phoolkumar
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सुभाष बत्रा जैसे राजनीतीज्ञ को यह शोभा नह&
सुभाष बत्रा जैसे राजनीतीज्ञ को यह शोभा नहीं देता:
गत पांच जुलाई को दिल्ली में हुई जाट महासभा के सम्मेलन में हरियाणा के मुख्यमंत्री के सिरकत करने से सुभाष बत्रा जी क्यों बोखलाए हुए हैं, समझ से परे की बात है| बत्रा जी कहते हैं कि मुख्यमंत्री को ऐसे सम्मेलन में नहीं जाना चाहिए था जो कि जातिगत हो और उस सम्मेलन के मंच से उस जाति के हित की बात नहीं करनी चाहिए, तो मैं बत्रा जी से यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि आप की यह बोखलाहट उस वक्त कहाँ गई थी:
1) जब हर एक पंजाबी सम्मेलन में मुख्यमंत्री को बुलाया जाता था और उनके आगे मांग रखी जाती थी कि पंजाबी भाषा को हरियाणा में द्वितीय श्रेणी की भाषा का दर्जा मिलना चाहिए और पंजाबी को एक विषय के रूप में पढाया जाना चाहिए और मुख्यमंत्री ने 2009 में इसका संज्ञान लेते हुए ना सिर्फ पंजाबी को एक ऐसे प्रदेश जहां कि पंजाबी तीसरे नम्बर की भाषा है उसको दूसरी राजकीय भाषा घोषित कर दिया? क्या बत्रा जी याद दिलाएंगे कि किस हरियाणवी बोलने वाले ने इसका विरोध किया था? तब तो बत्रा जी आपने भी ये नहीं कहा कि अकेली पंजाबी ही क्यों हरियाणवी को भी हरियाणा की राजकीय भाषाओँ में शामिल किया जाए? क्यों बत्रा जी जवाब देना चाहेंगे?
2) जब मुख्यमंत्री को हर पंजाबी सम्मेलन में बुला कर पंजाबी समाज के भिन्न-भिन्न कार्यों की लम्बी फह्रिश्तें थमाई जाती रही हैं और मुख्यमंत्री लगभग हर कार्य को मंजूरी देते रहे हैं? तब कहाँ रहे हैं आप बत्रा जी, तब तो आपने कभी नहीं कहा कि मुख्यमंत्री को ऐसे किसी जाति विशेष के कार्यों का समर्थन नहीं करना चाहिए?
3) हरियाणा राज्य में जाटों के आरक्षण के साथ-साथ आपके समुदाय का भी मुख्यमंत्री ने ध्यान रखा? तब कहाँ थे आप? तब तो आप नहीं बोले? जिस आधुनिक समाज होने का दम्भ आप हर वक्त भरते रहते हैं उस वक्त कहाँ गया था आपका यह तर्क जब जाटों के साथ-साथ, वो भी बिना कोई संघर्ष किये चुपचाप पंजाबी समाज को भी आरक्षण मिला? तब क्यों नहीं कहा आपने कि हमें भी पहले जाटों कि तरह सड़कों पर धक्के खाने दो, जाटों कि तरह हमारे समाज के भी 2-4 युवकों को पुलिस कि गोलियां खाने दो और फिर हमें आरक्षण देना? जनाब पकी-पकाई खाते हैं और फिर भी चैन नहीं?
4) पिछली 2 योजनाओं से केंद्र में एक पंजाबी ही प्रधानमंत्री है और हरियाणा से 10 में से 9 सीटें कोंग्रेस के खाते में हैं जिनमें कि मनमोहन सिंह को जाटों का खुला समर्थन सर्वविदित है वर्ना जाट हरियाणा की हर लोकसभा सीट पर किसी भी पार्टी का समीकरण बिगाड़ने का सामर्थ्य रखते हैं? और बावजूद इसके मनमोहन सिंह के 9 साल के राज में हरियाणा (हरियाणा तो क्या पूरे देश के जाट भी ले लो) से एक भी जाट अगर केंद्र में केबिनेट मंत्री बनाया हो और वो मनमोहन सिंह सरकार की एक भी योजना पूरी कर पाया हो; जबकि जाट देश की कुल जनसँख्या का 9% के करीब हैं और पंजाबी 2% के| और पिछले 9 साल में ऐसी कोई योजना नहीं रही जिसमें मनमोहन सिंह ने कम से कम 3 केबिनेट स्तर के पंजाबी मंत्री अपनी सरकार में ना रखे हों? क्यों बत्रा जी, इसपे तो आपको कभी बोलते नहीं सुना?
5) दिल्ली की विधानसभा में भी पंजाबी बनाम जाट मंत्रियों का आंकड़ा उठा के देखिये जरा और फिर बताइए कि किसी भी जाट (शायद सिवाई मेरे) ने कभी इस बात के लिए बोखलाहट दिखाई हो कि एक पंजाबी सिर्फ पंजाबी को ही आगे बढ़ा रहा है?
