A Humble Request - Pls don't speak in Urdu !!!!!

We Indians have this penchant for foreign/imported stuff. Something similar to 'Ghar ki murgi daal barabar'.

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Rajpal ji,

It seems the only agenda of a few members is to criticize whatever you write. Whatever you write is 'Namakool' to them.

In this thread you have nowhere mentioned that Urdu is not a good language. Your only contention and rightly so was that we should preserve our own language.

However, people (especially those who love to oppose you) have twisted your contention and interpreted it according to their convenience that Urdu is not a good language and hence, it should not be spoken.

Why cannot Hindi be just spoken as Hindi (unadulterated with any other language)?

We Indians will always be Indians. Ourselves being Indian breed, we prefer to keep pets which are foreign breed.

श्री मान राना साहब , अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करना भी तो उतना ही विदेशी है जितना उर्दू का ! नहीं ? हिंदी भाषा का समर्थन और वो भी अंग्रेजी में लिख कर ! उपदेश देना बहुत सरल कार्य है ! आप आगे से अपनी एक पोस्ट पूर्णतया हिंदी में लिख कर हम सबको एक उदारहण दे जिस से कम से कम कुछ नहीं तो एक जाटलैंड का सदस्य तो आपका अनुसरण अवश्य करेगा ! जो प्रश्न आपने पूछा है कि क्यूँ नहीं हिंदी को हिंदी की भांति बोला जा सकता ? तो महोदय आप बोलना तो छोडिये यहाँ लिखना ही शुरू कीजिये!
 
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श्री मान राना साहब , अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करना भी तो उतना ही विदेशी है जितना उर्दू का ! नहीं ? हिंदी भाषा का समर्थन और वो भी अंग्रेजी में लिख कर ! उपदेश देना बहुत सरल कार्य है ! आप आगे से अपनी एक पोस्ट पूर्णतया हिंदी में लिख कर हम सबको एक उदारहण दे जिस से कम से कम कुछ नहीं तो एक जाटलैंड का सदस्य तो आपका अनुसरण अवश्य करेगा ! जो प्रश्न आपने पूछा है कि क्यूँ हिंदी को हिंदी की भांति बोला जा सकता ? तो महोदय आप बोलना तो छोडिये यहाँ लिखना ही शुरू कीजिये!


Language is not someone's personal property neither it should be dictated. Everyone must be free to use any language they want as long as it is not abusive and conveys the person's message correctly.
 
A-Humble-Request-Pls-don-t-speak-in-Hindi

Now, what if.. People in Southern states would say.

A-Humble-Request-Pls-don-t-speak-in-Hindi

pls speak in marathi.... telugu....tamil....kannada...
 
I think majority of fellow members have expressed their opinion against the request by thread initiator.

It does not make any sense to stop using urdu words.

People have argued very well for that reason. One may have an opinion(backed by rational and logical arguments) and one may request but one cannot impose!

Therefore it would be in fitness of things to say that one must continue using as many languages as he/she wants.
 

जाटलैंड पर आप सभी महानुभावों के विचारों का पठन किया और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जिस प्रकार संस्कृत भाषा लुप्तप्राय हो गयी है ठीक उसी प्रकार हिंदी को भी काल का ग्रास होने से कोई नहीं बचा सकता।
हिंदी को सबसे अधिक हानि बोलीवुड ने पंहुचाई है, केवल नाम ही हिंदी फिल्म होता है पर ९०% शब्द उर्दू के होते हैं।


मेरे इस धागे का तात्पर्य यही है कि दूसरों की भाषा, संस्कृति एवं धर्म स्वीकार करने के लिए हम ही रह गए हैं?


हमारा भी कोई आत्मसम्मान है कि नहीं?


जापान, यूरोपियन देश एवं खाड़ी के देश ये सब अपनी-अपनी भाषा को कितना महत्व देते हैं, ये आप सबको पता ही है।


शुभ कामनाओं सहित।












 
Yah Khuda. Lahaul wilakuuat (Fun intended).

If Urdu is our own language, whose Language is Hindi? Pakistanis' or the Bangladeshis'?

If you don't care for and preserve your language, who will? Pakistanis or the Bangladeshis?????

