Hindi Kavita

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अब आग के लिबास को ज्यादा न दाबिए।

अब आग के लिबास को ज्यादा न दाबिए।
सुलगी हुई कपास को ज्यादा न दाबिए।

ऐसा न हो कि उँगलियाँ घायल पड़ी मिलें
चटके हुए गिलास को ज्यादा न दाबिए।

चुभकर कहीं बना ही न दे घाव पाँव में
पैरों तले की घास को ज्यादा न दाबिए।

मुमकिन है खून आपके दामन पे जा लगे
ज़ख़्मों के आस पास यों ज्यादा न दाबिए।

पीने लगे न खून भी आँसू के साथ-साथ
यों आदमी की प्यास को ज्यादा न दाबिए।




डॉ कुँअर 'बेचैन'
 
Finally, after long search I found the remaining part of this beautiful poem .. :)

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा,
एक झूठ है आधा सच्चा सा
जज़बात के मन पे इक परदा सा,
बस एक बहाना अच्छा सा
जीवन का ऐसा साथी है,
जो दूर ना होकर भी पास नहीं
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं ...

Remaining part ...

हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाजुक तो कभी तूफानों सा
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र,
जो समंदर है, पर दिल को प्यास नहीं
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
एक साथी जो अनकही बातें कुछ कह जाता है,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं,
पर कभी - कभी आंखों में आंसू बन के बह जाता है
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है,
पर इन आंखों को उसकी तलाश नही
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं ! ..


Rock on
Jit




Few wonderful lines sent by gud friend of mine lately..deep touchin' indeed. :)

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा
एक झूठ है आधा सच्चा सा
जज़बात के मन पे इक परदा सा
बस एक बहाना अच्छा सा
जीवन का ऐसा साथी है
जो दूर ना होकर भी पास नहीं
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं !..


 
A very nice deep touching composition by poet Durgesh Gupt, a bit melancholic but describes restlessness of soul pretty well ! :)

मेरा जीवन बंजारा है - दुर्गेश गुप्त

मेरा जीवन बंजारा है
इक टूटा तारा है
सत्य मार्ग पर चलते-चलते
बेचारा हारा है।

बहुत किया विश्वास खुशी पर
लेकिन गम की जीत हुई है।
गुलशन फूलों लदा मिला था
पर काँटों से प्रीत हुई है।

कैसे समझाऊँ इस मन को
ये तो आवारा है।

सपनों के बादल से टुकड़े
आँसू बन कर बरस गए।
बैरागी मन के आँगन में
प्यासे अरमाँ तरस गए।

कैसे बुझाऊँ प्यास में अपनी
सारा जल खारा है।..


Rock on
Jit
 
क्या मेरे भीतर है ?

यह रचना उस व्यक्ति की मनोस्थिति को दर्शाती है जो अपनी मां और पिता जी के देहान्त के दो वर्ष बाद अपने गांव उस घर में लौटा है जहां वो अपने परिवार के साथ अक्सर आता जाता था जब मां और पिता जी जीवित थे. बंद पडे घर की दशा देख कर उसके मन में उठते भावों को शब्दों में बांधने का प्रयास है..

जहां से
झांका करता था
बचपन मेरा
वो अटारी
बंद पडी है

छत और आंगन
अटे हुये हैं
काई और सूखे पत्तों से
हर दम
खिलने वाली क्यारी
बदरंग पडी है

मां जी के हाथों नित
पुतने वाला चुल्हा
फ़टा-फ़टा
बदहाल पडा है

ताक पर धरी हांडियां
प्रतीक्षारत
आंच आलन औटन के
खाली घडा औंधे मुंह
एक तरफ़ पडा है

आटे दालो के डिब्बों में
घुन-पंखूं की
भरमार हो गई
पूरे घर में
चूहे मकडों की
सरकार हो गई

जहां जमाते बाबू जी
पूजा पाठ का आसन
वो तख्त
दिवार के साथ
खडा हुआ है

नहीं कोई स्वर गुंजता
मौन का आवरण
चढा हुआ है

कील पर टंगी
बाबूजी की टोपी में
छेद कर दिये कीटों ने
और बैठक की खिडकियां
सनी पडी पक्षी बीठों से

