London Olympics

rang dikha diya bhai :victorious:

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या फोटो उस टेम की स जब वो न्यू ठा के उपर तें धूं पटक्या दो बे.... जिबे तो 6 पॉइंट मिले थे शेर ने.........आँख मसल मसल रोवे था कजाकिस्तान आला हारे पाछे.... आक भाई जरड़ दिया आज तो कसाई ने......... सिल्वर के घाट स... मानगे सुशिल तेंने ........ जबरदस्त मैच दिखाया भाई ......
 
Thanks a lot for pulling down the aspirations of Boxing on an International level against Wrestling. Anyway, please check your facts before posting comments i.e. wrestlers vs boxers ????

राणा गश ना खावे भाई...:triumphant::triumphant:. एक बात तो साची कह स कर्मेंदर भाई ... ये बोक्सर, खासकर विजेंदर... माचे बहुत सें, काम घाट करें सें, मीडिया के हीरो सें ये... कदे अड में आ गए... कदे पीसे ले के टीवी प्रोग्राम में.... .....टाइम तो खराब होवे इ स खिलाड़ी का इन बातां में ... एर उपर तें प्रक्टिस पे असर पड़े वो न्यारा....:sorrow:
एर ये सुशिल, योगी... जमा देसी आदमी - बस खेल में डूबे होए.... कोए फ़ालतू का मीडिया में हव्वा नहीं मचाना ..... सीले आदमी जमा :victorious:

भाई सादगी एर अनुशाशन तो यो इ स खिलाड़ी का....
 
या फोटो उस टेम की स जब वो न्यू ठा के उपर तें धूं पटक्या दो बे.... जिबे तो 6 पॉइंट मिले थे शेर ने.........आँख मसल मसल रोवे था कजाकिस्तान आला हारे पाछे.... आक भाई जरड़ दिया आज तो कसाई ने......... सिल्वर के घाट स... मानगे सुशिल तेंने ........ जबरदस्त मैच दिखाया भाई ......

Japani dimaag laa gaya bhai final mai..point banake tame pass karee gaya..tezz dimag to howai e sai japaniyaan mai ..
 
