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पगली लड़की
डॉ कुमार विश्वाश

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग घुलता है
जब पिछवाडे के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं, अकेले होते हैं
जब घडियां टिक टिक चलती हैं , सब सोते हैं, हम रोते हैं
जब बार बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं
जब उंच नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती हैं
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है
और उस लड़की बिन मरना भी भारी लगता है

जब पोथे खाली होते हैं, जब हर्फ़ सवाली होते हैं
जब गजलें रास नहीं आती, अफ़साने गाली होते हैं
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जाता है
जब सूरज का लश्कर छत से गलियों में देर से जाता है
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है
जब कालेज से घर जाने वाली पहली बस छुट जाती है
जब बेमन से खाना खाने से माँ गुस्सा हो जाती हैं
जब लाख मना करने पर भी पारो पढने आ जाती है
जब अपना मनचाहा हर काम कोई लाचारी लगता है
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है
और उस लड़की बिन मरना भी भारी लगता है

जब कमरे में सन्नाटे की आवाज सुने देती है
जब दर्पण में आँखों के निचे झाई दिखाई देती है
जब बडकी भाभी कहती है, कुछ सेहत का भी ध्यान करो
क्या लिखते हो लल्ला दिनभर, कुछ सपनो का भी सम्मान करो
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं
जब बाबा हमें बुलाते हैं, हम जाने में घबराते हैं
जब साड़ी पहने लड़की का एक फोटो लाया जाता है
जब भाभी हमें मानती है, फोटो दिखलाया जाता है
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है

दीदी कहती हैं कि उस पगली लड़की कोई औकात नहीं
उसके दिल में भैया, तेरे जैसे प्यारे जज्बात नहीं
वो पगली लड़की मेरे लिए नो दिन भूखी रहती है
चुप चुप सारे व्रत करती है, पर मुझसे कभी न कहती है
जो पगली लड़की कहती है में प्यार तुम्ही से करती हूँ
लेकिन हूँ मजबूर बहुत , अम्मा बाबा से डरती हूँ
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा
ये कथा कहानी किस्से हैं कुछ भी तो सार नहीं बाबा
बस उस पगली लड़की के संग जीना फुलवारी लगता है
और उस पगली लड़की बिन मरना भी भारी लगता है

आप इस कविता को इस विडियो में सुन भी सकते हैं!



http://www.youtube.com/watch?v=nLguUMngR0k


चियर्स
 
Last edited:
हम अखबार उठाते हुए भी डरते हैं, क्योंकि हमें मालूम है, मुख पृष्ठ पर कुछ भी अच्छा नहीं लिखा होगा . इस सब के जिम्मेदार हैं आज के कमज़ोर और बेईमान राजनेता . जिनको सिर्फ पैसा दिखता है
इसी सन्दर्भ में श्री सतपाल ख्याल जी एक कविता यहाँ छाप रही हूँ


खौफ़ से सहमी हुई है खून से लथपथ पड़ी
अब कोई मरहम करो घायल पड़ी है ज़िंदगी।

पुर्जा-पुर्जा उड़ गए कुछ लोग कल बारुद से
आज आई है खबर कि अब बढ़ी है चौकसी।

किस से अब उम्मीद रक्खें हम हिफ़ाजत की यहाँ
खेत की ही बाड़ सारा खेत देखो खा गई ।

यूँ तो हर मुद्दे पे संसद में बहस खासी हुई
हल नहीं निकला फ़कत हालात पर चर्चा हुई।

कौन अपना दोस्त है और कौन है दुश्मन यहाँ
बस ये उलझन थी जो सारी ज़िंदगी उलझी रही।

अपना ही घर लूटकर खुश हो रहें हैं वो ख्याल
आग घर के ही चरागों से है इस घर मे लगी।

सतपाल 'ख्याल'

 
जीवकी न आपाधापी

जीवकी न आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
------ harivansh rai bachchan
 
संवेदनाओं को इस कविता में जिस प्रकार से उतारा गया है, उससे यह कविता अपने आप में बहुत कुछ कहती है । भावनाओं के समंदर में बहा ले जाने वाली रचना के लिए 'रचना' जी बधाई की पात्र हैं ।



पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot]
[/font]हमसे दूर ईश्वर का सहारा बन गए[font=&quot]
[/font]पार्क में बच्चे पापा के साथ खेलते हैं[font=&quot]
[/font]कभी दौड़ते कभी कंधे पर चढ़ते हैं[font=&quot]
[/font]मै दूर बैठा उनको देखा करता हूँ[font=&quot]
[/font]बस तुम को ही सोचा करता हूँ[font=&quot]
[/font]पहले से जीने के ढंग गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot][/font]

[font=&quot]
[/font]माँ काम करते करते थक जाती है[font=&quot]
[/font]कहानी रात को कभी कभी ही सुनती है[font=&quot]
[/font]ब्रश मे फस्ट आने का कॉम्पटीशन कोई करता नहीं[font=&quot]
[/font]सच पापा अब तो ब्रश करने का ही मन करता नहीं[font=&quot]
[/font]मेरे जीवन के तो सारे रंग गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot]

[/font]मै अकेले स्कूल जाता हूँ[font=&quot]
[/font]आप कि कही बातो को मन मे दोहराता हूँ[font=&quot]
[/font]किनारे चलो ऊँगली पकडो मत दौडो[font=&quot]
[/font]पर ऊँगली पकड़ने को जो हाथ बढ़ता हूँ[font=&quot]
[/font]तुम को वहां नहीं पाता हूँ[font=&quot]
[/font]मेरे तो सब सहारे[font=&quot] [/font]गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot]

[/font]रोज मै तुम से बात करता हूँ[font=&quot]
[/font]तारों मे तुम को खोजा करता हूँ[font=&quot]
[/font]जब छाते हैं बादल तो बहुत रोता हूँ[font=&quot]
[/font]तुम को नहीं देख पाउँगा बस यही कहता हूँ[font=&quot]
[/font]आंसूं[font=&quot] [/font]अब मेरे साथी बनगए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बनगए[font=&quot]

[/font]शाम आती है पर तुम आते नहीं[font=&quot]
[/font]कैसे हो बेटे कह के गोद में उठाते नहीं[font=&quot]
[/font]एक बार कहो[font=&quot]
[/font]क्या मिला होमवर्क रहा कैसा स्कूल[font=&quot]
[/font]दो हाई फाई लग रहे हो कितने कूल[font=&quot]
[/font]मस्ती भरे सारे वो पल गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बनगए[font=&quot]

[/font]जब कहता हूँ चॉकलेट लाने को[font=&quot]
[/font]बहला के मुझे दे देती है गुड खाने को[font=&quot]
[/font]दो वक्त कि रोटी मिलजाए तू स्कूल जा पाए[font=&quot]
[/font]बस इतना कमा पाती हूँ मै[font=&quot]
[/font]इसी लिये तेरा कहा नहीं कर पाती हूँ[font=&quot]
[/font]अब[font=&quot] [/font]मेरी खाव्हिशों के दिन गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बनगए[font=&quot]

[/font]मै माँ से माँ मुझ से छुप के रोती है[font=&quot]
[/font]अक्सर खाने की ३ प्लेट धरती है[font=&quot]
[/font]मै उसके लिये हसीं कमाना चाहता हूँ[font=&quot]
[/font]आप जैसा घर का ख्याल रखना चाहता हूँ[font=&quot]
[/font]मै जल्दी से बड़ा होना चाहता हूँ[font=&quot]
[/font]मेरे खेलने के दिन गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए
[font=&quot][/font]
[font=&quot] [/font]
[font=&quot]‘[/font]रचना[font=&quot] [/font][font=&quot]‘[/font]

रुला दिया ........
 
