कुत्ते पै प्रस्ताव |

jsrana

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कुत्ते पै प्रस्ताव |

रामफल मास्टर ने क्लास के बाल्कान त कुत्ते पै प्रस्ताव लिख कै ल्यान ताहि कहा |

सब लिख क लिआए पर धारे ने ना लिख्या |

रामफल मास्टर ने धारे त बुझी -मंने तेरे त कुत्ते पै प्रस्ताव लिखाण की कही थी तू क्यूँ ना लिख कै लाया |

धारे - जी मंने कुत्ते पै पेंसिल धर कै लिखन की कोशिश त बहुत करी पर कुत्ता डटया ए ना इब मने देखते ए भाज ज्या सै |
 
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हा हा हा हा बढ़िया स राणा जी | काल ने मास्टर कीड़ी पे प्रस्ताव लिखण की कहवेगा ते फेर ?आर चाँद या सूरज पे प्रस्ताव लिखाण की कह दी ते फेर ?
 
ठीक पांच साल पहले (फरवरी 2007 में) मैंने एक धागा लिखा था जिसका शीर्षक था - Dastan-e "Time Pass". इस पर कुछ controversy हो गई थी, बहुत सी पोस्ट (कुछ मेरी भी) डिलीट कर दी गईं थी । यहां तक कि अब भी जब मैं उस धागे का अपनी किसी पोस्ट में लिंक देता हूं तो कईयों को चुरणे लग जाते हैं । इसलिए इसका लिंक आप खुद ढूंढ़ लो । उसमें मैंने एक प्रस्ताव लिखा था, कुत्ते पर । उसको यहाँ पर कापी-पेस्ट कर रहा हूं :


......... बहुत साल पहले मेरे पड़ौस में एक बच्चे का जन्मदिन मनाया गया था। बहू (बच्चे की मां) पढ़ी लिखी थी और केक वगैरा ले आई थी । बूढे ताऊ (बच्चे के दादा) ने हवन करवाया और बाद में मिठाईयां भी बांटी । सब होने के बाद जब बहू केक कटवाने का प्रोग्राम करने लगी तो ताऊ ने कहा - जब जन्मदिन की रस्म पूरी हो ही चुकी है, तो फिर इस की क्या जरूरत है ? और जब एक किलो लकड़ियां और पाव घी का हवन हो चुका है तो दो-तीन मोमबत्ती जलाने से क्या ज्यादा आग निकलेगी ? और ताऊ ने वह केक कुत्ते को खिला दिया । बहू नाराज तो बहुत हुई पर चुप रही । बात सच भी है - अग्नि की ज्वाला का महत्व है । पहले हमारे बुजुर्ग हवन करते थे, बाद में सिमट कर यही अग्नि दीवे के रूप में घरों में रही । ईसाई भी चर्च में मोमबती जलाते हैं - यानी हवन की अग्नि का छोटा रूप ।

बात 'टाइम पास' की हो रही थी - अब कुत्ते का जिक्र आ गया तो थोड़ी बात और हो जाये । कालेज के जमाने में Lord Byron की लाजवाब कविता "An Eligy on the Death of a Mad Dog" पढी थी - अफसोस है कि वह इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है । कुत्ता सारी दुनियां में पाया जाता है और स्वामीभक्ति के लिए मशहूर है । गजब का सयाना जानवर है । पर वह स्वामीभक्ति में अंधा हो जाता है, विवेक नहीं रहता - मालिक चाहे अच्छा हो या बुरा, उसके लिए जान दे देता है । और तो और, उसकी पूंछ भी टेढी ही रहती है, चाहे बारह साल उसको एक सीधे पाईप में रख लो । धोबी तो गधा रखता है, फिर भी यह कहावत चल पड़ी - धोबी का कुत्ता घर का न घाट का । कुत्ते की मौत बुरी ही होती है, इसीलिए कहते हैं - पापी तो मरेगा कुत्ते की मौत । हमारे बुजुर्ग गाय पालते थे, रखवाली के कुत्ता रखते थे पर उसको घर में या रसोई में नहीं घुसने देते थे - गली का कुत्ता ! अंग्रेज भी कुत्ता पालते जरूर हैं, पर नफरत के लिए वे भी 'कुत्ता' ही कहते हैं, हम भारतीयों से नफरत करते थे और कई जगहों पर लिख देते थे - dogs and Indians are not allowed.

