Mein Mar Chuki Hun

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vivektaliyan

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:p
हर शख्स इसे तोड़ने को तैयार है,
मैं मर चुकी हूँ अब तो जीने दो,
की मेरे सिर पे छत नही दीवार है,

मिटटी की चादर ओढ़ कर
सदियों मैं ये सोचा करूँ
सर्दी नही लगती है अब
यहाँ मौसम मेरे अनुसार है,
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सिर पे छत नही दीवार है.

मेरी कब्र पे मेरे पेट के पास
धीरे धीरे से आकर जो
चावल का दाना रख गई,
उस चींटी को लगता है
वो मेरी तिमारदार है
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

ना साँस लेने की परेशानी
न सोच की हैं उलझाने
सवालों और जवाबों से दूर
न राज है कोई
न कोई राजदार है
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

बस तन्हाई है ज़रा सी,
पर मुझे पता है
आख़िर यहीं सब आयेंगे,
और कहाँ जायेंगे,
जो अब भी साँसों की
क़ैद में गरिफ्तार हैं,
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

जब तक उसके पास थी,
वो रोज फूल देता था,
अब सिर्फ़ यह चोंकिदार है
फोल चढाता है और
देखता रहता है,
खैर वो भी प्यार था
और ये भी प्यार है.
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सिर पे छत नही दीवार hai

तेरे नाखूनों के निशाँ
जो मेरी कलाई पे थे
अब पिघल गए हैं
और सारे जख्म
अब गल गए हैं
ओअर ये आँखे अब भी
दागदार हैं,
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

उस रात हादसे में बस
दो ही लोग थे,
फिर मेरा घर,मेरा समाज
पुलिस के सवाल,और
देश की सरकार,
अब क्या बातों कौन कौन
जिम्मेदार है!
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही दीवार है.

मर के इस लड़की ने
कैसे ये कहानी लिख दी,
गर आवाज नही है
तो किसकी जुबानी लिख दी?
सोचते रहो तुम
ये किस्सा
मजेदार है.
मैं मर चुकी हूँ
मेरे सर पे छत नही
दीवार है.




Feel the fellings.........:)
 
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मर गये आदमी, एक खबर बन गयी




मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

जल गयी लाश थी कोई पत्थर हुआ
क्या संभाले उसे, क्या करेंगे दुआ
ज़िंदगी आँख में रुक गयी काँच बन
और हाँथों की हर फूटती चूडियाँ
इसमें भी है खबर, कैमरे की नज़र
चीखती अधमरी की तरफ तन गयी
मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

जिसने फोडा था बम उसका ईमान क्या
उफ पिशाचों से बदतर वो हैवान था
हो कि हूजी, सिमि या कि लश्कर कोई
कैसे खुफिया हैं क्यों तंत्र अंजान था
लोकशाही में आलू तो मँहगा हुआ
आदमी की रही कोई कीमत नहीं
मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

वो पहन कर के खादी निकल आयेंगे
उंगलियों को उठा कर के चिल्लायेंगे
चुप हैं घडियाल सूखी नदी देख लो
उनकी आँखों से आँसू निकल आयेंगे
जो बचाते हैं अफज़ल को इस देश में
वो हैं कारण अमन की कबर बन गयी
मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

मुझको अफसोस मेरे गुलाबी शहर
तेरे सीने में नश्तर, लहू का कहर
अब सियासी बिसातों की सौगात बन
फैलता जायेगा हर डगर एक ज़हर
हादसे पर सिकेंगी बहुत रोटियाँ
देख गिद्धों की कैसी नज़र बन गयी
मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

writer ----***राजीव रंजन प्रसाद
 
वो मीरा थी...

इन्तज़ार बहुत था
उनके आने का ,
पर उम्मीद नहीं.

लेकिन
जिसने नहीं छोडा साथ
कान्हा का,
जिसने हर पल किया
उसको याद ,
वो मीरा थी...

वादे तो सब करते है
साथ जीने- मरने के ,
बिरले होते है जो
नहीं करते बात
साथ रहने की.

लेकिन
दूर होते हुए भी
जिसने
कान्हा से निभाया
वो मीरा थी...

मैं कब कहती हूँ
मिलता है सबको
सब कुछ यहाँ,
जिसने माना
एक कान्हा को
हक़ से अपना,
जो प्यार को
पूजा कहती थी
वो एक मीरा थी...
 
मौत


भूला था मैं ....
आज याद आ गया ..
सच जो सबसे अलग था ...
सबको रुला गया ..

एख्लौती साँस बची थी ...
एक मर्म आह जगी थी...
नींद का आखिरी झोखा ...
आख़िर सुला गया...

