sandeepsirohi
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मेरे अंदर जो सच्चाई बहुत है |
जला कुछ भी तो आंच आई बहुत है ||
किसी मजलूम की आँखों से देखा |
तो ये दुनिया नज़र आई बहुत है ||
तुझी को आंख भर के देख पाऊं |
मुझे बस इतनी बिनाई बहुत है ||
नहीं चलने लगी यु मेरे पीछे |
ये दुनिया मैंने ठुकराई बहुत है ||
जला कुछ भी तो आंच आई बहुत है ||
किसी मजलूम की आँखों से देखा |
तो ये दुनिया नज़र आई बहुत है ||
तुझी को आंख भर के देख पाऊं |
मुझे बस इतनी बिनाई बहुत है ||
नहीं चलने लगी यु मेरे पीछे |
ये दुनिया मैंने ठुकराई बहुत है ||