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anjaliji,

indeed a matter for shame for all indians. We keep forgetting our real heros nowadays. That's really bad. Even not on tv, news nowhere it is mentioned about the great son of soil's bday, paying tribute is a far cry! :mad:

No excuses, even i forgot the same. :(

anyways, thanks a lot anjaliji to remind and let us know about this great personality.

chander shekhar azad sada amar rehe !!

मुझे आप से उम्मीद थी की आप तो शायद याद रखेंगे
 
Hari Om panwar

भारतभर में विस्फोटों का शोर सुनाई देता है,
हिजबुल लश्कर के नारों का शोर सुनाई देता है,
मलय समीर मौसम आदमखोर दिखाई देता है
लालकिले का भाषण भी कमजोर दिखाई देता है,
इन कोहराम भरी रातों का ढालना बहुत ज़रूरी है
भोर तिमिर में शब्द ज्योति का जलना बहुत ज़रूरी है
नए युगों के कलमकार की कलम नहीं बिकने दूंगा
चाहे मेरा सर कट जाये कलम नहीं बिकने दूंगा
इसलिए केवल अंगार लिए फिरता हूँ मैं गीतों में
आंसू से भीगा अख़बार लिए फिरता हूँ मैं गीतों में,
ये जो आतंको पर चुप रह जाने की लाचारी है
ये हमारी कायरता है, अपराधिक गद्दारी है
ये शेरों का चरण पत्र है भेड़ सियारों के आगे
वाट वृक्षों का शीश नमन है खर पतवारों के आगे
जैसे कोई ताल तलय्या गंगा जमुना को डांटे
चार तमंचे मार रहे एटम के मुह पर चांटे
किसका खून नहीं खौलेगा पढ़ सुनकर अख़बारों में
शेरों की पेशी करवा दी चूहों के दरबारों में
इन सब षड्यंत्रों से पर्दा उठाना बहुत ज़रूरी है
पहले घर के गद्दारों का हटना बहुत ज़रूरी है
पांचाली के चिर हरण पर जो चुप पाए जाते हैं
इतिहास के पन्नो में वो सब कायर कहलाते हैं ……..
 
A commendable effort by poet Neeraj Guru to describe the Life and its very meaning thro' this b'ful and thought-provoking poem. Nice one indeed !


जीवन के अर्थ - नीरज गुरु

एक जगह खड़े होकर -
जहाँ तक हाथ फैला सकता हूँ,
जीवन को उसके सही अर्थों में -
वहीँ तक समझ पाता हूँ,
और शेष तो -
जीवन तट है सागर का,
लहरों के थपेडों से सराबोर,
जिसके तट पर आह्लादित जन -
और तट बना आहत मैं,
अतः -
अपने फैलाये हाथों की सीमा से परे -
क्या जान पाऊगाँ मैं,
अपनी सीमा से परे -
कहाँ जा पाऊगाँ मैं,
इन्हीं सीमाओं में हैं -
सब अपने-पराये,
प्रेम-पीड़ा,
पाप-पुण्य,
फूल-कांटें,
यह – वो – सारी दुनिया,
पूरा ब्रह्माण्ड,
इन्हें जितना समझ पाता हूँ,
समझ लेता हूँ,
और इसीलिए -
एक जगह खड़े होकर -
जहाँ तक हाथ फैला सकता हूँ,
जीवन को उसके सही अर्थों में -
वहीँ तक समझ पाता हूँ!..


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कौन तुम मेरे हृदय में ? -----महादेवी वर्मा

कौन तुम मेरे हृदय में ?



कौन मेरी कसक में नित
मधुरता भरता अलक्षित ?
कौन प्यासे लोचनों में
घुमड़ घिर झरता अपरिचित ?



स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा
नींद के सूने निलय में !
कौन तुम मेरे हृदय में ?



अनुसरण निश्वास मेरे
कर रहे किसका निरन्तर ?
चूमने पदचिन्ह किसके
लौटते यह श्वास फिर फिर



कौन बन्दी कर मुझे अब
बँध गया अपनी विजय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?



एक करूण अभाव में चिर-
तृप्ति का संसार संचित
एक लघु क्षण दे रहा
निर्वाण के वरदान शत शत,



पा लिया मैंने किसे इस
वेदना के मधुर क्रय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?



