What's wrong with BJP?

थोड़ा सा समारना चाहूँगा राका भाई आप की बात ने ----वशुन्धरा राजपूतों की नहीं मराठों की लड़की हे | दूसरी बात बाहरी दिल्ली की शीट जो जाट बहुल हे उसको आरक्षित बना दिया गया हे ,यानि की दिल्ली से जट्टों का पत्ता साफ़ | एक बात और ध्यान देने योग्य हे ,चाहे कांग्रेस हो आर चाहे बी,जे,पि, दोनु पार्टिया में वर्चस्व रिफुजियाँ का स ध्यान दे के देख ल्यो | यानी देश पे राज रिफूजी करण लागरे सें |
अच्छा मराठा भी कोई जाति हो स के मैंने ना बेरा था , मैं तो न्यू सोचा करता के जैसे हरियाणा के लोगा न हरियाणवी कहवे स वैसे महाराष्ट्र के लोगा न मराठा |
 
मैं कहाँ मजाक कर रहा हूँ, आप ही कह रहे हैं की न कांग्रेस न भाजपा जाटों के लिए कुछ करने वाली हैं तो क्यूँ इनमे से एक को चुना जाये. अपनी ही पार्टी बना ल्यो. जाटों ने कांग्रेस को वोट दिया राजस्थान में, कुछ न मिल्या, भाजपा ने भी जाटों के खिलाफ ही काम कर्या दिल्ली और हरयाणा में तो दोनों को छोड़ के तीसरा कोई लाओ, और तीसरा ही लाना है तो अपनी जाट पार्टी क्यूँ नहीं.

जाखड़ साहब इब आप मजाक करण लागे बाकी बात तो ज्ञान की कही इसकी शुरुआत और करके दिखाओ यदि कर राखी स तो किम्मे हामने भी बताओ...
 
पक्की बात स के भाई रविंदर ..
काका सही सही बता दिए आड़े 4 साल होए घर फूंकते हुए अगर पक्की खबर हो तो फेर टाल कर दया आगे फूंकन की भाई की मान के |

जा न्यू-ए फूट पड़ी रही ते पक्की बात स कोणी मिले आरक्षणं | हर जिले का एक नेता होर्या स अर सब एक दुसरे की घेटी बोचअण लाग रे सें | आप के परिवार का योगदान इस आन्दोलन में भोत ही निस्वार्थ और सहरानीय रह्या स | पर दुसरे टांग खीन्चानिये जाट कोणी होवण दें | देख लिए भाई ,अर जा मिल गया ते किहे चमत्कार तें कम नि स फेर या बात ,सर चौधरी छोटूराम जी के बाद ये दुसरा महान कार्य कर्या जावेगा जट्टां के हित में |
 
फ़तेह साब,
अगर कोई तीसरा न आया तो वोट देने नहीं जाना है हमको? सेंटर में कांग्रेस और भाजपा के बिना सरकार बनना नामुमकिन सा है. इस अवस्था में कांग्रेस के साथ जाएँ या भाजपा के साथ, अब सिर्फ जाटों से ही तो तीसरा मोर्चा न बनेगा.
मतदान दो तरह से की जा सकती है, किसी को जिताने के लिए या किसी को हराने के लिए.
अगर हमारे पास कांग्रेस और भाजपा में से एक को हराने का विकल्प हो तो किसे हरवाएंगे? राजस्थान में यही तो दल हैं, तीसरा मोर्चा है ही नहीं विधानसभा चुनावो में कम से कम. आप बताइए क्या किया जाये. तीसरे मोर्चे के लिए इंतज़ार करते रहें और जो कोई भी जीते उसे जीतने दें.

जहाँ तक मैं सोचता हूँ, जाटों को पहले कांग्रेस या भाजपा में से एक को चुनना चाहिए. तीसरा मोर्चा बड़े दूर को कोडी लगती है, कम से कम इस राजनीतिक माहौल में तो बाकि सब अपनी समझदारी से जो करना चाहें कर सकते हैं, न मैं न कोई और किसी को अपनी इच्छानुसार कुछ करने को मजबूर कर सकता है.