6) हरियाणा की जनसंख्या का 4% के करीब होते हुए भी a और b श्रेणी की लगभग 35 प्रतिशत नौकरियां आपके समाज के पास हैं और फिर भी आपको चैन नहीं? 35% तो जाट भी नहीं हरियाणा की कुल जनसँख्या का|
और इसके बावजूद भी हुड्डा साहब नें तो आपके समुदाय तो क्या बल्कि हर समुदाय का बराबर का ख्याल रखा है, फिर चाहे वो हरियाणा विधान सभा में मंत्री बनाने का हो या सामाजिक स्तर पर कार्य करने का? जितना जाटों ने आपके लिए किया है उसका कभी 10% भी लौटा सकें तो आपका शुक्र-गुजर होऊंगा| इस रव्वये से आप समाज में कटुता भरने के अलावा कुछ हासिल नहीं करेंगे|
सुभाष बत्रा जैसे राजनीतीज्ञ को यह शोभा नहीं देता:
गत पांच जुलाई को दिल्ली में हुई जाट महासभा के सम्मेलन में हरियाणा के मुख्यमंत्री के सिरकत करने से सुभाष बत्रा जी क्यों बोखलाए हुए हैं, समझ से परे की बात है| बत्रा जी कहते हैं कि मुख्यमंत्री को ऐसे सम्मेलन में नहीं जाना चाहिए था जो कि जातिगत हो और उस सम्मेलन के मंच से उस जाति के हित की बात नहीं करनी चाहिए, तो मैं बत्रा जी से यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि आप की यह बोखलाहट उस वक्त कहाँ गई थी:
1) जब हर एक पंजाबी सम्मेलन में मुख्यमंत्री को बुलाया जाता था और उनके आगे मांग रखी जाती थी कि पंजाबी भाषा को हरियाणा में द्वितीय श्रेणी की भाषा का दर्जा मिलना चाहिए और पंजाबी को एक विषय के रूप में पढाया जाना चाहिए और मुख्यमंत्री ने 2009 में इसका संज्ञान लेते हुए ना सिर्फ पंजाबी को एक ऐसे प्रदेश जहां कि पंजाबी तीसरे नम्बर की भाषा है उसको दूसरी राजकीय भाषा घोषित कर दिया? क्या बत्रा जी याद दिलाएंगे कि किस हरियाणवी बोलने वाले ने इसका विरोध किया था? तब तो बत्रा जी आपने भी ये नहीं कहा कि अकेली पंजाबी ही क्यों हरियाणवी को भी हरियाणा की राजकीय भाषाओँ में शामिल किया जाए? क्यों बत्रा जी जवाब देना चाहेंगे?
2) जब मुख्यमंत्री को हर पंजाबी सम्मेलन में बुला कर पंजाबी समाज के भिन्न-भिन्न कार्यों की लम्बी फह्रिश्तें थमाई जाती रही हैं और मुख्यमंत्री लगभग हर कार्य को मंजूरी देते रहे हैं? तब कहाँ रहे हैं आप बत्रा जी, तब तो आपने कभी नहीं कहा कि मुख्यमंत्री को ऐसे किसी जाति विशेष के कार्यों का समर्थन नहीं करना चाहिए?
3) हरियाणा राज्य में जाटों के आरक्षण के साथ-साथ आपके समुदाय का भी मुख्यमंत्री ने ध्यान रखा? तब कहाँ थे आप? तब तो आप नहीं बोले? जिस आधुनिक समाज होने का दम्भ आप हर वक्त भरते रहते हैं उस वक्त कहाँ गया था आपका यह तर्क जब जाटों के साथ-साथ, वो भी बिना कोई संघर्ष किये चुपचाप पंजाबी समाज को भी आरक्षण मिला? तब क्यों नहीं कहा आपने कि हमें भी पहले जाटों कि तरह सड़कों पर धक्के खाने दो, जाटों कि तरह हमारे समाज के भी 2-4 युवकों को पुलिस कि गोलियां खाने दो और फिर हमें आरक्षण देना? जनाब पकी-पकाई खाते हैं और फिर भी चैन नहीं?
4) पिछली 2 योजनाओं से केंद्र में एक पंजाबी ही प्रधानमंत्री है और हरियाणा से 10 में से 9 सीटें कोंग्रेस के खाते में हैं जिनमें कि मनमोहन सिंह को जाटों का खुला समर्थन सर्वविदित है वर्ना जाट हरियाणा की हर लोकसभा सीट पर किसी भी पार्टी का समीकरण बिगाड़ने का सामर्थ्य रखते हैं? और बावजूद इसके मनमोहन सिंह के 9 साल के राज में हरियाणा (हरियाणा तो क्या पूरे देश के जाट भी ले लो) से एक भी जाट अगर केंद्र में केबिनेट मंत्री बनाया हो और वो मनमोहन सिंह सरकार की एक भी योजना पूरी कर पाया हो; जबकि जाट देश की कुल जनसँख्या का 9% के करीब हैं और पंजाबी 2% के| और पिछले 9 साल में ऐसी कोई योजना नहीं रही जिसमें मनमोहन सिंह ने कम से कम 3 केबिनेट स्तर के पंजाबी मंत्री अपनी सरकार में ना रखे हों? क्यों बत्रा जी, इसपे तो आपको कभी बोलते नहीं सुना?
5) दिल्ली की विधानसभा में भी पंजाबी बनाम जाट मंत्रियों का आंकड़ा उठा के देखिये जरा और फिर बताइए कि किसी भी जाट (शायद सिवाई मेरे) ने कभी इस बात के लिए बोखलाहट दिखाई हो कि एक पंजाबी सिर्फ पंजाबी को ही आगे बढ़ा रहा है?
6) हरियाणा की जनसंख्या का 4% के करीब होते हुए भी a और b श्रेणी की लगभग 35 प्रतिशत नौकरियां आपके समाज के पास हैं और फिर भी आपको चैन नहीं? 35% तो जाट भी नहीं हरियाणा की कुल जनसँख्या का|
और इसके बावजूद भी हुड्डा साहब नें तो आपके समुदाय तो क्या बल्कि हर समुदाय का बराबर का ख्याल रखा है, फिर चाहे वो हरियाणा विधान सभा में मंत्री बनाने का हो या सामाजिक स्तर पर कार्य करने का? जितना जाटों ने आपके लिए किया है उसका कभी 10% भी लौटा सकें तो आपका शुक्र-गुजर होऊंगा| इस रव्वये से आप समाज में कटुता भरने के अलावा कुछ हासिल नहीं करेंगे|