samarkadian
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खुद मुंबई आइआइटी के छात्र रह चुके केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सोमवार को एक नया विवाद खड़ा करते हुए देश के प्रतिष्ठित आइआइटी और आइआइएम को विश्वस्तरीय मानने से इंकार कर दिया। रमेश ने इन संस्थानों के शिक्षकों को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि ये संस्थान विश्वस्तरीय नहीं हैं और वे विद्यार्थियों की गुणवत्ता के कारण ही उत्कृष्ट हैं। साथ ही केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और भारतीय जीव विज्ञान सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं को अपने दो वर्ष के कार्यकाल में सरकार से स्वतंत्र और स्वायत्त न बना पाने को अपनी सबसे बड़ी हताशा मानते हैं। रमेश ने यहां संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित जैव विविधता दशक के विषय पर हुए समारोह से इतर पत्रकारों से कहा, आइआइटी के जरिए बमुश्किल ही कोई महत्वपूर्ण शोध आ पाता है। आइआइटी में शिक्षक विश्वस्तरीय नहीं हैं। आइआइटी में जाने वाले विद्यार्थी विश्वस्तरीय हैं। लिहाजा, आइआइटी और आइआइएम उनके शिक्षकों या शोध की गुणवत्ता के कारण नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की गुणवत्ता के कारण उत्कृष्ट हैं। मालूम हो कि रमेश ने 1975 में आइआइटी मुंबई से मैकेनिकल इंजीनियरिंग से बीटेक किया था। रमेश ने कहा कि भारत सरकारी तंत्र के चलते विश्वस्तरीय शोध केंद्र विकसित नहीं कर पाता। उन्होंने गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के संयुक्त उपक्रम के साथ विश्वस्तरीय राष्ट्रीय समुद्री जैव विविधता केंद्र की स्थापना करने के अपने मंत्रालय के फैसले को भी जायज ठहराया। जामनगर में रिलायंस की बड़ी तेल रिफाइनरी है। रमेश ने कहा कि मंत्रालय ने यह फैसला इसलिए किया क्योंकि सरकारी तंत्र में विश्वस्तरीय शोध केंद्र की स्थापना नहीं की जा सकती और अगर स्थापना हो भी जाए तो उसमें युवाओं को आकर्षित नहीं किया जा सकता। रिलायंस के सहयोग से शोध केंद्र स्थापित करने पर हितों का टकराव होने की बात से रमेश ने इंकार किया। उन्होंने कहा, हम सरकारी व्यवस्था में विश्वस्तरीय शोध केंद्र की स्थापना नहीं कर सकते। हम बीते 60 वर्ष के अनुभव से इस बात को समझ सकते हैं कि सरकारी शोध संस्थान युवा प्रतिभाओं को आकर्षित नहीं कर सकते। रमेश ने कहा कि यही कारण है कि हमें अलग नजरिए से सोचने की जरूरत है। जामनगर में शोध केंद्र सार्वजनिक-निजी भागीदारी के आधार पर स्थापित होगा। इससे पहले जैव विविधता दशक पर रमेश ने कहा, पर्यावरण के क्षेत्र में भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और भारतीय जीव विज्ञान सर्वेक्षण दो प्रमुख संस्थाएं हैं। बतौर पर्यावरण मंत्री मेरी दो वर्ष की सबसे बड़ी हताशा इन्हीं संस्थाओं को लेकर है। उन्होंने कहा, हम चाहते हैं कि ये संस्थाएं पेशेवर तरीके से काम करने के लिए स्वतंत्र और स्वायत्त हो जाएं लेकिन इस संबंध में हो रहे प्रयासों का विरोध इन्हीं संस्थाओं की ओर से हो रहा है। ऐसा इसलिए है कि दोनों संस्थाएं सरकार से अपना जुड़ाव तोड़ना नहीं चाहती क्योंकि स्वतंत्र और स्वायत्त हो जाने वे जवाबदेह भी हो जाएंगी।
Couples of months ago Jai Ram Ramesh had thrown the convocation gown in a convocation ceremony of some University. He had cited that this gown represents the slavery era. This time he has questioned the top reputed institutes of the country. However, by stating teachers/administration the main villain, he righteously projected students as world class. These are the same institutes for which most of school going students start preparing 2-3 years ago. This is an interesting scenario.
1. How can students be world class when their teachers are not above average standards? Or Above observation is purely fictional?
2. As we all know that big middle class pocket of the country loosen itself only at children education. It makes education a huge business market for private and foreign institutes. Indirectly is he alluding towards welcoming of foreign institutes in Indian education sector.?
3. Are top institutes in real facing a phase of saturation?