Shayri (Continued)

क्या उस से छुपाऊँ कि नहीं गैर भी इतना,
क्या उसको बताऊँ, मेरा अपना भी तो नहीं वो |
 
जुदा हुए हैं बहुत लोग, एक तुम भी सही,
अब इतनी बात पे क्या जिंदगी बर्बाद करें |
 
कोई पागल, कोई शायर, कोई बेपीर बन जाए |
जो भी देखे तेरी सूरत वो खुद तस्वीर बन जाए ||
 
ज़िंदगी का लमहा लमहा करना इस तरह बसर...
तू चला जाए पर तेरी कमी बाकी रहे.
 
वो आये हैं बड़ी मुद्दत के बाद, चौहदवीं का चाँद बन कर
घटा सी जुल्फें बिखराए चेहरे पर, सावन की आग बनकर I

ये आँखों की स्याही, ये होंठों की लाली ये दुल्हन ज्यों शर्माना,
ये मंद मंद मुश्कान, ये अदा की शोखी कह रही हैं कोई फ़साना I

आते थे वो कभी महफ़िल में हर रोज़ मगर ये मशरूफियत का दौर है
कोई दौर था जो देते थे वो दोस्तों को तवज्जो अब मगर बात कुछ और है

रहतें हैं ख़वाबगाह में हर दम, भुला दिया फेसबुक को ज़ालिम नशेमन ने,
कह गए अलविदा इस गुलशन को,, फूल हैं अब वो किसी और के चमन के I

----by Vijya Pal Singh.

शुक्रिया रविंदरजीत भाई मेरी ये ऊट-पटांग लाइऩे यहाँ छापने के लिए जो मैंने फेसबुक पर किसी की टाइम लाइन पर यों ही लिख डाली थी I पर भाई हैं original I
 
किसी के दिल का दर्द किसने देखा है;
देखा है, तो सिर्फ चेहरा देखा है;
दर्द तो तन्हाई मे होता है;
लेकिन तन्हाइयो मे लोगों ने हमे हँसते हुए देखा है!....
 
थोड़ी मस्ती थोड़ा सा ईमान बचा पाया हूँ।
ये क्या कम है मैं अपनी पहचान बचा पाया हूँ।
कुछ उम्मीदें, कुछ सपने, कुछ महकी-महकी यादें,
जीने का मैं इतना ही सामान बचा पाया हूँ .
 
रगों में दौड़ने फिरने के हम नहीं कायल |
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है ||
 
जब कभी धूप की शिद्दत ने सताया मुझको
याद आया बहुत एक पेड़ का साया मुझको

अब भी रौशन है तेरी याद से घर के कमरे
रोशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको

मेरी ख़्वाहिश थी कि मैं रौशनी बाँटूँ सबको
ज़िन्दगी तूने बहुत जल्द बुझाया मुझको

चाहने वालों ने कोशिश तो बहुत की लेकिन
खो गया मैं तो कोई ढूँढ न पाया मुझको

सख़्त हैरत में पड़ी मौत ये जुमला सुनकर
आ, अदा करना है साँसोंका किराया मुझको

शुक्रिया तेरा अदा करता हूँ जाते-जाते
ज़िन्दगी तूने बहुत रोज़ बचाया मुझको
 
उसकी ना थी खता, हम ही कुछ गलत समझ बैठे,
वो प्यार से बात करते थे, हम प्यार ही समझ बैठे.
 
हम तो दुश्मन को भी पाकीज़ा सजा देते हैं !
हाथ नहीं उठाते , नज़रों से गिरा देते हैं ||
 
हसीन था इस कदर, कि महसूस न हुआ
कैसे, कहाँ और कब मेरा बचपन चला गया ||

 
तुम्हारी हिचकियाँ बयाँ कर रही हैं हाजिरी मेरी,
बस इतना तो बता दो, कब हम जुबाँ पे होंगे ||
 
इस दुनिया से चले जाने के बाद हम तुम्हे ,
हर एक तारे में नज़र आया करेंगे |
तुम हर पल कोई दुआ मांग लेना ,
और हम हर बार टूट जाया करेंगे |
 
कामयाबी v/s नाकामी
वो कामयाबी ही क्या जो अपनों को ही भुला दे ..
और वो नाकामी ही क्या जो सारी उम्र के लिए रुला दे ....
 
