Shayri (Part 1)

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मैंने आंसू को समझाया;
भरी महफ़िल में ना आया करो;
आंसू बोला, तुमको भरी महफ़िल में तन्हा पाते है;
इसीलिए तो चुपके से चले आते है!
 
यादों के गहरे जख्म अजीब होते हैं।
अपनों के साथ बिताये लम्हे अजीज होते हैं।
सदा ताजा रहती हैं यादें उनकी,
जो नजरों के नहीं दिल के करीब होते हैं।
 
यहाँ गरीब को मरने की जल्दी इसलिए भी है !
.....की कहीं .....
जिन्दगी की कशमकश में कफ़न महंगा ना हो जाये .....
 
तुम मुहब्बत भी मौसम की तरह निभाते हो
कभी बरसते हो तो कभी एक बूंद के लिए तरसाते हो |
 
अब तो शायद ही मुझसे मुहब्बत करे कोई
मेरी आँखों में तुम साफ़ नजर आते हो |
 
चलो आज का काम तो चल गया शराब पीकर
कल वो फिर याद आयेंगे तो देखी जाएगी

सो जाऊंगा बिना खाए पिए मुह के बल पड़कर
रात को ख्वाब सतायेंगे तो देखी जाएगी
 
ऐ सितारों तुम्हें कलियों के तबस्सुम की कसम,
ओस की बूंद पर सूरज की गवाही लेना,
खो गई है मेरे महबूब के चेहरे की चमक,
चांद निकले तो उसकी गवाही लेना|
 
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फासला रखना,

दरिया जो समंदर से मिले दरिया नहीं रहता !!
 
साकी मुझे शराब की तोहमत नहीं पसंद,

मुझे तेरी नज़र का इलज़ाम चाहिए !!
 
जागती हक़ीक़त तक रास्ता है ख़्वाबों का

दरमियां मेरे उनके फ़ासला है ख़्वाबों का
 
भीड़ में शायद कही खो गया हु लगता है
न उठूँगा कुछ इस तरह सो गया हु लगता है |
कोशिश तो बहुत की पहचान बनाने की
इच्छाए तो थी पता नहीं क्या क्या पाने की |
पर हर चाह कब किसी की पूरी होती है
हर नाकामी के पीछे एक मजबूरी होती है |
वैसे तो कभी भी हार नहीं मानता हू में
क्यूकि खुद को अच्छी तरह जनता हू में |
अपनी नाकामी पर अफ़सोस तो होता है
कभी -२ मन एकांत में चुपके से रोता है |
पर हार शाम के बाद सवेरा आता है
करके अँधेरा दूर संग रौशनी लाता है |
कह दो इन नाकामियों से डरता नहीं हू मे
दुनिया वालो की परवाह करता नहीं हू में |
कल अपनी दुनिया खुद ही बनाऊंगा में
ओर अपने ख्वाबो से फिर उसे सजाऊंगा में |
 
में ही बेवफा था ,जो निकल गया उसके दिल से ,
उस्से तो आज तक नहीं पड़ी जरुरत जाने की मेरे दिल से |------रवि "अतृप्त"
 
Last edited:
हकीकत जान लो जुदा होने से पहले,
मेरी सुन लो अपनी सुनाने से पहले,
ये सोच लेना भुलाने से पहले,
बहुत रोई है ये आँखे मुस्कुराने से ...
 
लोग हर मोड़ पे रूक-रूक के सभलते क्यूँ हैं
इतना डरते हैं, तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं

 
हुश्यारी तो देखो बातें खरी खरी करता रहा
मुझमे समाकर वो मेरी मुखबरी करता रहा

नही आता था ख्याल शक के घेरे में हूँ मैं
वो जब जब हालत मेरी दुखभरी करता रहा
 
लोग हर मोड़ पे रूक-रूक के सभलते क्यूँ हैं
इतना डरते हैं, तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं

लोगों को हर मोड़ पे जान का ख़तरा हे ,
जो गिरा हे वो मेरे ही खून का कतरा हे ||------रवि "अतृप्त"
 
जिस रोज उतरूंगा मैं बेवफाई पर
सौ गुना भारी पडूंगा उस हरजाई पर

वही शख्स मेरी मुखबरी कर रहा है
दिन रात लिखता हूँ जिसकी अंगडाई पर
 
आँखों को बादल बारिश से क्या लेना

ये गलियाँ अपने पानी से भरती हैं .....
 
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