माहरा हरयाणा ( हरयाणवी कविताये, रचनाये,गीत 

mere gaon mein "देख्या-ए-नी इह्सा धाय्ड मोड़णिया" ki kahawat kaise bani

सांझ का सीळआ, गाम-गमीणयाँ धमक चढ़ी जा हो,
दूर समांणयाँ धाड़ ठहर रही, कोडबै गाम ब्छोन्याँ हो|

डांगर-ढोर, धन-साधन जो ठया ज्या साह्मर ल्याणा हो,
खूनी जाळ बछ्या गाम पै, करड़ाई का साया हो|
बादळ गरजें-बिजळी कड्कें काळी घटा घुमराई हो,
गादड़-रोवें कुत्ते-कुवावें, किसकी चढ़ी करड़ाई हो|
फेर दुज्जे पहर रात की धाड़ नै तैयारी ठाई हो,
न्यडाणे नै उजाड़-ल्यावा या बैरी नै प्रणाई हो|

धाड़ चढ़ती आवे बेटा, सीन्घां माटी ठाई रे,
भावड-आळए गमे म लखा मौत नाचती आई रे|
खड्या खेत म्ह प्रहलाद सोच रह्या गाम चढ़ाई होगी हो,
घाग लूटण चढ़ आया सै-सूते गाम का के राह हो|
इन ब्य्चारा डूबे प्रहलाद कै माथे त्योड़ी छाई,
कै मरणा कै मारणा ना तै गाम-दुहाई|
सुनसान स्म्यान्याँ फेर प्रहलाद नैं चौगरदे नजर दुड़ाई,
ना दूर लग बीज माणस का, करड़ाई गहरान्दी आई|

ले नाम न्यडाणा नगरी का, प्रहलाद नै भाला ठाया,
जा बड्या-भोज्ड़ा म्ह को, गमे की राह पै नजर टकायां|
धाड़ चढ़ रही-धूळ उड़ रही, सरण दे सी भाला सरणाया,
काळ बना लिया अगड़ी-घोड़े को, धाड़ नै धक्का खाया|
डेठ टूट गया-होंसला छूट गया, काळ पै काळ चढ़ आया,
न्यडाणा सै थारी बाट म्ह-बैठा गमे की साथ म, धाड़ नै यू फ़रमाया|
बेरा कोन्या कितणे सें, या सोच धाड़ उलटे-पायां-भोड़ी,
न्यडाणे के सूरमा तैने-ऐकले नैं धाड़ मोड़ी|

घाघाँ की कड़ तोड़ी, गाम-माँ का संकट टाल्या,
धन-धन हो जामण आळी तन्नैं गाम-रुखाळआ जाया|
तेरे न्यडाणा फेर आइये हो दादा,
गा गाथा त्हारी फुल्ले-भगत की गद-गद होगी काया|

puraane jamaane mein 2 types ke gaon hua karte they ek jo ek jagah tik ke kheton mein mehnat karke khaya karte they aur ek wo jo doosre gaovon ko loota karte they.....lootne waale jab group bana ke nikalte they to usko deshi bhasha mein "Dhaad" bolte they aur ek dhaad mein 100 se 200-300 tak ghodon ki fouj hoti thi....aur aisi hi ek dhaad in dada (jinka ki is ooper ki kavita mein jikar kiya gaya hai) ne akele hi waapis moud di thi...tab se inka naam mere gaon ke itihaas mein inki veerta ke liye ye mashoor hue....aur jab bhi koi badi dheeng hankta hai to kaha jata hai ki "Dekhya e ni ihsa dhaad modniya"...
 
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"प्रेम की पूंझड़ हिलाते चलो"

कित बांधते खिंडके- साफे, कित बांधते धोती
जै म्हारे सिर पै सींग, अर कड़ पै पूंझड़ होती

जै न्यू हो जाता तो चाल़ा हो जाता
बस अर रेलाँ मैं यूँ लिखा पाता

अपणा सामान खूद देखैं-भालैं
कृपया सींग अर पूंझड़ बार न निकालैं

बस अपणे स्थान से टैम पै चलैगी
लाण्डी सवारी को सीट ना मिलैगी

जब रिश्ते ख़ातर छोरे नै देखण आते
बेशक भरे रहते उनके बैंका के म्हाँ खाते

रिश्ता क्यूकर कराँ, या दुविधा मोटी सै
छोरा तो सुथरा सै, पर माड़ी पूंझड़ छोटी सै ...
"नैने"

जब किते कोय चलती होती प्यार-प्रेम की कहाणी
किते कैण्टीन पै बैठ कै प्रेमी पीते सोडा-पाणी

छोरे अर छोरी कै, जब इष्क का नषा चढ्या
बागाँ के मैं गाणा गाते, सींग-कै-सींग भिड़या