A good editorial by Shekhar Gupta (not my favorite editor though)
[h=1]मायूसी के बीच सुनहरी रेखा[/h]पदकों को छोड़ दें तो भारत के लिए ओलंपिक में रोमांच का क्षण तब आया जब 55 किलोग्राम श्रेणी के प्रीक्वार्टर फाइनल में 18 वर्ष के अमित कुमार ने विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाले ईरान के हसन सब्जाली रहीमी को पटकनी दे दी। अमित के पिता गुरु सतपाल के अखाड़े में दूध की सप्लाई करते हैं। कुछ देर बाद ही जॉर्जिया के एमबीए के छात्र ने क्वार्टर फाइनल मैच में उनसे जीत चुरा ली। इस मैच में अब तक का सबसे भयावह फैसला देखने को मिला। हममें से बहुत से लोग ये मुकाबले देखने से चूक गए, जो महज चार-छह मिनट में ही खत्म हो जाते हैं। लगता है कि अमित पर दोहरी आफत आई- एक तो खराब रेफरिंग और दूसरा गलत टाइमिंग। इस मुकाबले के दौरान मैंने तमाम न्यूज चैनल देखे। सभी लाइव कवरेज दिखा रहे थे। नहीं, वहां बाबा रामदेव का कॉमेडी शो नहीं चल रहा था, बल्कि सबसे महानतम ब्रेकिंग न्यूज जारी थी कि युवराज सिंह का टी20 क्रिकेट टीम में चयन हो गया है। आप पूछ सकते हैं कि इसमें गलत क्या है? एक गरीब किशोर दूधिये की तुलना भारत में क्रिकेट के युवराज से कैसे की जा सकती है? इस संदर्भ में एक छोटी सी जानकारी उल्लेखनीय है कि पिछले सप्ताह तक भारत टी20 में आठवें पायदान पर था, यहां तक कि बांग्लादेश से भी नीचे। जरा बीसीसीआइ का देशप्रेम तो देखिए। 2010 के एशियाड में पहली बार शामिल की गई क्रिकेट स्पर्धा में उसने टीम तक उतारना गवारा नहीं किया। क्या आप ओलंपिक फुटबॉल के प्रति ब्राजील या स्पेन में इस तरह की अवमानना देख सकते हैं? कहने का मतलब यह है कि हम विभिन्न खेल खेलने वाले भारतीयों के प्रति अलग-अलग मानदंड अपनाते हैं। आपकी टीम की रैंकिंग कुछ भी हो, एक क्रिकेट स्टार हमेशा स्टार ही रहेगा। अगर हम क्त्रिकेट खेलने वाले प्रमुख देशों, जिनकी संख्या आठ मानी जा सकती है, के ऊपरी आधे देशों में भी नहीं हैं, तब भी हम अपने क्रिकेटरों को राष्ट्रीय हीरो मानते हैं। किंतु बात जब ओलंपिक खेलों की होती है तो पदक न जीत पाने को अगर राष्ट्रीय शर्म नहीं, तो समय की बर्बादी जरूर मान लिया जाता है। इस तथ्य का विचार किए बिना कि सोनीपत के किशोर अमित जैसे अनेक खिलाड़ियों ने ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने से पहले अनेक मुकाबलों में खुद को साबित किया है, उन्होंने विभिन्न देशों के सैकड़ों पहलवानों या खिलाड़ियों से खुद को श्रेष्ठ साबित किया है। केवल ओलंपिक पदक और इससे कम कुछ नहीं, यह एक बहुत बड़ी मांग है, खासतौर पर हमारी खेल परंपरा और इतिहास को देखते हुए। हेलसिंकी में 1952 में कुश्ती में कांस्य पदक को छोड़ दें तो पांच दशक तक हमने यदाकदा हॉकी के अलावा कोई पदक नहीं जीता था। 1968 में मैक्सिको में कांस्य पदक जीतने के बाद हॉकी में भी हमारा उतार हो गया। इसके बाद 1980 में हॉकी में स्वर्ण जीता, किंतु तब अमेरिकी ब्लॉक के देशों ने ओलंपिक का बहिष्कार किया था और हमारे मुकाबले में विश्व के प्रमुख देश नहीं थे। पिछले तीन ओलंपिकों से हम कुछ न कुछ जीतते आ रहे हैं। क्या हमारे जैसे आकार वाले देश और खेलों के प्रति हमारे प्रेम को देखते हुए यह काफी है? इसका जवाब है, बिल्कुल नहीं। किंतु हम आसानी से खुश होना भी नहीं जानते। हम इस तथ्य को नहीं स्वीकारते कि किसी