phoolkumar
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जाटों को 'चचनामा' में ‘चांडाल’ कहने के पीछे का
जाटों को 'चचनामा' में ‘चांडाल’ कहने के पीछे का असली मर्म!:
हरियाणा कहिये या खापलैंड कहिये, यहाँ एक जुमला है "चांडाल-चौकड़ी"; जो कि अमूमन ऐसे लोगों के समूह के लिए बोला जाता है जो आमभाषा में या तो "कढ़ी-बिगाड़" की श्रेणी में आते हैं या अपने हठ की करने वालों की श्रेणी में| कुछ-कुछ उद्दंड प्रकार के होते हैं यह लोग| और अमूमन तो पूरी धरती पर और इस लेख के केंद्रबिंदुनुसार हरियाणा के लगभग हर गली-मुहल्ले में ऐसी चौकड़ियां मिल ही जाती हैं| इससे एक बात तो स्पष्ट है कि "चांडाल" शब्द किसी भी मायने में आपके हीन या छोटा होने का परिचायक नहीं है| और चचनामा में यह शब्द इसी प्रयोजन को सिद्ध करने हेतु जाटों के बारे लिखा गया है|
'चचनामा' में इस शब्द के प्रयोग बारे चर्चा करने पर सरदार प्रताप फौजदार बताते हैं कि सातवीं शताब्दी के बाद जिन जाटों ने अपना ''बौद्ध'' धर्म नहीं छोड़ा, उनको धर्मावलम्बियों ने ' चांडाल' व् ‘शूद्र’ कहना शुरू कर लिया, और ऐसा ही चचनामा के लेखक ने लिख दिया| राजस्थान के ''माउंट आबू यज्ञ'' जहाँ से बौद्ध धर्म से व्यापक धर्म परिवर्तन शुरू हुआ, वहां से इन्होनें उन जाटों को जिन्होनें इनके प्रोपेगैंडों को शिरोधार्य कर "राजपूत" बनना नहीं स्वीकारा, उनकी अछूत जैसी स्थिति लाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। उदाहरणत: शैलजा पुत्र राजा दाहिर के पिता 'चच' ने तो बाकायदा जाटों के खिलाफ पदत्राण, मखमली वस्त्र, सिरोत्राण आदि के प्रयोग को राजाज्ञा द्वारा बंद करवा दिया था|
क्योंकि जाटों ने कभी धर्मावलम्बियों की वर्ण-व्यवस्था को नहीं माना| जब जाट को नियंत्रण में लेने की इनकी मंशा नहीं फूल पाई तो वह कुंठा में बदल गई| और उनकी लाख कोशिशों के बावजूद भी जाट स्वछंद रहे और इस लाचारी से हारकर इन्होनें जाटों को ‘एंटी-ब्राह्मण’ भी कहना शुरू करवा दिया; ताकि कहीं दूसरी जातियां भी जाट का अनुसरण ना करने लग जाएँ और इनके प्रभाव से ना निकल जाएँ| ऊपर बताये राजा दाहिर और चच के जाटों के प्रति इनके सब दुर्व्यवहारों के प्रमाण ‘चचनामा’ पुस्तक में मिलते हैं|
डी. आर. चौधरी जैसे विद्वान खापों को न्यूनतम आंकने हेतु उनकी खाप पे लिखी पुस्तक में ‘चचनामा’ के इन्हीं हवालों का प्रयोग करते हैं| पता नहीं डी. आर. चौधरी जी का यह कैसा कौम-प्रेम है कि जिन अत्याचारों को हमारे पुरखों ने स्वीकारा ही नहीं, उन्होंने अपनी पुस्तक में उनको जाटों का स्टेटस रिफरेन्स बना लिया और वो भी जाटों को न्यून दर्जे का दिखाने हेतु? जबकि यह तो जाटों ने अपनी स्वछँदता व् आन-बान को बनाये रखने की कीमत चुकाई थी, कि खुद को 'चांडाल' और 'शूद्र' कहलवाना मंजूर किया परन्तु धर्मावलम्बियों के प्रोपेगैंडों में नहीं आये| भला कोई तब तक न्यून कैसे हो सकता है जब तक वो उस बात को मन से स्वीकार ना करे| किसी का किसी के विरुद्ध न्यूनतम स्तर का अत्याचार तो किसी का स्टेटस निर्धारित नहीं कर सकता आखिर; क्यों डी. आर. चौधरी जी?