नया-नया बटेऊ जब ससुराड़ मैं जावै सै
पीढ़े ऊपर बैठ कै जब हलवा-पूरी खावै सै

साल़ी-सपटी कट्ठी होकै, इसे मजाक करती
जीजा नै सतावण ख़ातर, पूंझड़ पै चूंटी भरती

सींग-पूंझड़ के चैगरदे घूमती या दुनिया सारी होती
टी.वी. अखबाराँ मैं ख़बर भी कुछ न्यू न्यारी होती

हड़ताल़ी कर्मचारी अपणी मांगा नै लेके डी.सी. आॅफिस आये
पुलिस आला नै वे पूंझड़ पकड़-पकड़ बाहर भगाये,

अमेरिकी राश्ट्रपति ने पाकिस्तान का दौरा किया
मुशर्रफ ने उनका पूंछ हिला के स्वागत किया

लोकसभा मैं भी सींग अर पूंझड़ का होता रोल़ा
अपोजिशन कै सींग मारता, रूलिंग पार्टी का टोल़ा

पाॅलिटिक्स मैं महारत का, यू-ए पैरामीटर होता
जिसके सींग घणे टूट रे, वो-ए सीनियर लीडर होता

आच्छज्ञ -ए होया, जै यू काम ना होया
पूंझड़ अर सींगा का तामझाम ना होया

ना तो बीमार भूखी जनता के सीगाँ मैं कीड़े पड़े होते

बेघर, गरीब सड़क-किनारे पूंझड़ तुड़ाये पड़े होते

भूखी ज़र्ज़र काया क्यूकर, पूंझड़-सींगा का बोझ ढ़ोती
कितै मरता भूखा बचपन, किते भरपूर ज़वानी रोती

बस इतनी-ए विनती सै प्रभु, नाव किनारै ला दे
इन्सानियत के सींग उगा दे, प्यार की पूंझड़ ला दे

ऐसा कर दे प्रभु तो मैं फू ला नहीं समाऊँगा
चैगरदै भाजा फिरूंगा अर प्यार के गीत गाऊँगा

सींग तैं सींग भिड़ाते चलो।
प्रेम की पूंझड़ हिलाते चलो।
 
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हांस्या बहुत था में जिश्ने हँसावण खातेर,

छोड चली गई मैं रहगया आशु बहावण खातेर,
कदे रुका पाट्या था माहरी यारी का,
मैं चमन उश लिलो प्यारी का,
राँझा बी बन ज्याता मैं भंस चरावण खातेर,
वक्त ने बी वक्त ना दिया उश्ने भुलावण खातेर,

वा तो फूला की भरी क्यारी थी,
मेरी किश्मत सायेद न्यारी थी,
हर ते करता दर्कास उशका माली बनावण खातेर,
करम का कोए लेखा नहीं था बाग खिलावण खातेर,

इब तो कुछ बच्या नहीं,
उश्ने बी कुछ कह्या नहीं,
कोए सहारा बी नहीं रह्या जिंदगी बितावाण खातेर,
कदे आशिक था अपणा बहम मिटावण खातेर,

हांस्या बहुत था में जिश्ने हँसावण खातेर,
छोड चली गई मैं रहगया आशु बहावण खातेर !!!
 
‘जाट चालीसा’ ओमपाल आर्य ( सांगवान )

जय जग जाट हरे, स्वामी जय जग जाट हरे।

दो दो गज की मूंछे, कान्धै लट्ठ धरै।। जय।।

पंचों का सरपंच कहाये, हाथ रहे चलता। स्वामी।

देता भूत उतार तभी, जो तीन पांच करता।। जय।।

अन्न विधाता कहलाता तू, हे हलधर नामी। स्वामी।

तुम बिन बात बने ना मेरी, लट्ठमार स्वामी।। जय।।

चिलम-तम्बाकू और हुक्के की, धूप लगे तेरी। स्वामी।।

मठा-दही के साथ कलेवा, दो गुड़ की पेड़ी।। जय।।

तुम हो निशाचरों के मारक, निर्बल के साथी। स्वामी।।

सोया भूत जागता जाये, जै पड़ जावे लाठी।। जय।।

सूरजमल सी चाल चले तू, नाहर सा गरजे। स्वामी।

भगतसिंह बनकर तू इंकलाब करदे।। जय।।

दगाबाज और जालसाज के, भर देता भूसा। स्वामी।।

चोर, उचक्का, झूठा भागे, सात - सात कोसा।। जय।।

रोड़ा, राह बने ना कोई, जो खेंच कान देता। स्वामी।।

जब-उठै तलब दूध की, पी एक भैंस लेता।। जय।।

जो ये पढ़ै आरती जाट की, तो आरक्षण मिलज्या। स्वामी।।

साथ सभी के जाट हवासिंह का मन भी खिलज्या।।

समर्पण

तन मन धन से जिनका जीवन, जाति के हित अर्पित है।
‘जाट चालीसा’ सही जाट का, जाटो ! तुम्हें समर्पित है।।
 