गूँजता उर में न जाने
दूर के संगीत सा क्या ?
आज खो निज को मुझे
खोया मिला, विपरीत सा क्या



क्या नहा आई विरह-निशि
मिलन-मधु-दिन के उदय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?



तिमिर-पारावार में
आलोक-प्रतिमा है अकम्पित
आज ज्वाला से बरसता
क्यों मधुर घनसार सुरभित ?



सुन रहीं हूँ एक ही
झंकार जीवन में, प्रलय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?



मूक सुख दुख कर रहे
मेरा नया श्रृंगार सा क्या ?
झूम गर्वित स्वर्ग देता -
नत धरा को प्यार सा क्या ?



आज पुलकित सृष्टि क्या
करने चली अभिसार लय में
कौन तुम मेरे हृदय में ?
 
Some times we look at the world just as an observer. We see all the colors, beauty and joy, but just as an outside observer and not as a participant. There is an acute sense of loneliness, as if nothing belongs to us. Great Poet Dharamvir Bharati conveys the very feelings by this classy b'ful creation. :)


एक धुंधली नदी में - धरमवीर भारती

आज में भी नहीं अकेला हूँ
शाम है, दर्द है, उदासी है.

एक खामोश सांझ-तारा है
दूर छुटा हुआ किनारा है
इन सबों से बड़ा सहारा है.

एक धुंधली अथाह नदिया है
और भटकी हुई दिशा सी है.

नाव को मुक्त छोड़ देने में
और पतवार को तोड़ देने में
क्या अजब-सी, निराशा-सी
सुख-प्रद एक आधारहीनता-सी है.

प्यार की बात ही नहीं साथी
हर लहर साथ-साथ ले आती
प्यास ऐसी की बुझ नहीं पाती
और ये जिंदगी किसी सुन्दर
चित्र में रंगलिखी सुरा-सी है.

आज में में भी नहीं अकेला हूँ
शाम है, दर्द है, उदासी है !...


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Last edited:
पापा तुम क्यों तारा बनगए

संवेदनाओं को इस कविता में जिस प्रकार से उतारा गया है, उससे यह कविता अपने आप में बहुत कुछ कहती है । भावनाओं के समंदर में बहा ले जाने वाली रचना के लिए 'रचना' जी बधाई की पात्र हैं ।



पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot]
[/font]हमसे दूर ईश्वर का सहारा बन गए[font=&quot]
[/font]पार्क में बच्चे पापा के साथ खेलते हैं[font=&quot]
[/font]कभी दौड़ते कभी कंधे पर चढ़ते हैं[font=&quot]
[/font]मै दूर बैठा उनको देखा करता हूँ[font=&quot]
[/font]बस तुम को ही सोचा करता हूँ[font=&quot]
[/font]पहले से जीने के ढंग गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot][/font]

[font=&quot]
[/font]माँ काम करते करते थक जाती है[font=&quot]
[/font]कहानी रात को कभी कभी ही सुनती है[font=&quot]
[/font]ब्रश मे फस्ट आने का कॉम्पटीशन कोई करता नहीं[font=&quot]
[/font]सच पापा अब तो ब्रश करने का ही मन करता नहीं[font=&quot]
[/font]मेरे जीवन के तो सारे रंग गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot]

[/font]मै अकेले स्कूल जाता हूँ[font=&quot]
[/font]आप कि कही बातो को मन मे दोहराता हूँ[font=&quot]
[/font]किनारे चलो ऊँगली पकडो मत दौडो[font=&quot]
[/font]पर ऊँगली पकड़ने को जो हाथ बढ़ता हूँ[font=&quot]
[/font]तुम को वहां नहीं पाता हूँ[font=&quot]
[/font]मेरे तो सब सहारे[font=&quot] [/font]गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए[font=&quot]

[/font]रोज मै तुम से बात करता हूँ[font=&quot]
[/font]तारों मे तुम को खोजा करता हूँ[font=&quot]
[/font]जब छाते हैं बादल तो बहुत रोता हूँ[font=&quot]
[/font]तुम को नहीं देख पाउँगा बस यही कहता हूँ[font=&quot]
[/font]आंसूं[font=&quot] [/font]अब मेरे साथी बनगए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बनगए[font=&quot]