पगली लड़की
डॉ कुमार विश्वाश

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग घुलता है
जब पिछवाडे के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं, अकेले होते हैं
जब घडियां टिक टिक चलती हैं , सब सोते हैं, हम रोते हैं
जब बार बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं
जब उंच नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती हैं
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है
और उस लड़की बिन मरना भी भारी लगता है

जब पोथे खाली होते हैं, जब हर्फ़ सवाली होते हैं
जब गजलें रास नहीं आती, अफ़साने गाली होते हैं
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जाता है
जब सूरज का लश्कर छत से गलियों में देर से जाता है
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है
जब कालेज से घर जाने वाली पहली बस छुट जाती है
जब बेमन से खाना खाने से माँ गुस्सा हो जाती हैं
जब लाख मना करने पर भी पारो पढने आ जाती है
जब अपना मनचाहा हर काम कोई लाचारी लगता है
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है
और उस लड़की बिन मरना भी भारी लगता है

जब कमरे में सन्नाटे की आवाज सुने देती है
जब दर्पण में आँखों के निचे झाई दिखाई देती है
जब बडकी भाभी कहती है, कुछ सेहत का भी ध्यान करो
क्या लिखते हो लल्ला दिनभर, कुछ सपनो का भी सम्मान करो
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं
जब बाबा हमें बुलाते हैं, हम जाने में घबराते हैं
जब साड़ी पहने लड़की का एक फोटो लाया जाता है
जब भाभी हमें मानती है, फोटो दिखलाया जाता है
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है

दीदी कहती हैं कि उस पगली लड़की कोई औकात नहीं
उसके दिल में भैया, तेरे जैसे प्यारे जज्बात नहीं
वो पगली लड़की मेरे लिए नो दिन भूखी रहती है
चुप चुप सारे व्रत करती है, पर मुझसे कभी न कहती है
जो पगली लड़की कहती है में प्यार तुम्ही से करती हूँ
लेकिन हूँ मजबूर बहुत , अम्मा बाबा से डरती हूँ
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा
ये कथा कहानी किस्से हैं कुछ भी तो सार नहीं बाबा
बस उस पगली लड़की के संग जीना फुलवारी लगता है
और उस पगली लड़की बिन मरना भी भारी लगता है

आप इस कविता को इस विडियो में सुन भी सकते हैं!



http://www.youtube.com/watch?v=nlguumngr0k


चियर्स

मन की बात कह दी !
 
Touching..

संवेदनाओं को इस कविता में जिस प्रकार से उतारा गया है, उससे यह कविता अपने आप में बहुत कुछ कहती है । भावनाओं के समंदर में बहा ले जाने वाली रचना के लिए 'रचना' जी बधाई की पात्र हैं ।



पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot]
[/font]हमसे दूर ईश्वर का सहारा बन गए[font=&quot]
[/font]पार्क में बच्चे पापा के साथ खेलते हैं[font=&quot]
[/font]कभी दौड़ते कभी कंधे पर चढ़ते हैं[font=&quot]
[/font]मै दूर बैठा उनको देखा करता हूँ[font=&quot]
[/font]बस तुम को ही सोचा करता हूँ[font=&quot]
[/font]पहले से जीने के ढंग गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot][/font]

[font=&quot]
[/font]माँ काम करते करते थक जाती है[font=&quot]
[/font]कहानी रात को कभी कभी ही सुनती है[font=&quot]
[/font]ब्रश मे फस्ट आने का कॉम्पटीशन कोई करता नहीं[font=&quot]
[/font]सच पापा अब तो ब्रश करने का ही मन करता नहीं[font=&quot]
[/font]मेरे जीवन के तो सारे रंग गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot]

[/font]मै अकेले स्कूल जाता हूँ[font=&quot]
[/font]आप कि कही बातो को मन मे दोहराता हूँ[font=&quot]
[/font]किनारे चलो ऊँगली पकडो मत दौडो[font=&quot]
[/font]पर ऊँगली पकड़ने को जो हाथ बढ़ता हूँ[font=&quot]
[/font]तुम को वहां नहीं पाता हूँ[font=&quot]
[/font]मेरे तो सब सहारे[font=&quot] [/font]गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot]

[/font]रोज मै तुम से बात करता हूँ[font=&quot]
[/font]तारों मे तुम को खोजा करता हूँ[font=&quot]
[/font]जब छाते हैं बादल तो बहुत रोता हूँ[font=&quot]
[/font]तुम को नहीं देख पाउँगा बस यही कहता हूँ[font=&quot]
[/font]आंसूं[font=&quot] [/font]अब मेरे साथी बनगए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बनगए[font=&quot]

