं बता तू कच्चा 'सिंह' सै, आक पक्का ?


छोहरा (छाती फुला कर) - कच्चा क्यूं, मैं तै पक्का सूं !


ताऊ - भाई, फेर तू इस गाम मैं के करै सै ? पक्के सिंह तै जंगलां मैं हुया करैं !!"


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अब रूपी का लिखा हुआ एक धागा ( besuri lugai ! ) याद आ रहा है :


एक बाबा आटा मांगण चल्या गया - बाबा नै एक घर मैं जा-कै रूका मारा । बाबा नैं देख्या सारा घर खिंढ्या पड़्या था - कितै बर्तन पड़े, कितै चप्पल-जूते, कितै कपड़े पड़े थे । फेर एक बेसूहरी सी लुगाई बाहर आई ।


लुगाई - बाबा, न्यूं आटा मांगता हांडै सै ईब, घर क्यूं ना बसाया ?


बाबा - "बेबे, सुथरा घर कदे बस्सया कोनी, और तेरे बरगा वसावण का जी कोनी करया ।"


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एक भाई ने मेरे को ई-मेल भेजी कि आपने तो इस Humor फोरम में आना ही छोड़ दिया । मन्नै जवाब दिया:


"भाई, देसी आदमियों में ऊठ बैठ कोनी आड़ै, आगै-सी भारत का एक गेड़ा मारूंगा, आपणे गाम मैं ताऊ बदले धौरै बैठ-कै दो-चार चमौले सुण-कै आऊंगा और लिखूंगा । आजकल देसी आदमियों से बात ना होती, संता-बंता के बंद हो-गे, और थारे बरगे लिक्खण का मेरा जी कोनी करता ।"

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Theek kahya deshwal saheb, manne bhi ghane din ho gaye humour pe likhe...
meree bhi bheen kie bheen
 
Bahut khoob deshwal sahab .........bahut deena pacche a sahi par aapne chutkule bade badhiya likhe.......par kirket ek bimari na sai .....yo bhi ek khel sai ....thoda sa jue jisa sai .....par isme bhi jor lagge sai ........aar khel to sare area main nayare nayare a hoya karen....haan ya bat jaroor sai ke hum mahare parampragat khel bhulan lag re sai .............par iska yo matlab na sai ke koi bhi khel bura sai bas khelan kee neet aachi honi chahiye.......Ram Ram
 
Bahut khoob deshwal sahab .........bahut deena pacche a sahi par aapne chutkule bade badhiya likhe.......par kirket ek bimari na sai .....yo bhi ek khel sai ....thoda sa jue jisa sai .....par isme bhi jor lagge sai ........aar khel to sare area main nayare nayare a hoya karen....haan ya bat jaroor sai ke hum mahare parampragat khel bhulan lag re sai .............par iska yo matlab na sai ke koi bhi khel bura sai bas khelan kee neet aachi honi chahiye.......Ram Ram

I also used to be a cricket fan during my student days but now, after seeing the world, it is no longer the case. Cricket is a 'bimari', not a 'sport', though it can be called a 'game' ('game' means gambling also). Remember George Bernard Shaw's opinion about this 'game' "A fools' play (drama) where 22 fools befool 22,000 people for 22 hours". Bernanrd Shaw wrote these lines in those days when cricked was played for 5-and-a-half days (four hours daily - totalling 22 hours). In my view, it would be better to kick out this disease from India as soon as possible. It is affecting other sports like Hockey and football etc. Today's thread by Deepak Sejwal Why India's former captain killed himself is relevant in this regard.
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Bhai Deswal, do we have Kavi Sammelans in Haryanvi? Lot of writers I know are from Haryana but I never heard of Kavi Sammelan on poetry (hasya or otherwise) written in Haryanvi lingo.
 
Bhai Deswal, do we have Kavi Sammelans in Haryanvi? Lot of writers I know are from Haryana but I never heard of Kavi Sammelan on poetry (hasya or otherwise) written in Haryanvi lingo.

Such Kavi Sammellans are called "raagni competition" in Haryana. Many such events are being organised - perhaps those members who are in India, may be in a better position to give details.
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Ram Ram deshwal sahab kya aap mujhe ye batayenge ke football ko cricket se acha manne kee vajah kya hai ........
 
Ram Ram deshwal sahab kya aap mujhe ye batayenge ke football ko cricket se acha manne kee vajah kya hai ........

भाई इस का जवाब तो शुरू में ही लिखा जा चुका है - फुटबाल की तो सारी दुनियां ही दीवानी है - क्रिकेट को कोई नहीं जानता (यहां तक कि अमेरिका और कनाडा जैसे बडे देशों में भी जो खुद भी अंग्रेजी भाषी हैं) - सिवाय उन थोडे से देशों के जो कभी अंग्रेजों की गुलामी भुगत चुके हैं । और अपने भारत में भी ये कोई लोकप्रिय खेल नहीं है - बेशक कुछ शहरी लोग ऐसा ही समझते हों । खुद ब्रिटेन में भी यह अब पहले जितना लोकप्रिय नहीं रहा - इसकी कद्र कम होती जा रही है । और जो खेल सारा दिन चले और कई-कई दिन चले (दो टीमों के बीच) वो कोई 'खेल' नहीं होता - एक जूए जैसा ही होता है (जूआ भी कई दिन चल सकता है - जैसे शतरंज) । इसीलिए ओलिंपिक में भी क्रिकेट के लिए कोई जगह नहीं है - अपने आप कोई बेशक 'क्रिकेट ओलिंपिक' मनाता रहे।
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Fir se Ram Ram deshwal sahab ........aap ise bahas ya jid ya cricket ke prti mera lagaw na samjhe waise main abhi aap jitna abubhavi nahin hoon aage chalkar mere taste kya honge ye bhi nahin kah sakta hoon lekin jo baaten aapne likhi hain wo footbal ki lokpriyata par thik nahin baithti hai jaise ki
1.cricket ko koi nahin janta .....cricket is also gaining more and more popularity
2.usa and canada bhi apni team taiyar kar rahe hain
3.Bharat main ye bahut lokpriya hai
4.England main to county cricket bhi bahut lokpriya hai

aur ye game 5 din chalta hai ye iska positive point bhi hai aur negative bhi ...jaise 5 din chalne wala game player ke pratibha ko puri tarah janchta hai .......aur ...negative isliye ho sakta hai ki ab is busy life main itna lamba time kissi bhi khel ko de pana aasan kam nahin hai ....
 
Ye kahna ki Cricket is not goot because America n Europe doesnt play this game is absolutely wrong.

What they do is not right and what we do is not wrong, We dont need to copy them.

Cricket is a game played in Indian subcontinent, Middle East,Austrailia, England, African countries, even USA Canada, My friend in Germany says they have regular matches, Netherlands have there team.


And it is called Gentleman's game, there are so many red cards shown in football.

But i too believe that our sports like kabbadi and hockey are loosing there charm because of this cricket but then it is the thinking of people not Cricket which is wrong.
 
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