ayushkadyan
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जब बात कश्मीर की चल निकली है तो गौर फरमाने वाली चीज़ है कि हम सभी पिछले काफ़ी वक़्त से कश्मीर और कश्मीरियो के बारे में काफ़ी कुछ कहते और सुनते आ रहे है| लेकिन कम्बख़त कोई नतीज़ा मिलता नज़र नही आता| यह बात तो एक दम दुरुस्त है कि आज कश्मीरी अवाम पूरी तरह से गुमराह है| फ़िरकापरस्त ताकतो ने पूरे कश्मीर को अपने आगोश में ले लिया है| आख़िर समझने वाली बात है कि क्यों पाकिस्तान कश्मीरी अवाम को गुमराह करने में कामयाब हुआ| जवाब पेचीदा नही है बल्कि बेहद आसान है| यह इस्लाम है, जिसके सहारे पाकिस्तान को कश्मीरी अवाम का मुखर समर्थन मिलता रहा है| अगर वाकई पाकिस्तान का कश्मीरियत से कोई वास्ता होता तो कश्मीरी पंडित जिहाद छेड़कर खदेड़े ना जाते| वो भी उसी कश्मीरियत को हिस्सा थे|So why not allow plebiscite? What is wrong in it? If you boast so much about democracy then why to shy with plebiscite?
वह पाकिस्तान जो अपने वतन में जम्हूरियत को कायम ना रख पाया, अगर कश्मीरियो की रायशुमारी की बात करता है तो यह ढोंग ज़्यादा लगता है|
पाकिस्तान इस बात से वाकिफ़ है कि आज जबकि कश्मीर की ज़्यादातर आबादी इस्लाम को मानती है तो वह इसका फ़ायदा उठा सकता है| उसे पता है कि आज भी कश्मीरी मुस्लिमो को इस्लाम के नाम पर बरगला कर हिन्दुस्तान के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है| इसीलिए वह बार बार रायशुमारी के रट लगाए हुए है| इसी को मद्देनजर रखते हुए उसके फ़ौज़ी तानाशाह जिया उल हक़ ने ८० के दौर में पूरी दुनिया में कश्मीर की ऐसी तस्वीर पेश की, मानो दुनियाभर के ज़ुल्म कश्मीरी मुसलमान पर हो रहे हो| उस वक़्त कश्मीर में बढ़ती बेरोज़गारी ने कश्मीरी नौजवानो को पाकिस्तान के हाथो में खेलने के लिए मजबूर कर दिया जो आज तक बदस्तूर जारी है|
जनरल जिया उल हक़ की अगुवाई में पाकिस्तान एक सोच समझी रणनीति पर काम कर रहा था| उसने पहले योजनाबद्ध तरीके से स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम नवयुवको के सहारे गैर मुस्लिमो के खिलाफ जिहाद छेड़ दिया| जनरल जिया चाहता था की यह सब इस तरह से हो की सबको ऐसा लगे की जो कुछ भी हो रहा है वह स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम कर रहे है क्योकि उनके साथ नाइंसाफी हुई है और उनको अपना अलग वतन चाहिए| फिर जब उसे लगा कि अब घाटी में केवल मुस्लिमो की तादाद ही ज़्यादा है तो उसने रायशुमारी का मुद्दा ज़ोर शोर से उठना शुरू कर दिया|
अगर हम इतिहास के पन्ने पलट कर देखे तो पता चलता है कि १९७१ की जंग के बाद पाकिस्तान को यह अहसास हो गया था की भारत कभी भी उससे अधिकृत कश्मीर वैसे ही वापस ले सकता है जैसे उसने बांग्लादेश को आज़ाद किया| कुछ सालो के अंतराल के बाद १९७७-७८ में ज़िया उल हक़ ने पाकिस्तान में ज़ुल्फ़िकार अलो भुट्टो का तख्ता पलट कर दिया| यहाँ से एक ऐसे तानाशाह का ज़न्म हुआ जो किसी भी कीमत पर हिन्दुस्तान को सबक सिखाना चाहता था| इसी बीच उसने ८० के दशक में सोवियत यूनियन से युद्ध लड़ने के लिए अफ़गानी मुजाहिद्दिनो के साथ काम किया| यहाँ से उसे कुछ ऐसे तजुर्बे हासिल हुए जो आगे चलकर उसने कश्मीर में आज़माए|
आइए अब गौर फरमाते है कि आख़िर जनरल ज़िया उल हक़ ने ऐसा क्या सीखा|
उसने पाया कि जेहाद के नाम पर एक कट्टर और कभी ना ख़त्म होने वाली जंग शुरू की जा सकती है| इसी तरह की जंग में उसने सोवियत सेना को अफ़ग़ानिस्तान में मात दे दी थी| इस जंग के नतीजे ने जनरल को जोश से भर दिया| वह अच्छी तरह समझ चुका था कि केवल फ़ौज़ के सहारे जंग नही जीती जा सकती, इसके लिए स्थानीय जनता का साथ होना भी ज़रूरी है| अब जनरल हक़ ने आज़ाद कश्मीर के सब्जबाग कश्मीरी अवाम को भी दिखाने शुरू कर दिए थे| इसके लिए उसने कश्मीरी मुस्लिमो को इस्लाम के नाम पर जिहाद के लिए तैयार करना शुरू कर दिया| बेरोज़गार कश्मीरी मुस्लिमो को पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने अपने जाल में फाँसना शुरू कर दिया| उस वक़्त के आईएसआई मुखिया हामीद गुल ने सोवियत जंग में मिले अमेरिकी हथियारो को कश्मीरी मुस्लिमो को बाँटना शुरू कर दिया| अब एक ऐसी नफ़रत की पौध तैयार हो रही थी जिसे मुजाहिदीन कहा गया जो किसी भी कीमत पर हिन्दुस्तान से अलग होना चाहती थी| और उनका साथ दे रहा था पाकिस्तान|
इस बीच १९८८ में जनरल ज़िया उल हक़ की मौत हो गयी पर तब तक उसने पाकिस्तान को एक ऐसी सौगात दे दी थी जिसके नतीज़तन आज भी घाटी अशांत है| यह है एक छद्म युद्ध या यूँ कहे जिहाद जो आज भी ज़ारी है|
--आयुष
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