Origin of Burdak Gotra
महाभारत के प्रारंभ में लिखा गया है कि जो महाभारत में नहीं है वह कहीं नहीं है. महाभारत को गणेश ने लिखा. इसका अर्थ मैं यह लगता हूँ कि गणेश से तात्पर्य भगवान से नहीं है बल्कि उस समय के गण के राजा अर्थात गणेश ने इसके लिखने में योगदान किया. इस आधार पर मैं बुरडक गोत्र की प्राचीनता के निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ.
बुरड़क गोत्र के बडवा (भाट) इस गोत्र का प्रारम्भ राव बुरड़कदेव (1000 ई.) से मानते हैं. बुरड़क गोत्र के बडवा का यह कथन मान्य नहीं किया जा सकता कि बुरड़क गोत्र की उत्पत्ति राव बुरड़क देव से हुई. बडवा ने राव बुरड़क देव के इतिहास में योगदान को देखते हुए बुरड़क गोत्र उनसे निकलना बताया है परन्तु बुरड़क का अस्तित्व प्राचीन काल से प्रमाणित है. विस्तृत अध्ययन और तथ्यों के आधार पर लेखक का मत है कि बुरड़क गोत्र की उत्पत्ति शिव से हुई है. महाभारत अश्वमेध पर्व (XIV.8.13,25), (XIV.8) में शिव के अनेक नाम बताये गए हैं और लेख किया गया है कि वे स्वर्ण खदान की रक्षा कर रहे हैं. शिव का एक नाम वरद है. वरद के अंश को वरदाक्ष कहा गया जो बाद में भाषा भेद के कारण वरदक या बर्ड़क से बुरड़क हो गया.
सीकर के पास स्थित हर्ष के शिव मंदिर के 961 ई. के शिलालेख और उनके द्वारा बडवा अभिलेखों के अनुसार शिव मंदिर बनाने की परंपरा भी इसकी पुष्टि करती है.
महाभारत के प्रारंभ में लिखा गया है कि जो महाभारत में नहीं है वह कहीं नहीं है. महाभारत को गणेश ने लिखा. इसका अर्थ मैं यह लगता हूँ कि गणेश से तात्पर्य भगवान से नहीं है बल्कि उस समय के गण के राजा अर्थात गणेश ने इसके लिखने में योगदान किया. इस आधार पर मैं बुरडक गोत्र की प्राचीनता के निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ.
बुरड़क गोत्र के बडवा (भाट) इस गोत्र का प्रारम्भ राव बुरड़कदेव (1000 ई.) से मानते हैं. बुरड़क गोत्र के बडवा का यह कथन मान्य नहीं किया जा सकता कि बुरड़क गोत्र की उत्पत्ति राव बुरड़क देव से हुई. बडवा ने राव बुरड़क देव के इतिहास में योगदान को देखते हुए बुरड़क गोत्र उनसे निकलना बताया है परन्तु बुरड़क का अस्तित्व प्राचीन काल से प्रमाणित है. विस्तृत अध्ययन और तथ्यों के आधार पर लेखक का मत है कि बुरड़क गोत्र की उत्पत्ति शिव से हुई है. महाभारत अश्वमेध पर्व (XIV.8.13,25), (XIV.8) में शिव के अनेक नाम बताये गए हैं और लेख किया गया है कि वे स्वर्ण खदान की रक्षा कर रहे हैं. शिव का एक नाम वरद है. वरद के अंश को वरदाक्ष कहा गया जो बाद में भाषा भेद के कारण वरदक या बर्ड़क से बुरड़क हो गया.
सीकर के पास स्थित हर्ष के शिव मंदिर के 961 ई. के शिलालेख और उनके द्वारा बडवा अभिलेखों के अनुसार शिव मंदिर बनाने की परंपरा भी इसकी पुष्टि करती है.