samarkadian
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''पैसा सब कुछ नहीं जानी, मगर बहुत कुछ है!''
ये सवांद हम अक्सर हिंदी चलचित्रों में नायक या खलनायक को कहते हुए सुन चुके है और आगे भी सुनते रहेंगे !
परन्तु ये वास्तविक रूप से भारतीय महाग्रंथ महाभारत के शांति पर्व , खंड - आठ में भीष्म - अर्जुन -नुकुल -सहदेव -युधिस्ठिर के आपसी सवांद से लिया गया है !
यहाँ अर्जुन कहता है, '' दरिद्रता एक अभिशाप की अवस्था है ! दरिद्र व्यक्ति त्रुटिहीन होते हुए भी प्रत्येक का कोपभोजन बनता है ! सामान्य बुद्धिमान किन्तु निर्धन व्यक्ति भी जीवन के भवंर में दुखी रहता है और उसकी अवस्था भीषण ग्रीष्म ऋतू में एक सूखे हुए झरने के सामान है ! अर्थोपार्जन से ने केवल परिवार में व्यक्ति की प्रतिस्ठा बढती है अपितु समाज में प्रशंशा एवं मान होता है ! ''
इसी चर्चा में नुकुल और सहदेव कहते हैं, '' सोते - जागते , उठते - बैठते मनुष्य को धन उपार्जन की सभी संभव हष्ट - पुष्ट विधियों का चिंतन, मनन एवं क्रियान्वन पूर्ण निष्ठा से करना चाहिए ! धन के बैगर कोई भी मनुष्य इस संसार में इच्छाओ एवं जरूरतों की पूर्ति नहीं कर सकता ! इसलिए प्रत्येक मनुष्य को शुद्धता एवं सदगुण को किनारे किये बिना पूर्ण निष्ठा एंव श्रधा के साथ धन उपार्जन करना चाहिए !
भीष्म इसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अपना तर्क देते हैं, '' इछाये , सदगुण एवं धन की त्रिमूर्ति पुरे विश्व में उत्तम मानी गयी है !''
धर्मराज युधिस्ठिर इस चर्चा का निष्कर्ष देते हुए कहते हैं, '' इस संसार में जिसने सभी वस्तुओ,इच्छाओं संबंधो को त्याग दिया है अर्थात सन्यासी , केवल वही सबसे ऊंचे पद पर विराजमान है ! इसी जीवन के कर्म चक्र में सभी सन्यासी नहीं हो सकते ! अत: शेष मनुष्यों को अपने जीवन में धन उपार्जन को अधिक से अधिक महत्व देना चाहिए ताकि वो कर्म चक्र में एक दिन उस स्थान पर आसीन हो जाए जहाँ वो सभी सांसारिक सुखो का भोग कर त्याग सके. सांसारिक सुखो के चरम पर पहुँचाने वाला त्याग एवं सन्यास के अधिक निकट होता है ! अत: आप अगर सन्यासी नहीं है तो सांसारिक वस्तुओ पर पहले विजय प्राप्त करे ! इसकी पूर्ति हेतु अपनी बुद्धि एवं विशेषताओ का पूर्ण दोहन करे ! ''
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प्रिय सदस्यों ,
उपोराक्त चर्चा से ये पूर्णतया साफ़ है की हम जिस भी क्षेस्त्र में हो , हमारा ध्येय उसके शीर्ष पर जाकर परचम लहराने का होना चाहिए ! इससे न केवल हम धन उपार्जन कर पाएंगे अपितु स्वयं हेतु नए रास्तो का निर्माण कर पाएंगे !
आप अपने क्षेत्र के निर्भीक एवं आत्म विस्वाशी नेता बने ! इस शंभंगुर जीवन में केवल अतार्किक आत्म-विस्वास एवं निर्भीकता ही आपकी कुंजी रहेगी ! आप चाहे इसे प्रिंट करके अपने बाथरूम के शीशे पर चिपका ले की -- '' आत्म-विस्वास एवं निर्भीकता विश्व के सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाले गुण है ''
धनोपार्जन के कठिन एवं दुर्गम रास्ते में ये गुण आपके व्यक्तित्व के प्रत्यक्ष आभास होने चाहिए ! जो व्यक्ति निर्भीकता, साहस एवं आत्म-विस्वास से परिपूर्ण है , धन उससे ज्यादा समय तक दूर नहीं भाग सकता ! किन्तु अगर आपको लगता है की कहीं से आप के अंदर ये पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं तो निराश न हो क्यों की ये जन्मजात गुण नहीं हैं ! हाँ ! आप अभ्यास से इनको आसानी से अपने व्यक्तित्व में समन्वित कर सकते हैं ! प्रति दिन स्वयम को दिन की शुरुआत में याद दिलाये की मै निर्भीक, निडर एवं आत्म विस्वास स पारी पूर्ण रहूँगा चाहे कुछ भी हो ! तीन सप्ताह में अगर आपके व्यक्तित्व में आमूल चुल परिवर्तन एवं सुधर न हो देख लीजियेगा !
निर्भीकता - आत्म विस्वास - साहस -धन ये सब के दुसरे के पीछे भागते हैं एवं एक दुसरे के पूरक हैं !
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जाटलैंड के सभी माननीय सदस्यों से विनती है की इस धागे में अपना हरसंभव् योगदान दे !
जो सदस्य किसी अपनी नौकरी , व्यापार में किसी भी समस्या से झुझ रहे हैं वो बिना किसी हिचक यहाँ अपनी समस्या रखे ताकि और लोग अगर उसी समस्या से गुजरे तो आसानी से उसे पार पा सके !
कम से कम हम किसी सदस्य या मेहमान को अपने अनुभवों, विचारो से उचित रास्ता दिखने में सफल हो सकते हैं !
जो सदस्य अपने अनुभव , धनोपार्जन के तौर तरीके , विधिया , विचार , सलाह व्यक्त करना चाहे, उनका ससमान स्वागत है !
स्वयं धनी बनो और उस ज्ञान से सभी को धनी बनाओ !
धन्यवाद !
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