URDU IS ONE OF OUR LANGGUAGE, HINDI is also one of our langguage, Indians have many langguages of our own,urdu originated from India by putting many words of our own langguages including brij bhasa,
 

जाटलैंड पर आप सभी महानुभावों के विचारों का पठन किया और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जिस प्रकार संस्कृत भाषा लुप्तप्राय हो गयी है ठीक उसी प्रकार हिंदी को भी काल का ग्रास होने से कोई नहीं बचा सकता।
हिंदी को सबसे अधिक हानि बोलीवुड ने पंहुचाई है, केवल नाम ही हिंदी फिल्म होता है पर ९०% शब्द उर्दू के होते हैं।


मेरे इस धागे का तात्पर्य यही है कि दूसरों की भाषा, संस्कृति एवं धर्म स्वीकार करने के लिए हम ही रह गए हैं?


हमारा भी कोई आत्मसम्मान है कि नहीं?


जापान, यूरोपियन देश एवं खाड़ी के देश ये सब अपनी-अपनी भाषा को कितना महत्व देते हैं, ये आप सबको पता ही है।


शुभ कामनाओं सहित।


राजपाल जी,

यदि इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो ये प्रतीत होता है की भाषाएं बनती हैं और लुप्त हो जाती हैं। शायद आप इस्सी धागे में कुछ भाइयों के विचारों को नकार गए। हिंदी भाषा भी खड़ी बोली और अन्य भाषाओँ से बनी है। अब आप खड़ी बोली के लुप्त होने का मातम थोड़ी ना बनायेंगे। और खड़ी बोली से पहले भी कोई बोली होगी जो लुप्त हो गयी। अर्थात समय के साथ भाषाएँ भी बदलती है। एक भाई ने बहुत अच्छा विचार रखा की भाषाएँ एक पुल का काम करती और विचारों के आदान प्रादान में सहयोग देती हैं। बदलाव कभी रुक नहीं सकता। ये प्रकृति का नियम है। तो कृपया करके इस बात पर भावुक ना होयें और सभी भाषाओँ का लुत्फ़ उठाएं।










 

जाटलैंड पर आप सभी महानुभावों के विचारों का पठन किया और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जिस प्रकार संस्कृत भाषा लुप्तप्राय हो गयी है ठीक उसी प्रकार हिंदी को भी काल का ग्रास होने से कोई नहीं बचा सकता।
हिंदी को सबसे अधिक हानि बोलीवुड ने पंहुचाई है, केवल नाम ही हिंदी फिल्म होता है पर ९०% शब्द उर्दू के होते हैं।


मेरे इस धागे का तात्पर्य यही है कि दूसरों की भाषा, संस्कृति एवं धर्म स्वीकार करने के लिए हम ही रह गए हैं?


हमारा भी कोई आत्मसम्मान है कि नहीं?


जापान, यूरोपियन देश एवं खाड़ी के देश ये सब अपनी-अपनी भाषा को कितना महत्व देते हैं, ये आप सबको पता ही है।


शुभ कामनाओं सहित।













राजपाल जी ,

एक जनमानस की भाषा होती है और एक भाषा अभिजात्य वर्ग की, जिसके अंतर्गत विद्वान, साहित्यिक लेखक , विचारक , राजशाही कार्य , प्रशासन के कार्य कलाप इतियादी आते है ! चूँकि सभी व्यक्तियों का बौधिक स्तर एक समान नहीं होता और सामान्यत सभी सरलता से प्रयोग की जाने वाली भाषा , बोली को अपनाते हैं ! संस्कृत कभी जनमानस की भाषा नहीं थी इसलिए लुप्तप्राय हो गयी !

आपने ये धागा हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए आरम्भ किया था या नहीं , ये तो आपको ही संज्ञान होगा ; किन्तु ये प्रतीत होता है की आपका भाव उर्दू को अपमानित करके एक प्रकार से हिंदी को सर्व श्रेष्ठ बताने का अवश्य था और यही भाव आपका प्रत्येक दूसरी तीसरी पोस्ट में इस्लाम और मुसलमानों के लिए होता है ! एक रेखा को छोटी करने के लिए आप केवल दूसरी रेखा को बढ़ा ही सकते हैं छोटी रेखा को काट नहीं सकते !