मैं आ रहा था सांझ ने

मैं आ रहा था सांझ ने साइकिल भगा कै

तेज तेज मार रहा था पैडल घूमा घूमा कै
आधे रास्ते आया था साइकिल चला कै
एक मानस खड़ा होगया एक दम आगे आके
मन्ने रोकी साइकिल ब्रेक दबा कै
मैं बोल्या क्यूँ खड़ा होग्या तू आगे आके
मारना चाहवे सै के इसके नीचे आ कै
उसने एक दिया मेरे थप्पड़ घूमा कै
नु बोल्या साइड मे खड़ा होज्या स्टैंड लगा कै
मन्ने जब देख्या उसकी ओर लखा कै
मैं साइड मे खड़ा होग्या स्टैंड लगा कै
वो मेरते नु बोल्या चक्कू दिखा कै
भागन की कोशिस न करिए रोला मचा कै
उसने तलाशी सी ले ली हाथ लगा लगा कै
वो मेरते बोल्या घेटी पे चक्कू ला कै
जावन नहीं पवेगा पैसे छुपा कै
फेर उसने दिये मेरे दो चार घूमा कै
जणू पिन नम्बर दबावे सै एटीएम कार्ड लगा कै
मन्ने सारे पइसे दे दिये पिट पीटा कै
अड़तालीस बैठे थे कुल मिला कै
वो बोल्या दो चार ओर लगा कै
भाग ज्या हड़े ते छुप छुपा कै
मैं चलन लाग्या साइकिल ने ठा कै
बोल्या कड़े चल्या साइकिल ने ठा कै
खड़ी करदे हड़े स्टैंड ला कै
ओर भाग ले घर ने रेस लगा कै
या हे तो बची सै कुल मिला कै
इसे ने चल पड़ा तू नु हे ठा कै
साइकिल ने हुड़े ए स्टैंड ला कै
मैं भाग्या घरने बच बचा कै
फेर देख्या मन्ने चाँदने मैं आ कै
एक सो का नोट बचा सै कुल मिला कै
जो लको राख्या था मन्ने आट मैं ला कै
वे अड़तालीस रुपए तो जोड़े थे ऊपर के बना कै
ये सो रुपए ए तो लाया था मेहनत के कमा कै
 
दादा नील्ले खागड़ हो!

दादा नील्ले खागड़ हो, तैने आज भी टोहन्दा हांडु हो|
नहीं पाया रहबर गाम की सीम्मां का, तेरे बरगा दूज्जा हो||

गाम के बुड्डे खागड़ का, तैने बदला लिया खेड़े आळी लेट म,
ड्यंग पाट्टी नही बैरी पै ज्यब धरया तैने अपणी फेट म|
रुक्का पाट्या तेरी रहबरी का दूर-दूर लग की हेट म,
आंडीवारें गाम की गाळआं, रहन्दा रात्याँ खेत म||
नहीं पाया रहबर गाम की सीम्मां का, तेरे बरगा दूज्जा हो||

रोज सांझ नैं आया करदा, जाणू कोए सिद्ध-जोगी हो,
गाळ म एक बै धाहड्या करदा, ज्यब घुड़ की डळी ले मैं आया करदा|
बड़े चा तें मेरे हाथां नैं चाट-चाट तू खाया करदा,
गात पै खुर्रा फेरूँ ताहरै, इस बाबत फेर पूंजड़ ठाया करदा||
नहीं पाया रहबर गाम की सीम्मां का, तेरे बरगा दूज्जा हो||

दो पल भिक्षा की बाट देखण की तैनें, मर्याद कदे तोड़ी नहीं,
दादी बरसदी मेरे पै जै टेम पै टहल तरी मोड़ी नहीं|
दूसरा दर जा देख्या तन्नै जो मेरे पै बार माड़ी सी हुई नहीं,
पर कदे भी देळ की लछमन-रेखा, तःम्ने लांघी नहीं||
नहीं पाया रहबर गाम की सीम्मां का, तेरे बरगा दूज्जा हो||

खागड़ सून्ने न्यडाणे की राह भोत चढ़े,
तू ए बताया जिसनें सबके मोर्चे खूब अड़े|
एक-एक खैड़ तेरी गाम की गाळआँ नैं सरणा ज्यांदी,
स्याह्मी आळए खागडाँ की जोहडाँ बड़ें ज्यान छूटदी||
नहीं पाया रहबर गाम की सीम्मां का, तेरे बरगा दूज्जा हो||

उत्तराधिकारी नैं ब्यरासत सोंपणी तन्नें खूब स्य्खाई हो,
ज्यब नया बाछड़ा हुया तैयार, तू गाम की गाळ त्यज जाई हो|
सांझरण आळी पाळ बणी डेरा, तैनें जग-मोह तैं सुरती हटाई हो,
माणस भी के जी ले इह्सी बैराग ज्यन्दगी तैनें प्रणाई हो||
नहीं पाया रहबर गाम की सीम्मां का, तेरे बरगा दूज्जा हो||

