ravindersura
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कुछ लोग कांग्रेस पर आरोप लगा रहे हैं की कांग्रेस ने जाट आरक्षण पर राजनीतिक खेल खेला हैं | अब इसने खेल खेला हैं या नहीं ये तो बाद की बात हैं परंतु इस सारे खेल मे ये तो पता लगा की कौन अपना हैं कौन पराया , इस खेल मे कईयों की जात पा गई |
राजनीतिक पार्टी कोई हो हमेशा अपने नफे नुकसान की देख कर कदम उठाती हैं | जब राजस्थान मे जाटों ने भाजपा को आरक्षण के लिए वोट दिये तो कोई बात नहीं अब जब कांग्रेस को आरक्षण के लिए वोट दे तो खेल !!!
कुछ लोग कानून छाटते हैं की ऐसे ही नहीं मिला जान दे कर लिया हैं | कुल मिलाकर तीन शहादत हुई और कुछ लोग घायल भी हुए जिनकी बदौलत आज हमे आरक्षण मिला परंतु क्या ये ऐसी टिक्का टिप्पणी करने वाले बता सकते हैं की गुज्जर आंदोलन मे 65 मरे और उन्हे आजतक क्या मिला ? और क्यो नहीं मिला ? इस आंदोलन मे तीन शहादत हुई , एक एसपी और डीसी की गलतियों के कारण , दूसरा मेहुवाला मे ट्रैक पर (इनकी कैसे क्यो हुई वो आंदोलन के सभी मुख्य लोगो को पता हैं) तीसरा 2012 मे माय्यड मे | अब इस भोले समाज को कौन कैसे समझाये की जब 2012 मे पिछड़ा आयोग अपनी सुनवाई कर रहा था तो यह आंदोलन क्यों किया किसके बहकावे मे किया ? समय था आयोग के सामने जाने का पर वाहा ना जा कर बोले हुड्डा की कुर्सी गेरेंगे | इन तीनों शहीदो को हुड्डा सरकार की तरफ से आर्थिक सहायता दी गई दो के परिवारों को सरकारी नौकरी भी दी गई | आजतक इस आंदोलन मे शुरू से लेकर आखिर तक चाहे वो सांगवान गुट हो या मलिक गुट या परिहार गुट या खाप सिर्फ 10 या 15 हजार लोग इसमे लगातार सक्रिय रहे हैं वो अलग बात की जब कोई हादसा हुआ तो हजारों की तादाद मे लोग घरों से निकले , 2011 मे जब रेल ट्रैक जाम किए तो उस वक़्त पूरे हरियाणा यूपी मे मुश्किल से 40 से 50 हजार जाट घरों से निकले होंगे | आंदोलन मे मुख्य रूप से सिर्फ हरियाणा के लोगो की ही भूमिका अहम रही हैं , यूपी मे एक बार ट्रैक रोका गया वो भी बीच मे छोड़ गए , जब पानी रोका तो पहले दिन 20 हजार लोग थे अगले दिन सवेरे सिर्फ हरियाणा वाले 2 हजार बचे | कहने का मतलब यह हैं की तीन शहादत और 10-15 हजार लोगो के दाबाव से 9 राज्यों के जाटों को आरक्षण मिल गया ! हमे यह सिर्फ इसलिए मिला की हमारे बड़े नेता जैसे चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा , चौधरी अजीत सिंह , चौधरी बलराम जाखड़ आदि मे समाज को यह हक दिलाने की एक इच्छाशक्ति जागृत हुई और उसी की वजह से हमे यह मिला | और सरकार पर ऐसा कोई दबाव नहीं था की जाटों को यह देकर बाकी लोगो की नाराजगी झेले | सिर्फ तीन लोगो की शहादत से और कुछ हजार लोगो के आंदोलन मे हिस्सा लेने से सरकार की सेहत पर कुछ असर नहीं पड़ता , अगर ऐसे पड़ता होता तो 1990 से बड़ा आंदोलन नहीं हुआ होगा और बदले मे सिर्फ बरबादी के मिला कुछ नहीं |
कुछ जाट ही कहते हैं की पहले क्यो नहीं दिया ? ऐसे लोग जाट हो ही नहीं सकते जिसको समाज के लिए कुछ मिलने पर खुशी न हो | खैर ऐसे लोगो की जानकारी के लिए बता दु की जब इस आंदोलन की शुरुआत की थी तो कमांडेंट साहब व उनके कुछ साथी मुख्यमंत्री हुड्डा साहब से मिले और उन्हे उनका वादा याद दिलाया | इस पर हुड्डा साहब बोले की मैं तो कर दु आप लोग भी कुछ करो | उनका कहने का अर्थ था की जाटों मे इसके लिए अलख तो जगाओ नहीं तो वही हुकुम सिंह वाली बनेगी , उन्होने कब जाटों को आरक्षण दिया और कब भजन लाल ने जाटों का आरक्षण छिना यह जाट समाज को पता ही नहीं लगा | और आज बेशक हमारे आरक्षण को कोर्ट मे चुनौती दी गई हो पर इसके लिए अब समाज जागरूक हैं , पैरवी के लिए एक से एक वकील कर रहे हैं |
खास बात यह हैं जाट आरक्षण से जो सबसे ज्यादा दुखी हुए हैं वे इनेलो वाले , इतने दुखी तो शायद गैर जाट भी नहीं | क्योंकि इससे इनको सत्ता दूर होती दिख रही हैं , समाज जाये कुए मे |
राजनीतिक पार्टी कोई हो हमेशा अपने नफे नुकसान की देख कर कदम उठाती हैं | जब राजस्थान मे जाटों ने भाजपा को आरक्षण के लिए वोट दिये तो कोई बात नहीं अब जब कांग्रेस को आरक्षण के लिए वोट दे तो खेल !!!
