1) कश्मीर में गरीबी की दर है सिर्फ़ 3.4 प्रतिशत है जबकि भारत की गरीबी दर है अधिकतम 26 प्रतिशत (बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों में)
– फ़िर भी बिहार, उड़ीसा में तिरंगा फ़हराया जा सकता है, लाल चौक पर नहीं…
2) 1991 में कश्मीर को 1,244 करोड़ रुपये का अनुदान दिया गया जो कि सन् 2002 तक आते-आते बढ़कर 4,578 करोड़ रुपये हो गया था (सन्दर्भ-इंडिया ...टुडे 14 अक्टूबर 2002)।
- फ़िर भी हम लाल चौक में तिरंगा नहीं फ़हराएंगे…
3) 1991 से 2002 के बीच केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर को दी गई मदद कुल जीडीपी का 5 प्रतिशत से भी अधिक बैठता है। इसका मतलब है कि कश्मीर को देश के बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा हिस्सा दिया जाता है, किसी भी अनुपात से ज्यादा। यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी परिवार के “सबसे निकम्मे और उद्दण्ड लड़के” को पिता का सबसे अधिक पैसा मिले “मदद(?) के नाम पर”
– फ़िर भी हम अपना अलग संविधान, अलग झण्डा रखेंगे…
4) “वे” लोग हमारे पैसों पर पाले जा रहे हैं, और वे इसे कभी अपना “हक”(?) बताकर, कभी असंतोष बताकर, कभी “गुमराह युवकों”(?) के नाम पर… और-और-और ज्यादा हासिल करने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत के ईमानदार करदाताओं का पैसा इस तरह से नाली में बहाया जा रहा है…
– फ़िर भी बहादुर सिख कौम के प्रधानमंत्री कहते हैं, लाल चौक पर तिरंगा नहीं फ़हराना चाहिये…
5) जब नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि “गुजरात से कोई टैक्स न लो और न ही केन्द्र कोई मदद गुजरात को दे” तो कांग्रेस इसे तत्काल देशद्रोही बयान बताती है। अर्थात यदि देश का कोई पहला राज्य, जो हिम्मत करके कहता है कि “मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ…” तो उसे तारीफ़ की बजाय उलाहने और आलोचना दी जाती है, जबकि गत बीस वर्षों से भी अधिक समय से “जोंक” की तरह देश का खून चूसने वाला कश्मीर, “बेचारा है” और “धर्मनिरपेक्ष भी है”?
– फ़िर भी गाँधीनगर में तिरंगा फ़हरा सकते हैं, श्रीनगर में नहीं…
6) कश्मीर के प्रत्येक व्यक्ति पर केन्द्र सरकार 10,000 रुपये की सबसिडी देती है, जो कि अन्य राज्यों के मुकाबले लगभग 40% ज्यादा है (कोई भी सामान्य व्यक्ति आसानी से गणित लगा सकता है कि कश्मीरी नेताओं, हुर्रियत अल्गाववादियों, आतंकवादियों और अफ़सरों की जेब में कितना मोटा हिस्सा आता होगा, “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” की ताजा रिपोर्ट में कश्मीर को सबसे भ्रष्ट राज्य का दर्जा इसीलिये मिला हुआ है)
– फ़िर भी हम लाल चौक में तिरंगा नहीं फ़हरा सकते…
7) इसके अलावा रेल्वे की जम्मू-उधमपुर योजना 600 करोड़, उधमपुर-श्रीनगर-बारामुला योजना 5000 करोड़, विभिन्न पहाड़ी सड़कों पर 2000 करोड़, सलाई पावर प्रोजेक्ट 900 करोड़, दुलहस्ती हाइड्रो प्रोजेक्ट 6000 करोड़, डल झील सफ़ाई योजना 150 करोड़ आदि-आदि-आदि
– फ़िर भी लाल चौक पर तिरंगा फ़हराना “राजनीति” है…
(समस्त आँकड़े CAGR की रिपोर्ट के अनुसार)
8) कश्मीर घाटी से गैर-मुस्लिमों का पूरी तरह से सफ़ाया कर दिया गया है,
कश्मीरी सारे भारत में कहीं भी रह सकते हैं, कहीं भी जमीने खरीद सकते हैं, लेकिन कश्मीर में वे किसी को बर्दाश्त नहीं करते, अमरनाथ यात्रियों के लिये एक टेम्परेरी ज़मीन का टुकड़ा भी नहीं दे सकते…
- फ़िर भी भाजपा ही “शांति भंग”(?) करना चाहती है…
जम्मू में तिरंगा फ़हरा सकते हैं, लेह में फ़हरा सकते हैं, लद्दाख में शान से लहरा सकते हैं, द्रास-कारगिल में बर्फ़ की चोटियों पर गर्व से अड़ा सकते हैं… सिर्फ़ एक छोटे से टुकड़े कश्मीर” के लाल चौक में नहीं फ़हरा सकते… क्यों? इस क्यों का जवाब “कांग्रेस(I) – अर्थात कांग्रेस (Italy)” ही दे सकती है… लेकिन देगी नहीं, क्योंकि राष्ट्रीय स्वाभिमान, तिरंगे की आन-बान-शान, एकता-अखण्डता इत्यादि शब्द उसके लिये चिड़ियाघर में रखे ओरांग-उटांग की तरह हैं…
यदि कल को पश्चिम बंगाल के 16 जिलों में, अथवा असम के 5 जिलों में, या उत्तरी केरल के 3 जिलों में भी तिरंगा फ़हराने पर “किसी” की भावनाएं आहत होने लग जायें तो आश्चर्य न कीजियेगा… “सत्य-अहिंसा के पुजारियो” ने जो विरासत हमें सौंपी है, उसमें ऐसा बिलकुल हो सकता है…।
वाकई दुर्भाग्य है कि, “मैकाले की शिक्षा पद्धति” ने, खामख्वाह में “बच्चों के चाचा” बन बैठे एक व्यक्ति ने, और अलगाववादियों के सामने “सतत रेंगते रहने वाले” वाले गाँधी परिवार, नरसिंहराव, वीपी सिंह, सभी ने मिलकर… देश को एक सड़े हुए टमाटर की तरह पिलपिला बनाकर रख दिया ह.