आज भी तरी तस्वीर मग्ज म न्यूं की न्यूं धरी, ओ गाम के मोड़ हो|
गाम का द्योता, गाम का रुखाळआ, तू था गाम का खोड़ हो|
लियें तासळआ दळीये का हांडू, न्यडाणे के काल्लर-लेट हो,
फुल्ले-भगत की भेंट स्वीकारिये, नहीं आगै करूँ को अळसेट हो|
नहीं पाया रहबर गाम की सीम्मां का, तेरे बरगा दूज्जा हो||

दादा नील्ले खागड़ हो, तैने आज भी टोहन्दा हांडु हो|
नहीं पाया रहबर गाम की सीम्मां का, तेरे बरगा दूज्जा हो||
 
पैसे पेड़ो पर नही उगते
हा आप सच ह कहते
पेड़ो पर उगते तो हमारे आँगन का नीम होता हमारा धनदाता
फिर हमारे खेत का वो पीपल यु ही न काटा जाता
होते जो पेड़ो पर पैसे
न हम भूखे रहते ऐसे
मनमोहन तुम सच कहते हो
तुम तो वही रहते हो
जहाँ पैसो की खदान है
जिससे हम अनजान है
उस खदान में है कोमनवाल्थ का खेल
उस खदान में है कोयले से भरी रेल
उस खदान में मोज करता है राजा
हम बजाते है भूके पेट बाजा
हम फिर भी खुश है रहते
सच है मनमोहन
पैसे पेड़ो पर नही उगते




------जगबीर सिंह राठी
 
"सोच विचार में"

रोऊ सूं पड्या मैं एकला सोच विचार में

छोड्गी क्यूं मैंने मेरी जान मझधार में

के था कसूर मेरा बोल के नही गई
गाँठ नाराजगी की खोल के नही गई
हाय के करूं मेरा दम घुटता जा रह्या सै
मैं ए जाणु सूं सांस क्यूकर आ रह्या सै
कोन्या सै जीवण का इब मन संसार में
छोड्गी क्यूं मैंने मेरी जान मझधार में

नाम नये उसके रोज धरया करता
कदे लाडली कदे लाडो कह्य करता
हौसला बढ़े था वो जद मुस्कुरावे थी
रग रग में लहू बनके दौड़ लगावे थी
बेरा ना के होया सै चाणचक प्यार में
छोड्गी क्यूं मैंने मेरी जान मझधार में

बजगे सै बारा मेरी दोस्तों शक्ल में
ढूंढ़ रह्या सूं उसने दर्द की गजल में
इसा लागे सै वा जणू इब्बे आवेगी
सर मेरा ठाके गोद में धरावेगी
सांस चाल री सै इस्से एतबार में
छोड्गी क्यूं मैंने मेरी जान मझधार में

वक्त तेरा नाश जावे तैने खूब करी
गलतफहमी में भर दी मेरी चाँदपरी
सामण की ज्यूं बरसै सै आँख सवेर तै
मैं नही पाउँगा गर सुध लेई देर तै
आत्मा बेचैन सै उसके इंतजार में
छोड्गी क्यूं मैंने मेरी जान मझधार में
 
"गुण बिन लाज, लाज बिन मतलब, बिन मतलब के प्यार नहीं"

रस बिन इश्क, इश्क बिन आशिक, आशिक बिन संसार नहीं,

गुण बिन लाज, लाज बिन मतलब, बिन मतलब के प्यार नहीं!

धन बिन ध्यान, ध्यान बिन दाता, दाता बिन जग सुना है,
सत बिन पुरुष, पुरुष बिन तिरया, तिरया बिन घर सुना है,
रन बिन सुरे, सुरे बिन तेगा, तेगा बिन तर सुना है,
सत बिन करम, करम बिन किश्मत, किश्मत बिन नर सुना है,
हर बिन हार, हार बिन हाणी-२, और हाणी बिन हुशियार नहीं,
गुण बिन लाज, लाज बिन मतलब, बिन मतलब के प्यार नहीं!.....

शशि बिन रैन, रैन बिन तारे, तारे बिन गगन सुना सै,
कुल बिन रात, रात बिन बुलबुल, बुलबुल बिन बन सुना सै,
रंग बिन रूप, रूप बिन जोबन, जोबन बिन तन सुना सै,
मोह बिन मेर, मेर बिन ममता, ममता बिन मन सुना सै,
कहे बिन हुकम, हुकम बिन हाकिम-2, हाकिम बिन हक़दार नहीं,
गुण बिन लाज, लाज बिन मतलब, बिन मतलब के प्यार नहीं!.....

मन बिन मेर, मेर बिन प्यारा, प्यारे बिन दो बात नहीं,
जर बिन ठाठ, ठाठ बिन जारी, जारी बिन उत्पात नहीं,
प्रजा बिन देश, देश बिन कातिल, कातिल बिन अपघात नहीं,
चिड़िया रह, सजन की गेल्याँ बिछड़े पाछै साथ नहीं,
दुःख बिन दर्द, दर्द बिन दुखिया-2, दुखिया बिन फटकार नहीं,
गुण बिन लाज, लाज बिन मतलब, बिन मतलब के प्यार नहीं!