आजकल तो कुत्तों के दिन हैं - वे अच्छे खासे बिस्तर पर सोते हैं, कारों में भी घूमते हैं । उदयपुर झील के बीच एक छोटे से टापू पर एक कुत्ते की समाधि है - महाराजा का कुत्ता था भाई - क्यूं ना बने समाधि ! महाराज युधिष्ठिर के पास भी एक कुत्ता था जो पांडवों के साथ ही हिमालय में चला गया था और पांचों पांडव बर्फीली तूफान में दब कर मरे थे, साथ में उनका प्यारा कुत्ता भी ।


कुत्ते वाली अंध-भक्ति मनुष्य का धर्म नहीं - मनुष्य को नीर-क्षीर विवेकी होना चाहिये । सदा धर्म का ही साथ दो - दोस्ती में अंधे मत बन जाओ । अगर तुम्हारा प्यारा दोस्त अधर्म की राह पर है तो उस काम में उसका साथ मत दो - यह शिक्षा है श्रीकृष्ण की । कर्ण बहुत उत्तम योद्धा था, पर दुर्योधन का साथ देकर उसने गलती की, श्रीकृष्ण का कहना नहीं माना । यही बात द्रोणाचार्य और भीष्म पर भी लागू होती है - इतने बड़े महापुरुष यही गलती कर बैठे - सच्चाई जानते हुए भी उन्होंने पापी दुर्योधन का ही साथ दिया और श्रीकृष्ण के समझाने पर भी नहीं माने ।

श्रीकृष्ण की शिक्षा जाटों के अंतर्मन में है । दक्षिण भारतीय श्रीकृष्ण की मूर्ति की पूजा करते हैं, पर जाटलैंड के जाट उसके सच्चे चेले हैं । देख लो बेशक - एक पार्टी के पीछे अंधे हो कर कभी नहीं लगते - चापलूस से नफरत करते हैं । हर बार सरकार बदल देते हैं ।

ऊपर कुत्ते की बात हो रही थी ना - अच्छे नाम हैं इस जानवर (कुत्ते) के सभी भाषाओं में - संस्कृत में श्वान, रूसी में सोबाका, स्पेनिश-इटालियन में पेरो (Perro) - अंग्रेजी के dog का तो आपको पता ही है । पर देशी शब्द 'कुत्ता' का जवाब नहीं । कितनी फिल्मों में यह डायलोग आया होगा - "कमीने, कुत्ते, मैं तेरा खून पी जाऊंगा" । 'शोले' में धर्मेन्द्र का डायलोग अब भी याद है - "बसन्ती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना"। 'राम और श्याम' में दिलीप कुमार का डायलोग (प्राण को) - "कमीने, शेर कभी कुत्ते के हाथों मरा है?"

अभी याद आया - ताऊ ने जिस कुत्ते को वह केक खिला दिया था, वह मेरा ही प्यारा कुत्ता था, डोबरमैन नस्ल का - 'बूजो' नाम था उसका । हरयाणवी खूब समझता था । कुत्ते की उम्र कुल बारह साल ही होती है, आज मेरा प्यारा बूजो इस दुनियां में नहीं है । क्या पता जिस दिन उसने ताऊ के हाथों केक खाया, उस दिन उसका जन्मदिन हो?
 
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हा हा हा ,बढ़िया लेख स देशवाल जी ,फेर भी लोगाँ के चुरने क्यूँ हो गे थे ? सरसम के तेल का फोवा दे देंदे !!!!!!!
 
हा हा हा ,बढ़िया लेख स देशवाल जी ,फेर भी लोगाँ के चुरने क्यूँ हो गे थे ? सरसम के तेल का फोवा दे देंदे !!!!!!!

