तू इस कदर मुझे अपने करीब लगता है
तुझे अलग से जो सोचूं , अजीब सा लगता है
जिसे न हुस्न से मतलब न इश्क से सरोकार
वो शख्स मुझको बहुत बदनसीब लगता है
हदूद ऐ जात से बाहर निकल के देख ज़रा
न कोई गैर , न कोई रकीब लगता है
ये दोस्ती , ये मरासिम , ये चाहतें , ये खुलूस
कभी कभी ये सब कुछ अजीब सा लगता है...