जहाँ तक विभिन्न देशो का प्रश्न है वो देश मुख्यत एक देश ही रहे हैं किन्तु भारत एक देश होकर भी प्रकृति जितना विविध है ! ऐसी स्थिति में कुछ न कुछ अवश्य कहीं ना कहीं से मिलाया जाएगा , बनाया जाएगा ! उपरोक्त देश सदैव से एक ही संस्कृति एवं भाषा का अनुसरण करते आये हैं इसीलिए आपको लगता है की उन्होंने कुछ भिन्न किया है !

हिंदी फिल्म सिनेमा ने हिंदी भाषा और देश को अंतररास्ट्रीय स्तर पर एक पहचान अवश्य दिलवाई है ! चूँकि आप हानि देखना चाहते हैं तो आपको हानि ही दिख रही है !

हर घटना , वस्तु एवं व्यक्ति को यदि साम्प्रदायिक ( आर एस एस , डॉ हेडगेवार इतियादी ) ऐनक से निहारेंगे तो अवश्यम्भावी है कि आपको ये पीड़ा पूर्ण आयु रहेगी ! समय बड़ा निष्ठुर है, बड़ी बड़ी सभ्यताओं , शूरवीरों , संस्कृतियों , परम्पराओ , शिक्षाओं को कभी ना वापस आने वाले स्थान पर भेज चुका है ! जो समय ने नहीं किया और जो उपलब्ध है उसी के कृतघ हो कर वर्तमान का आनंद लीजिए ! इस अस्थायी जीवन में अधिक कुछ नहीं किया जा सकता !

नोट :- यदि आपको उर्दू से इतनी घृणा ( या छदम हिंदी प्रेम ? ) है तो आप भी भविष्य में शुद्ध सात्विक हिंदी में अपनी सारी पोस्ट लिखे जिसमे उर्दू या आम बोलचाल की भाषा का कोई शब्द न हो अन्यथा आपकी ये विनती हिंदी के लिए प्रेम कम और ढकोसला अधिक लगेगी !
 
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मेरे इस धागे का तात्पर्य यही है कि दूसरों की भाषा, संस्कृति एवं धर्म स्वीकार करने के लिए हम ही रह गए हैं?


हमारा भी कोई आत्मसम्मान है कि नहीं?


जापान, यूरोपियन देश एवं खाड़ी के देश ये सब अपनी-अपनी भाषा को कितना महत्व देते हैं, ये आप सबको पता ही है।


शुभ कामनाओं सहित।













राजपाल जी,

यदि आप इन सभी भाषाओँ की प्रष्टभूमि देखें तो आप को अचरज होगा की कोई भी भाषा स्थायी नहीं रही है। अब आप जापानी भाषा को ही ले लें। वैसे तो जापान और चीन में छत्तीस का आंकड़ा है। परन्तु जापानी भाषा के शब्द चीनी भाषा से हैं। और जापानी शब्दकोष चीनी भाषा से लिए गए हैं। इसी प्रकार यूरोप की भाषाएँ भी एक दुसरे से इजाद हुई हैं।


इसी प्रकार हिंदी और उर्दू में भी काफी समानताएं है जो ये दर्शाती हैं की भारत कितनी विविधताओं का देश है। तो कृपया करके हिंदी से उर्दू ,पर्शियन,या खड़ी बोली के शब्द दूर करके हिंदी भाषा का मजा खट्टा न करें।
 
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Rajpal ji,

I would like to view this topic from another aspect which others can throw light on.

How many words has Urdu language incorporated/accommodated from Hindi?? And mind you I am not talking about Hindustani. I am talking about the Urdu as such.

It seems that only accommodation/adjustment/bridges to be built have to be at the cost of Hindi language.
 
Sriman Kadian Sahab,

As a free thinking individual I choose the forum in which I participate and the language which I use and neither am I inclined to take any diktats nor give diktats to others (including to you). Though I am not obliged to grant your wish, I promise I would use Hindi (Devanagari script) the day Jatland.com becomes a full-fledged Hindi website.

The only message that the topic of the thread puts across is that 'PRESERVE YOUR LANGUAGE (HINDI) LEST IT GOES THE SANSKRIT WAY'. Nowhere in the thread has Rajpal ji contended that urdu is not a good language or Hindi is a better language. Rajpal ji has not put a gun to anyone's head to use Hindi, the thread is only intended to be an eye-opener to the danger to the very existence of Hindi language which has been spoken over centuries. You can take it or leave it.


