N
nysa
Guest
मेरी पत्नी एक पुराना गीत कभी कभी गुनगुनाती है , शायद इस में कुछ संसोधन की जरुरत है, अगर कोई भाई बहिन इस ठीक ठीक लिख सके तो आभार रहेगा, इस गीत के भावः इस प्रकार हैं की एक बहिन जिसको रूडिवादी माता पिता ने पढाया लिखाया नही और वो अपने भाई से गुहार लगाती है!
बीर हम माँ के जाए रे, रे लोटे थे एक शरीर
के किस्मत, न्यारी न्यारी रे !
बीर तू पढ़न बिठा दिया रे, तेरे कपड़े किमतदार
बीर तू ते बी ऐ करग्या रे!
बीर में ते गोबर बिटोलूं रे , मेरे कपड़े झिराम्झिर
बीर में ते अनपढ़ रहगी रे!
बीर तेरा अच्छा खाना रे, पिणे ने निख्डू दूध
डाट कुनबे पे मारे रे !
बीर मेरा निरशा खाना रे , रे पिणे ने खाटा सीत
डाट मैं सबकी ओटू रे !
बेबे तने पढ़न बिठा दें हे, करवा दें बी ऐ पास
...........
खुश रहो !
amazing song ..beautiful n innocent feeling shown in simple words so ..well
thanx for sharing ..Deshwal ji ..