सेवा में,
श्रीमती सुषमा स्वराज जी,
सांसद एवं नेता प्रतिपक्ष,
नई दिल्ली
विषय : जाट समाज को पिछड़ी जाति घोषित करवाने हेतु।
महोदया,
उपर लिखित विषय के संदर्भ में कुछ तथ्य आपके समक्ष पेश करते हुए आपके समर्थन व सहयोग की आशा करते हुए, हमारा कहना है कि:
1. भारतीय संविधान की धारा 15(4) तथा 16(4) के तहत किसी भी जाति को पिछड़ा घोषित करने के लिए केवल दो ही शर्तें हैं, पहली सामाजिक पिछड़ापन और दूसरा शैक्षणिक पिछड़ापन।
2. संविधान की धारा 340 के तहत पहला पिछड़ा आयोग सन् 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में बनाया गया, जिसने अपनी रिपोर्ट 1955 में भारत सरकार को सौंपी, लेकिन किन्हीं कारणों से इस रिपोर्ट पर कभी चर्चा नहीं हुई, इसलिए इस आयोग को कभी लागू नहीं किया गया। इस रिपोर्ट में जाट समाज को शूद्र मानते हुए पिछड़ी जाति घोषित किया गया था(प्रमाण संलग्न है)।
3. दूसरा पिछड़ा आयोग भारत सरकार ने श्री बीपी मंडल की अध्यक्षता में प्रथम जनवरी, 1979 को स्थापित किया, जिसने अपनी रिपोर्ट 31 दिसंबर, 1980 को भारत सरकार को सौंपी। दस साल के अंतराल के बाद 13 अगस्त, 1990 को केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट को लागू किया। इस रिपोर्ट के आधार पर आयोग ने जाट समाज के समान सामाजिक स्तर वाली जातियां, उदाहरण के लिए अहीर, गुज्जर, सैनी, कंबोज आदि, जिनके साथ जाट समाज का सामाजिक तौर पर आपस में खाना-पीना, हुक्का-पानी तथा ब्याह-शादियों में आपस में आना-जाना आदि था, उनको पिछड़ी जाति घोषित कर दिया गया और जाट समाज को इस अधिकार से वंचित रखते हुए आयोग ने अपनी रिपोर्ट के पेज नंबर 294 पर लिखा है कि जाट समाज अपने को पिछड़ी जाति कहलाने में स्वभिमान को नीचा मानता है, इसलिए जाट समाज को पिछड़ी जाति में सम्मिलित नहीं किया गया। इससे प्रतीत होता है कि उस समय जो भी जाट समाज के लोग आयोग के सामने पेश हुए, वे इसके महत्व को नहीं जानते थे, दूसरा उस समय जाटों के पास खेती के लिए काम चलाऊ जमीन थी, जो आज 80 से 90 प्रतिशत मामलों में घटकर दो एकड़ से भी कम की जोत रह गई हैं। इसलिए वर्तमान में ग्रामीण जाट की आर्थिक हालत अत्यंत दयनीय है और उसे पिछड़ी जाति स्वीकार करना पूरी तरह न्यायोचित है।
4. मंडल आयोग ने दूसरी शर्त शैक्षणिक पिछडापन के बारे में स्पष्ट लिखा है कि राज्यों के पास जातिवाद शिक्षा के आंकड़े नहीं हैं, इसलिए उन्होंने स्पष्ट करते हुए लिखा कि जो भी जाति गांवों में रहती है, वे सभी शिक्षा में पिछड़ी हुई हैं। जहां तक जाट समाज का प्रश्न है, आजादी के 64 वर्ष बाद भी 90 प्रतिशत से भी अधिक जाट गांवों में रहते हैं और वे लगभग सभी के सभी शिक्षा में पिछड़े हैं। आठ से दस प्रतिशत ग्रामीण जाटों ने तरक्की की, वे शहर में आ गए और उनमें से अधिकतर क्रिमिलेयर होने के कारण आरक्षण के पात्र नहीं बन सकते, क्योंकि पिछड़ा वर्ग में क्रिमिलेयर को आरक्षण नहीं मिलता।
5. उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, बिहार, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश तथा आंधप्रदेश की राज्य सरकारों ने जाट समाज के साथ न्याय करते हुए उनको पिछड़ी जाति में शामिल किया। राजस्थान के जाटों को राज्य सरकार व केंद्र सरकार दोनों ने ही पिछड़ी जाति स्वीकार किया, लेकिन धौलपुर व भरतपुर जिलों को आश्चर्यजनक तरीके से इससे बाहर रखा।
6. मैडम, हम यह भी आपके संज्ञान में लाना चाहते हैं कि उपरोक्त राज्यों में से अधिकतर को भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने जाट समाज को पिछड़े वर्ग में शामिल करके उनको उनका सवैंधानिक अधिकार दिया। हम आपके संज्ञान में यह भी लाना चाहते हैं कि जाट समाज को छोड़कर बाकी देश की सभी किसान जातियां को राज्य स्तर और केंद्र स्तर पर समान रूप से पूरे देश में पिछड़ी जाति माना गया, जबकि भारत का संविधान एक है, उसी के तहत दोनों आवश्यक शर्तों के अंतर्गत सभी किसान जातियों के साथ न्याय करते हुए ग्रामीण जाट को अलग से छोड़ दिया, जो घोर अन्याय है। इससे बढ़कर जाट समाज के शादी-ब्याह अंतर्राज्यों में होते रहे हैं, लेकिन यह भी आश्चर्यजनक है कि दूसरे राज्यों में शादी होते ही उन्हीं लड़कियों को बहू बनते ही यह अधिकार छीन लिया जाता है। ऐसी बातें हमारे देश के कानून पर कलंक हैं।
इसलिए आप एक सजग विपक्षी नेता होने के कारण हम जाट समाज की तरफ से आपसे प्रार्थना करते हैं कि भारतवर्ष के ग्रामीण जाट के साथ न्याय करते हुए उसे पिछड़े वर्ग में शामिल करवाकर उसका अपना सवैंधानिक अधिकार दिलवाने की कृपा करें।
आदर सहित,
प्रार्थी
नई दिल्ली
मई 30, 2012 (भगत सिंह दलाल),
राष्ट्रीय अध्यक्ष,
अखिल भारतीय जाट आरक्षण
संघर्ष समिति