वो आये हैं बड़ी मुद्दत के बाद, चौहदवीं का चाँद बन कर
घटा सी जुल्फें बिखराए चेहरे पर, सावन की आग बनकर I
ये आँखों की स्याही, ये होंठों की लाली ये दुल्हन ज्यों शर्माना,
ये मंद मंद मुश्कान, ये अदा की शोखी कह रही हैं कोई फ़साना I
आते थे वो कभी महफ़िल में हर रोज़ मगर ये मशरूफियत का दौर है
कोई दौर था जो देते थे वो दोस्तों को तवज्जो अब मगर बात कुछ और है
रहतें हैं ख़वाबगाह में हर दम, भुला दिया फेसबुक को ज़ालिम नशेमन ने,
कह गए अलविदा इस गुलशन को,, फूल हैं अब वो किसी और के चमन के I
----by Vijya Pal Singh.
उसकी ना थी खता, हम ही कुछ गलत समझ बैठे,
वो प्यार से बात करते थे, हम प्यार ही समझ बैठे.
गम ना कर ए दिल, मुगालते अक्सर हो जाया करते हैं,
देख अमानत गैरों की भी हम ख्यालों में खो जाया करते हैं i
दीदारे-ए -हुश्न गुनाह नहीं गर नज़र-ए-आशिक में नहीं कोई खोट
दीवाना है खूबसूरती का हर कोई, हर किसी ने खाई है सीने में चोट
है जब तक जिश्म में जुम्बिश ओ सीने में दम चलेंगे तीरे-नज़र यूंही ,
चाहता हुश्न भी यही है, नज़र भर के देखे हमें ये मगर लाजमी नहीं
इश्क की ना उम्र होती है ना होता इंसानी हसरतों का कोई किनारा
सूनी है महफ़िल ज़िंदगी की गर ना मिले किसी माहज़बीं का इशारा
We use essential cookies to make this site work, and optional cookies to enhance your experience.