भी खिलाड़ी के लिए ओलंपिक श्रेष्ठता की पराकाष्ठा है। ओलंपिक में जीतने से पहले हमें बहुत सी बाधाएं पार करनी पड़ती हैं। किसी खिलाड़ी को एक-दो साल ट्रेनिंग देकर आप अचानक ओलंपिक स्तर की स्पर्धा नहीं जिता सकते। इस अफसोसजनक सप्ताह में यह कहना खतरनाक है, किंतु मैं यह कहने का साहस दिखाऊंगा कि इस बार उम्मीदें बहुत थीं। सात सदस्यीय पुरुष बॉक्सिंग टीम का खाली हाथ लौटना एक बड़ा धक्का है, किंतु दयनीय पदक तालिका के पीछे शांति से देखें तो हालात इतने बुरे नहीं हैं। असल में यह कुछ खेलों में समग्र सुधार और प्रगति की कहानी है। एथलेटिक्स सभी खेलों की मां है। पिछले एशियाई खेलों में भारत ने एथलेटिक्स में 12 मेडल, जिनमें से पांच स्वर्ण पदक थे, जीते थे। यह उपलब्धि तब रही जब भारतीय एथलेटिक्स सुरेश कलमाड़ी के नियंत्रण में थी। हमने अपने प्रदर्शन में काफी सुधार किया है। पहले एथलेटिक्स में सालों-साल हमारे राष्ट्रीय रिकॉर्ड नहीं टूटते थे। बाद में स्थिति में बदलाव आया और राष्ट्रीय रिकॉर्ड टिकाऊ नहीं रह गए। इसी प्रकार तीरंदाजी, निशानेबाजी, कुश्ती और मुक्केबाजी में देश में कम से कम 20 भारतीय हैं, जो अपनी स्पर्धाओं में खुद को विश्व के शीर्ष दस खिलाड़ियों की सूची में गिना सकते हैं। यह संतोषजनक प्रगति है। हमें ओलंपिक पदक हासिल करने से चूकने वाले खिलाड़ियों को कुचलने के बजाय उनके प्रदर्शन का सम्मान करना चाहिए। सच्चाई यह है कि इन खेलों में हम एशियाई शक्ति बन चुके हैं और शेष विश्व के साथ यह अंतर निरंतर कम होता जा रहा है। वास्तव में, अभी भी यह अंतर काफी अधिक है, किंतु वैश्विक प्रतिस्पर्धी खेलों में आप एक झटके में जीरो से हीरो नहीं बन सकते। पदक अद्भुत होते हैं, किंतु हमें चीन जैसी पदक शक्ति को देखकर खुद को शर्मिदगी के राष्ट्रीय अहसास में डुबा लेने से उबरना चाहिए। ओलंपिक खेल किसी राष्ट्र की सफलता या शक्ति का अनिवार्य रूप से सूचकांक नहीं होते। ओलंपिक में बहुत से ऐसे खेल शामिल हैं, जिन्हें अधिकांश व्यक्ति असल जीवन में न खेलते हैं और न ही देखते हैं। खेलों में पदक जीतने के लिए बचपन से ही प्रशिक्षित करना पड़ता है। ऐसे में अनुशासित और सैन्य माहौल वाले समाज हमेशा फायदे में रहते हैं। शीतयुद्ध के दौरान हम पूर्वी जर्मनी के उदय को देखकर हैरान रह गए थे। 1980 में मास्को में वह 126 पदक जीत ले गया था। आज विलय के दो दशक बाद संयुक्त जर्मनी के इसके एक-तिहाई पदक पर ही सिमटने के आसार हैं। इसी प्रकार चीन में खिलाड़ी तैयार करने की प्रक्त्रिया में बच्चों पर जो अत्याचार किए जाते हैं वे किसी लोकतांत्रिक देश में संभव नहीं हैं। निश्चित तौर पर हमने अपने लंदन दस्ते से इससे अधिक की उम्मीद की थी। हमें अपने मुक्केबाजों, पहलवानों और निशानेबाजों से कुछ और पदक जीतने की अपेक्षा थी। इस रूप में हमारा निराश होना स्वाभाविक है, किंतु पदक तालिका से परे भी बहुत कुछ महत्वपूर्ण है। भारतीय खेलों ने वास्तविक लक्ष्य निर्धारित किए हैं। भारत एशिया में चौथे नंबर पर है। दस स्वर्ण सहित कुल 25 पदकों के साथ वह कजाकिस्तान से आगे है। अगले एशियाड में विश्व के शीर्ष दस में शामिल पहलवानों, मुक्केबाजों, निशानेबाजों और तीरंदाजों के साथ भारत के पदक 50 तक पहुंचने की उम्मीद है। तभी यह सपना देख सकते हैं कि हम ओलंपिक पदक तालिका में शीर्ष 25 देशों में स्थान बनाने में सफल हुए हैं।