[/font]शाम आती है पर तुम आते नहीं[font=&quot]
[/font]कैसे हो बेटे कह के गोद में उठाते नहीं[font=&quot]
[/font]एक बार कहो[font=&quot]
[/font]क्या मिला होमवर्क रहा कैसा स्कूल[font=&quot]
[/font]दो हाई फाई लग रहे हो कितने कूल[font=&quot]
[/font]मस्ती भरे सारे वो पल गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बनगए[font=&quot]

[/font]जब कहता हूँ चॉकलेट लाने को[font=&quot]
[/font]बहला के मुझे दे देती है गुड खाने को[font=&quot]
[/font]दो वक्त कि रोटी मिलजाए तू स्कूल जा पाए[font=&quot]
[/font]बस इतना कमा पाती हूँ मै[font=&quot]
[/font]इसी लिये तेरा कहा नहीं कर पाती हूँ[font=&quot]
[/font]अब[font=&quot] [/font]मेरी खाव्हिशों के दिन गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बनगए[font=&quot]

[/font]मै माँ से माँ मुझ से छुप के रोती है[font=&quot]
[/font]अक्सर खाने की ३ प्लेट धरती है[font=&quot]
[/font]मै उसके लिये हसीं कमाना चाहता हूँ[font=&quot]
[/font]आप जैसा घर का ख्याल रखना चाहता हूँ[font=&quot]
[/font]मै जल्दी से बड़ा होना चाहता हूँ[font=&quot]
[/font]मेरे खेलने के दिन गए[font=&quot]
[/font]पापा तुम क्यों तारा बन गए
[font=&quot][/font]
[font=&quot] [/font]
[font=&quot]‘[/font]रचना[font=&quot] [/font][font=&quot]‘[/font]
 
श्यामल सुमन द्वारा रचित एक खुबसूरत रचना, सरल शब्दों में कही गयी यथार्थ वादी बातें .

बाहर बारिश अन्दर आग
अभी शेष भीतर अनुराग

परदेशी बालम आयेंगे
कुछ बोला है छत पर काग

सब रिश्तों के मोल अलग हैं
नारी माँगे अमर सुहाग

भाव इतर और शब्द इतर हैं
रंग मिलेगा गाकर राग

खोने का संकेत है सोना
छोड़ नींद को उठकर जाग

उदर भरण ही लक्ष्य जहाँ हो
मची वहाँ पर भागमभाग

इक दूजे का हक जो छीना
लेना अपना लड़कर भाग

घाव भले तन पर लग जाये
कभी न रखना मन पर दाग

देखो नजर बदल के दुनिया
लगता कितना सुन्दर बाग

सुमन खिले हैं सबकी खातिर
लूट रहा क्यों भ्रमर पराग
 
An easy yet pragmatic poem that describes the phases of bliss n blues in life, good one indeed. :)

सुख-दुख आना-जाना - अमित

सुख-दुख आना-जाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

सुख की है कल्पना पुरानी
स्वर्गलोक की कथा कहानी
सत्य-झूठ कुछ भी हो लेकिन
है मन को भरमाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

सुख के साधन बहुत जुटाए
सुख को किन्तु ख़रीद न पाए
थैली लेकर फिरे ढूँढते
सुख किस हाट बिकाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

आस-डोर से बँधी सवारी
सुख-दुख खीचें बारी-बारी
कहे कबीरा दो पाटन में
सारा जगत पिसाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

जब-जब किया सुखों का लेखा
सुख को पता बदलते देखा
किन्तु सदा ही इसके पीछे
दुख पाया लिपटाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

जीवन की अनुभूति इसी में
द्वेष इसी में प्रीति इसी में
इसी खाद-पानी पर पलकर
जीवन कुसुम फुलाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।


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कह जाता कौन कहानी अपनी ----जयशंकर प्रसाद

मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह,

मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।

इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्*य जीवन-इतिहास

यह लो, करते ही रहते हैं अपने व्*यंग्*य मलिन उपहास

तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।

तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।

किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-

अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।

यह विडंबना! अरी सरलते हँसी तेरी उड़ाऊँ मैं।

भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।

उज्*ज्*वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।

अरे खिल-खिलाकर हँसते वाली उन बातों की।

मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्*वप्*न देकर जाग गया।

आलिंगन में आते-आते मुसक्*या कर जो भाग गया।

जिसके अरूण-कपोलों की मतवाली सुन्*दर छाया में।

अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

उसकी स्*मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।

सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्*यों मेरी कंथा की?