यह मत पूछो रवीन्द्र । यह तो घाव पर नमक छिड़कने वाली बात हो जायेगी !

अपनी ऊपर वाली पोस्ट में मैंने एक अंग्रेजी कविता का जिक्र किया था । यह Oliver Goldsmith की कविता है । इसको नीचे लिख रहा हूं । गजब की कविता है यह ! एक पागल कुत्ते ने एक आदमी को काट लिया । आदमी नहीं मरा, बेचारा कुत्ता मर गया ! पढ़ो नीचे -



An Eligy on the Death of a Mad Dog
(Oliver Goldsmith)

Good people all, of every sort,
Give ear unto my song;
And if you find it wondrous short,
It cannot hold you long.

In Islington there was a man,
Of whom the world might say
That still a godly race he ran,
Whene'er he went to pray.

A kind and gentle heart he had,
To comfort friends and foes;
The naked every day he clad,
When he put on his clothes.

And in that town a dog was found,
As many dogs there be,
Both mongrel, puppy, whelp and hound,
And curs of low degree.

This dog and man at first were friends;
But when a pique began,
The dog, to gain some private ends,
Went mad and bit the man.

Around from all the neighbouring streets
The wondering neighbours ran,
And swore the dog had lost his wits,
To bite so good a man.

The wound it seemed both sore and sad
To every Christian eye;
And while they swore the dog was mad,
They swore the man would die.

But soon a wonder came to light,
That showed the rogues they lied:
The man recovered of the bite,
The dog it was that died.




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यह मत पूछो रवीन्द्र । यह तो घाव पर नमक छिड़कने वाली बात हो जायेगी !

अपनी ऊपर वाली पोस्ट में मैंने एक अंग्रेजी कविता का जिक्र किया था । यह Oliver Goldsmith की कविता है । इसको नीचे लिख रहा हूं । गजब की कविता है यह ! एक पागल कुत्ते ने एक आदमी को काट लिया । आदमी नहीं मरा, बेचारा कुत्ता मर गया ! पढ़ो नीचे -



An Eligy on the Death of a Mad Dog
(Oliver Goldsmith)

Good people all, of every sort,
Give ear unto my song;
And if you find it wondrous short,
It cannot hold you long.

In Islington there was a man,
Of whom the world might say
That still a godly race he ran,
Whene'er he went to pray.

A kind and gentle heart he had,
To comfort friends and foes;
The naked every day he clad,
When he put on his clothes.

And in that town a dog was found,
As many dogs there be,
Both mongrel, puppy, whelp and hound,
And curs of low degree.

This dog and man at first were friends;
But when a pique began,
The dog, to gain some private ends,
Went mad and bit the man.

Around from all the neighbouring streets
The wondering neighbours ran,
And swore the dog had lost his wits,
To bite so good a man.

The wound it seemed both sore and sad
To every Christian eye;
And while they swore the dog was mad,
They swore the man would die.

But soon a wonder came to light,
That showed the rogues they lied:
The man recovered of the bite,
The dog it was that died.




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kafi achi poem h Deshwal ji ..
 
हा हा हा हा बढ़िया स राणा जी | काल ने मास्टर कीड़ी पे प्रस्ताव लिखण की कहवेगा ते फेर ?आर चाँद या सूरज पे प्रस्ताव लिखाण की कह दी ते फेर ?

Bhaiji fer ta Dhare kadde bhi prastav na lik k layata....ha ha ha
 
हा हा हा ,बढ़िया लेख स देशवाल जी ,फेर भी लोगाँ के चुरने क्यूँ हो गे थे ? सरसम के तेल का फोवा दे देंदे !!!!!!!

