A small poem by Dinesh Raghuvanshi
जिनके हिस्से अपनी माँ की लोरियाँ आती नहीं
उनके सपनों में भी परियाँ, तितलियाँ आती नहीं
नींव पर जो स्वार्थ की चुनते गये, बुनते गये
ऐसे रिश्तों में कभी नजदीकियाँ आती नहीं
मेरी इन आँखों के आँसू जानते हैं बात ये
मेरी पलकों तक कीसी की उँगलियाँ आती नहीं
एक मुददत...