Arvind, you are very right and I am not agaist change and not at all in favour of congress including their leadership, My simple point was that there is no use of coming out of ditch and going to well, we must come out for good and that is why suggested third front, I am very keen and will try my best for a change but priority will go to non BJP, IF THAT IS NOT POSSIBLE THAN WE WILL ACCEPT WHAT EVER INDIAN PUBLIC AND GOD GIVES US.
 
अच्छा मराठा भी कोई जाति हो स के मैंने ना बेरा था , मैं तो न्यू सोचा करता के जैसे हरियाणा के लोगा न हरियाणवी कहवे स वैसे महाराष्ट्र के लोगा न मराठा |

हाँ भाई मराठा जट्टां की ढाल आड़े के जमींदार सें अर राजनीती भी इनकी-ए चाले स | दुसरे महारस्तरीयां ने मराठी कह्या करें | आपणे कानी इन् ने बड्डे बुड्ढे "मरहेटे" कह्या करदे |
 
मैं कहाँ मजाक कर रहा हूँ, आप ही कह रहे हैं की न कांग्रेस न भाजपा जाटों के लिए कुछ करने वाली हैं तो क्यूँ इनमे से एक को चुना जाये. अपनी ही पार्टी बना ल्यो. जाटों ने कांग्रेस को वोट राजस्थान में, कुछ न मिल्या, भाजपा ने भी जाटों के खिलाफ ही काम कर्या दिल्ली और हरयाणा में तो दोनों को छोड़ के तीसरा कोई लाओ, और तीसरा ही लाना है तो अपनी जाट पार्टी क्यूँ नहीं.
ठीक बात कही आपने याहे तो कहू सु मैं , इसकी शुरुआत और करो | विचार आपने जाहिर किया हैं तो शुरुआत भी करके दिखाओ मैं आपके साथ सु तन मन धन त | हामने तो वैसे भी आदत सी होली इब एक दाव इबके आपके ऊपर खेल के देख लेंगे :)
वैसे हरियाणा ,पंजाब में तो जाटो के पास विकल्प हैं इस भाजपा कांग्रेस का |
 
मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ की कांग्रेस भाजपा का विकल्प है. कांग्रेस ने ५० साल में कुछ ना करया तो भाजपा का विकल्प कैसे हो सकती है?

तीसरे मोर्चे की बात आप लोग ही कर रहे हैं, आप ही कांग्रेस और भाजपा दोनों को पसंद नहीं करते, ये सुझाव आपके लिए था. तीसर मोर्चा हकीकत नहीं है, इस राजनीतिक माहौल में. मैं तो पहले ही कह चूका हूँ की कांग्रेस और भाजपा में से चुनना पड़ा तो भाजपा को चुनुँगा और शुरू से कहता आ रहा हूँ. कुछ भी करने से पहले आदमी को अपना मत अभिव्यक्त कर देना चाहिए और मैं वो कर चूका हूँ.


ठीक बात कही आपने याहे तो कहू सु मैं , इसकी शुरुआत और करो | विचार आपने जाहिर किया हैं तो शुरुआत भी करके दिखाओ मैं आपके साथ सु तन मन धन त | हामने तो वैसे भी आदत सी होली इब एक दाव इबके आपके ऊपर खेल के देख लेंगे :)
वैसे हरियाणा ,पंजाब में तो जाटो के पास विकल्प हैं इस भाजपा कांग्रेस का |
 
Let me make myself more clear on this. I am supporting BJP not because it is good but because certainly congress is worst. I want to root out congress. I want congress to be extinct from Indian political scene. Congress is the reason behind religion and caste based politics. It has divided Indian society in regions, religions, castes etc etc.

मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ की कांग्रेस भाजपा का विकल्प है. कांग्रेस ने ५० साल में कुछ ना करया तो भाजपा का विकल्प कैसे हो सकती है?