लोभ बिन लोभी, लोभी बिन क्रोधी, क्रोध बिना अपमान नहीं,
कुल बिन कदर, कदर बिन शोभा, शोभा बिन सम्मान नहीं,
भाव बिन भगत, भगत बिन भगती, भगती बिन कल्याण नहीं,
सुर बिन साज, साज बिन गाना, गाने बिन शुद्ध तान नहीं,
गुर बिन ज्ञान, ज्ञान बिन मेहर सिंह-२, गाने का अधिकार नहीं,
गुण बिन लाज, लाज बिन मतलब, बिन मतलब के प्यार नहीं!

रस बिन इश्क, इश्क बिन आशिक, आशिक बिन संसार नहीं,
गुण बिन लाज, लाज बिन मतलब, बिन मतलब के प्यार नहीं!
 
एक क्य्सान के च्यार रूप सुणे!

एक क्य्सान के च्यार रूप सुणे, इह्सा देख्या तगाजा चाळआ हे|
अन्नदाता, रक्षक, रोजीदाता इसमें, यू न्याकारी भा आळआ हे||

तात्ता-सीळआ देख्या कदे ना, समूं-सुझाई चाल्या हे,
सांपा के मुहां पाँ रहे सदा, खाळआं गात अड़ाए हे|
रायत बधी चैहे पाणी चढ़े, अयन्सान भूखा ना रह ज्या हे,
गात गाळ कें पेट भरण के धर्म की श्यान सदा पुगाई हे||
यू खुडाँ-खुडाँ खटे तै, लोगाँ का सुवाद बनै न्यराळआ हे|
अन्नदाता, रक्षक, रोजीदाता इसमें, यू न्याकारी भा आळआ हे||

लोकतंत्र का ज्ञान त्यरे म्ह, देख्या सबतें टळमा हे,
खाप बणाई तन्ने, यू न्यातन्त्र का उपरला खरणा हे|
दुनिया कणछै तोड़ण नैं, त्यरी न्या की इस भेरी नैं,
स्प्रे-ठावें मन-भरमावें न्या इह्सा सस्ता क्युकर ठयाणा हे||
हळद लगै न फटकड़ी, रंग चोक्खे का चोक्खा ए पाणा हे|
अन्नदाता, रक्षक, रोजीदाता इसमें, यू न्याकारी भा आळआ हे||

स्वभिमान्नी अर समर्थ ईतणा, रक्ष्या का सांग भी जोड्या हे,
बड़े-बड़े राजां के जुल्मी राज हाथ लिए, जो राजा राह तैं ब्यद्का हे|
खाप-सेना राखी तैयार बणा कें, नवाब्बी धोख्याँ म आया कदे ना हे,
बड़े-बड़े राज बणा कें खड़े कर दिए, फ्यरंगी भी तोड़ ना पाए हे||
लोकतंत्र कहें इसे नैं जडै, दांती प्यघळआ तल्वायर बणदी आई हे,
लोगाँ के रयात नैं बारहा बजदे, तैने द्यन-धोळी रयात बणाई हे||
विक्टोरिया क्रोस तें ले कारगिल लग, तरया जज्बा उत-मटिल्ला हे|
अन्नदाता, रक्षक, रोजीदाता इसमें, यू न्याकारी भा आळआ हे||

आज बतावें सदियाँ तें एक-ए काम करणियाँ नैं आरक्षण दे रहे सें,
तेरे तैं पराणा कर्म किसका, फेर भी खड़े मुंह फेरें सें|
सब धंधे चलें तेरे तैं, चाहे रोजगार हो चाहे खाणा हे,
दो पाट्टा ब्यचाळए प्यसदा आया, फेर भी धन्ना भगत कुहाया हे|
पर रोऊँ आज की दुनिया म, ज्यब देखूं तन्ने उघाणा हे|
फुल्ले भगत राह जोह्वे छोटूराम तेरा फेर कद बनै आणा हे||
अन्नदाता, रक्षक, रोजीदाता इसमें, यू न्याकारी भा आळआ हे||

एक क्य्सान के च्यार रूप सुणे, इह्सा देख्या तगाजा चाळआ हे|
अन्नदाता, रक्षक, रोजीदाता इसमें, यू न्याकारी भा आळआ हे||
 