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श्री मान राना साहब , अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करना भी तो उतना ही विदेशी है जितना उर्दू का ! नहीं ? हिंदी भाषा का समर्थन और वो भी अंग्रेजी में लिख कर ! उपदेश देना बहुत सरल कार्य है ! आप आगे से अपनी एक पोस्ट पूर्णतया हिंदी में लिख कर हम सबको एक उदारहण दे जिस से कम से कम कुछ नहीं तो एक जाटलैंड का सदस्य तो आपका अनुसरण अवश्य करेगा ! जो प्रश्न आपने पूछा है कि क्यूँ नहीं हिंदी को हिंदी की भांति बोला जा सकता ? तो महोदय आप बोलना तो छोडिये यहाँ लिखना ही शुरू कीजिये!
 
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Sriman Kadian Sahab,

As a free thinking individual I choose the forum in which I participate and the language which I use and neither am I inclined to take any diktats nor give diktats to others (including to you). Though I am not obliged to grant your wish, I promise I would use Hindi (Devanagari script) the day Jatland.com becomes a full-fledged Hindi website.

The only message that the topic of the thread puts across is that 'PRESERVE YOUR LANGUAGE (HINDI) LEST IT GOES THE SANSKRIT WAY'. Nowhere in the thread has Rajpal ji contended that urdu is not a good language or Hindi is a better language. Rajpal ji has not put a gun to anyone's head to use Hindi, the thread is only intended to be an eye-opener to the danger to the very existence of Hindi language which has been spoken over centuries. You can take it or leave it.

राना साहेब , छोडिये आपके बस का नहीं है ! एक सामान्य बात आप अहम पर ले गए और वही हिंदी छदम प्रेम ( Read hypocrisy) की महा गाथा शुरू कर दी ! कम से कम ये पोस्ट तो आप हिंदी में लिख ही सकते थे !

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We Indians will always be Indians. Ourselves being Indian breed, we prefer to keep pets which are foreign breed.
 
Rajpal ji,

I would like to view this topic from another aspect which others can throw light on.

How many words has Urdulanguage incorporated/accommodated from Hindi?? And mind you I am not talking about Hindustani. I am talking about the Urdu as s
It seems that only accommodation/adjustment/bridges to be built have to be at the cost of Hindi language.
When two languages are exactly similar in grammar, vary only slightly in vocabulary with only difference being the script, then its irrelevant to talk about who has borrowed from whoe such a question could be asked for Hindi and Tamil which have different origins. Otherwise its a futile exercise.

Lets be clear, there's no harm in professing love for one's mother tongue or promoting it. But do so by downplaying another language and calling it foreign is unfair and pure ignorance.
 
Kadian Sahab,

I have already replied to the point raised by you in my earlier post addressed to you.

As far as the word 'hypocrisy' is concerned, it's nothing new on these forums. Words heavier than this are used against fellow members. So I will leave it at that.

राना साहेब , छोडिये आपके बस का नहीं है ! एक सामान्य बात आप अहम पर ले गए और वही हिंदी छदम प्रेम ( Read hypocrisy) की महा गाथा शुरू कर दी ! कम से कम ये पोस्ट तो आप हिंदी में लिख ही सकते थे !

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I have not seen the downplaying anywhere.

South Indian languages have their origin in Sanskrit which is also the progenitor of Hindi language.

It is highly incorrect to suggest that Hindi and urdu are EXACTLY similar. They are on two divergent planks, though lately, more so within the last century and in particular within the last few decades Hindi has incorporated heavily from Urdu thanks to the So-called Hindi movies, news and songs. The same accommodation/incorporation cannot be said for urdu language.



When two languages are exactly similar in grammar, vary only slightly in vocabulary with only difference being the scr, then its irrelevant to talk about who has borrowed from whoe such a question could be asked for Hindi and Tamil which have different origins. Otherwise its a futile exercise.

Lets be clear, there's no harm in professing love for one's mother tongue or promoting it. But do so by downplaying another language and calling it foreign is unfair and pure ignorance.
 
