"रावण" ( जगबीर राठी )
उस दिन च्यारूं ओर, रौनक का पहरा था
और सॉलाँ की ढाल, उस दिन भी दशहरा था
लोग एक मैदान मैं कट्ठे हो, रावण नैं फूक आये
नई-नई बोहड़िया चहकैं थीं, थे बालक भी हर्षाये
सब कुछ उसा-ए था, कुछ भी ना नया था
जलता हुआ रावण देखण, मैं भी तो गया था
फूस जल्या, फेर रावण भी जलग्या
गरीबणी के...