चार दिवारी की बाड से
लोग ले गये
ख्पची और खूंटे
कितना कुछ यहां

बदल गया है
देख कर दिल
दहल गया है
मन के तार हैं टूटे

छोटा सा घर
थोडा सा सामान
मगर संसार लगे

जिधर घुमाऊं
नजर मैं अपनी
यादों के अंबार लगे

यहां कोई नहीं अब
बाट जोहता
मन का मर्म
कौन टोहता

सब कहते
ईंटों का घर है
कैसे समझाऊं
जो मेरे भीतर है


'मोहिंदर कुमार'
 
One fine creation by great poet Poornima ji, her poems are so soothing and touching that sometimes it makes life feel lil easy n light ! :)


खत्म होता नहीं इंतज़ार - पूर्णिमा वर्मन

अब भी भर आती आँखें
यदा कदा
प्रेरणा के पंख
बन जाते सहारा
अब भी यादों की बाहें
सँभाल लेती लड़खड़ाते ही
बात होती नहीं
लेकिन
कोरे कागज़ पर उभर आते
हीरक शब्द
अब भी सन्नाटे में गूँजते साम
दिखा देता दिशा
विश्वास का ध्रुवतारा
अँधेरा अब भी बदलता सुबह में
समय बीतता है
पर
खत्म होता नहीं इंतज़ार
अब भी बाकी है दोस्ती पर भरोसा ! ..


Rock on
Jit
 
Mere priya kavi BornSeptember 23, 1908(1908-09-23)
Simariya village, Begusarai district mein hua

DiedApril 24, 1974 (aged 65)
In Begusarai districtOccupation,poet, essayist, academician,
Notable award(s)1959:Sahitya Akademi Award,,
1959: Padma Bhushan,,
1972: Bharatiya Jnanpith,,

mere ko ye panktiyaan ati sundar lagi,,,

"Re rok yudhhishthir ko na yahan jane de unko swarg dhir,
Par phira hamen gandeev gada lauta de arjun bheem veer"
 
अनुभूति / रमा द्विवेदी

अनुभूति / रमा द्विवेदी

हर अनुभूति परिभाषा के पथ पर बढे-
यह आवश्यक नहीं,
शब्दों की भी होती है एक सीमा,
कभी-कभी साथ वे देते नहीं
इसलिए बार -बार मिलने व कहने पर
यही लगता है जो कहना था, कहां कहा?
'प्रेम' ऐसी ही इक 'अनुभूति' है,
वह मोहताज नहीं रिश्तों की।

अनाम प्रेम आगे ही आगे बढता है,
किन्तु रिश्ते हर पल मांगते हैं-,
अपना मूल्य?
मूल्य न मिलने पर
सिसकते,चटकते,टूटते,बिखरते हैं
फिर भी रिश्तों की जकडन को,
लोग प्रेम कहते हैं।

कैसी है विडम्बना जीवन की?
सच्चे प्रेम का मूल्य,
नहीं समझ पाता कोई?
फिर भी वह करता है प्रेम जीवन भर,
सिर्फ इसलिए कि-
प्रेम उसका ईमान है,इन्सानियत है,
पूजा है॥


 
अनुभूति / रमा द्विवेदी

हर अनुभूति परिभाषा के पथ पर बढे-
यह आवश्यक नहीं,
शब्दों की भी होती है एक सीमा,
कभी-कभी साथ वे देते नहीं
इसलिए बार -बार मिलने व कहने पर
यही लगता है जो कहना था, कहां कहा?
'प्रेम' ऐसी ही इक 'अनुभूति' है,
वह मोहताज नहीं रिश्तों की।

अनाम प्रेम आगे ही आगे बढता है,
किन्तु रिश्ते हर पल मांगते हैं-,
अपना मूल्य?
मूल्य न मिलने पर
सिसकते,चटकते,टूटते,बिखरते हैं
फिर भी रिश्तों की जकडन को,
लोग प्रेम कहते हैं।

कैसी है विडम्बना जीवन की?
सच्चे प्रेम का मूल्य,
नहीं समझ पाता कोई?
फिर भी वह करता है प्रेम जीवन भर,
सिर्फ इसलिए कि-
प्रेम उसका ईमान है,इन्सानियत है,
पूजा है॥


बहुत सुन्दर कविता है ! :)

कुछ लिखने का दिल किया इसिलिये लिख रहा हूँ :