[/font]शाम आती है पर तुम आते नहीं[font=&quot]
[/font]कैसे हो बेटे कह के गोद में उठाते नहीं[font=&quot]
[/font]एक बार कहो[font=&quot]
[/font]क्या मिला होमवर्क रहा कैसा स्कूल[font=&quot]
[/font]दो हाई फाई लग रहे हो कितने कूल[font=&quot]
[/font]मस्ती भरे सारे वो पल गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बनगए[font=&quot]

[/font]जब कहता हूँ चॉकलेट लाने को[font=&quot]
[/font]बहला के मुझे दे देती है गुड खाने को[font=&quot]
[/font]दो वक्त कि रोटी मिलजाए तू स्कूल जा पाए[font=&quot]
[/font]बस इतना कमा पाती हूँ मै[font=&quot]
[/font]इसी लिये तेरा कहा नहीं कर पाती हूँ[font=&quot]
[/font]अब[font=&quot] [/font]मेरी खाव्हिशों के दिन गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बनगए[font=&quot]

[/font]मै माँ से माँ मुझ से छुप के रोती है[font=&quot]
[/font]अक्सर खाने की ३ प्लेट धरती है[font=&quot]
[/font]मै उसके लिये हसीं कमाना चाहता हूँ[font=&quot]
[/font]आप जैसा घर का ख्याल रखना चाहता हूँ[font=&quot]
[/font]मै जल्दी से बड़ा होना चाहता हूँ[font=&quot]
[/font]मेरे खेलने के दिन गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए
[font=&quot][/font]
[font=&quot] [/font]
[font=&quot]‘[/font]रचना[font=&quot] [/font][font=&quot]‘[/font]

My feelings are same like Lalit's for this poem, "rula diya..."

Thanks Anjali Ji, how could I miss this this one earlier?
 
संवेदनाओं को इस कविता में जिस प्रकार से उतारा गया है, उससे यह कविता अपने आप में बहुत कुछ कहती है । भावनाओं के समंदर में बहा ले जाने वाली रचना के लिए 'रचना' जी बधाई की पात्र हैं ।



पापा तुम क्यों तारा बन गए
हमसे दूर ईश्वर का सहारा बन गए
पार्क में बच्चे पापा के साथ खेलते हैं
कभी दौड़ते कभी कंधे पर चढ़ते हैं
मै दूर बैठा उनको देखा करता हूँ
बस तुम को ही सोचा करता हूँ
पहले से जीने के ढंग गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए


माँ काम करते करते थक जाती है
कहानी रात को कभी कभी ही सुनती है
ब्रश मे फस्ट आने का कॉम्पटीशन कोई करता नहीं
सच पापा अब तो ब्रश करने का ही मन करता नहीं
मेरे जीवन के तो सारे रंग गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

मै अकेले स्कूल जाता हूँ
आप कि कही बातो को मन मे दोहराता हूँ
किनारे चलो ऊँगली पकडो मत दौडो
पर ऊँगली पकड़ने को जो हाथ बढ़ता हूँ
तुम को वहां नहीं पाता हूँ
मेरे तो सब सहारेगए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

रोज मै तुम से बात करता हूँ
तारों मे तुम को खोजा करता हूँ
जब छाते हैं बादल तो बहुत रोता हूँ
तुम को नहीं देख पाउँगा बस यही कहता हूँ
आंसूंअब मेरे साथी बनगए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

शाम आती है पर तुम आते नहीं
कैसे हो बेटे कह के गोद में उठाते नहीं
एक बार कहो
क्या मिला होमवर्क रहा कैसा स्कूल
दो हाई फाई लग रहे हो कितने कूल
मस्ती भरे सारे वो पल गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

जब कहता हूँ चॉकलेट लाने को
बहला के मुझे दे देती है गुड खाने को
दो वक्त कि रोटी मिलजाए तू स्कूल जा पाए
बस इतना कमा पाती हूँ मै
इसी लिये तेरा कहा नहीं कर पाती हूँ
अबमेरी खाव्हिशों के दिन गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