छोटे से जीवन की कैसे बड़े कथाएँ आज कहूँ?

क्*या यह अच्*छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?

सुनकर क्*या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्*मकथा?

अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्*यथा।
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' की लिखी हुई यथार्थ वादी रचना


खोटे सिक्के हैं प्रचलन में.
खरे न बाकी रहे चलन में.

मन से मन का मिलन उपेक्षित.
तन को तन की चाह लगन में.

अनुबंधों के प्रतिबंधों से-
संबंधों का सूर्य गहण में.

होगा कभी, न अब बाकी है.
रिश्ता कथनी औ' करनी में.

नहीं कर्म की चिंता किंचित-
फल की चाहत छिपी जतन में.

मन का मीत बदलता पाया.
जब भी देखा मन दरपण में.

राम कैद ख़ुद शूर्पणखा की,
भरमाती मादक चितवन में.

स्नेह-'सलिल' की निर्मलता को-
मिटा रहे हम अपनेपन में.
 
bahut achi poem post ki hai.. thanxs a lot....
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' की लिखी हुई यथार्थ वादी रचना


खोटे सिक्के हैं प्रचलन में.
खरे न बाकी रहे चलन में.

मन से मन का मिलन उपेक्षित.
तन को तन की चाह लगन में.

अनुबंधों के प्रतिबंधों से-
संबंधों का सूर्य गहण में.

होगा कभी, न अब बाकी है.
रिश्ता कथनी औ' करनी में.

नहीं कर्म की चिंता किंचित-
फल की चाहत छिपी जतन में.

मन का मीत बदलता पाया.
जब भी देखा मन दरपण में.

राम कैद ख़ुद शूर्पणखा की,
भरमाती मादक चितवन में.

स्नेह-'सलिल' की निर्मलता को-
मिटा रहे हम अपनेपन में.
 
अक्सर मुझको अपने----ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'परा&#2

अक्सर मुझको अपने से ही डर लगता है
अपना ही व्यवहार बहुत बर्बर लगता है

बेजाना पहचाना अपना घर लगता है
रिश्तों का ये राजमहल खँडहर लगता है

तन अपनी ही बस्ती का दुत्कारा जोगी
मन परदेशी-वन का राजकुँवर लगता है

इतनी तेज़ हवाएँ आँगन में घुस आईं
पूरा घर दरवाजे से बाहर लगता है

जब उन्मुक्त बज़ारों की बातें होती हैं
अपना छोटा-सा छप्पर अम्बर लगता है

आवारा मौसम की मनमानी के चलते
मधुमासों में भी मुझको पतझर लगता है

सुनकर कर्मफलों की उलटी-सीधी बातें
क़िस्मत का लेखा बस आडम्बर लगता है।

होनी अनहोनी की इस खींचातानी में
अपना होना भी बस एक ख़बर लगता है

मज़हब के मतभेदों, संघर्षों में उलझा
अपनी रचना से रूठा ईश्वर लगता है
 
Heart toching ...........

अक्सर मुझको अपने से ही डर लगता है
अपना ही व्यवहार बहुत बर्बर लगता है

बेजाना पहचाना अपना घर लगता है
रिश्तों का ये राजमहल खँडहर लगता है

तन अपनी ही बस्ती का दुत्कारा जोगी
मन परदेशी-वन का राजकुँवर लगता है

इतनी तेज़ हवाएँ आँगन में घुस आईं
पूरा घर दरवाजे से बाहर लगता है

जब उन्मुक्त बज़ारों की बातें होती हैं
अपना छोटा-सा छप्पर अम्बर लगता है

आवारा मौसम की मनमानी के चलते
मधुमासों में भी मुझको पतझर लगता है

सुनकर कर्मफलों की उलटी-सीधी बातें
क़िस्मत का लेखा बस आडम्बर लगता है।

होनी अनहोनी की इस खींचातानी में
अपना होना भी बस एक ख़बर लगता है

मज़हब के मतभेदों, संघर्षों में उलझा
अपनी रचना से रूठा ईश्वर लगता है
 
Do something diffrent, make your own way and leave a trail behind is the message this wonderful inspiring poem is conveying. Indeed a classic from senior poet Mukut Bihari Saroj ! :)