शब्दों की सीमाओं में प्रेम नहीं बंधता
शब्द तो होते हैं
सिर्फ़ कहने भर के लिये ।
कभी कहने को सब कुछ कह देते हैं
सुनने वाले को सुनाई नहीं देता ।
कभी हम कुछ भी नहीं कह्ते
और वही मौन सब कुछ कह जाता है ।
विडम्बनाओं सा जीवन है
आकांक्षाओं सी है अनूभुति ।

रिश्ते अवश्य समय मांगते है
परन्तु अनूभुति नहीं ।
अनूभुति बदल जाती है समय के साथ
लेकिन रिश्ते नहीं बदलते॥
क्योंकि रिश्ते जीवन की सच्चाई हैं
ओर अनूभुति सपनों का संसार ।

प्रेम जितना ही सरल है
उतना ही जटिल है मनुष्य ।
प्रेम का मूल्य कैसे समझे कोई ?
सामने आ ही जाता है कोई विकार
प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या ?
जब भौतिक है सारा संसार ।

अध्यातमिक प्रेम अधूरा ही है
जब तक न हो यथार्थ का समावेश ।
छलिया सा जीवन जी कर
नहीं कर सकते प्रेम की आस ।
सच्चाई यही है कि
हर कोई यह चाहता है
प्रेम सब लोग हमेंशा सच्चा ही करें
परन्तु मेरा हिस्सा रहा उधार ।



.


 
बहुत सुन्दर कविता है ! :)

कुछ लिखने का दिल किया इसिलिये लिख रहा हूँ :

शब्दों की सीमाओं में प्रेम नहीं बंधता
शब्द तो होते हैं
सिर्फ़ कहने भर के लिये ।
कभी कहने को सब कुछ कह देते हैं
सुनने वाले को सुनाई नहीं देता ।
कभी हम कुछ भी नहीं कह्ते
और वही मौन सब कुछ कह जाता है ।
विडम्बनाओं सा जीवन है
आकांक्षाओं सी है अनूभुति ।

रिश्ते अवश्य समय मांगते है
परन्तु अनूभुति नहीं ।
अनूभुति बदल जाती है समय के साथ
लेकिन रिश्ते नहीं बदलते॥
क्योंकि रिश्ते जीवन की सच्चाई हैं
ओर अनूभुति सपनों का संसार ।

प्रेम जितना ही सरल है
उतना ही जटिल है मनुष्य ।
प्रेम का मूल्य कैसे समझे कोई ?
सामने आ ही जाता है कोई विकार
प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या ?
जब भौतिक है सारा संसार ।

अध्यातमिक प्रेम अधूरा ही है
जब तक न हो यथार्थ का समावेश ।
छलिया सा जीवन जी कर
नहीं कर सकते प्रेम की आस ।
सच्चाई यही है कि
हर कोई यह चाहता है
प्रेम सब लोग हमेंशा सच्चा ही करें
परन्तु मेरा हिस्सा रहा उधार ।


.

WAH WAH Shayar ji,, aap ko kavitaen bhi khoob kerne lage.. good attempt and b'ful kavita.
 
wah wah shayar ji,, aap ko kavitaen bhi khoob kerne lage.. Good attempt and b'ful kavita.

धन्यवाद नीलम,
आजकल कविता लिखने की चेष्टा कर रहा हूँ । उम्मीद करता हूँ कि पढ्ने वालों को पसन्द आयेगी ।
 
Life is indeed one of the fav topic of Philosopher and Poets as well; Poornima Ji tried to touch its deep, mysterious n unpredictable nature thro' this beautiful poem. :)

ज़िदगी - पूर्णिमा वर्मन

चाहे बाँचो, चाहे पकड़ो, चाहे भीगो
एक आवाज़ है बस दिल से सुनी जाती है
कभी पन्ना, कभी खुशबू, कभी बादल
ज़िंदगी वक्त-सी टुकड़ों में उड़ी जाती है।

कभी अहसास-सी
बहती है नसों में हो कर
कभी उत्साह-सी
उड़ती है हर एक चेहरे पर
कभी बिल्ली की तरह
दुबकती है गोदी में
कभी तितली की तरह
हर ओर उड़ा करती है

चाहे गा लो, चाहे रंग लो, चाहे बालो
हर एक साँस में अनुरोध किए जाती है
कभी कविता, कभी चित्रक, कभी दीपक
आस की शक्ल में सपनों को सिये जाती है

कभी खिलती है
फूलों की तरह क्यारी में
कभी पत्तों की तरह
यों ही झरा करती है
कभी पत्थर की तरह
लगती है एक ठोकर-सी
कभी साये की तरह
साथ चला करती है

कभी सूरज, कभी बारिश, कभी सर्दी
आसमानों में कई रंग भरा करती है
कभी ये फूल, कभी पत्ता, कभी पत्थर
हर किसी रूप में अपनी-सी लगा करती है |


Rock on
Jit

 
Last edited:
One fine creation with a hint of solitude n melancholy by Anurag Ranjan, indeed a class apart that penetrates deep inside your soul ! ..