दशहरा

दशहरे के मौके पै आओ उल्हाना उतार देवां
अपने अपने मन का मिलके रावण मार देवां

हम भरत लक्ष्मन सा तो राम की सेवा करां
या फिर राम बनके छोट्या पै सब वार देवां

दिलों दिमाग त नफरत का ख्याल काढ के
अपने हर रिश्ते नै प्यार के बदले प्यार देवां

इज्जतदार समाज हो सोच गर या लेरे सो
छोरियां नै लेके आओ नजरियाँ संवार देवां

बेशक जाके चाँद पै कोए भाई प्लाट कटवाले
पर सदा औकात नै हम जमीनी आधार देवां

शूर्पनखा की माना तो,भाई होवे रावण बरगा
इस सच्चाई पै आओ अपणे हम विचार देवां

जात धर्म गरीबी और महंगाई की दुश्मन हो
आवो समाज नै हम मिलकर वा सरकार देवां
 
"जाड़ा आग्या"

जाड़ा आग्या इब तो करामात होया करेगी
दो कौफी में लम्बी मुलाक़ात होया करेगी

स्वेटर जाकेट पहर के मैं भी मोटा दिखूंगा
मेरी कमजोरी पर ना इब बात होया करेगी

कितनी ए कॉफ़ी पी ले, वा सहेलियां कै संग
ना बिल नै लेके कोए खड़ी खाट होया करेगी

दिसम्बर जनवरी में जद भी बैठांगे पार्क में
गुनगुनाती धुप भी माहरे साथ होया करेगी

हाथ पकड़ के चालांगे तो किसे ना दिखांगे
जद धुंध आल्ली बरसात होया करेगी
 
बड़े कसट ठा क आया सु


बड़े कसट ठा क आया सु तेरे प्यार म
म बाल कटा क आया सु तेरे प्यार म

काल कह थी तू मैंने भूनडे मुहे का
आज नहा क आया सु म तेरे प्यार म

तू नुए कह थी तेरी अनखा न फोड दूंगी
देख चश्मे ला क आया सु तेरे प्यार म

तू नुए कह थी तेरी बूरसट न पाड दूंगी
टी -सर्ट पहर क आया सु तेरे प्यार म

तू नुए कह थी मेरे भाई न ना दिख जाइये
गुलाबो छुप छुपा क आया सु तेरे प्यार म

तू नुए कहवे थी घरक्या क पिछान म नहीं आवेगा
नाम हाथ प खुदवा क आया सु तेरे प्यार म
 
किसे और की कहाणी कोन्या

किसे और की कहाणी कोन्या इसमैं राजा रानी कोन्या
सै अपनी बात बिराणी कोन्या, थोड़ा दिल नै थाम लियो।।
यारी घोड़े घास की भाई, नहीं चलै दुनिया कहती आई
मैं बाऊं और बोऊं खेत मैं, बाळक रुळते मेरे रेत मैं
भरतो मरती मेरी सेत मैं, अन्नदाता का मत नाम लियो।।

जमकै लूटै सै मण्डी हमनै, बीज खाद मिलै मंहगा सबनै
मेहनत लुटै मजदूर किसान की, आंख फूटी क्यों भगवान की
भरै तिजूरी क्यों शैतान की, देख सभी का काम लियो।।

चाळीस साल की आजादी मैं, कसर रही ना बरबादी मैं
बाळक म्हारे सैं बिना पढाई, मरैं बचपन मैं बिना दवाई
कड़ै गई म्हारी कष्ट कमाई, झूठी हो तै लगाम दियो।।

शेर बकरी का मेळ नहीं, घणी चालै धक्का पेल नहीं
टापा मारें पार पडैग़ी धीरे, मेहनतकश रुपी जितने हीरे
बजावैं जब मिलकै ढोल मंजीरे, रणबीर का सलाम लियो।।
 