मै माँ से माँ मुझ से छुप के रोती है
अक्सर खाने की ३ प्लेट धरती है
मै उसके लिये हसीं कमाना चाहता हूँ
आप जैसा घर का ख्याल रखना चाहता हूँ
मै जल्दी से बड़ा होना चाहता हूँ
मेरे खेलने के दिन गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए


[FONT=&quot]‘[/FONT]रचना[FONT=&quot]‘[/FONT]
bhaawenaaon kaa samunder hei ye kavitaa.dil ki gehraai tek jhekjhor diyaa.
 
my feelings are same like lalit's for this poem, "rula diya..."

thanks anjali ji, how could i miss this this one earlier?

ललित जी, सीताराम जाखड जी और रविंदर जीत सिंह जी

यह कविता है ही इतनी भावनात्मक किसी भी संवेदनशील मनुष्य को रुला दे .


[i]मैं माँ से माँ मुझ से छुप कर रोती हैं .......[/i]
कितनी संवेदना है इन शब्दों में
 
anjali ji last month i lost my wife and when i read this kavitaa i was not able to control myself.i know that how i and my childern are couping with this.
 
anjali ji last month i lost my wife and when i read this kavitaa i was not able to control myself.i know that how i and my childern are couping with this.

इश्वर आपको हौंसला दे
मुझे माफ़ कर दें , बहुत दुःख हुआ आपकी अर्धांगिनी की दुखद खबर से
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे
 
anjali ji last month i lost my wife and when i read this kavitaa i was not able to control myself.i know that how i and my childern are couping with this.



कभी एक पर्वत थी जिदंगी
सूनी-अकेली-अबोली-सी,
किसी ने छुआ फूल बन गई,
किसी ने झटक दिया
पाँखुरी-सी बिखर गई।
तब जाना:
न कभी वह फूल थी,
न राई-पर्वत,
एक खिलौना भर थी
टूट बिखर कर
होती रही आहत।
कोई और जिदंगी
पास आई तो
वह प्रभावित हुई
और किसी बिछोह के साथ
रह गई छुईमुई।
 
(1)
आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ?
मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ?
आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,
पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।
(2)
हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले,
पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले।
इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ?
(1)
आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ?
मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ?
आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,
पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।
(2)
हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले,
पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले।
इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ?
है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ?
(3)
झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ?
आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ?
है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी,
बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी। है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ?
(3)
झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ?
आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ?
है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी,
बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।
 
कभी की जा चुकीं नीचे यहाँ की वेदनाएँ,
नए स्वर के लिए तू क्या गगन को छानता है ?

[1]

बताएँ भेद क्या तारे ? उन्हें कुछ ज्ञात भी हो,
कहे क्या चाँद ? उसके पास कोई बात भी हो।
निशानी तो घटा पर है, मगर, किसके चरण की ?
यहाँ पर भी नहीं यह राज़ कोई जानता है।

[2]

सनातन है, अचल है, स्वर्ग चलता ही नहीं है;
तृषा की आग में पड़कर पिघलता ही नहीं है।
मजे मालूम ही जिसको नहीं बेताबियों के,
नई आवाज की दुनिया उसे क्यों मानता है ?

[3]

धुओं का देश है नादान ! यह छलना बड़ी है,
नई अनुभूतियों की खान वह नीचे पड़ी है।
मुसीबत से बिंधी जो जिन्दगी, रौशन हुई वह,
किरण को ढूँढता लेकिन, नहीं पहचानता है।

[4]

गगन में तो नहीं बाकी, जरा कुछ है असल में,
नए स्वर का भरा है कोष पर, अब तक अतल में।
कढ़ेगी तोड़कर कारा अभी धारा सुधा की,
शरासन को श्रवण तक तू नहीं क्यों तानता है ?

[5]

नया स्वर खोजनेवाले ! तलातल तोड़ता जा,
कदम जिस पर पड़े तेरे, सतह वह छोड़ते जा;
नई झंकार की दुनिया खत्म होती कहाँ पर ?
वही कुछ जानता, सीमा नहीं जो मानता है।

[6]

वहाँ क्या है कि फव्वारे जहाँ से छूटते हैं,
जरा-सी नम हुई मिट्टी कि अंकुर फूटते हैं ?
बरसता जो गगन से वह जमा होता मही में,
उतरने को अतल में क्यों नहीं हठ ठानता है ?

