Shayari (Part 2)

या तो मिट जाइए या मिटा दीजिए,
कीजिए जब भी सौदा खरा कीजिए !!
 
ग़ालिब निकले थे घर से बाहर सूखते कपड़े उतारने,दुनिया ने मदद यूँ की, जो पहने थे वो भी उतार दिए!
 
ठोकरें खाकर भी ना संभले तो मुसाफिर का नसीब;राह के पत्थर तो अपना फ़र्ज़ अदा करते हैं!
 
" कभी किसी को
छला नहीं हूँ
इसीलिये तो
चला नहीं हूँ..."
 
"आज फिर तेरी याद आई बारिश को देख कर,
दिल पर ज़ोर ना रहा अपनी बेक़सी को देख कर,
रोए इस क़दर तेरी याद में,
कि बारिश भी थम गई मेरी अश्कों के बारिश देख कर।"
 
तू लख भूला के वेख ले, असी दोस्ती फेर वी निभावांगे !तु पाणी पी पी वेख ले,असी हिचकी बण बण आवांगे !
 
अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने का दम भरते थे हम ...आज उन्ही में उलझ कर रह गये हैं ..
 
प्यासा ही रहा वो कुएँ के पास रहकर गालिब;
शहर मे रस्सी से पानी निकालने का हुनर नही सिखाते।
 
उम्र ने जब तलाशी ली जेबों से लम्हे बरामद हुएकुछ गम,कुछ नम,कुछ टूटे बस कुछ ही सलामत थे.
 
जीने का तरीका काश वो फूटपाथ पे खेल रहा बच्चा मुझे सिखा दे,ना जाने भूखा पेट लेकर कैसे मुस्कुरा लेता है?
 
कोई जायका नहीं मिलता था ये करने में ग़ालिबफिर भी पेन्सिल को पीछे से कुतरना सुकूं देता था.
 
ग़मों की दुकान खोलकर बैठा हुआ था,
आँसू निकल गये खरीददार देखकर...!!
 
ग़मों की दुकान खोलकर बैठा हुआ था,
आँसू निकल गये खरीददार देखकर...!!
Ghame-ae sukoon aur bhagwan bhi bikta hai, aadmi bhi bikta hai uska imaan bhi bikta hai.
 
आंधियो ने लाख बढ़ाया हौसला धूल कादो बूंद बारिश ने औकात बता दी।
 
औरो को लिए जीते थे तो किसी को कोई शिकायत ना थी,
तनिक अपने लिए क्या सोच लिया सारा ज़माना शत्रु बन गया।
 
Ab to aadat si ho gai hai dard sahne ki,,,
Apne hi zakhmon main doob kar rahne ki,,,
Khamosh tanhaai main ab dil lagta hai,,,
Na pukaare koi,,nigaah uthane se bhi dil darta hai,,,
 
Na koi meri manzil hai na koi Kinara,,,
Tanhai meri mahfil or yaadain mera sahara,,,
Unse bichadkar kuch yun waqt guzra,,,
Kabhi zindgi ko tarse kabhi maut ko pukara...


 
लोग मुझे पत्थर मारने आये तो वो भी साथ थे,जिनके गुनाह कभी हम अपने सर लिया करते थे.
 
जब थक जाओ दुनियाँ की महफिलों से तुम,
आवाज देना हम अक्सर अकेले ही रहते हैं।
 
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