राना साहेब , छोडिये आपके बस का नहीं है ! एक सामान्य बात आप अहम पर ले गए और वही हिंदी छदम प्रेम ( Read hypocrisy) की महा गाथा शुरू कर दी ! कम से कम ये पोस्ट तो आप हिंदी में लिख ही सकते थे !

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हिन्दी (देवनागरी लिपि) में लिखना तो ठीक है। एक और तथ्य हमें ध्यान में रखना चाहिये कि जब किसी दूसरी भाषा के शब्द इतने ठूंस दिए जाएं (चाहे वे अपनी ही लिपि में लिख लो) तो भाषा दम तोड़ने लगती है। उसके मूल शब्द लुप्त होकर भुला दिए जाते हैं और शब्दावली से धीरे-धीरे गायब होने लगते हैं। कई बार हमे ऐसे लेख (देवनागरी - हिन्दी में) पढ़ने को मिलते हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि यह हिन्दी है या उर्दू को ही देवनागरी में लिखा जा रहा है।

यही हाल आजकल हिन्दी के समाचारपत्रों का है जिनमें बेहद अंग्रेजी शब्द ढूंसे गए होते हैं। आज हिंदी के कुछ अख़बार अपने प्रसार-क्षेत्र को बढ़ाने की उतावली में, हिंदी के खामोश हत्यारे की भूमिका में उतर पड़े हैं। विसंगति यह है कि अन्य भारतीय भाषायें, विशेषतया हिन्दी उस 'भाषायी-साम्राज्यवाद' के निशाने पर है, जो हिंदी को हटाकर 'अंग्रेज़ी को भारत की पहली भाषा' बनाने का एक विराट कुचक्र चला रहा है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि इसमें वह हिंदी के समाचारपत्रों का ही सहयोग ले रहा है।

अंग्रेज़ी के एक मनोभाषाविद ने हिंदी को हटाने की बहुत ही चालाक रणनीति सुझाई है और वह रणनीति पिछले दरवाज़े से हिंदी के अधिकांश अख़बारों में काम करने लगी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दलालों ने, समाचारपत्रों को यह स्वीकारने के लिए राज़ी कर लिया है कि इसकी `नागरी-लिपि` को बदल कर, 'रोमन' करने का अभियान छेड़ दीजिए और वे अब तन-मन और धन के साथ इस तरफ़ कूच कर रहे हैं। उन्होंने इस अभियान को अपना प्राथमिक लक्ष्य बना लिया है। क्योंकि इस देश में, बहुराष्ट्रीय-निगमों की महाविजय, सायबर युग में `रोमन-लिपि` की पीठ पर सवार होकर ही बहुत जल्दी संभव हो सकती है।

अंग्रेजों की बौद्धिक चालाकियों का बखान करते हुए एक लेखक ने लिखा था - ''अंग्रेज़ों की विशेषता ही यही होती है कि वे आपको बहुत अच्छी तरह से यह बात गले उतार सकते हैं कि आपके हित में आपका स्वयं का मरना बहुत ज़रूरी है। और, वे धीरे-धीरे आपको मौत की तरफ़ ढकेल देते हैं।'' ठीक इसी युक्ति से हिंदी के अख़बारों के पन्नों पर नई नस्ल के कुछ चिंतक, यही बता रहे हैं कि हिंदी का मरना, हिंदुस्तान के हित में बहुत ज़रूरी हो गया है। यह काम देश-सेवा समझकर जितना जल्दी हो सके करो, वर्ना, तुम्हारा देश सामाजिक-आर्थिक स्तर पर ऊपर उठ ही नहीं पाएगा। परिणाम स्वरूप, वे हिंदी को विदा कर देश को ऊपर उठाने के काम में जी-जान से जुट गए हैं।

ये मनोभाषाविद गुलाम मानसिकता के भारतीयों के मनोविज्ञान के अध्ययन के सहारे हिंदी की हत्या की अचूक युक्तियाँ भी बताते हैं, जिससे भाषा का बिना किसी हल्ला-गुल्ला किए 'सुगम संहार' किया जा सकता है ताकि भाषा का संहार होते ही, उस पर टिकी संस्कृति भी लगे हाथ निपट जाए।

