जिस दिन से चला हूँ मेरी मंजिल पर नज़र है..
इन आंखों ने कभी मील का पत्थर नही देखा..
किसी शायर की ये पंक्तियाँ अनूप लाठर पर बिल्कुल सही बैठती हैं! पिछले लगभग 25 साल से यह शख्स हरियाणवी सभ्यता, संस्कृति, आचार व्यवहार, रहन सहन और पहनावे के साथ साथ यहाँ की 'अक्खड़' बोली को वो सम्मान दिलाने के लिए...