ढूंढ़ता तन्हाइयों को इक खुले आकाश में - अनुराग रंजन

ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|
देखता परछाइओं को,
मौत की तलाश में|

आसमां भी रो पड़ा,
ये सोच तनहा है सफ़र|
एक टक वो देखता,
आए कहीं कोई नज़र|
देरों तलक निहारता,
शायद किसी की आस में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|

चाँद-तारे सब के सब,
जानते हर बात को|
देखा है सबने साथ ही,
आसमां की बरसात को|
भींगतें हैं वो सभी,
रह आसमां के पास में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|

चातक को है क्या पड़ा?
स्वाति की इक बूंद का|
चकोर भी है बावड़ा,
चाँद की इक धुन्द का|
जाने क्यूँ परेशां हैं सब?
गुमनाम-से इक प्यास में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|

बुझती चिराग अब,
जोर है तूफान का|
टूटती दिवार अब,
हर पक्के मकान|
पत्थरों में देख करुणा,
जाने जीतें हैं क्यूँ विश्वास में?
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|

ऐ दिल तूँ सुन यूँ ना मचल,
ये असर है उनके साथ का|
वादा किया करतें हैं वो,
क्या भरोसा बात का?
तूँ गुम है इतना क्यूँ भला?
दो पल के एहसास में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में | ...


Rock on
Jit
 
Last edited:
A poem by Dinesh Raghuvanshi

Dinesh Raghuvanshi is a renowned Jat international poet. This is one of his good poems for the younger lot.
It is named ‘Ek Ladki’
for more of his poems see following link
http://dineshraghuvanshi.com/

इक लड़की भोली-भाली सी
महके फूलों की डोली – सी
निश्छल, निर्मल, चंचल धारा
जैसे तोड़ के चले किनारा
नेह के अमरित कलश से मेरी
जीवन बगिया को सींचे
जिसके पीछे दुनिया पागल
वो पागल मेरे पीछे…

वो दुनिया का गणित न जाने
सबकी बातें सच्ची माने
जागी आँखों में कुछ सपने
उसको सब लगते हैं अपने
झील-सी गहरी आँखें सुहानी
जैसे कहें अनकही कहानी
मौन निमन्त्रण मुझको जिसका
कोई अर्थ स्वयं गढ़ लूँ
उसकी चाहत बस मैं उसकी
आँखों में चेहरा पढ़ लूँ
उससे कुछ कहना चाहूँ तो
हँसकर अँखियों को मींचे
जिसके पीछे दुनिया पागल
वो पागल मेरे पीछे…

उसका जीवन खुली हथेली
वो क्या जाने प्यार पहेली
वेद ॠचाओं-सी वो पावन
उससे महके प्रीत का चंदन
सारा खालीपन भर देगी
जीवन वृंदावन कर देगी
देह-सृष्टि ऐसी कि जैसे
लाखों वंदनवार सजे
उसकी मादक छुवन से पल में
मन – वीणा के तार बजे
इक अनदेखे-से बंधन में
मुझको अपनी ओर खींचे,
जिसके पीछे दुनिया पागल
वो पागल मेरे पीछे…

आँचल में खुश्बू भर लाई
उससे महक उठी अँगनाई
मौसम की पहली बारिश वो
अब मेरी भी हर ख्वाहिश वो
डरता हूँ कुछ कर ना जाये
ना बोलूँ तो मर ना जाये
सोच रहा हूँ आखिर कैसे
अब मैं उसको समझाऊँ
उसको समझाते –समझाते
खुद पागल ना हो जाऊँ
मन करता है रख दूँ दिल को
उसकी पलकों के नीचे
जिसके पीछे दुनिया पागल
वो पागल मेरे पीछे…


You can listen to the above poem in Dinesh ji's voice in the link given above under 'Audio Video' section.
 