उसकी ना थी खता, हम ही कुछ गलत समझ बैठे,
वो प्यार से बात करते थे, हम प्यार ही समझ बैठे.

गम ना कर ए दिल, मुगालते अक्सर हो जाया करते हैं,
देख अमानत गैरों की भी हम ख्यालों में खो जाया करते हैं i

दीदारे-ए -हुश्न गुनाह नहीं गर नज़र-ए-आशिक में नहीं कोई खोट
दीवाना है खूबसूरती का हर कोई, हर किसी ने खाई है सीने में चोट

है जब तक जिश्म में जुम्बिश ओ सीने में दम चलेंगे तीरे-नज़र यूंही ,
चाहता हुश्न भी यही है, नज़र भर के देखे हमें ये मगर लाजमी नहीं

इश्क की ना उम्र होती है ना होता इंसानी हसरतों का कोई किनारा
सूनी है महफ़िल ज़िंदगी की गर ना मिले किसी माहज़बीं का इशारा
 
मेरे लफ्जों से ना कर मेरे किरदार का फ़ैसला
तेरा वजूद मिट जाएगा मेरी हकीकत ढूँढते ढूँढते....
 
मेरी सारी ज़िन्दगी मुझे ऐसी लगती है
जैसे मैंने तुम्हे एक ख़त लिखा हो। ...( अमृता प्रीतम)
 
Last edited:
गम ना कर ए दिल, मुगालते अक्सर हो जाया करते हैं,
देख अमानत गैरों की भी हम ख्यालों में खो जाया करते हैं i

दीदारे-ए -हुश्न गुनाह नहीं गर नज़र-ए-आशिक में नहीं कोई खोट
दीवाना है खूबसूरती का हर कोई, हर किसी ने खाई है सीने में चोट

है जब तक जिश्म में जुम्बिश ओ सीने में दम चलेंगे तीरे-नज़र यूंही ,
चाहता हुश्न भी यही है, नज़र भर के देखे हमें ये मगर लाजमी नहीं

इश्क की ना उम्र होती है ना होता इंसानी हसरतों का कोई किनारा
सूनी है महफ़िल ज़िंदगी की गर ना मिले किसी माहज़बीं का इशारा


रूह तक नीलाम हो जाती है बाज़ार-ऐ-इश्क मे
इतना आसाँ नहीं होता किसी को अपना बना लेना
 
आबिद आलमी की एक गजल.....................

अजनबी समझा मुझे उसने कहा अच्छा बहुत

मेरे काम आया मेरा बिगड़ा हुआ हुलिया बहुत

उसको अपने घर की दीवारें निगल कर सो गईं

उसका पहरेदार उसके दर पे गो जागा बहुत

पहले हिचकोले में ही बस गर्क -ए -दरिया हो गया

नाखुदा साहिल पे तो हुशियार लगता था बहुत

इसकी बुनियादें हैं इन्सा के लहू पर , देखना

ये मकां अब आदमी का खून मांगेगा बहुत

शहर में हर आते जाते शख्स से रस्ता न पूछ

अजनबी लोगों के लुटने का है यां खदशा बहुत

आलमों को नापने की धुन मेरे काम आ गई

रास्तों पर दूरियों का वरना गलबा था बहुत

शहर में जो इक मकां है सब मकानों से बुलन्द

जलजला आने पे निकलेगा वही बोदा बहुत

मेरा दिल रखने को खुलकर मुस्कराए वो , मगर

घर के इक गोशे में तन्हा बैठकर रोया बहुत

आलमी मण्डी में हम तोले गए मिट्टी के भाव

हम तो सोना हैं , हमें ये बहम रहता था बहुत

एक -इक दिल में हजारों आरजुएं दफन हैं

जिन्दा रहने को है गोया आदमी मरता बहुत

उसने अपनी चारदीवारी को ऊँचा कर लिया

मेरा घर उसकी निगाहों में खटकता था बहुत

टीला टीला रास्ते में दिल की कैफियत न पूछ

दो कदम है या तो मंजिल , या है फिर रस्ता बहुत

बंद कमरों में नगर के रत दिन कटने लगे

यूं भी आबिद ये खुली राहों से कटता था बहुत
 
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