प्यार का इजहार या अभिवयक्ति कुछ खास सब्दों या वाक्यों तक ही सिमित नहीं होती !
रविंदरजीत भाई ने इस चर्चा की अपनी एक पोस्ट में, अपने निजी अनुभव लिखते हुए, इस विचार को बड़े ही मार्मिक ढंग से स्पष्ट किया था !
इन सब के इलावा, हमारे सामाजिक परिवेश का, हमारे रिश्तों पर ,हमारी भावनाओं की अभिवयक्ति पर बहुत प्रभाव रहता है !
हमारी ग्रामीण जीवनशैली, रिश्ते नाते और मान मर्यादा , बहुत हद तक हमारी अभिवयक्ति को संचालित भी करते हैं और मर्यादित भी !
एक जैसे हालात में ,एक ठेठ देहाती पत्नी और एक आधुनिक पत्नी की अभिवयक्ति की तुलना कीजिये !
एक कहेगी, "डार्लिंग बहुत देर करदी" ! दूसरी कहेगी," अनपुत्ते घनी वार करदी"
सयुंक्त परिवार में ताऊ, ताई को आने का संकेत खंखार(by coughing) कर दे देता है !
प्यार की अभिवयक्ति में, कभी-२ हावभाव भी शब्दों का स्थान ले लेते हैं !
इस सम्बन्ध में मुझे बचपन का एक वाकया याद आ रह है
उम्र में करीब दस साल बड़ा मेरा एक पडोसी भतीजा नेवी में कार्यरत था ! विवहा के कुछ दिन बाद डयूटी पर चला गया था !
एक साल बाद घर आया था ! वो साल (घर का बड़ा कमरा ) के बीच में एक पीढ़े (स्टूल) पर बैठा था ! घर की औरतों और बच्चों ने उससे घेरा हुआ था !
सभी कुछ न कुछ सवाल कर रहे थे ! वह अनमने भाव से जवाब दे रह था ! शायद उसका ध्यान उनके सवालों पर नहीं था ! बीच -२ में नजर इधर २ घुमा कुछ ढूंढने का प्रय्तन करता !
तभी, लम्बा घूँघट ताने उसकी पत्नी ने प्रवेश किया ! कमरे के एक कोने में दीवार का सहारा ले खड़ी हो गई! उसके चेहरे पर एक खास चमक लिए, मुस्कान उभर आई ! ! पत्नी ने प्रतिउत्तर में थोडा शिर झुका दिया ! शायद घूँघट में, प्रसन्नता से आंखे चमक रही थी , चेहरा दमक रह था ! एक वर्ष के विरह की पीड़ा छू मन्त्र हो गई थी ! शारीरिक न सही आत्मिक मिलन हो गया था !
बाद में मेरे उस भतीजे से प्रेरित हो में भी नाविक बन गया था ! हमारे बीच घनिष्ठता बढ़ गई थी ! मैंने उसके विवशता भरे इस सांकेतिक मिलन के विषय में उससे बात भी की थी!
मेरे गाँव की इस तरह की कुछ और घटनाएं भी मुझे याद हैं !
सत्यपाल