[7]

हृदय-जल में सिमट कर डूब, इसकी थाह तो ले,
रसों के ताल में नीचे उतर अवगाह तो ले।
सरोवर छोड़ कर तू बूँद पीने की खुशी में,
गगन के फूल पर शायक वृथा संधानता है।
 
उसकी चूड़ी, उसकी बेंदी, उसकी चुनर से अलग।
मैं सफर में भी न हो पाया कभी घर से अलग।


गो कि मेरी ‘पास-बुक’ से भी बड़े थे उनके ख्वाब
फिर भी उसने पाँव फैलाये न चादर से अलग।


मुझसे वो अक्सर लड़ा करती है, मतलब साफ है
वो न भीतर से अलग है, वो न बाहर से अलग।


पत्रिकायें उसके पढ़ने की मैं लाया था कई
फिर भी उसने कुछ न देखा मेरे स्वेटर से अलग।


सोच में उसके भरी हैं मेरी लापरवाहियाँ
यों वो सोने जा रही हैं मेरे बिस्तर से अलग।
उसकी चूड़ी, उसकी बेंदी, उसकी चुनर से अलग।
मैं सफर में भी न हो पाया कभी घर से अलग।


गो कि मेरी ‘पास-बुक’ से भी बड़े थे उनके ख्वाब
फिर भी उसने पाँव फैलाये न चादर से अलग।


मुझसे वो अक्सर लड़ा करती है, मतलब साफ है
वो न भीतर से अलग है, वो न बाहर से अलग।


पत्रिकायें उसके पढ़ने की मैं लाया था कई
फिर भी उसने कुछ न देखा मेरे स्वेटर से अलग।


सोच में उसके भरी हैं मेरी लापरवाहियाँ
यों वो सोने जा रही हैं मेरे बिस्तर से अलग।


उम्र ढलते ही बनेगा कौन मेरा आइना
हो न पाया मैं कभी उससे इसी डर से अलग।


दोस्तों, हर प्रश्न का उत्तर तुम्हें मिल जायेगा
सोचना कुछ देर घर को अपने दफ्तर से अलग।

उम्र ढलते ही बनेगा कौन मेरा आइना
हो न पाया मैं कभी उससे इसी डर से अलग।


दोस्तों, हर प्रश्न का उत्तर तुम्हें मिल जायेगा
सोचना कुछ देर घर को अपने दफ्तर से अलग।
 
जब से मन घनश्याम हो गया

जब से मन घनश्याम हो गया
तन वृंदावन धाम हो गया

राधा के मुख से जो निकला
वही कृष्ण का नाम हो गया

तन की तपन मिली है तन को
जख़्मों में आराम हो गया

प्रीति रही बदनाम सदा से
लेकिन मेरा नाम हो गया

वे कालिख पीकर भी उजले
वक्त स्वयं बदनाम हो गया

तुम ने जिस क्षण छुआ दृष्टि से
सारा जग अभिराम हो गया

अल्प विराम मृत्यु को जग ने
समझा पूर्ण विराम हो गया

सब गुलाम राजा बन बैठे
राजा मगर गुलाम हो गया

तुम ने आँखों से क्या ढाली
'यायावर' ख़ैयाम हो गया


राम सनेहीलाल शर्मा 'यायावर'
 
अपने ही मन से कुछ बोलें!


क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!


पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!


जन्म-मरण अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा
अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!