खैर आगे बढ़ता हूँ, माउंट-आबू यज्ञ से ही "राजपूत" शब्द अस्तित्व में आया (सनद रहे इससे पहले के किसी भी प्रकार के हिन्दू-सनातन-आर्य-वैदिक साहित्य में कहीं भी "राजपुत्र-राजपूत" शब्द का उसी तरह जिक्र नहीं मिलता, जिस तरह हिन्दू शब्द का नहीं मिलता| हाँ प्राचीनकाल में पत्नियां अपने पतियों को "आर्यपुत्र" कहती जरूर लिखी गई हैं|) यह तो सब जानते हैं| जो जाट (शायद गुज्जर-अहीर भी) सम्पूर्णत: सनातनी विचारधारा के बन गए उनको ब्रह्मिणों ने राजपुत्र अथवा राजपूत कहना शुरू कर दिया|
और जो जाट बौद्ध से हिन्दू ना बनके "आर्य" बने रहे क्योंकि जाटों नें ‘मूर्ती-पूजा’, ‘'विधवा अविवाह', 'देवदासी प्रथा', 'सती प्रथा' आदि जैसी इनकी कुप्रथाओं को कभी नहीं स्वीकारा, तो जाट इनसे हिंसात्मक रास्ता अपनाने की बजाय अविवाद का रास्ता अपनाये हुए खुद को 'आर्य' ही कहलाते रहे| यह भी एक आश्चर्य की बात है कि "सनातन" धर्म के बाद धर्मावलम्बियों ने "आर्य-पुत्र" शब्द को उतना मान-प्रचार नहीं दिया, जितना राजपुत्र अथवा राजपूत शब्द को दिया| और सदियों से जाटों द्वारा यह इसी "आर्य" शब्द को संभाले रखने का चमत्कार था कि जब आगे चलकर इन्होनें जाटों को फिर से अपने प्रभाव में लेने हेतु 1875 में महर्षि दयानंद को कमान सौंपी, तो उन्होंने जाटों की 'आर्य' शब्द के प्रति इतनी गूढ़ अटूटता को देखते हुए अपने मिशन का नाम ही "आर्य-समाज" रख लिया और आश्चर्य की बात नहीं कि जाटों में उनका यह प्रयोग सबसे ज्यादा सफल रहा|
खैर मैं कहानी को कहाँ से कहाँ निकाल लाया| मैं इस लेख के माध्यम से मूल संदेश यही देना चाहता हूँ कि कोई भी जाट का युवक-युवती इतिहास के इन तथ्यों को जाने-सुने तो अपने पुरखों व् इतिहास के इन पन्नों को लेकर कभी शर्मिंदा या हीन महसूस ना करे; अपितु इस बात पर गर्व करे कि आपके पुरखों ने अपनी स्वछँदता व् अपनी औरतों के मान-सम्मान को इनसे स्वतंत्र बनाये रखने के लिए जो अडिगता दिखाई, यह इनके द्वारा इतिहास में हमें "चांडाल" अथवा "शूद्र" लिखना सिर्फ हमारी इसी अडिगता की विरुद्ध इनकी कुंठामात्र थी| और यही इनका जाटों को ‘चांडाल’ कहने के पीछे का असली मर्म था और कुछ भी नहीं|
जरा आप ही सोचिये, जो इंसान ‘मूर्ती-पूजा, ‘'विधवा अविवाह', 'देवदासी प्रथा', 'सती प्रथा' जैसी प्रथाओं का विरोधी रहा हो वो भला 'चांडाल' या 'शूद्र' कैसे हो सकता है? हाँ दूसरे क्या हैं, यह टिका-टिप्पणी करना हमारा जीन नहीं रहा, अन्यथा औरतों पर यह ऊपरलिखित जुल्म ढाने वालों से तो बेहतर ही रहे हैं हम और हमारे पुरखे|
वैसे चलते-चलते बता दूँ, हरियाणा में जब पोते-पोतियां दादियों का कहा नहीं मानते हैं तो वो अक्सर लाड भरी डांट में कह ही देती हैं; 'दुष्ट, पक्का चांडाल सै|" अक्सर देशी दोस्त भी इस शब्द को व्यंगात्मक व् हास्यात्मक रूप में अपने दोस्तों पर ही बोलते देखे जा सकते हैं|
जय दादा बड़ा बीर (दादा नगर खेड़ा)!