[FONT=lucida grande, tahoma, verdana, arial, sans-serif][/FONT][FONT=lucida grande, tahoma, verdana, arial, sans-serif]"रावण" ( जगबीर राठी )[/FONT][FONT=lucida grande, tahoma, verdana, arial, sans-serif]
[/FONT]
उस दिन च्यारूं ओर, रौनक का पहरा था
और सॉलाँ की ढाल, उस दिन भी दशहरा था
लोग एक मैदान मैं कट्ठे हो, रावण नैं फूक आये
नई-नई बोहड़िया चहकैं थीं, थे बालक भी हर्षाये
सब कुछ उसा-ए था, कुछ भी ना नया था
जलता हुआ रावण देखण, मैं भी तो गया था
फूस जल्या, फेर रावण भी जलग्या
गरीबणी के जोबन-सा ओ ढलग्या
दशहरै कै नाम पै, जो होणां था होग्या
मैं भी घराँ आ कै, फटकार कै सोग्या
नींद के म्हाँ सुपने का, धूम्मां-सा छाग्या
चॉला होग्या मेरे सुपने मैं, वो-ए रावण आग्या
उस दिन रावण बहोत दुःखी था
न्यू बोल्या, भाई मैं बहोत सुखी था
थाम सबका दिमाग तो किताबां न भरमाया
पर किसै नै भी ना मेरे दिल का हाल सुणाया
भाई ताकत थी देही मैं, ज्याँ तैं थोड़ा गरूर था
दशरथ नै राम घर तै काढ़ दिया, मेरा के कसूर था
सब आपणे-आपणे घर मैं नचीत हो कै सौवे सैं
जिसी चाहिये जिसनै जीनस, उसा-ए बीज बोवैं
ब्योंत था मेरा, ज्यां तैं हर कोय चिलम भर रहया था
आपणा राज चला रहया था, बता के जुल्म कर रहया था
कोय पूछणिया हो, कोय क्यूकर आपणै आपे मैं रह लेगा
कोय थारी बहाण की नाक काट ले, बता क्यूकर सह लेगा
मैं तो बहोत ठीक था, मन्नै ठाई होई सीता ना सताई
पर उन नैं या के करी, वा-ए सीता आग पै बिठाई
न्यू कहैं सैं, वो धर्म बचावण नै जंगलाँ मैं आ रहया था
कित था उसका धर्म, जब उसनै बाली लुक कै मारया था
थोड़ा-सा तीर-ए लॉगा था लछमण कै, के ठाडू रोया था
कुम्भकरण भी तो मेरा भाई था, मैं ना बिल्कुल रोया था
रहया-खहया कॉलजा तो वे उस दिन काढ़ लेगे थे
जब मेरे भाई विभीषण नै, मेरे तैं वे पाड़ लेगे थे
फेर इसा आदमी क्यूकर मन मै भगवान-सा रच सकै सै
जिस देस मै हो भाई-भाई का बैरी, वो बता क्यूकर बच सकै सै
भाई-भाई का बैर-ए नास ठाग्या
बस मैं आड़ै-ए मार खाग्या
इब थाम मन्नै बुरा बता कै थूकदे रहो
बेसक आये साल मन्नै फूकदे रहो
 
हीड़ो रै हीड़ो!

हीड़ो रै हीड़ो, आज ग्यरड़ी तड़कै द्यवाळी हीड़ो रै हीड़ो|
गाम जळआवै गादड़ की पीढ़ी, रोशनाई चढो रे चढो||

पंढे-बास्सण ले-ल्यो नए, घर के भाग खुल ज्यां ठये,
तिजोरियां पै चुग्गे बळएं, लछमी खूब-ए-खूब फळऐ|
पयत्राळ-मोरी पै जो धरें, घर के भाग फिरें-ऐ-फिरें,
धनभाग कुम्हार तेरा चाक हो, जिसपै यें ख़ुशी घड़ें||
माट्टी च्यकणी जोहड़-डहरां की, बीनो-रै-बीनो,
हीड़ो रै हीड़ो, आज ग्यरड़ी तड़कै द्यवाळी हीड़ो रै हीड़ो|
गाम जळआवै गादड़ की पीढ़ी, रोशनाई चढो रे चढो||

या गांडळी मरदो त्यरे ना की, बेदु आळी पाळ बंटी,
रोज चंदे मोरां के चुगे, जिनतें इसकी ग्याँठ बुणी|
टंकार-घुंघरू बळधां के, गेल जूटी थी दो-च्यार सणी,
जोहड़ नुहाऊं गात चमकाऊं, के रूंडी-खुंडी के रोजणी||
तेल लाऊं सीन्गां कै, गांडळी मोर-फुल्लां की गळ म्ह बिणी,
गामी झोटे-खाग्गड़ के घेट भी, कान्नां लग जां ल्य्दो-ल्य्दो|||
हीड़ो रै हीड़ो, आज ग्यरड़ी तड़कै द्यवाळी हीड़ो रै हीड़ो|
गाम जळआवै गादड़ की पीढ़ी, रोशनाई चढो रे चढो||

द्यवाळी का दयन बताया, खेतां तें पहला गंडा पाड़ण का,
समाई का फळ यू गंडे की म्यठास म्ह लबड़-लबड़ सुर्डाणे का|
सांझी दशेरे नै जो बुहाई, भाई गेल्याँ उसनै उलटी मोड़ण का,
कायत्ग के गीतां की गूँज म्ह, दशरथ के पूताँ नैं टोह्वण का||
हे-माँ-मेरी, हे-माँ-मेरी, हे-जी मन्नै राम म्यले स्यमाणे गूंजो-हे-गूंजो,
हीड़ो रै हीड़ो, आज ग्यरड़ी तड़कै द्यवाळी हीड़ो रै हीड़ो|
गाम जळआवै गादड़ की पीढ़ी, रोशनाई चढो रे चढो||

गाळआं चढु अल्ल्हड़ भरूँ, टोळआं के टोळआं म्ह,
हीड़ो आळी ज्योत चढ़ी बळऐ, ज्यन्दगी धक्कम पेल म्ह|
जो च्य्ढ़ ज्या पार उतर ज्या, दुनियादारी की रोळ म्ह,
हीड़ो-रै-हीड़ो जो गाळ म गूंजी, जा मिली नभछोर म्ह||
फुल्ले-भगत नैं छोड्डी फुलझड़ी, खूब चसो-रे-चसो,
हीड़ो रै हीड़ो, आज ग्यरड़ी तड़कै द्यवाळी हीड़ो रै हीड़ो|
गाम जळआवै गादड़ की पीढ़ी, रोशनाई चढो रे चढो||
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Source: Nidana Heights!
 