कुछ हटके चलो - मुकुट बिहारी सरोज

भीड़-भाड़ में चलना क्या?
कुछ हटके-हटके चलो
वह भी क्या प्रस्थान कि जिसकी अपनी जगह न हो
हो न ज़रूरत, बेहद जिसकी, कोई वजह न हो,
एक-दूसरे को धकेलते, चले भीड़ में से-
बेहतर था, वे लोग निकलते नहीं नीड़ में से

दूर चलो तो चलो
भले कुछ भटके-भटके चलो

तुमको क्या लेना-देना ऐसे जनमत से है
ख़तरा जिसको रोज़, स्वयं के ही बहुमत से है
जिसके पाँव पराये हैं जो मन से पास नहीं
घटना बन सकते हैं वे, लेकिन इतिहास नहीं

भले नहीं सुविधा से -
चाहे, अटके-अटके चलो

जिनका अपने संचालन में अपना हाथ न हो
जनम-जनम रह जायें अकेले, उनका साथ न हो
समुदायों में झुंडों में, जो लोग नहीं घूमे
मैंने ऐसा सुना है कि उनके पाँव गए चूमे

समय, संजोए नहीं आँख में,
खटके, खटके चलो !...



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एक भाषा हुआ करती है-


जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूं `आंसू´ से मिलता जुलता कोई शब्द
हर बार बहने लगती है रक्त की धार


एक भाषा है जिसे बोलते वैज्ञानिक और समाजविद और तीसरे दर्जे के जोकर
और हमारे समय की सम्मानित वेश्याएं और क्रांतिकारी सब शर्माते हैं
जिसके व्याकरण और हिज्जों की भयावह भूलें ही
कुलशील, वर्ग और नस्ल की श्रेष्ठता प्रमाणित करती हैं


बहुत अधिक बोली-लिखी, सुनी-पढ़ी जाती,
गाती-बजाती एक बहुत कमाऊ और बिकाऊ बड़ी भाषा
दुनिया के सबसे बदहाल और सबसे असाक्षर, सबसे गरीब और सबसे खूंख़ार,
सबसे काहिल और सबसे थके-लुटे लोगों की भाषा,
अस्सी करोड़ या नब्बे करोड़ या एक अरब भुक्खड़ों, नंगों और ग़रीब-लफंगों की जनसंख्या की भाषा,
वह भाषा जिसे वक़्त ज़रूरत तस्कर, हत्यारे, नेता, दलाल, अफसर, भंड़ुए, रंडियां और कुछ जुनूनी
नौजवान भी बोला करते हैं


वह भाषा जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है
आत्मघात करती हैं प्रतिभाएं
`ईश्वर´ कहते ही आने लगती है जिसमें अक्सर बारूद की गंध


जिसमें पान की पीक है, बीड़ी का धुआं, तम्बाकू का झार,
जिसमें सबसे ज्यादा छपते हैं दो कौड़ी के मंहगे लेकिन सबसे ज्यादा लोकप्रिय अखबार
सिफ़त मगर यह कि इसी में चलता है कैडबरीज, सांडे का तेल, सुजूकी, पिजा, आटा-दाल और स्वामी
जी और हाई साहित्य और सिनेमा और राजनीति का सारा बाज़ार


एक हौलनाक विभाजक रेखा के नीचे जीने वाले सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगों के
आंसू और पसीने और खून में लिथड़ी एक भाषा
पिछली सदी का चिथड़ा हो चुका डाकिया अभी भी जिसमें बांटता है
सभ्यता के इतिहास की सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक चिटि्ठयां