Author: Phool Malik
जाटों को 'चचनामा' में ‘चांडाल’ कहने के पीछे का असली मर्म!:
हरियाणा कहिये या खापलैंड कहिये, यहाँ एक जुमला है "चांडाल-चौकड़ी"; जो कि अमूमन ऐसे लोगों के समूह के लिए बोला जाता है जो आमभाषा में या तो "कढ़ी-बिगाड़" की श्रेणी में आते हैं या अपने हठ की करने वालों की श्रेणी में| कुछ-कुछ उद्दंड प्रकार के होते हैं यह लोग| और अमूमन तो पूरी धरती पर और इस लेख के केंद्रबिंदुनुसार हरियाणा के लगभग हर गली-मुहल्ले में ऐसी चौकड़ियां मिल ही जाती हैं| इससे एक बात तो स्पष्ट है कि "चांडाल" शब्द किसी भी मायने में आपके हीन या छोटा होने का परिचायक नहीं है| और चचनामा में यह शब्द इसी प्रयोजन को सिद्ध करने हेतु जाटों के बारे लिखा गया है|
'चचनामा' में इस शब्द के प्रयोग बारे चर्चा करने पर सरदार प्रताप फौजदार बताते हैं कि सातवीं शताब्दी के बाद जिन जाटों ने अपना ''बौद्ध'' धर्म नहीं छोड़ा, उनको धर्मावलम्बियों ने ' चांडाल' व् ‘शूद्र’ कहना शुरू कर लिया, और ऐसा ही चचनामा के लेखक ने लिख दिया| राजस्थान के ''माउंट आबू यज्ञ'' जहाँ से बौद्ध धर्म से व्यापक धर्म परिवर्तन शुरू हुआ, वहां से इन्होनें उन जाटों को जिन्होनें इनके प्रोपेगैंडों को शिरोधार्य कर "राजपूत" बनना नहीं स्वीकारा, उनकी अछूत जैसी स्थिति लाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। उदाहरणत: शैलजा पुत्र राजा दाहिर के पिता 'चच' ने तो बाकायदा जाटों के खिलाफ पदत्राण, मखमली वस्त्र, सिरोत्राण आदि के प्रयोग को राजाज्ञा द्वारा बंद करवा दिया था|
क्योंकि जाटों ने कभी धर्मावलम्बियों की वर्ण-व्यवस्था को नहीं माना| जब जाट को नियंत्रण में लेने की इनकी मंशा नहीं फूल पाई तो वह कुंठा में बदल गई| और उनकी लाख कोशिशों के बावजूद भी जाट स्वछंद रहे और इस लाचारी से हारकर इन्होनें जाटों को ‘एंटी-ब्राह्मण’ भी कहना शुरू करवा दिया; ताकि कहीं दूसरी जातियां भी जाट का अनुसरण ना करने लग जाएँ और इनके प्रभाव से ना निकल जाएँ| ऊपर बताये राजा दाहिर और चच के जाटों के प्रति इनके सब दुर्व्यवहारों के प्रमाण ‘चचनामा’ पुस्तक में मिलते हैं|
डी. आर. चौधरी जैसे विद्वान खापों को न्यूनतम आंकने हेतु उनकी खाप पे लिखी पुस्तक में ‘चचनामा’ के इन्हीं हवालों का प्रयोग करते हैं| पता नहीं डी. आर. चौधरी जी का यह कैसा कौम-प्रेम है कि जिन अत्याचारों को हमारे पुरखों ने स्वीकारा ही नहीं, उन्होंने अपनी पुस्तक में उनको जाटों का स्टेटस रिफरेन्स बना लिया और वो भी जाटों को न्यून दर्जे का दिखाने हेतु? जबकि यह तो जाटों ने अपनी स्वछँदता व् आन-बान को बनाये रखने की कीमत चुकाई थी, कि खुद को 'चांडाल' और 'शूद्र' कहलवाना मंजूर किया परन्तु धर्मावलम्बियों के प्रोपेगैंडों में नहीं आये| भला कोई तब तक न्यून कैसे हो सकता है जब तक वो उस बात को मन से स्वीकार ना करे| किसी का किसी के विरुद्ध न्यूनतम स्तर का अत्याचार तो किसी का स्टेटस निर्धारित नहीं कर सकता आखिर; क्यों डी. आर. चौधरी जी?