अब दर्द नही ...
ना कर्ज है कोई...
अब शब्द नही...
ना मर्ज है कोई..

अब एक सोच है...
नये नकाब की ...
नई सुबह की...
और नए आदाब की...

ठिठुर न जाऊं ...
कफ़न ऊढा दो मुझको...
कपकपीं तेज़ न हो...
ज़रा लेटा दो मुझको...

अब नई आहट है...
नया भरोसा है...
आज सब मासूम हैं ..
हीसाब अनोखा है...

चलो अलवीदा अब ..
एक रात और कम हुई ...
दुनिया की बारात मे...
शाम की वीदाई नम हुई...
 
shaurya..(शौर्य )

उस लड़की की गुहार se ज्यादा aawaaj
उसे घूरती आँखों के उन्माद में था.
मेरे भी बाजुओं में जोर कम न था
पर मैंने देखा उसको घेरे
सारे शौर्य पुरषों में
मेरा ही प्रतिरूप था.
पर उसकी आवाज मेरे लिए अब
एक पल की शोर था.

हमने सोंचा चलो.
इस झंझट से दूर चल.ें
पढ़ लिखा संस्कारी इंसान हूँ
इस पच्दे में कौन पड़े.
हर साल बहन से राखी बंध्वता हूँ.
हर हाल में किसी की रक्षा की कसम खाता ह.ूँ
माँ को भी बड़ा गुमान है.
बेटा उसका बड़ा गुणवान ह.ै
आज जो रुका तो अच्छा न होगा
पढ़ लिखा मुझसे बड़ा कोई बेवकूफ न होगा.

गर्व से सीना फुला कर
उस लड़की से नजरें हटा कर
दंभ भरता चल पड़ा मैं..
औए चल पड़ी वो लाश
जिस पर शान से जीता रहा हूँ
जीवन की दंभ भर कर.

घर पहुँच कर जब मैंने दरवाजा खटखटाया
दरवाजा खुलते ही मैं सकपकाया
उस लड़की को ही dwar खोलते पाया
हद्बदा कर मैंने पूछा ..
तुम यंहा क्या कर रही हो?.
तुम्हे यंहा किसने पहुँचाया ?
तुम क्या कह रहे हो बेटा ?
सुबह से तुम्हारा घर पर इन्तिजार कर रही हूँ
उसने बतलाया.

बचाओ!! बचाओ!!
तभी अन्दर से आवाज आयी.
मैं भाग कर अन्दर गया
मेरी बहन कॉकरोच को देख कर चिल्लाई थी.
मैंने कॉकरोच को भगाया
अपन बहन को समझाया
कुछ तो शर्म करो ..बड़ी हो गयी हो
यूँ डरपोक न बनो..
उसने जवाब में मुस्कुराया
पर अबकी बार मैं
उससे आँख न मिला पाया.

मुझे लगा की उस लड़की ने
मेरे माथे पे जोर से थूका tha
मुझे थका देख कार
jab माँ ने मेरे ललाट को चूमा था.

मुझे लगा नेरे कमरे में बड़ी बदबू थी
जैसे कोई लाश बर्षों से सड़ी पड़ी थी
ये घटना आज कोई
पहली बार नहीं घटी थी.
मैं सूंघ रहा था
एक मुर्दा जो हजार बार जन्म लेने के
बाद भी ऊंघ rahatha मेरे अन्दर
मेरा वजूद कब्र में सिर्फ एक 'लाश' बन कर
बेचैन है .
मिटटी में मिल जानेको..
और रो रही है बोझ से दब कर मेरी आत्मा
एक मुर्दे को धोते हुए ..
 
bhaiji bahut badiya lagi aapki ye kavitae par bhai mere inme ya samaj nahi aayi ki aapka yo maut ta pyaar sain ak maut ka gum sain.
 
Vivek....its wonderful n amazing....Feelings can be felt EASILY:)is it your creation or copied from somewhere?
:p
हर शख्स इसे तोड़ने को तैयार है,
मैं मर चुकी हूँ अब तो जीने दो,
की मेरे सिर पे छत नही दीवार है,


Feel the fellings.........:)
 
Ek kavi ki bebasi

स्याही जैसे लगी सूखने
जज्बात ने दम तोडा है
है कागज़ कोरा, कोरा है मन
लफ्जों ने साथ अब छोडा है.