वह भाषा जिसमें नौकरी की तलाश में भटकते हैं भूखे दरवेश
और एक किसी दिन चोरी या दंगे के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं
जिसकी लिपियां स्वीकार करने से इंकार करता है इस दुनिया का समूचा सूचना संजाल
आत्मा के सबसे उत्पीड़ित और विकल हिस्से में जहां जन्म लेते हैं शब्द
और किसी मलिन बस्ती के अथाह गूंगे कुएं में डूब जाते हैं चुपचाप
अतीत की किसी कंदरा से एक अज्ञात सूक्ति को अपनी व्याकुल थरथराहट में थामे लौटता है कोई जीनियस
और घोषित हो जाता है सार्वजनिक तौर पर पागल
नष्ट हो जाती है किसी विलक्षण गणितज्ञ की स्मृति
नक्षत्रों को शताब्दियों से निहारता कोई महान खगोलविद भविष्य भर के लिए अंधा हो जाता है
सिर्फ हमारी नींद में सुनाई देती रहती है उसकी अनंत बड़बड़ाहट...मंगल..शुक्र..
बृहस्पति...सप्त-ॠषि..अरुंधति...ध्रुव..
हम स्वप्न में डरे हुए देखते हैं टूटते उल्का-पिंडों की तरह
उस भाषा के अंतरिक्ष से
लुप्त होते चले जाते हैं एक-एक कर सारे नक्षत्र


भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को
अपनी छाती हिलाने की छूट है
जिसमें दण्डनीय है विज्ञान और अर्थशास्त्र और शासन-सत्ता से संबधित विमर्श
प्रतिबंधित हैं जिसमें ज्ञान और सूचना की प्रणालियां
वर्जित हैं विचार


वह भाषा जिसमें की गयी प्रार्थना तक
घोषित कर दी जाती है सांप्रदायिक
वही भाषा जिसमें किसी जिद में अब भी करता है तप कभी-कभी कोई शम्बूक
और उसे निशाने की जद में ले आती है हर तरह की सत्ता की ब्राह्मण-बंदूक


भाषा जिसमें उड़ते हैं वायुयानों में चापलूस
शाल ओढ़ते हैं मसखरे, चाकर टांगते हैं तमगे
जिस भाषा के अंधकार में चमकते हैं किसी अफसर या हुक्काम या किसी पंडे के सफेद दांत और
तमाम मठों पर नियुक्त होते जाते हैं बर्बर बुलडॉग


अपनी देह और आत्मा के घावों को और तो और अपने बच्चों और पत्नी तक से छुपाता
राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में
दिन भर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ
खाता है पिछले रोज की बची हुई रोटियां
और मृत्यु के बाद पारिश्रमिक भेजने वाले किसी राष्ट्रीय अखबार या मुनाफाखोर प्रकाशक के लिए
तैयार करता है एक और नयी पांडुलिपि


यह वही भाषा है जिसको इस मुल्क में हर बार कोई शरणार्थी, कोई तिजारती, कोई फिरंग
अटपटे लहजे में बोलता और जिसके व्याकरण को रौंदता
तालियों की गड़गड़ाहट के साथ दाखिल होता है इतिहास में
और बाहर सुनाई देता रहता है वर्षो तक आर्तनाद


सुनो दायोनीसियस, कान खोल कर सुनो
यह सच है कि तुम विजेता हो फिलहाल, एक अपराजेय हत्यारे
हर छठे मिनट पर तुम काट देते हो इस भाषा को बोलने वाली एक और जीभ
तुम फिलहाल मालिक हो कटी हुई जीभों, गूंगे गुलामों और दोगले एजेंटों के
विराट संग्रहालय के
तुम स्वामी हो अंतरिक्ष में तैरते कृत्रिम उपग्रहों, ध्वनि तरंगों,
संस्कृतियों और सूचनाओं
हथियारों और सरकारों के


यह सच है


लेकिन देखो,
हर पांचवें सेकंड पर इसी पृथ्वी पर जन्म लेता है एक और बच्चा
और इसी भाषा में भरता है किलकारी


और
कहता है - `मां ´ !



Uday Prakash
 
मेरा भारत

जहाँ डाल-डाल पर​
जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा
जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा
ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला
जहाँ हर बालक एक मोहन है और राधा हर एक बाला
जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा
वो भारत देश है मेरा

अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले
कहीं दीवाली की जगमग है कहीं हैं होली के मेले
जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का चारों ओर है घेरा
वो भारत देश है मेरा

जब आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले
जहाँ किसी नगर में किसी द्वार पर कोई न ताला डाले
प्रेम की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा
वो भारत देश है मेरा

- राजेंद्र किशन
 
A very nice n' creative poem that depicts poet's conflict n' confusion with in self, praiseworthy indeed !