Last edited:
रिश्ते भी मुरझाते हैं /रमा द्विवेदी

रिश्ते भी मुरझाते हैं /रमा द्विवेदी

पल-पल रिश्ते भी मुरझाते हैं
उम्र बढते-बढते वे घटते जाते हैं।
मानव कुछ और की चाह बढाते हैं,
इसलिए वे कहीं और भटक जातेहैं॥


रिश्ते का जो पक्ष कमजोर है,
समय उसको ही देता झकझोर है।
अतीत की गवाही नहीं चलती वहां,
मानव सुख की पूंजी का जमाखोर है॥


मानव एक रिश्ते को तोड,दूसरे को अपनाता है,
अब तक के सारे कसमें-वादे भूल जाता है।
मानव से अधिक स्वार्थी न कोई होगा जहां में,
अपनी तनिक खुशी के लिए वो दूसरों के घर जलाता है॥

 
इक लड़की भोली-भाली सी
महके फूलों की डोली – सी
निश्छल, निर्मल, चंचल धारा
जैसे तोड़ के चले किनारा
नेह के अमरित कलश से मेरी
जीवन बगिया को सींचे
जिसके पीछे दुनिया पागल
वो पागल मेरे पीछे…

.

Very meaningful poem..... And I liked your Signature Sir. Its all about thinking....positive or negative,,,,that decides the course of life.
 
कुछ मैं कहूँ, कुछ तुम कहो---रमानाथ अवस्थी

जीवन कभी सूना न हो

कुछ मैं कहूँ, कुछ तुम कहो।


तुमने मुझे अपना लिया

यह तो बड़ा अच्छा किया

जिस सत्य से मैं दूर था

वह पास तुमने ला दिया


अब ज़िन्दगी की धार में

कुछ मैं बहूँ, कुछ तुम बहो।


जिसका हृदय सुन्दर नहीं

मेरे लिए पत्थर वही।

मुझको नई गति चाहिए

जैसे मिले वैसे सही।


मेरी प्रगति की साँस में

कुछ मैं रहूँ कुछ तुम रहो।


मुझको बड़ा सा काम दो

चाहे न कुछ आराम दो

लेकिन जहाँ थककर गिरूँ

मुझको वहीं तुम थाम लो।


गिरते हुए इन्सान को

कुछ मैं गहूँ कुछ तुम गहो।


संसार मेरा मीत है

सौंदर्य मेरा गीत है

मैंने कभी समझा नहीं

क्या हार है क्या जीत है


दुख-सुख मुझे जो भी मिले

कुछ मैं सहूं कुछ तुम सहो।
 
तुम इस अभागे देश के कौन थे भगतसिंह?

मकडियों नें हर कोने को सिल दिया है
उलटे लटके चमगादड
देख रहें हैं
कैसे सिर के बल चलता आदमी
भूल गया है अपनी ज़मीन
दीवारों पर की सीलन का
फफूंद की आबादी को
दावत पर आमंत्रण है
दरवाज़ों पर दीमक की फौज़
फहराती है आज़ादी का परचम
दाहिने-बांयें थम...

मैडम का जनमदिन है
जनपथों के ट्रैफिक जाम है
साहब का मरणदिन है
रेलडिब्बे के ट्वायलेट तक में लेट कर
आदमी की खाल पहने सूअर
बढे आते हैं रैली को
थैली भर राशन उठायें
कि दिहाडी भी है, मुफ्त की गाडी भी है
देसी और ताडी भी है..

और तुम भगतसिंह?
पागल कहीं के
इस अह्सान फरामोश देश के लिये
"आत्म हत्या” कर ली?
अंग्रेजी जोंक जब यह देश छोड कर गयी
तो कफन खसोंट काबिज हो गये
अब तो कुछ मौतें सरकारी पर्व हैं
जिनके बेटों पोतों को विरासत में कुर्सियाँ मिली हैं
निपूते तुम! किसको क्या दे सके?
फाँसी पर लटक कर जिस जड को उखाडने का
दिवा-स्पप्न था तुम्हारा
वह अमरबेल हो गयी है

आज 23 मार्च है...
आज किसी बाग में फूल नहीं खिलते
कि एक सरकारी माला गुंथ सके
मीडिया को आज भी
किसी बलात्कार का
लाईव और एक्सक्लूसिव
खुलासा करना है
सारे संतरी मंत्री की ड्यूटी पर हैं
और सारे मंत्री उसी भवन में इकट्ठे
जूतमपैजार में व्यस्त हैं
जिसके भीतर बम पटक कर तुम
बहरों को सुनाना चाहते थे...
बहरे अब अंधे भी हैं

तुम इस राष्ट्र के पिता-भ्राता या सुत
कुछ भी तो नहीं
तुम इस अभागे देश के कौन थे भगतसिंह?