दिल में तडपता कोई दर्द नहीं
भटकती कोई प्यास नहीं
न कोई गम, न उदास हूँ मैं
और खुशियों की कोई आस नहीं

पलकों के कोर ना भीगे हैं
अब खून रगों में नहीं खौलता
यादों के मंजर भूल गए सब
इश्क जुबान से नहीं बोलता

ना जीतने का जश्न कोई
ना हार कर दिल रोया है
ना चाहत किसी को पाने की
ना सपना कोई संजोया है

लिखना चाहूँ तो क्या लिखूं
सोच में आज रफ़्तार नहीं
अल्फाजों ने रुख मोड़ लिया
या कागज़ को कलम से प्यार नहीं

क्यों मन का पंछी घायल है
क्यों इसकी उड़ान पर बंदिश है
क्या कशमकश, कैसी उलझन
या ना लिखने की साजिश है

खोई कल्पना कहाँ छुपी है
शायद कलम ये सोच रही है
सूनी लकीरें पन्नों पर
स्याही का कतरा खोज रही हैं

आवारा मन कुछ थमा थमा सा
रात भी कुछ मदहोश है
लम्हा जैसे ठहर गया है
और कलम खामोश है. :(:(
 
पश्चिम के सूरज !!

ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !
कुछ पल मे पहुँचो जब पूरब मेरे घर !!

तो पूछेगी माँ है मेरा लाल कैसा , छुकर के पैरों को उंनसे ये कहना !
महसूस करता वही हाथ सिर पे , जो जाते हुए रोते उसने रखा था !
अभी तक जुबान पे वही स्वाद गुड़ का , हाथोँ से जो आखरी चखा था !
कहना बहुत याद करता हूँ उसको !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !

पिताजी मिलेगें वही चाय पीते , कुछ पल उनके संग बैठ लेना !
महसूस करना छुपी मन मे हलचल , है चिंता मेरी पर जताते नही है !
भरती है आंखे मुझे याद कर के , मगर बोलकर वो बताते नही है !
कहना हूँ अच्छा करें ना यूं चिंता !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !

मिलेगा बिस्तर मै उन्नीदा भाई , उठा के कहना की दिन चढ़ चला है !
आंगन मे गीले कपड़े सुखाती , हँसके मिलेगी भोली सी बहना !
दोनों लड़े ना मेरे ख़त को लेकर , रखे ध्यान सबका उंनसे ये कहना !
कहना की आऊंगा इस बार जल्दी !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !

मिल जाए गर चौक पे यार कोई ,मिलना गले और उससे ये कहना !
मिला ना कभी यहाँ दोस्त तुझसा , है महफ़िल यहाँ पर मजा वो नही है !
अकेला हूँ मै ना कोई संग साँथी , बिना यारों के जिंदगी कट रही है !
कहना की आऊंगा महफ़िल सजाने !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !

आओगे कल तो पुछृँगा तुमसे , कोई घर मिला क्या !
पिताजी है कैसे कहा क्या है माँ ने , उठा था क्या भाई बहाना हँसी क्या !
मिली थी क्या नुक्कड़ पे यारो की महफ़िल , अभी तक है दिल मे यादें बसी क्या !
मिलुंग तुम्हे कल पूरब दिशा मै !!
ऐ पश्चिम से जाते हुए दोस्त सूरज !
 
सफ़र मे धूप होगी जो चल सकों तो चलो

सभीं हैं भीड मे तुम भी निकल सकों तो चलो

इधर ऊधर कईं मंजिलें हैं चल सको तो चलो

बने बनाए हैं सांचे जो ढल सको तो चलो

किसी के वास्ते राहें कहां बदलती हैं

तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो

यहां कोइ किसी को रास्तां नहीं देता

मुझे गिराकर तुम संभल सको तो चलो

यही हैं जिंदग़ी कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें

ईन्ही खिलौनो से तुम भी बहल सको तो चलो

कहीं नही कोई सूरज,धुआं धुआं हैं फ़िजा

खुद अपने आप से बहर निकल सको तो चलो

Thanx
 
excellent

इन्तज़ार बहुत था
उनके आने का ,
पर उम्मीद नहीं.

लेकिन
जिसने नहीं छोडा साथ
कान्हा का,
जिसने हर पल किया
उसको याद ,
वो मीरा थी...

वादे तो सब करते है
साथ जीने- मरने के ,
बिरले होते है जो
नहीं करते बात
साथ रहने की.

लेकिन
दूर होते हुए भी
जिसने
कान्हा से निभाया
वो मीरा थी...

मैं कब कहती हूँ
मिलता है सबको
सब कुछ यहाँ,
जिसने माना
एक कान्हा को
हक़ से अपना,
जो प्यार को
पूजा कहती थी
वो एक मीरा थी...

its d meaning of true love.....really fantastic....good mr. taliyan...
 
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