वे कहते हैं कि हिंदी का हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा करने के लिए आप अपनाइए 'प्रॉसेस ऑफ कॉण्ट्रा-ग्रेज्युअलिज़म`। अर्थात्, बाहर पता ही नहीं चले कि भाषा को 'सायास` बदला जा रहा है। बल्कि, 'बोलने वालों` को लगे कि यह तो भाषा में होने वाले परिवर्तन की एक ऐतिहासिक-प्रक्रिया है, जिसके तहत, हिंदी को हिंग्लिश होना ही है। और हिंदी के अधिकांश अख़बारों की भाषा में, यह परिवर्तन उसी प्रक्रिया के तहत जानबूझकर एक षडयंत्र के तहत किया जा रहा है।

वे कहते हैं कि इसका एक ही तरीक़ा है कि आप अपने अख़बार की भाषा में, हिंदी के रोज़मर्रा के मूल शब्दों को हटाकर, उनकी जगह अंग्रेज़ी के उन शब्दों को छापना शुरू कर दो, जो 'बोलचाल की भाषा' में 'शामिल-शब्दों` की श्रेणी (शेयर्ड-वकैब्युलरि) में आते हैं। जैसे कि रेल, पोस्ट-कार्ड, मोटर, टेलिविजन, कंप्यूटर, टेलीफोन, स्कूटर, बस, कार, हेलिकॉप्टर आदि-आदि।

इसके पश्चात धीरे-धीरे आप इस 'शेयर्ड वकैब्युलरि' में रोज़-रोज़ अंग्रेज़ी के नये शब्दों को शामिल करते जाइए और उसकी तादाद बढ़ा दीजिए। जैसे माता-पिता की जगह छापिए : 'पेरेंट्स'/छात्र-छात्राओं की जगह : 'स्टूडेंट्स' /विश्वविद्यालय की जगह : 'युनिवर्सिटी'/रविवार की जगह : 'संडे'/यातायात की जगह : 'ट्रेफिक' आदि-आदि। कुल मिलाकर अंतत: उनकी तादाद इतनी बढ़ा दीजिए कि मूल-भाषा (हिंदी) के केवल कारक भर रह जाएँ। क्योंकि कुल मिलाकर रोज़मर्रा के बोलचाल में बस हज़ार-डेढ़ हज़ार शब्द ही तो होते हैं और आपको सिर्फ़ हिंदी के इतने ही शब्दों को हटाकर अंग्रेज़ी के शब्दों की शुरुआत करनी है। यदि कोई इनको लेकर आपत्ति करे तो उनकी आपत्ति छीनने का एक ही तर्क है कि श्रीमान ये तो सब रोज़मर्रा के बोलचाल के ही शब्द हैं और हिंदी को समृद्ध करना है तो इन्हें स्वीकारना ही होगा। यहाँ अंग्रेजी का उदाहरण दीजिए कि देखिए अंग्रेज़ी के शब्दों में भी हिंदी के पचास शब्द ले लिए गए हैं, तो फिर हिंदी को अंग्रेज़ी के शब्दों से क्यों ऐतराज़ होना चाहिए। इसलिये आप ये शुद्धतावादी पंडिताऊ दृष्टि बदलिए। (वास्तव में देखा जाए तो अंग्रेज़ी में हिंदी के शब्द दाल में नमक के बराबर है, जबकि ये नमक में दाल मिला रहे हैं।)

भाषा को परिवर्तित करने का यह चरण, 'प्रोसेस ऑव डिसलोकेशन' कहा जाता है। यानी की 'हिंदी के रोज़मर्रा के मूल शब्दों को धीरे-धीरे बोलचाल के जीवन से उखाड़ते जाने का काम।' ऐसा करने से इसके बाद भाषा के भीतर धीरे-धीरे 'स्नोबॉल थियरी` काम करना शुरू कर देगी-अर्थात बर्फ़ के दो गोलों को एक दूसरे के निकट रख दीजिए, कुछ देर बाद वे एक दूसरे से घुलमिलकर इतने जुड़ जाएँगे कि उनको एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं हो सकेगा। यह `सिद्धांतकी` (थियरी) भाषा में सफलता के साथ काम करेगी और अंग्रेज़ी के शब्द, हिंदी से इस क़दर जुड़ जाएँगे कि उनको अलग करना मुश्किल होगा।