कुछ लोग कानून छाटते हैं की ऐसे ही नहीं मिला जान दे कर लिया हैं | कुल मिलाकर तीन शहादत हुई और कुछ लोग घायल भी हुए जिनकी बदौलत आज हमे आरक्षण मिला परंतु क्या ये ऐसी टिक्का टिप्पणी करने वाले बता सकते हैं की गुज्जर आंदोलन मे 65 मरे और उन्हे आजतक क्या मिला ? और क्यो नहीं मिला ? इस आंदोलन मे तीन शहादत हुई , एक एसपी और डीसी की गलतियों के कारण , दूसरा मेहुवाला मे ट्रैक पर (इनकी कैसे क्यो हुई वो आंदोलन के सभी मुख्य लोगो को पता हैं) तीसरा 2012 मे माय्यड मे | अब इस भोले समाज को कौन कैसे समझाये की जब 2012 मे पिछड़ा आयोग अपनी सुनवाई कर रहा था तो यह आंदोलन क्यों किया किसके बहकावे मे किया ? समय था आयोग के सामने जाने का पर वाहा ना जा कर बोले हुड्डा की कुर्सी गेरेंगे | इन तीनों शहीदो को हुड्डा सरकार की तरफ से आर्थिक सहायता दी गई दो के परिवारों को सरकारी नौकरी भी दी गई | आजतक इस आंदोलन मे शुरू से लेकर आखिर तक चाहे वो सांगवान गुट हो या मलिक गुट या परिहार गुट या खाप सिर्फ 10 या 15 हजार लोग इसमे लगातार सक्रिय रहे हैं वो अलग बात की जब कोई हादसा हुआ तो हजारों की तादाद मे लोग घरों से निकले , 2011 मे जब रेल ट्रैक जाम किए तो उस वक़्त पूरे हरियाणा यूपी मे मुश्किल से 40 से 50 हजार जाट घरों से निकले होंगे | आंदोलन मे मुख्य रूप से सिर्फ हरियाणा के लोगो की ही भूमिका अहम रही हैं , यूपी मे एक बार ट्रैक रोका गया वो भी बीच मे छोड़ गए , जब पानी रोका तो पहले दिन 20 हजार लोग थे अगले दिन सवेरे सिर्फ हरियाणा वाले 2 हजार बचे | कहने का मतलब यह हैं की तीन शहादत और 10-15 हजार लोगो के दाबाव से 9 राज्यों के जाटों को आरक्षण मिल गया ! हमे यह सिर्फ इसलिए मिला की हमारे बड़े नेता जैसे चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा , चौधरी अजीत सिंह , चौधरी बलराम जाखड़ आदि मे समाज को यह हक दिलाने की एक इच्छाशक्ति जागृत हुई और उसी की वजह से हमे यह मिला | और सरकार पर ऐसा कोई दबाव नहीं था की जाटों को यह देकर बाकी लोगो की नाराजगी झेले | सिर्फ तीन लोगो की शहादत से और कुछ हजार लोगो के आंदोलन मे हिस्सा लेने से सरकार की सेहत पर कुछ असर नहीं पड़ता , अगर ऐसे पड़ता होता तो 1990 से बड़ा आंदोलन नहीं हुआ होगा और बदले मे सिर्फ बरबादी के मिला कुछ नहीं |
कुछ जाट ही कहते हैं की पहले क्यो नहीं दिया ? ऐसे लोग जाट हो ही नहीं सकते जिसको समाज के लिए कुछ मिलने पर खुशी न हो | खैर ऐसे लोगो की जानकारी के लिए बता दु की जब इस आंदोलन की शुरुआत की थी तो कमांडेंट साहब व उनके कुछ साथी मुख्यमंत्री हुड्डा साहब से मिले और उन्हे उनका वादा याद दिलाया | इस पर हुड्डा साहब बोले की मैं तो कर दु आप लोग भी कुछ करो | उनका कहने का अर्थ था की जाटों मे इसके लिए अलख तो जगाओ नहीं तो वही हुकुम सिंह वाली बनेगी , उन्होने कब जाटों को आरक्षण दिया और कब भजन लाल ने जाटों का आरक्षण छिना यह जाट समाज को पता ही नहीं लगा | और आज बेशक हमारे आरक्षण को कोर्ट मे चुनौती दी गई हो पर इसके लिए अब समाज जागरूक हैं , पैरवी के लिए एक से एक वकील कर रहे हैं |
खास बात यह हैं जाट आरक्षण से जो सबसे ज्यादा दुखी हुए हैं वे इनेलो वाले , इतने दुखी तो शायद गैर जाट भी नहीं | क्योंकि इससे इनको सत्ता दूर होती दिख रही हैं , समाज जाये कुए मे |