एक सुहानी शाम रात की तरफ़ हाथ उठा रही थी.... मानो कह रही हो की आजा अब जल्दी से और इन दिन भर की भाग दौड़ से थके मनुष्यों को कुछ पल अपने आगोश में लेकर चैन की नींद से इनकी मुलाक़ात करा ... रात की आँखे नम थी ... शाम से बोली वो धीमे से ... आज तू मुझे रोक ले किसी तरह आने से .... आज कुछ है मेरी मुट्ठी में जो काला सा है, वो मैला कर देगा इस धरती का चेहरा ...
पर ऐसा होना तो मुमकिन न था ... सो रात दाखिल हुई अनमने मन से .... उसकी मुट्ठी से निकली कुछ चींखे, कुछ कराहने की आवाजे .... कई मनुष्य सोये पर नींद की नही, मौत की गोद में, घर जल्दी आने का वादा कर के गया था कोई और उसकी अर्धांगिनी अब हमेशा के लिए अधूरी रह गई है, कोई जशन मना रहा था जन्मदिन का पर अब वो वापस नही जायेगा घर उसकी देह के टुकड़े पूरा मृत शरीर भी नही बना पायेंगे , और कोई शायद उमर भर साथ निभाने का वादा कर रहा था पर जिससे वो वादा किया था वो अब किसी भी रात चैन से नही सोयेगी .... वो सब मारे गए ... और जो बचे थे वो मौत के दर्द को सीने में दबाये छुपे हुए थे ..... मुंबई काँप उठा था .....
पर आजकल ये आम सी बात हो गई है .... कभी दिल्ली कांपती है, कभी मुंबई पे हमला होता है .... आम जनता बहुत भावुक होती है ..... वो रो उठती है और हर मरने वाले में अपना चहरा देख के काँप भी उठती है ... सवाल जवाब का सिलसिला, मीडिया की प्रस्तुति के नए अंदाज़, पोस्टर्स, नारों, सभाओं, जलसों से भर जाता है सारा देश .... ये ऐसे क्यो नही किया जा रहा था, ऐसा होता तो ये कभी नही होता, उनको चूड़ी पहना दो, बार गल्सः नेताओ से ज्यादा बेहतर हैं ......
लगता है जैसे सब जाग चुके हैं लम्बी नींद से और अब कुछ हो कर रहेगा ...
मनुष्य जब तड़पता है, उसकी आत्मा जब रोती है तो ऐसा ही कुछ होता है. कोई ऐसे अपने को शांत करता है, तो कोई वैसे.... पर ये शान्ति हम हिन्दुस्तानियों को बड़ी आसानी से मिल जाती है .... या फ़िर शायद हम इतने मजबूत नही की इससे ज्यादा कुछ कर पाये ...
या तो हम बहुत सहेनशील हैं या फ़िर कमजोर - आपको क्या लगता है ? हँसी आती है पूछते हुए भी, कोई पड़ोसी हमारे घर के आगे भी कूड़ा फेंक दे तो हम सेहेन नही करते, फ़िर ये कैसे कर लेते हैं हम?
हलाँकि बहुत कुछ कहा सुना जा चुका है अब तक इस पर - सरकार ने कहा, जनता ने कहा, विदेशी लोगो ने कहा, हमने कहा - हुआ क्या कोई बतायेगा हम सभी को ?
हम भूलना शुरू कर रहे हैं और बहुत जल्दी हम अपने दोस्त की शादी में, अपनी नौकरी में, अपने घर की साफ़ सफाई में व्यस्त हो जायेंगे, और तब तक रहेंगे जब तक की कोई दूसरी रात अपनी काली मुठी नही खोलती. .....
क्या कोई भी तरीका नही है की हम अपने अन्दर उपजे गुस्से से कुछ कर दिखाए, कुछ ऐसा की आगे कोई ऐसा ग्रह्नित काम करने से पहले सौ बार सोचे, क्यो होता है ऐसा की हम भूल जाते हैं सब कुछ, क्यो राजनेता हमारी इस कमजोरी का फायदा उठाते रहते हैं, हर बार, बार बार?