इसके पश्चात शब्दों के बजाय पूरे के पूरे अंग्रेज़ी के वाक्यांश छापना शुरू कर दीजिए। अर्थात 'इनक्रीज़ द चंक ऑफ इंग्लिश फ्रेज़ेज़'। मसलन 'आऊट ऑफ रीच/बियाण्ड डाउट/नन अदर देन/एज एण्ड व्हेन रिक्वायर्ड`/ आदि आदि। कुछ समय के बाद लोग हिंदी के उन शब्दों को बोलना ही भूल जाएँगे। उदाहरण के लिए हिंदी में गिनती स्कूल में बंद किए जाने से हुआ यह है कि यदि आप बच्चे को कहें कि अड़सठ रुपये दे दो, तो वह अड़सठ का अर्थ ही नहीं समझ पाएगा, जब तक कि उसे अंग्रेज़ी में 'सिक्सटी एट' नहीं कहा जाएगा। इस रणनीति के तहत बनते भाषा रूप का उदाहरण हिंदी के एक अख़बार से उठाकर दे रहा हूँ -

'युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को स्टूडेंट्स ने अपने पेरेंट्स के साथ राइटिंग में कम्प्लेंट की है कि मार्कशीट्स के डिले होने से उनके दूसरे इन्स्टीट्यूट्स में एडमिशंस में चांसेस निकाले जाएँगे।'

इस तरह की भाषा को लगातार पाँच-दस वर्ष तक प्रिंट-माध्यम से पढ़ते रहने के बाद जो नई पीढ़ी इस क़िस्म के अख़बार पठन-पाठन के कारण बनेगी, उसकी यह स्थिति होगी कि उसे कहा जाय कि वह हिंदी में बोले तो वह गूँगा हो जाएगा। उनकी इस युक्ति को वे कहते हैं 'इल्यूज़न ऑफ स्मूथ ट्रांजिशन'। अर्थात हिंदी की जगह अंग्रेज़ी को निर्विघ्न ढंग से स्थापित करने का सफल छद्म।

हिंदी को इसी तरीक़े से हिंदी के अख़बारों में 'हिंग्लिश` बनाया जा रहा है। समझ के अभाव में अधिकांश हिंदी भाषी लोग और विद्वान भी लोग इस सारे सुनियोजित एजेंडे को भाषा के 'परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रिया' ही मानने लगे हैं और हिंदी में इस तरह की व्याख्या किए जाने का काम होने लगा है। लोग बाक़ायदा अपनी गर्वीली मुद्रा में वे बताते हैं जैसे कि वे अपनी एक गहरी सार्वभौम-प्रज्ञा के सहारे ही वे इस सचाई को सामने रख रहे हों कि हिंदी को हिंग्लिश बनना अनिवार्य है।

एक भली-चंगी भाषा से, उसके रोज़मर्रा के साँस लेते शब्दों को हटाने और उसके व्याकरण को छीन कर उसे 'बोली' में बदल दिए जाने की 'क्रियोल' कहते हैं। अर्थात हिंदी को 'हिंग्लिश' बनाना, एक तरह का उसका चुपचाप किया जा रहा 'क्रियोलीकरण' है। और 'कांट्रा-ग्रेजुअलिज्म' के हथकंडों से बाद में उसे 'डि-क्रियोल' किया जाएगा। अर्थात विस्थापित करने वाली भाषा (अंग्रेज़ी) को मूल भाषा (हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं) की जगह आरोपित करना।