तीसरे मोर्चे की बात आप लोग ही कर रहे हैं, आप ही कांग्रेस और भाजपा दोनों को पसंद नहीं करते, ये सुझाव आपके लिए था. तीसर मोर्चा हकीकत नहीं है, इस राजनीतिक माहौल में. मैं तो पहले ही कह चूका हूँ की कांग्रेस और भाजपा में से चुनना पड़ा तो भाजपा को चुनुँगा और शुरू से कहता आ रहा हूँ. कुछ भी करने से पहले आदमी को अपना मत अभिव्यक्त कर देना चाहिए और मैं वो कर चूका हूँ.
 
जा न्यू-ए फूट पड़ी रही ते पक्की बात स कोणी मिले आरक्षणं | हर जिले का एक नेता होर्या स अर सब एक दुसरे की घेटी बोचअण लाग रे सें | आप के परिवार का योगदान इस आन्दोलन में भोत ही निस्वार्थ और सहरानीय रह्या स | पर दुसरे टांग खीन्चानिये जाट कोणी होवण दें | देख लिए भाई ,अर जा मिल गया ते किहे चमत्कार तें कम नि स फेर या बात ,सर चौधरी छोटूराम जी के बाद ये दुसरा महान कार्य कर्या जावेगा जट्टां के हित में |

भाईसाहब यो आरक्षण आल्ला काम तो बनेगा ये छोटी मोटी फुंट न्यू ऐ चाले जाया करे स इन्ते हार के घर बैठ गए तो फेर किसे जाट सा | एकली अपने जाटो में ही नहीं सभी जातियों में स या फुंट आल्ली समस्या | आपके रोहतक आल्ला ने चौ.छोटूराम की जमानत जब्त करा दी थी और तो और उस महान आदमी को जाति बाहर करने के लिए पंचायत तक करी परन्तु उस शेर ने इन स्वार्थी नेताओ की परवाह कोणी की | आपने तो इबे सुनी स ये आन्दोलन में फुंट आल्ली खबर, हामने तो बेरा न कितने नेता आते जाते देख लिए इस चक्कर में बस थोड़ी तकलीफ हो स के गाँव में हांड के लोगा न समझावा उनने ल्यावा आर फेर ये स्वार्थी अपनी शक्ल दीखान आजा स टीवी अखबार आल्ला न, कोई बढ्ले नेता त साथगाठ में लाग जा स | अब जब इन नेता न न्यू दीखन लाग्या के बात बनन आल्ली स तो ज्यादा मारा मरी करे स ये |
आज त 3 -4 साल पहले की बात स ड़ीगल गाँव की गौशाला में प्रोग्राम था तो ड़ीगल के एक सज्जन आदमी ने फोन करके पिताजी को भुला लिया के जी आप आओ 3 -4 हजार आदमी एकैठे होंगे इनने समझाओ बताओ | जद के उस वक़्त आन्दोलन का 'अ' भी शुरू ना होया था कोई भूली भटकी खबर गलती त अखबार आल्ले छाप दिया करते | पिताजी बोले के भाई वहा तो 36 बिरादरी के लोग होंगे और मैं बात करूँगा जाट की रोला हो जागा देख लिए वो बोला जी कोई बात न मेरा काम स आप आओ | आगले दिन मैं और रविंदर सूरा भी उनके साथ ड़ीगल गए | ड़ीगल जाटो का बड़ा गाँव हैं वहा अच्छी भीड़ थी सांग चाल रया था | सांग रुकवा के पिताजी का भाषण शुरू करवाया जैसे ही पिताजी ने जाटो पे बोलना शुरू किया लोगो ने हल्ला शुरू कर दिया के हामने नहीं सुनना | पिताजी बोले ठीक स भाई जाट की बात नहीं करूँगा गौ माता की करू सारे बोले हाँ गौ पर बोलो | पिताजी बोले - गौ हमारी माता हैं इस पर सब राजी तलाई बजाई , अगली लाइन में बोले के जाट देवता स एक दिन पूजना पड़ेगा | माच गया उड़े रोल्ला मैंने रविंदर त कही के भाई गाड़ी तैयार करले बुढ्ला पिटवावेगा आज दिखे | उस वक़्त यो हाल था के जाटो के इतने बड़े गाँव में भी जाट की कोई बात सुनके या करके राजी नहीं था और आज कम से कम इस हाल तक तो ले आये की जाट की बात पे रेल लाइन रुक जा स शहर में आग लाग जा स |
भाई रविंदर इन छोटी छोटी बाता त हिम्मत नहीं हारा करते अपना काम करे जाओ खरपतवार न्यू ऐ आती जाती रहा करे , आरक्षण पक्का मिलेगा |
 