मंजिलें और रास्ते - राजेश गुप्ता

कुछ मंजिलें हैं सामने, पर रास्ते अनजान हैं,
जो रास्ते मैं हूँ जानता, वो रास्ते नादान हैं;
मुझे ज़िन्दगी दिखती नहीं, मुझे मौत भी मिलती नहीं,
मेरे हाथ हैं बंधे हुए, मेरी जुबां हिलती नहीं,
मैं हूँ खड़ा अनभिज्ञ सा, मेरे कदम परेशान हैं,
कुछ मंजिलें हैं सामने, पर रास्ते अनजान हैं;
मैं खुद ही खुद को क्या कहूँ, खुद को नहीं पहचानता,
दुश्मन मुझे ये कह चले कि मैं दुश्मनी नहीं जानता,
मेरे सिवा मुझ पर सभी, हर हाल में मेहरबान हैं,
कुछ मंजिलें हैं सामने, पर रास्ते अनजान हैं;
तुझको खुदा मेरी कसम, इक और कर दे बस वफ़ा,
मुझे वक़्त से ये पूछ दे कि क्यों है ‘वो’ मुझसे खफा,
उस ही त्रिशंकु की तरह, मेरा भी अब मचान है,
कुछ मंजिलें हैं सामने, पर रास्ते अनजान हैं;
जो रास्ते मैं हूँ जानता, वो रास्ते नादान हैं |


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धूप ही क्यों

धूप ही क्यों छांव भी दो
पंथ ही क्यों पांव भी दो
सफर लम्बी हो गई अब,
ठहरने को गांव भी दो ।

प्यास ही क्यों नीर भी दो
धार ही क्यों तीर भी दो
जी रही पुरुषार्थ कब से,
अब मुझे तकदीर भी दो ।

पीर ही क्यों प्रीत भी दो
हार ही क्यों जीत भी दो
शुन्य में खोए बहुत अब,
चेतना को गीत भी दो ।

ग्रन्थ ही क्यों ज्ञान भी दो
ज्ञान ही क्यों ध्यान भी दो
तुम हमारी अस्मिता को,
अब निजी पहचान भी दो ।

- ----कनकप्रभा
 
जुगनू

अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

उठी ऐसी घटा नभ में
छिपे सब चांद औ' तारे,
उठा तूफान वह नभ में
गए बुझ दीप भी सारे,
मगर इस रात में भी लौ लगाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

गगन में गर्व से उठउठ,
गगन में गर्व से घिरघिर,
गरज कहती घटाएँ हैं,
नहीं होगा उजाला फिर,
मगर चिर ज्योति में निष्ठा जमाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

तिमिर के राज का ऐसा
कठिन आतंक छाया है,
उठा जो शीश सकते थे
उन्होनें सिर झुकाया है,
मगर विद्रोह की ज्वाला जलाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

प्रलय का सब समां बांधे
प्रलय की रात है छाई,
विनाशक शक्तियों की इस
तिमिर के बीच बन आई,
मगर निर्माण में आशा दृढ़ाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

प्रभंजन, मेघ दामिनी ने
न क्या तोड़ा, न क्या फोड़ा,
धरा के और नभ के बीच
कुछ साबित नहीं छोड़ा,
मगर विश्वास को अपने बचाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

प्रलय की रात में सोचे
प्रणय की बात क्या कोई,
मगर पड़ प्रेम बंधन में
समझ किसने नहीं खोई,
किसी के पथ में पलकें बिछाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

------ बच्चन
 
Tu rooth jaaye mujh se aisa kabhi na ho

Tu rooth jaaye mujh se aisa kabhi na ho,
main ek nazar ko tarson aisa kabhi na ho,

main pooch pooch haroon so so sawal kar ke,
tum jawab na do aisa kabhi na ho,

kuch main bhi hun janooni kuch meri mohabbat bhi,
yeh junoon tham na jaaye aisa kabhi na ho,

meray hi saath hasna,mujh se hi mil ke rona,
mujh se bichad ke jee lo aisa kabhi na ho,

tum chand ban kar nikalna main dekhta rahoonga,
kisi raat tum na niklo
aisa kabhi na ho !!!!!!!!!
 
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