Nahi Rabindar Bhai saheb ....................... Sarsam ke tel ka foha nahi. Uske liye to HUKKAAA peee n Foonk marwaaa dyo ................... Kaam Ho jahi ......................
:)
 
रामफल मास्टर ने क्लास के बाल्कान त कुत्ते पै प्रस्ताव लिख कै ल्यान ताहि कहा |

सब लिख क लिआए पर धारे ने ना लिख्या |

रामफल मास्टर ने धारे त बुझी -मंने तेरे त कुत्ते पै प्रस्ताव लिखाण की कही थी तू क्यूँ ना लिख कै लाया |

धारे - जी मंने कुत्ते पै पेंसिल धर कै लिखन की कोशिश त बहुत करी पर कुत्ता डटया ए ना इब मने देखते ए भाज ज्या सै |
hahaha kasuta joke rana sir g.....
 
हा हा हा हा बढ़िया स राणा जी | काल ने मास्टर कीड़ी पे प्रस्ताव लिखण की कहवेगा ते फेर ?आर चाँद या सूरज पे प्रस्ताव लिखाण की कह दी ते फेर ?
fer to kai keedi shaheed howengi...!!!
 
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एक ताऊ नै एक पिलूरा (पिल्ला) पाळ राख्या था । ईब पढ़ ल्यो एक पुराना चुटकला - किसै नै पहल्यां ना पढ्या हो तै !



एक बै एक ताऊ नै घेर में नळका (हैंड-पम्प) लगा राख्या था, अर एक पिलूरा पाळ राख्या था । उड़ै बहू/ छोरी पाणी भरण आया करती ।

एक बहू नई-नई आई थी - अर नई बहुवां नै गेड़े गैल नए सूट बदलण का शौक होवै ए सै ! ताऊ था असली नकल ठोकण आळा । जब भी वा बहू पाणी लेण आती, ताऊ पिलूरे कै ओड्डै (बहाने) बहू पै नकल मारता - "रै पिलूरे, आज तै जमा लाल (सूट) गाड रहया सै ... रै पिलूरे, आज तै सारा ए लीला हो रहया सै ... रै पिलूरे, आज तै तू काळा (सूट) पहर रहया सै ..."

कई दिनां में बहू की समझ में आया अक यो बूढ़ा तै तन्नैं कहै सै - अर उसनै आपणे खसम तैं कह दई एक वो बूढा तै न्यूं-न्यूं नकल मारै सै । वो छोरा सुण-कै बूढ़े धोरै आया, बोल्या - "ताऊ, तन्नैं बहूआं कानीं बात मारतीं हाण सरम ना आंदी ? तेरी उमर रह रही सै इन बातां की ?"

बूढ़ा बोल्या - "भाई, मैं तै इस पिलूरे नै कहया करता, अर जै बहू फरक मान-ग्यी हो, तै टाळ कर दयांगे ।"

आगलै दिन वा बहू फेर पाणी लेण आई, बूढ़ा बोल्या - रै पिलूरे, इसी-इसी बात के घरां बतावण की होया करैं ?"

 
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एक ताऊ नै एक पिलूरा (पिल्ला) पाळ राख्या था । ईब पढ़ ल्यो एक पुराना चुटकला - किसै नै पहल्यां ना पढ्या हो तै !



एक बै एक ताऊ नै घेर में नळका (हैंड-पम्प) लगा राख्या था, अर एक पिलूरा पाळ राख्या था । उड़ै बहू/ छोरी पाणी भरण आया करती ।


देशवाल जी पुन्झडी भी लाणी स के ?
 
देशवाल जी पुन्झडी भी लाणी स के ?

चुटकले मैं पहल्यां ए पलूरा सै जिकै पूंझड होया करै, ओर पूंझड की जरूरत कोन्या
 
देशवाल जी पुन्झडी भी लाणी स के ?

रवीन्द्र, पूंझड़ की जरूरत उत घणी पड़ै सै जित लोग निरा कापी पेस्ट कर-कै नया तागा शुरु करैं सैं । अर यो तै खुद मन्नैं wiki सैक्शन में गेर राख्या सै अर पहल्यां ऐं बता दिया था अक एक पुराना चुटकला पढ़ ल्यो ।

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इस धागे को देख कर दिनकर जी की कविता की दो लाइन याद आ गयी -

श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं
माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं।
 
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