फ़तेह साब,
अगर कोई तीसरा न आया तो वोट देने नहीं जाना है हमको? सेंटर में कांग्रेस और भाजपा के बिना सरकार बनना नामुमकिन सा है. इस अवस्था में कांग्रेस के साथ जाएँ या भाजपा के साथ, अब सिर्फ जाटों से ही तो तीसरा मोर्चा न बनेगा.
मतदान दो तरह से की जा सकती है, किसी को जिताने के लिए या किसी को हराने के लिए.
अगर हमारे पास कांग्रेस और भाजपा में से एक को हराने का विकल्प हो तो किसे हरवाएंगे? राजस्थान में यही तो दल हैं, तीसरा मोर्चा है ही नहीं विधानसभा चुनावो में कम से कम. आप बताइए क्या किया जाये. तीसरे मोर्चे के लिए इंतज़ार करते रहें और जो कोई भी जीते उसे जीतने दें.

जहाँ तक मैं सोचता हूँ, जाटों को पहले कांग्रेस या भाजपा में से एक को चुनना चाहिए. तीसरा मोर्चा बड़े दूर को कोडी लगती है, कम से कम इस राजनीतिक माहौल में तो बाकि सब अपनी समझदारी से जो करना चाहें कर सकते हैं, न मैं न कोई और किसी को अपनी इच्छानुसार कुछ करने को मजबूर कर सकता है.

Mr jakha, I have maded very clear in my previous and even the post you quoted, that I want change, first priority non BJP, second priority third front with BJP, and lastly BJP, so you should vote accordingly if follow my advise please, another reality of BJP, in Haryana last byelections bjp clearly sided congress and congress helped bjp, so you can see their game plan.rest upto every individual to see and act as per his wish, I donot want to force my liking on anybody please.
 
पिताजी बोले - गौ हमारी माता हैं इस पर सब राजी तलाई बजाई , अगली लाइन में बोले के जाट देवता स एक दिन पूजना पड़ेगा |

Hahahahahahaha...Ya to kardi baat keh di thi bhaisaab!!!
 
फ़तेह साब,
अगर कोई तीसरा न आया तो वोट देने नहीं जाना है हमको? सेंटर में कांग्रेस और भाजपा के बिना सरकार बनना नामुमकिन सा है. इस अवस्था में कांग्रेस के साथ जाएँ या भाजपा के साथ, अब सिर्फ जाटों से ही तो तीसरा मोर्चा न बनेगा.
मतदान दो तरह से की जा सकती है, किसी को जिताने के लिए या किसी को हराने के लिए.
अगर हमारे पास कांग्रेस और भाजपा में से एक को हराने का विकल्प हो तो किसे हरवाएंगे? राजस्थान में यही तो दल हैं, तीसरा मोर्चा है ही नहीं विधानसभा चुनावो में कम से कम. आप बताइए क्या किया जाये. तीसरे मोर्चे के लिए इंतज़ार करते रहें और जो कोई भी जीते उसे जीतने दें.

जहाँ तक मैं सोचता हूँ, जाटों को पहले कांग्रेस या भाजपा में से एक को चुनना चाहिए. तीसरा मोर्चा बड़े दूर को कोडी लगती है, कम से कम इस राजनीतिक माहौल में तो बाकि सब अपनी समझदारी से जो करना चाहें कर सकते हैं, न मैं न कोई और किसी को अपनी इच्छानुसार कुछ करने को मजबूर कर सकता है.

We have alternative in Parliamentary elections. There are several parties which might come together and form a third front. Even in States, you have options other than Congress and BJP. There are always several Independent candidates and some of them could be very honest and capable. There is no harm in trying them.
 