कोई ये मत बताइयेगा की सरकार को क्या करना है, हम सरकार नही है और फिलहाल ये सरकारतंत्र तो ऐसे ही चलेगा, क्या किया जा सकता है? या फ़िर अगले हमले का इंतज़ार ही हम भारतीयों को परिणिति है?
अपने इस आक्रोश को यूँ ही दब के मर जाने दे एक बार फ़िर और भूल जाए सब कुछ ?
पर ऐसा होना तो मुमकिन न था ... सो रात दाखिल हुई अनमने मन से .... उसकी मुट्ठी से निकली कुछ चींखे, कुछ कराहने की आवाजे .... कई मनुष्य सोये पर नींद की नही, मौत की गोद में, घर जल्दी आने का वादा कर के गया था कोई और उसकी अर्धांगिनी अब हमेशा के लिए अधूरी रह गई है, कोई जशन मना रहा था जन्मदिन का पर अब वो वापस नही जायेगा घर उसकी देह के टुकड़े पूरा मृत शरीर भी नही बना पायेंगे , और कोई शायद उमर भर साथ निभाने का वादा कर रहा था पर जिससे वो वादा किया था वो अब किसी भी रात चैन से नही सोयेगी .... वो सब मारे गए ... और जो बचे थे वो मौत के दर्द को सीने में दबाये छुपे हुए थे ..... मुंबई काँप उठा था .....
पर आजकल ये आम सी बात हो गई है .... कभी दिल्ली कांपती है, कभी मुंबई पे हमला होता है .... आम जनता बहुत भावुक होती है ..... वो रो उठती है और हर मरने वाले में अपना चहरा देख के काँप भी उठती है ... सवाल जवाब का सिलसिला, मीडिया की प्रस्तुति के नए अंदाज़, पोस्टर्स, नारों, सभाओं, जलसों से भर जाता है सारा देश .... ये ऐसे क्यो नही किया जा रहा था, ऐसा होता तो ये कभी नही होता, उनको चूड़ी पहना दो, बार गल्सः नेताओ से ज्यादा बेहतर हैं ......
लगता है जैसे सब जाग चुके हैं लम्बी नींद से और अब कुछ हो कर रहेगा ...
मनुष्य जब तड़पता है, उसकी आत्मा जब रोती है तो ऐसा ही कुछ होता है. कोई ऐसे अपने को शांत करता है, तो कोई वैसे.... पर ये शान्ति हम हिन्दुस्तानियों को बड़ी आसानी से मिल जाती है .... या फ़िर शायद हम इतने मजबूत नही की इससे ज्यादा कुछ कर पाये ...
या तो हम बहुत सहेनशील हैं या फ़िर कमजोर - आपको क्या लगता है ? हँसी आती है पूछते हुए भी, कोई पड़ोसी हमारे घर के आगे भी कूड़ा फेंक दे तो हम सेहेन नही करते, फ़िर ये कैसे कर लेते हैं हम?
हलाँकि बहुत कुछ कहा सुना जा चुका है अब तक इस पर - सरकार ने कहा, जनता ने कहा, विदेशी लोगो ने कहा, हमने कहा - हुआ क्या कोई बतायेगा हम सभी को ?
हम भूलना शुरू कर रहे हैं और बहुत जल्दी हम अपने दोस्त की शादी में, अपनी नौकरी में, अपने घर की साफ़ सफाई में व्यस्त हो जायेंगे, और तब तक रहेंगे जब तक की कोई दूसरी रात अपनी काली मुठी नही खोलती. .....
क्या कोई भी तरीका नही है की हम अपने अन्दर उपजे गुस्से से कुछ कर दिखाए, कुछ ऐसा की आगे कोई ऐसा ग्रह्नित काम करने से पहले सौ बार सोचे, क्यो होता है ऐसा की हम भूल जाते हैं सब कुछ, क्यो राजनेता हमारी इस कमजोरी का फायदा उठाते रहते हैं, हर बार, बार बार?
कोई ये मत बताइयेगा की सरकार को क्या करना है, हम सरकार नही है और फिलहाल ये सरकारतंत्र तो ऐसे ही चलेगा, क्या किया जा सकता है? या फ़िर अगले हमले का इंतज़ार ही हम भारतीयों को परिणिति है?
अपने इस आक्रोश को यूँ ही दब के मर जाने दे एक बार फ़िर और भूल जाए सब कुछ ?