बिग् बाजार

छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था

एक नाई, एक खाती ,एक काला लुहार था ।
छोटे घर थे ,हर आदमी बङा दिलदार था
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था ।

कितै रोटी खां लेतै ,हर घर मे भोजऩ तैयार था,
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था ।
बिटोङे पे घिया तौरी हो जाती
जिसके आगे शाही पनीर बेकार था,
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था ।

दो मिऩट की मैगी ना ,झटपट दलिया तैयार था,
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था ।
नीम की निबॊँली और शहतुत सदाबहार था,
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था
अपणा घङवा कस बजा लेते “
अपना रलदू “पुरा संगीतकार था
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था
 
म्हारे बचपन के दिन

तडके तडक उठ्या करते....

जोहड पै घूमण जाया करते
कुईं के पाणी मै नहाया करते
उडै ए भाजम भाज रेस लाया करते
नहर धोरै रेत मै लोटया करते
फेर पुल पै तै ए नहर मै कूदया करते

सरकारी सकूल मै जाया करते
मास्टरां के नाम लकाडा करते
सकूल का ओटडा कूद कै भाज जाया करते
फेर बड के पेड पै खेलया करते
सारी दोफारी हाण्डया करते
आपै आप कुछ हो बाण्डया करते

आज तो सब क्यम बदल गया
कुईं का पाणी सूख लिया
बड का पेड भी टूट लिया
सरकारी सकूल की जगहा
पराइवे्ट दफतर हो लिया
इब तै शडयूल का तो
नास तै बती उजाड हो लिया
इब वो जिसे नही आ पाते
काश म्हारे बचपन के दिन लोट आते
 
भगत सिंह

शहर में लॉग रहया मेलॉ,

लोगाँ का कट्ठा होरया रेला
मैं अर छोरा दोनूँ मिलकै
पहुँचगे उड़ै ले कै झोलॉ
छोरा बोल्या, बाबू मिजी ल्यूँगा
खावण ख़ातर चीजी ल्यूँगा
खूब खाया, फेर ध्यान घुमाया
एक आदमी गुड्डे बेचता पाया
छोरे नैं सिपाही का गुड्डा ठाया
दुकानदार भी था घणा हुमाया
बोल्या, यू चाबी का खिलौणा सै
खूब मजे का उसका बिछौणा सै
चाबी भरते ही बूट कै बूट मारैगा
इसा ज़ोर का सैलूट मारैगा
डण्डा घुमावैगा, लाग्या तो रूवावैगा
इसा खिलौणा और किते ना पावैगा
पीसे दे दो, पचास रुपये में आवैगा
मैं बोल्या, तू हामनैं के बहकावैगा
इन खिलौणां पै इतना क्यूँ इतरावै सै
पचास रुपये मैं तो असली का पुलिसिया आवै सै
सुण कै दुकानदार के तेवर चढ़गे
हाम दोनूं भी ऑगे बढ़गे
फेर छोरे नै एक पोस्टर नज़र आया
उसनै झट एक सवाल फरमाया
न्यूँ बोल्या, बाबू यू कुणसा हीरो सै
पोस्टर की कलर-स्कीम तो ज़ीरो सै==>
==> कुणसी फिल्म में आया
पिछाण ना पाऊँ, कै चालै से
म्हारे देश के हीरो तो मूछ मुण्डे सैं
यू तो मूच्छाँ ऑला हीरो सै
मैं बोल्या, बेटे यू असली हीरो सै
तेरा सलमान, शाहरूख इसके आगै ज़ीरो सै
इसनैं अंग्रेजाँ की ज़्यान का कट करया था
बम फोड़ कै असली का स्टंट भरया था
घर-बार, माँ-बाप नै भूला था
हंसते-हंसते फांसी पै झूला था
हीरोइन इसकी मौत थी
गुलामी इसकी सौत थी
जिसके दम पै अंग्रेज़ इस देश तैं बाहर सै
सच बताऊँ मेरे लाडले, यू भगत सिंह सरदार सै
छोरा बोल्या, समझग्या मैं, पर बात मैं कुछ रोल सै
क्यूँ बहकावै सै बाबू, यू तो बाबी दयोल सै
मैं आसमान कॉनी लख़ाया
भगतसिंह बादलाँ मैं नज़र आया
मैं रो पड़ा; बोल्या, सरदार म्हारै मैं खोट सै
आज फांसी के फन्दे तैं भी कसूती या चोट सै
आज दिन में पहली बार अपणे-आप में शर्माया
गलती मेरी सै; मन्नै, नई पीढ़ी ताँय तेरा बलिदान ना बताया
 
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