We have alternative in Parliamentary elections. There are several parties which might come together and form a third front. Even in States, you have options other than Congress and BJP. There are always several Independent candidates and some of them could be very honest and capable. There is no harm in trying them.

Agreed. But this third morcha luv should not be to keep BJP away and to cause a hung parliament. The utmost focus should be to penalize Congress, come what may and to have a stable govt also.

अगर यह कांग्रेस बच गयी तो, २० साल बाद इतिहास की रुपरेखा यह होगी१ मर्ज़ी है आपकी, आखिर देश है आपका!!

View attachment 13746
 
Agreed. But this third morcha luv should not be to keep BJP away and to cause a hung parliament. The utmost focus should be to penalize Congress, come what may and to have a stable govt also.

अगर यह कांग्रेस बच गयी तो, २० साल बाद इतिहास की रुपरेखा यह होगी१ मर्ज़ी है आपकी, आखिर देश है आपका!!

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There are some progressive and enlightened elements in BJP also. They may be invited to join the Bandwagon.
 
A blog on one of the ailments of BJP:

http://khabar.ibnlive.in.com/blogs/16/706.html

उमा की जीत में बीजेपी की हार


बड़े दिनों के बाद उमा भारती को टीवी पर चहकते हुए देखा। आत्मविश्वास से लबालब। एक जमाना था, जब उमा का जलवा था, लेकिन पिछले कुछ साल उनके लिए बहुत खराब बीते। पहले मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुरसी गई, फिर बीजेपी से ही बाहर हो गईं। अलग पार्टी बनाई। पर न पार्टी चली और न ही बीजेपी को इसकी वजह से नुकसान हुआ। लोग उनको भूलने लगे। कभी फायर ब्रांड नेता के नाम से मशहूर उमा के लिए सारे दरवाजे बंद हो गए। जो कभी अयोध्या मसले पर अपने जोशीले भाषणों के लिए जानी जाती थीं, वह अपने ही कार्यकर्ता को थप्पड़ मारने के लिए अखबारों की सुर्खियां बनने लगीं। उमा संन्यासिन कहलाना पंसद करती हैं, मगर राजनीति में एक दौर ऐसा भी आया कि वह वाकई संन्यास आश्रम में चली गईं। भला हो नितिन गडकरी का कि वह एक बार फिर सुर्खियों में हैं और उत्तर प्रदेश में उनकी अगुआई में बीजेपी अपना भविष्य तलाश रही है। यह समय की बलिहारी भी है और बीजेपी की हार भी।

राम मंदिर मुद्दा जब उफान पर था, तब उमा भारती कम उम्र के बाद भी बीजेपी के सबसे चमकदार चेहरों में थीं। आडवाणी की भी चहेती और आरएसएस की भी। दोनों को उनमें पार्टी का भविष्य दिखता था। पर बीजेपी का मूल स्वभाव आड़े आ गया। इसकी शुरुआत भी अयोध्या विवाद के बीच ही हुई। मंडल कमीशन ने देश को एक नई धारा दी थी। यह धारा संघ की हिंदुत्व धारा के विपरीत खड़ी हो गई। लेकिन संघ में एक शख्स थे के गोविंदाचार्य, जिन्होंने इस विपरीत धारा को बीजेपी में समाहित करने की कोशिश की। पार्टी को गोविंदजी ने सोशल इंजीनियरिंग का पाठ पढ़ाने का प्रयास किया। यूपी में कल्याण सिंह और मध्य प्रदेश में उमा भारती इस रणनीति की धुरी बने।
गोविंदजी का मानना था कि बीजेपी को अगर अखिल भारतीय दल बनना है, तो उसे अपने सामाजिक आधार का विस्तार करना होगा और इसके लिए उसे उच्च जातियों की पार्टी की अपनी छवि तोड़नी होगी, पिछड़ी जातियों को गले लगाना होगा। गोविंदाचार्य की सोच के बरक्स बिहार में लालू यादव और यूपी में मुलायम सिंह ने पिछड़ी जातियों व मुस्लिम तबके का सफल जातिगत गठजोड़ खड़ा कर दिया था। सेकुलरिज्म और पिछड़ों की राजनीति का यह नया रसायन काफी ठोस साबित हुआ और बीजेपी के लिए नुकसानदेह। अगर यह जातिवादी खिचड़ी नहीं पकी होती, तो बीजेपी को अपने बल पर बहुमत लाने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