खैर आगे बढ़ता हूँ, माउंट-आबू यज्ञ से ही "राजपूत" शब्द अस्तित्व में आया (सनद रहे इससे पहले के किसी भी प्रकार के हिन्दू-सनातन-आर्य-वैदिक साहित्य में कहीं भी "राजपुत्र-राजपूत" शब्द का उसी तरह जिक्र नहीं मिलता, जिस तरह हिन्दू शब्द का नहीं मिलता| हाँ प्राचीनकाल में पत्नियां अपने पतियों को "आर्यपुत्र" कहती जरूर लिखी गई हैं|) यह तो सब जानते हैं| जो जाट (शायद गुज्जर-अहीर भी) सम्पूर्णत: सनातनी विचारधारा के बन गए उनको ब्रह्मिणों ने राजपुत्र अथवा राजपूत कहना शुरू कर दिया|
और जो जाट बौद्ध से हिन्दू ना बनके "आर्य" बने रहे क्योंकि जाटों नें ‘मूर्ती-पूजा’, ‘'विधवा अविवाह', 'देवदासी प्रथा', 'सती प्रथा' आदि जैसी इनकी कुप्रथाओं को कभी नहीं स्वीकारा, तो जाट इनसे हिंसात्मक रास्ता अपनाने की बजाय अविवाद का रास्ता अपनाये हुए खुद को 'आर्य' ही कहलाते रहे| यह भी एक आश्चर्य की बात है कि "सनातन" धर्म के बाद धर्मावलम्बियों ने "आर्य-पुत्र" शब्द को उतना मान-प्रचार नहीं दिया, जितना राजपुत्र अथवा राजपूत शब्द को दिया| और सदियों से जाटों द्वारा यह इसी "आर्य" शब्द को संभाले रखने का चमत्कार था कि जब आगे चलकर इन्होनें जाटों को फिर से अपने प्रभाव में लेने हेतु 1875 में महर्षि दयानंद को कमान सौंपी, तो उन्होंने जाटों की 'आर्य' शब्द के प्रति इतनी गूढ़ अटूटता को देखते हुए अपने मिशन का नाम ही "आर्य-समाज" रख लिया और आश्चर्य की बात नहीं कि जाटों में उनका यह प्रयोग सबसे ज्यादा सफल रहा|
खैर मैं कहानी को कहाँ से कहाँ निकाल लाया| मैं इस लेख के माध्यम से मूल संदेश यही देना चाहता हूँ कि कोई भी जाट का युवक-युवती इतिहास के इन तथ्यों को जाने-सुने तो अपने पुरखों व् इतिहास के इन पन्नों को लेकर कभी शर्मिंदा या हीन महसूस ना करे; अपितु इस बात पर गर्व करे कि आपके पुरखों ने अपनी स्वछँदता व् अपनी औरतों के मान-सम्मान को इनसे स्वतंत्र बनाये रखने के लिए जो अडिगता दिखाई, यह इनके द्वारा इतिहास में हमें "चांडाल" अथवा "शूद्र" लिखना सिर्फ हमारी इसी अडिगता की विरुद्ध इनकी कुंठामात्र थी| और यही इनका जाटों को ‘चांडाल’ कहने के पीछे का असली मर्म था और कुछ भी नहीं|
जरा आप ही सोचिये, जो इंसान ‘मूर्ती-पूजा, ‘'विधवा अविवाह', 'देवदासी प्रथा', 'सती प्रथा' जैसी प्रथाओं का विरोधी रहा हो वो भला 'चांडाल' या 'शूद्र' कैसे हो सकता है? हाँ दूसरे क्या हैं, यह टिका-टिप्पणी करना हमारा जीन नहीं रहा, अन्यथा औरतों पर यह ऊपरलिखित जुल्म ढाने वालों से तो बेहतर ही रहे हैं हम और हमारे पुरखे|
वैसे चलते-चलते बता दूँ, हरियाणा में जब पोते-पोतियां दादियों का कहा नहीं मानते हैं तो वो अक्सर लाड भरी डांट में कह ही देती हैं; 'दुष्ट, पक्का चांडाल सै|" अक्सर देशी दोस्त भी इस शब्द को व्यंगात्मक व् हास्यात्मक रूप में अपने दोस्तों पर ही बोलते देखे जा सकते हैं|
जय दादा बड़ा बीर (दादा नगर खेड़ा)!
Author: Phool Malik