राजीव रंजन प्रसाद

 
मकडियों नें हर कोने को सिल दिया है
उलटे लटके चमगादड
देख रहें हैं
कैसे सिर के बल चलता आदमी
भूल गया है अपनी ज़मीन
दीवारों पर की सीलन का
फफूंद की आबादी को
दावत पर आमंत्रण है
दरवाज़ों पर दीमक की फौज़
फहराती है आज़ादी का परचम
दाहिने-बांयें थम...

मैडम का जनमदिन है
जनपथों के ट्रैफिक जाम है
साहब का मरणदिन है
रेलडिब्बे के ट्वायलेट तक में लेट कर
आदमी की खाल पहने सूअर
बढे आते हैं रैली को
थैली भर राशन उठायें
कि दिहाडी भी है, मुफ्त की गाडी भी है
देसी और ताडी भी है..

और तुम भगतसिंह?
पागल कहीं के
इस अह्सान फरामोश देश के लिये
"आत्म हत्या” कर ली?

अंग्रेजी जोंक जब यह देश छोड कर गयी
तो कफन खसोंट काबिज हो गये
अब तो कुछ मौतें सरकारी पर्व हैं
जिनके बेटों पोतों को विरासत में कुर्सियाँ मिली हैं
निपूते तुम! किसको क्या दे सके?
फाँसी पर लटक कर जिस जड को उखाडने का
दिवा-स्पप्न था तुम्हारा
वह अमरबेल हो गयी है

आज 23 मार्च है...
आज किसी बाग में फूल नहीं खिलते
कि एक सरकारी माला गुंथ सके
मीडिया को आज भी
किसी बलात्कार का
लाईव और एक्सक्लूसिव
खुलासा करना है
सारे संतरी मंत्री की ड्यूटी पर हैं
और सारे मंत्री उसी भवन में इकट्ठे
जूतमपैजार में व्यस्त हैं
जिसके भीतर बम पटक कर तुम
बहरों को सुनाना चाहते थे...
बहरे अब अंधे भी हैं

तुम इस राष्ट्र के पिता-भ्राता या सुत
कुछ भी तो नहीं
तुम इस अभागे देश के कौन थे भगतसिंह?

राजीव रंजन प्रसाद


Had he not died that way, this poet won't have got this poem.Crux, he did know the art of dying but certainly not the pain of living.Morever, genius dont have longer life span.
 
सबसे अधिक तुम्हीं रोओगे----रामावतार त्यागी

आने पर मेरे बिजली-सी कौंधी सिर्फ तुम्हारे दृग में
लगता है जाने पर मेरे सबसे अधिक तुम्हीं रोओगे !

मैं आया तो चारण-जैसा
गाने लगा तुम्हारा आंगन;
हंसता द्वार, चहकती ड्योढ़ी
तुम चुपचाप खड़े किस कारण ?
मुझको द्वारे तक पहुंचाने सब तो आये, तुम्हीं न आए,
लगता है एकाकी पथ पर मेरे साथ तुम्हीं होओगे !

मौन तुम्हारा प्रश्न चिन्ह है,
पूछ रहे शायद कैसा हूं
कुछ कुछ बादल के जैसा हूं;
मेरा गीत सुन सब जागे, तुमको जैसे नींद आ गई,
लगता मौन प्रतीक्षा में तुम सारी रात नहीं सोओगे !

तुमने मुझे अदेखा कर के
संबंधों की बात खोल दी;
सुख के सूरज की आंखों में
काली काली रात घोल दी;
कल को गर मेरे आंसू की मंदिर में पड़ गई ज़रूरत
लगता है आंचल को अपने सबसे अधिक तुम ही धोओगे !

परिचय से पहले ही, बोलो,
उलझे किस ताने बाने में ?
तुम शायद पथ देख रहे थे,
मुझको देर हुई आने में;
जगभर ने आशीष पठाए, तुमने कोई शब्द न भेजा,
लगता है तुम मन की बगिया में गीतों का बिरवा बोओगे!
 
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