गोविंदाचार्य की सोच में दम था। वह समय से आगे सोच रहे थे, पर बीजेपी और आरएसएस मानसिक रूप से इस बदलाव के लिए तैयार नहीं थे। बीजेपी और आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व में उच्च जातियों का वर्चस्व था। गोविंदाचार्य की राह पर चलने का अर्थ था संगठन में नई जातिगत व्यवस्था का निर्माण। उच्च जातियां इस त्याग के लिए तैयार नहीं थीं। लिहाजा पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा बदलने के लिए निकले गोविंदाचार्य ही पार्टी से बाहर हो गए। बिना किसी कारण और बिना किसी गंभीर आरोप के। हकीकत यह थी कि गोविंदजी का तेज और पिछड़ी जातियों का गठबंधन बनाने की उनकी पेशकश सवर्ण जातियों के नेताओं को रास नहीं आई और यही बात उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गई।

अकेले गोविंदाचार्य ही नहीं गए। उनके बाद पिछड़ी जाति की राजनीति और ऊंची जातियों के नेतृत्व के लिए चुनौती पैदा करने वाले हर शख्स को करीने से निपटा दिया गया। अयोध्या विवाद की वजह से यूपी में कल्याण सिंह का कद कभी अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के आसपास पहुंच गया था। कल्याण सिंह ने धैर्य खोया और पार्टी से बाहर हो गए। मध्य प्रदेश बीजेपी मे नई जान फूंकने और सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाने वाली उमा भारती के मुख्यमंत्री बनते ही षड्यंत्रों का दौर शुरू हो गया और अंत में ईदगाह में झंडा फहराने के मामले में उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट क्या जारी हुआ, पार्टी के काबिल नेताओं को बहाना मिल गया और उमा से इस्तीफा ले लिया गया।

उमा को लगा कि केस खत्म होते ही दोबारा कुरसी मिल जाएगी, लेकिन तब तक पार्टी ने यह तय कर लिया था कि जनाधार वाली उमा पार्टी के लिए बोझ बन गई हैं। उमा का नाराज होना स्वाभाविक था। कल्याण सिंह की तरह उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। झारखंड में बाबूलाल मरांडी के साथ भी कमोबेश यही हुआ। महाराष्ट्र में गोपीनाथ मुंडे का भी यही दर्द है। जब तक प्रमोद महाजन थे, तब तक उनका काम चलता रहा, पर महाजन के जाने के साथ ही मुंडे भी बेगाने हो गए। वह पार्टी में हैं भी और नहीं भी। महाराष्ट्र में उनके जूनियर रहे जनाधार विहीन गडकरी आज भाजपा के अध्यक्ष हैं और जनाधार के बावजूद मुंडे लगातार हाशिये पर धकेले जा रहे हैं। एक बार वह पार्टी से इस्तीफा भी दे चुके हैं।

हैरानी की बात यह है कि आज उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पिछड़ी जातियों की याद आई है। राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र की मौजूदगी के बाद भी गडकरी को लगता है कि गोविंदाचार्य की सोशल इंजीनियरिंग शायद पार्टी मे जान फूंक दे। अब बीजेपी को तुनकमिजाज उमा भारती में संभावनाएं दिख रही हैं और इशारों-इशारों में उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में पेश करके गैर यादव पिछड़ों को अपनी तरफ लाने का ख्वाब बुना जा रहा है। इस ख्वाब में भ्रष्टाचार के अति गंभीर आरोप ङोल रहे बालूलाल कुशवाहा का साथ भी नागवार नहीं गुजर रहा है। कारण- पार्टी की नजर चार फीसदी कुशवाहा वोट पर है।

