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66 साल पहले आजादी के वक्त देश पर कोई विदेशी कर्ज नहीं था, 27 दिसम्बर 1947 को भारत के वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का सदस्य बनने के बाद यह सिलसिला टूटने जा रहा था। इन दोनों संस्थाओं में सदस्य देश सहयोग राशि जमा करते रहे और फिर जरूरत पड़ने पर कर्ज भी लेते रहे। भारत भी इस दौड़ में शामिल हो चुका था, 1947 से 1952 तक दोनों संस्थाओं में इसने अरबों डॉलर सहयोग राशि जमा की। 1952 में ही पंचवर्षीय योजना के कार्यान्वयन के लिए भारत को कर्जे की जरूरत पड़ी। अरबों रुपये अंशदान के रूप में डकार चुके इन दोनों संस्थाओं ने नेहरु के सामने भारत को कर्ज देने के एवज में रुपए के अवमूल्यन करने की शर्त रखी। भारत ने अपने रुपए की कीमत, जो उस समय अमेरिका के डॉलर के बराबर हुआ करता था, उसे गिरा दिया फिर लगभग सभी पंचवर्षीय योजनाओं के समय भारत ने कर्ज लिया और शर्त स्वरूप रुपए की कीमत कम होती रही।
1948 से 1966 के बीच 4.79 रुपए प्रति डॉलर हो गई, चीन के साथ 1962 में और पाकिस्तान के साथ 1965 में हुए युद्धों के भार से भारत का बजट घाटा बढ़ने आर्थिक संकट गहराने लगा। इससे बाध्य होकर एक बार फिर रुपए का अवमूल्यन किया और डॉलर की कीमत 7.57 रुपए तय की गई। रुपये का संबंध 1971 में ब्रिटिश मुद्रा से खत्म कर दिया गया और उसे सीधे तौर पर अमेरिकी मुद्रा से जोड़ दिया गया। भारतीय रुपए की कीमत 1975 में तीन मुद्राओं- अमेरिकी डॉलर, जापानी येन और जर्मन मार्क के साथ संयुक्त कर दी गई। उस समय एक डॉलर की कीमत 8.39 रुपये थी।
भारत के सामने 1991 में भुगतान संतुलन का एक गंभीर संकट पैदा हो गया और वह अपनी मुद्रा में तीव्र गिरावट के लिए बाध्य हुआ। देश उस समय महंगाई, कम वृद्धि दर और विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा तीन हफ्तों के आयात के लिए भी पर्याप्त नहीं थी। इन परिस्थितियों से उबरने के लिए सरकार ने एक बार फिर रुपये का अवमूल्यन करके कीमत 17.90 रुपए प्रति डॉलर तय की गई।
यह वही दौर था जब वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण जैसे जुमले दुनिया भर में अपना पैर पसार रहे थे। वास्तव में ये शब्द वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी वैश्विक संस्थाओं के गढे़ हुए हैं, भारत भी इन जुमलों से अछूता न रह सका। सन् 1991 में उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण की आवाज भारत की फिजाओं में गूंजने लगी। तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह जिसको हम इन संस्थाओ का एजेंट भी कह सकते है इसका अगुआ बना। वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के जाल में भारत उलझने लगा। बाद में आयात शुल्क खत्म कर दिया गया और हमारे स्टॉक एक्सचेंज के दरवाजे भी विदेशी निवेश के लिये खोल दिए गए। विदेशी निवेश की यहां बाढ़ सी आने लगी और हमारा स्टॉक मार्केट, घरेलू बाजार की तरह धीरे-धीरे विदेशियों के कब्जे में जाने लगा। चारों तरफ विदेशी शराब, विदेशी बैंक, विदेशी ठंडा और विदेशी मॉल नजर आने लगे। विडंबना यह है कि इसी को हम विकास मान रहे थे। जबकि भीतर से लगातार बिगड़ती हालत के बारे में किसी को ख्याल नहीं आया।
वर्ष 1991 में जब महज 83.08 अरब डॉलर विदेशी कर्ज के कारण सोना गिरवी रखने की नौबत आ गई थी, तो आज 390 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज के बोझ तले अर्थव्यवस्था की स्थिति कैसी होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। वर्ष 2004 (112.06 अरब डॉलर) की तुलना में मार्च 2013 तक विदेशी कर्ज में तीन गुना से भी ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है। देश के कुल विदेशी कर्ज का 60 फीसदी हिस्सा डॉलर में लिया गया है, जिसे डॉलर में ही वापस करना है। एक डॉलर कर्ज की कीमत अगर कल तक देश के लिए 40 रुपए थी, तो आज उसी के लिए हमें 63 रुपए चुकाने होंगे।
आज रुपये और क़र्ज़ के संतुलन के लिए प्रधानमंत्री फिर शॉर्टकट ढूंढ रहे हैं, वित्तमंत्री हाथ-पांव मार रहे हैं, लेकिन इस मर्ज की दवा कहीं नजर नहीं आ रही - .