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    Hindi Kavita

    उसकी चूड़ी, उसकी बेंदी, उसकी चुनर से अलग। मैं सफर में भी न हो पाया कभी घर से अलग। गो कि मेरी ‘पास-बुक’ से भी बड़े थे उनके ख्वाब फिर भी उसने पाँव फैलाये न चादर से अलग। मुझसे वो अक्सर लड़ा करती है, मतलब साफ है वो न भीतर से अलग है, वो न बाहर से अलग। पत्रिकायें उसके पढ़ने की मैं लाया था...
  2. T

    Hindi Kavita

    कभी की जा चुकीं नीचे यहाँ की वेदनाएँ, नए स्वर के लिए तू क्या गगन को छानता है ? [1] बताएँ भेद क्या तारे ? उन्हें कुछ ज्ञात भी हो, कहे क्या चाँद ? उसके पास कोई बात भी हो। निशानी तो घटा पर है, मगर, किसके चरण की ? यहाँ पर भी नहीं यह राज़ कोई जानता है। [2] सनातन है, अचल है, स्वर्ग चलता ही...
  3. T

    Hindi Kavita

    (1) आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ? मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ? आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं, पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं। (2) हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले, पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले। इनके जादू का...
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    Is China now really become a concern for india?

    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से , जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से |" " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ? डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
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