भाषा की हत्या के एक योजनाकार ने अगले और अंतिम चरण को कहा है कि अब इसके बाद आता है 'फायनल असाल्ट ऑन हिंदी'। बनाम हिंदी को अखब़ार में 'नागरी-लिपि' के बजाय 'रोमन-लिपि' में छापने की शुरुआत करना। अर्थात हिंदी पर 'अंतिम प्राणघातक प्रहार'। बस हिंदी की हो गई अंत्येष्टि। चूँकि हिंदी को रोमन में लिख-पढ़कर बड़ी होने वाली पीढ़ी में देवनागरी में लिखी हिंदी और छपी पुस्तकें नितांत अपठनीय हो जाएगी। इसे ही कहते हैं 'भाषा को बोली' में बदलना बनाम उसका 'क्रियोलीकरण करना'। अर्थात किसी भाषा से उसके व्याकरण और रोज़मर्रा की शब्दावली को छीन लिया जाना। और बाद में इसके 'रोमन` में छापकर, उसे 'डि-क्रियोल' करना। या उसे उसकी मूल लिपि बदलकर रोमन में छापना। अब यह काम भारत में होने लगा है, जिसकी शुरुआत कोकणी को रोमनलिपि में लिखे जाने के निर्णय से शुरू हो चुका है। इसी युक्ति से गुयाना में, जहाँ 43 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते थे, वहाँ हिंदी को इसी तरह से 'डि-क्रियोल' कर दिया गया और अब वहाँ देवनागरी की जगह रोमन-लिपि को चला दिया गया है, जिसके कारण हिंदी की सैकड़ों किताबें नितांत अपठनीय होने जा रही है। यही काम त्रिनिदाद में इसी षड्यंत्र के ज़रिए किया गया है।

यदि ताजमहल या लाल किले जैसी राष्ट्रीय धरोहर की एक भी ईंट या दीवार तोड़ने पर अपराध कायम होता है, तो भाषाएँ भी इस राष्ट्र की धरोहर है और उन्हें नष्ट करना भी अपराध की ही श्रेणी में आता है। आप एक 'राष्ट्रीय-अपराध' कर रहे हैं और निवेदन है कि आप इसे अविलंब रोकिए। अपनी मातृभाषा की रक्षा के लिए इतनी हिम्मत तो जुटायें।


 
Last edited:
देशवाल जी,

हिंदी से पहले खड़ी बोली होती थी लेकिन हममे उसके लुप्त होने का कोई गम नहीं, लेकिन हिंदी के लुप्त होने के गम बड़ा सता रहा है।

आज का युवा, जब हरयाणा से दिल्ली जाता है और अपनी हरयाणवी में बात करता है तो लोग उससे गवार , फूहड़ की उपमा दे देते हैं।

कमाल की बात तो ये है के हरयाणवी की तो हरयाणा के शहरों में इज्जत नहीं है। माँ बाप तो अपने बच्चों को हिंदी या फिर अंग्रेजी सिखने की शिक्षा देते हैं।

जाटलैंड पे तो एक भाई बिचारा हिंदी लिखते हुए शर्मा रहा है और सलाह बड़ी बड़ी दे रहा लोगों को के हिंदी बचाओ, फलां करो धकड़ करो।

अब आप ही बताओ इस हिंदी ने तो अपनी शेत्रिय भाषा को लुप्त कर दिया है। अब हम हिंदी को बचाए या फिर खड़ी बोली को।
 
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Vicky,

I do not expect more from fellow members like you when they get personal. Samar had requested me to use Devanagari script to which I have already replied suitably, though I was not required to give any justification to anyone.

I would not like to listen from you or anybody as to what I speak or write in the same manner I would not like to impose anything on you or others. It's solely my discretion. So, you would be better advised to remain focussed on the topic of the discussion in case you have anything worthwhile to contribute on the topic which I really doubt considering your personal comments. I am not holding a gun to your head to speak Hindi. You may take it or leave it.

You are free to speak urdu, Farsee or whichever language you prefer by all means.

देशवाल जी,

हिंदी से पहले खड़ी बोली होती थी लेकिन हममे उसके लुप्त होने का कोई गम नहीं, लेकिन हिंदी के लुप्त होने के गम बड़ा सता रहा है।

आज का युवा, जब हरयाणा से दिल्ली जाता है और अपनी हरयाणवी में बात करता है तो लोग उससे गवार , फूहड़ की उपमा दे देते हैं।

कमाल की बात तो ये है के हरयाणवी की तो हरयाणा के शहरों में इज्जत नहीं है। माँ बाप तो अपने बच्चों को हिंदी या फिर अंग्रेजी सिखने की शिक्षा देते हैं।

जाटलैंड पे तो एक भाई बिचारा हिंदी लिखते हुए शर्मा रहा है और सलाह बड़ी बड़ी दे रहा लोगों को के हिंदी बचाओ, फलां करो धकड़ करो।

अब आप ही बताओ इस हिंदी ने तो अपनी शेत्रिय भाषा को लुप्त कर दिया है। अब हम हिंदी को बचाए या फिर खड़ी बोली को।
 
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