[लेखक शेखर गुप्ता, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक हैं] http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/opinion1_6_3_9564549.html
 
Olympics London 2012 -----The end

Next Organiser is Brazil-----

Today say the Concluding Ceremony for Olympic 2012 London------

All classic UK bands performed ----awesome feeling all at one platform-------

Small Apperance from Brazil----Pele was there as well.

So thumps up for 2016 Brazil Olympics
 
नमस्ते सुशिल की मम्मी जी :nonchalance:

हाहाहा छोरे र मम्मी बना गया ......ले एब तो देनाये पड़ेगा ........दूधो नहाऔ पुतो फलो .....!
 
Thanks a lot for pulling down the aspirations of Boxing on an International level against Wrestling. Anyway, please check your facts before posting comments i.e. wrestlers vs boxers ????

भाई राणा मन्ने कुन से international लेवल पे मुद्दा उठा दिया..मन्ने ते अपनी जाटलैंड पे लिखा से...बहार का कोई पुच्छेगा तो मैं भी न्यू कहूँगा की भाई म्हारे wrestler और boxer दोनों अच्छे हैं ..पैर यहाँ पैर तो discussion कर ही सकते हैं, भाई मन्ने ते गेम देखे दोनों के,अर्र मन्ने लाग्या की काबिलयत और तयारी wrestlers की ज्यादा अच्छी थी..मेरे लिए prove करने के लिए कोई facts नहीं हैं ,बस अपनी observation लिखी है..game analyst होता ते facts भी दे देता..पर वो अपना profession ना से..
 
भाई राणा मन्ने कुन से international लेवल पे मुद्दा उठा दिया..मन्ने ते अपनी जाटलैंड पे लिखा से...बहार का कोई पुच्छेगा तो मैं भी न्यू कहूँगा की भाई म्हारे wrestler और boxer दोनों अच्छे हैं ..पैर यहाँ पैर तो discussion कर ही सकते हैं, भाई मन्ने ते गेम देखे दोनों के,अर्र मन्ने लाग्या की काबिलयत और तयारी wrestlers की ज्यादा अच्छी थी..मेरे लिए prove करने के लिए कोई facts नहीं हैं ,बस अपनी observation लिखी है..game analyst होता ते facts भी दे देता..पर वो अपना profession ना से..

Laagey raho to fer Dr. Saab ! ;)
 
राणा गश ना खावे भाई...:triumphant::triumphant:. एक बात तो साची कह स कर्मेंदर भाई ... ये बोक्सर, खासकर विजेंदर... माचे बहुत सें, काम घाट करें सें, मीडिया के हीरो सें ये... कदे अड में आ गए... कदे पीसे ले के टीवी प्रोग्राम में.... .....टाइम तो खराब होवे इ स खिलाड़ी का इन बातां में ... एर उपर तें प्रक्टिस पे असर पड़े वो न्यारा....:sorrow:
एर ये सुशिल, योगी... जमा देसी आदमी - बस खेल में डूबे होए.... कोए फ़ालतू का मीडिया में हव्वा नहीं मचाना ..... सीले आदमी जमा :victorious:

भाई सादगी एर अनुशाशन तो यो इ स खिलाड़ी का....


A picture is worth a thousand words


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aa lliye bhai pahalwaan wapis....

[video]http://sports.ndtv.com/olympics-2012/videos/?video_id=242622[/video]

.........एब करेंगे चूरमे की इसी तीसी ... कई दिन तें थाया कोणी था London mein......!!!!
 
उनकी हाकी स्टिक खोस के कित देनी चाहिए................ समझ ते थम गए होगे......

Hockey aalya ka ke hisaab kitaab se ? aa liye ulte ak ghuspeth karni padegi un ne apne desh me ? :livid:
 
उनकी हाकी स्टिक खोस के कित देनी चाहिए................ समझ ते थम गए होगे......

Samjh Gyeee .............. Dusreee Balka T De Denii Chahiyee .....Khos K..

Anil Thoda Khol K Bata Deyaa Ker Etnee Samjhdhar Na S ...kimee or Samjh Jangeee ........
 
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Samjh Gyeee .............. Dusreee Balka T De Denii Chahiyee .....Khos K..

Anil Thoda Khol K Bata Deyaa Ker Etnee Samjhdhar Na S ...kimee or Samjh Jangeee ........

आप रहे आर सब की मदद करण ने ... के खतरा स फेर मेंने एर इनने... :)
 
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