अटल बिहारी वाजपेयी
 
जा चुके है सब और वही खामोशी छायी है,
पसरा है हर ओर सन्नाटा, तन्हाई मुस्कुराई है,
छूट चुकी है रेल ,
चंद लम्हों की तो बात थी,
क्या रौनक थी यहॉं,
जैसे सजी कोई महफिल खास थी,
अजनबी थे चेहरे सारे,
फिर भी उनसे मुलाक़ात थी,
भेजी थी किसी ने अपनाइयत,
सलाम मे वो क्या बात थी,
एक पल थे आप जैसे क़ौसर,
अब बची अकेली रात थी,
चलो अब लौट चलें यहॉं से,
छूट चुकी है रेल
ये अब गुज़री बात थी,
उङते काग़ज़, करते बयान्*,
इनकी भी किसी से
दो पल पहले मुलाक़ात थी,
बढ़ चले क़दम,
कनारे उन पटरियों
कहानी जिनके रोज़ ये साथ थी,
फिर आएगी दूजी रेल,
फिर चीरेगी ये सन्नाटा
जैसे जिन्दगी से फिर मुलाक़ात थी,
फिर लौटेंगे और,
भारी क़दमों से,जैसे
कोई गहरी सी बात थी,
छूट चुकी है रेल,
अब सिर्फ काली स्याहा रात थी |
​
 
जब काली रात बहुत गहराती है,
तब सच कहूँ, याद तुम्हारी आती है !
जब काले मेघों के ताँडव से,सृष्टि डर डर जाती है,
तब नन्हीं बूँदों में, सारे,अंतर की प्यास छलकाती है.
जब थक कर, विहंगों की टोली, साँध्य गगन मे खो जाती है,
तब नीड में दुबके पंछी -सी, याद, मुझे अक्स्रर अकुलाती है!
जब भीनी रजनीगंधा की लता, खुद-ब- खुद बिछ जाती है,
तब रात भर, माटी के दामन से, मिलकर, याद, मुझे तडपाती है !
जब हौले से सागर पर , माँझी की कश्ती गाती है,
तब पतवार के सँग कोई, याद दिल चीर जाती है!
जब पर्बत के मँदिर पर, घंटियाँ नाद गुँजातीं हैं
तब मन के दर्पण पर पावन माँ की छवि दिख जाती है!
जब कोहरे से लदी घाटियाँ , कुछ पल ओझल हो जाती हैं
तब तुम्हें खोजते मेरे नयनों के किरन पाखी में समातीं हैं
वह याद रहा,यह याद रहा, कुछ भी तो ना भूला मन!
मेघ मल्हार गाते झरनों से जीत गया बैरी सावन!
हर याद सँजो कर रख ली हैं मन में,
याद रह गईं, दूर चला मन! ये कैसा प्यारा बँधन!


लावण्या शाह
 
very nice anjali ji........
हर याद सँजो कर रख ली हैं मन में,
याद रह गईं, दूर चला मन! ये कैसा प्यारा बँधन!

लावण्या शाह
 
'मैने सांस लेना छोड़ दिया' - सौरभ कुणाल

हुई है जबसे ये हालत मेरी
मैने विश्वास करना छोड़ दिया
लौटा हूं जबसे हर दर से तनहा
मैने आस लगाना छोड़ दिया।

जलाता हूं विश्वास का आज भी दिया
मगर दिल में मेरे रोशनी नहीं होती
बढ़ाता हूं राहों पे आज भी कदम
मगर सफर है कि मेरी पूरी नहीं होती।

लगाया है जब से फरेब को दिल से
मैने दोस्त बनाना छोड़ दिया
खाया है जबसे नज़र का धोखा
मैने प्यार जताना छोड़ दिया।

करता हूं लोगों से आजमी बातें, पर
निगाहों की खामोशी मिटा नहीं सकता
छुपाता हूं आज भी दिल का दर्द
मगर आंखों के आंसू छुपा नहीं सकता।

टूटा है जबसे मेरा हर ख्वाब
मैने उम्मीद लगाना छोड़ दिया
जब से उठा भगवान से विश्वास
मैने पूजा करना छोड़ दिया।

अब अंधेरा ही दिन है
अंधेरी है रातें
अब अंधेरों से ही करता हूं
दिल की बातें।

अब है न कोई रास्ता
न मेरी कोई मंज़िल
मुझमें है खामोशी
मैं खामोशी में शामिल।

छोड़ा है जबसे किसी ने मेरा साथ
मैने हाथ बढ़ाना छोड़ दिया
उठा है जबसे इंसां से निश्वास
मैने सांस लेना छोड़ दिया।


--------सौरभ कुणाल
 
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