यह वही प्रदेश है, जहां कभी कल्याण सिंह की तूती बोला करती थी और बीजेपी की बहुमत वाली सरकार भी सिर्फ कल्याण सिंह के समय ही बनी थी। जैसे-जैसे कल्याण सिंह कमजोर होते गए, बीजेपी पहले नंबर की जगह तीसरे-चौथे नंबर की पार्टी बनती गई। अफसोस इस बात का कि बीजेपी को यह बात 2012 में समझ में आई है। पार्टी ने गोविंदाचार्य की बात मानी होती, कल्याण सिंह, उमा भारती, बाबूलाल मरांडी जैसों को प्यार से रखा होता, तो ट्रेजडी नहीं होती। उत्तर भारत में बीजेपी का कल्याण तभी हो सकता है, जब वह ब्राह्मण-ठाकुर के जातिवादी समीकरण से बाहर आए और पिछड़ी जातियों के प्रति सम्मान दिखाए। ऐसे में अगर उमा की वापसी और यूपी में उनको दिया गया भाव पार्टी का स्थायी भाव बनता है, तो बीजेपी के लिए अच्छी खबर होगी, वरना ट्रेजडी कॉमेडी में बदल जाएगी।
 
Last edited:
This is akin to create a BJP Phobia in Jats the way it has been created in Muslims. Jats in Rajasthan have been voting Congress to power for decades altogether,despite an open claim from Jats this last election, no JAT was considered worthy of CM ship. Even the second in succession is Joshi if Gehlot goes away?? So what should JAT do?? In that case, why they should vote for Congress in Rajsthan?? At least Vasundhra is a JAT by marriage!

Actual problem is with Jat leaders like Ajit Singh who wasted the great legacy and failed to consolidate the Jat votebank with other casts to make a rainbow coalition. Now they have been reduced to political opportunists and their misadventures have pushed Jats in oblivion. No cast, on its own, commands a centerstage, each has to align itself as the situation evolves. Brahmins have done it in UP by aligning with BSP. I

If Jats will continue to vote for a moribund congress, then they will end up with the losing side.

And the least, one should not always vote the cast, sometimes, it is better to cast the vote. The time for the later is nigh, else, not only Jats but whole country will be taken for ride by the inefficient Congress.

राजस्थान में यो 'बीजेपी फोबिया' गलत नहीं हैं वहा भाजपा में राजपूतो का प्रभुत्व हैं | जैसा की मैंने पहले भी कहा हैं की राजस्थान में राजनीति "जाट बनाम राजपूत" चलती हैं | राजस्थान में 'जाट मुख्यमंत्री ' भी एक मुद्दा हैं पर उससे अहम् मुद्दा वहा के जाटों के लिए यह रहता हैं की कहीं कोई ठाकर मुख्यमंत्री ना बन जाये | राजस्थान में दूसरा किसी जाति का मुख्यमंत्री बन जाये उससे जाट को इतना परहेज नहीं जितना एक राजपूत मुख्यमंत्री से होता हैं | इन राजपूतो को मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर रखने के लिए वाहा का जाट कांग्रेस से संधि में अपनी भलाई समझता हैं | आपने उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों का दलितों से संधि का सही उदाहरण दिया हैं हम जाटों को भी कौम की भलाई को देखते हुए संधिया करनी चाहिए | राजनीति हमेशा संधि की होती हैं इसलिए जाट कौम को भी अपने अपने क्षेत्र के हिसाब अपने कौमी मुद्दों के स्वार्थो को देखते हुए इन सियासी दलों से राज्य और केंद्र सत्र पर संधि करनी चाहिए |
 
Hrayana wala vikalpa to ek dum bekaar sai.. Chautala kaunsa kam sai.. ek number ka bhrshta sai yo bhi to..

ठीक बात कही आपने याहे तो कहू सु मैं , इसकी शुरुआत और करो | विचार आपने जाहिर किया हैं तो शुरुआत भी करके दिखाओ मैं आपके साथ सु तन मन धन त | हामने तो वैसे भी आदत सी होली इब एक दाव इबके आपके ऊपर खेल के देख लेंगे :)
वैसे हरियाणा ,पंजाब में तो जाटो के पास विकल्प हैं इस भाजपा कांग्रेस का |
 
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