Honesty is not only the parameters for a politician , a person can not make his best pesoonality idol both MK Gandhi and Saheed Bhgat Singh , both the leaders with opposite thoughts,
Mahatma never thought that Indian Internal system need to be changed after independence while Saheed Bhagat told that time that " Independence without changing internal system will be of no use " . Kejriwal is follower of MKG ideas, only to get vote he put Saheed Bhagat Singh picture. Why he did not visited saheed Bhagat Singh Park in Delhi to pay homage?
Mahatma never thought that Indian Internal system need to be changed after independence while Saheed Bhagat told that time that " Independence without changing internal system will be of no use " . Kejriwal is follower of MKG ideas, only to get vote he put Saheed Bhagat Singh picture. Why he did not visited saheed Bhagat Singh Park in Delhi to pay homage?
वैसे किसी ख़ास पार्टी का समर्थक या विरोधी होना बहस का अलग विषय है। एक समय था जब आप की लीक से हटकर कार्यशैली ने आम जनमानस में उम्मीद की किरण जगाई थी। लोगो को लगने लगा था शायद अब कांग्रेस और बीजेपी का विकल्प मिल गया है। परन्तु दिल्ली में अपनी पहली सरकार गठित करने के बाद इनके बचकाना और अदूरदर्शी फैसलों ने जनता का मोहभंग कर दिया।
दरअसल आप ने समाज के दो तबको पर सबसे ज्यादा असर डाला। एक है निम्न आय वर्गीय झुग्गी झोपडी में बसने वाला तबका जो समाज में उपेक्षित रहा है। इस तबके की शायद ही कभी किसी ने सुध ली होगी। इसी तबके ने आप को हाथो हाथ लिया।
दूसरा बुद्धिजीवी नौकरीपेशा वर्ग जो समाज में रुतबा हासिल करने के लिए छटपटा रहा था। उसने आप के जरिये अपनी राजनितिक आकांक्षाओ को अमलीजामा पहनाया। ज्यादातर आप उम्मीदवार समाज के उसी रिटायर्ड या नौकरीपेशा तबके से है।
जब मैं अरविन्द केजरीवाल के शुरुआती सफ़र पर नज़र डालता हूँ तो एक चीज़ साफ़ समझ आती है। उसकी राजनितिक शैली परम्परागत राजनीति से अलग रही है। वह लोगो को एक आम इंसान की तरह बात करता हुआ, खांसता हुआ दिखाई दिया। लोगो ने उससे एक अलग तरह का जुड़ाव महसूस किया। टीवी पर राजनितिक खबरों को देखते हुए अपने दांत पीसने वाले मध्यम वर्गीय तबके को जैसे उसने आवाज़ दे दी थी।
जो आभामंडल केजरीवाल ने अपने चारो तरफ बनाया था वह उसके एक गलत निर्णय ने झटके से तोड़ दिया।
अब उसकी राजनीति बदल चुकी है। वो उस परम्परागत राजनीति का हिस्सा बन चुका है जो पिछले कई सालो से कांग्रेस और बीजेपी करती आई है।
उसे भी अल्पसंख्यक वोटो की चिंता सताने लगी है। वो मीडिया से इंटरव्यू करते वक्त अपनी इमेज का ध्यान रखता है। उसे बैकग्राउंड में शहीदेआज़म भगत सिंह का फोटो चाहिए। लेकिन वो ऐसा देशभक्त है जो इतना तर्कशील है कि देश के एक हिस्से को रायशुमारी कराकर पडोसी देश को देने के लिए आमादा है। एक छोटी सी नीली कार कब एसयूवी कार बन गयी, वो मेट्रो ट्रेन कैसे एक झटके में परायी हो गयी कुछ पता ही नहीं चला। शायद उसका जमीर इतना कमजोर था कि उसने राजनीति के कीचड में बहुत जल्दी घुटने टेक दिए। अब उसे अल्पसंख्यक वोटो के लिए किसी मौलवी से अपील करवाना भी गलत नहीं लगता। हर चीज़ में पारदर्शिता का दंभ भरने वाले को हर तरीके से मिला चंदा मंज़ूर है। सादगी की मूर्ति कब आम से खास हो गयी पता ही नहीं चला।
दिल्ली चुनाव के नतीजें चाहे कुछ भी रहे पर इतना तय है कि न तो वो ईमानदारी न वो सच्चाई ना वो अच्छाई मिलेगी जिसकी कल्पना हम सभी ने अन्ना आन्दोलन के वक़्त की थी।
क्या इस आम आदमी को फिर कोई केजरीवाल मिलेगा जो अपनी ईमानदारी पर अडिग रहेगा। पता नहीं कब तक यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा।