anoop lather...

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adityachoudhary

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जिस दिन से चला हूँ मेरी मंजिल पर नज़र है..
इन आंखों ने कभी मील का पत्थर नही देखा..


किसी शायर की ये पंक्तियाँ अनूप लाठर पर बिल्कुल सही बैठती हैं! पिछले लगभग 25 साल से यह शख्स हरियाणवी सभ्यता, संस्कृति, आचार व्यवहार, रहन सहन और पहनावे के साथ साथ यहाँ की 'अक्खड़' बोली को वो सम्मान दिलाने के लिए पर्यास कर रहा है जो इसे आज तक नही मिल पाई! चंडीगढ़ से दिल्ली के बीच ज़मीन के इस हिस्से को ज्यादातर लोग सांस्कृतिक रूप से बंजर मानते हैं लेकिन जब यही लोग अनूप लाठर से मिलते हैं तो उनकी सोच बदल जाती है! 1983 में आई हरियाणवी फ़िल्म चंद्रावल में एक पागल का किरदार निभाने वाले अनूप ने ऐसा अभिनय किया था की लोग आज तक नही भूल पाए हैं! पंजाब यूनिवर्सिटी से अभिनय में डिप्लोमा करने वाले ज्यादातर युवा जब अपना भविष्य मुंबई की फिल्मी दुनिया में तलाश रहे थे तब अनूप लाठर ये तय कर चुके थे की उनके सपनों की दुनिया मुबई की चकाचौंध में नही बल्कि हरियाणा की सख्त ज़मीनी धरातल पर बसेगी! यही सोचकर उन्होंने 1985 में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में
बतौर युवा एवं सांस्कृतिक निदेशक ज्वाइन कर लिया! तब कई जानने वालों और दोस्तों ने इनके इस फैसले को देखकर कहा की वो अपनी प्रतिभा की हत्या कर रहे हैं! वो सोचते थे की इस राज्य में कल्चर नही है सिर्फ़ एग्रीकल्चर है ऐसे में जो आज तक नही हुआ वो अब कैसे हो सकता है! लेकिन जो होने जा रहा था इसका आभास लाठर जी को था! इन्हे पता था की किसी भी चीज़ को तभी लोकप्रिय और जिंदा रखा जा सकता है जब इसे युवाओं के माध्यम से किया जाए! यही सोच आगे रखकर अनूप लाठर ने युवाओं को अपनी संस्कृति के बारे में जागरूक करना शुरू किया!जिस वक्त ये सब उन्होंने सोचना शुरू किया तब वो अकेले ही थे. लेकिन वो कहते हैं न ..


मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग साथ मिलते गये और कारवां बनता गया!

1985 में उन्होंने हरियाणा के विभिन प्राचीन और लगभग ख़त्म होने की कगार पर पहुँच चुके वाद्य यंत्रों को लेकर हरियाणवी ओर्केष्ट्रा बनाया! इसकी पहली प्रस्तुति चंडीगढ़ में हुई. इस प्रस्तुति ने धूम मचा दी. इसके साथ ही दुनिया जान गई की जो अनूप लाठर ने सोचा है वो सही है और वो सही दिशा में बढ़ रहे हैं! इसी साल उन्होंने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में हरियाणा दिवस समारोह मनाना शुरू किया! इसमे पुरे प्रदेश से युवा प्रतिभागियों को बुला कर उनसे हरियाणवी में प्रस्तुतियां शुरू करवाई गई! कभी एक दिन और 4-5 प्रस्तुतियों का ये समारोह आज 4 दिन तक मनाया जाता है और 25 के करीब विधाएं इसमे शामिल होती हैं. सबसे खास बात ये है की इसमे हर उस विधा के दर्शन लोगों को हो जाते हैं जो किसी भी बोली या भाषा के बारे में सोची जा सकती है! इसमे सांग, रागनी, चुटकुला, भाषण, कविता, स्किट, नाटक, चित्रकला, नृत्य, ओर्केष्ट्रा, एकल वाद्य, हरियाणवी पॉप, गायन, के साथ सबसे अहम् है हरियाणवी ग़ज़ल. आप सोच ही सकते हैं की जिस बोली को तथाकथित पढ़ा लिखा तबका केवल फूहड़ता और मजाक की बोली मानता है उसमे ग़ज़ल जैसे संजीदा विधा कैसे हो सकती है लेकिन यहीं तो कमल है अनूप लाठर का जो आप संस्कृति के
बारे में सोच नही सकते वो वोही कर सकते हैं! हरियाणवी बोली में ग़ज़ल सुनकर इस प्रदेश की माटी की महक आप दिलो दिमाग पर महसूस कर सकते हैं!अपने बेमिसाल कम की बदौलत ही आज अनूप लाठर का नम कला के क्षेत्र में पुरे देश में सम्मान से लिया जाता है. ये अलग बात है की प्रदेश के लोगों और राजनेताओं ने आज तक न अपनी माती की कद्र की है न इसकी संस्कृति की न ही अनूप लाठर जैसे खेवनहार की! लाठर जी पर लगभग सभी हिन्दी, अंग्रेजी के अख़बारों, पत्रिकाओं में छाप चुका है, इंडिया टुडे ने तो इन्हे अपने २० साला अंक में देश की उन २० हस्तियों में शामिल किया था जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में मील का पत्थर बनकर मिसाल कायम की है! श्री अनूप लाठर के बारे में मैं कह सकता हूँ...


सच्चे शब्दों में सच के अहसास लिखते हैं...
वक्त पढ़े जिसको कुछ ऐसा खास लिखते हैं...
गीत ग़ज़ल इनपर लिखते हैं लिखने वाले..
ये जब भी कलम उठाते हैं तो इतिहास लिखते हैं..
 
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जिस दिन से चला हूँ मेरी मंजिल पर नज़र है..
इन आंखों ने कभी मील का पत्थर नही देखा..

किसी शायर की ये पंक्तियाँ अनूप लाठर पर बिल्कुल सही बैठती हैं! पिछले लगभग 25 साल से यह शख्स हरियाणवी सभ्यता, संस्कृति, आचार व्यवहार, रहन सहन और पहनावे के साथ साथ यहाँ की 'अक्खड़' बोली को वो सम्मान दिलाने के लिए पर्यास कर रहा है जो इसे आज तक नही मिल पाई! चंडीगढ़ से दिल्ली के बीच ज़मीन के इस हिस्से को ज्यादातर लोग सांस्कृतिक रूप से बंजर मानते हैं लेकिन जब यही लोग अनूप लाठर से मिलते हैं तो उनकी सोच बदल जाती है! 1983 में आई हरियाणवी फ़िल्म चंद्रावल में एक पागल का किरदार निभाने वाले अनूप ने ऐसा अभिनय किया था की लोग आज तक नही भूल पाए हैं! पंजाब यूनिवर्सिटी से अभिनय में डिप्लोमा करने वाले ज्यादातर युवा जब अपना भविष्य मुंबई की फिल्मी दुनिया में तलाश रहे थे तब अनूप लाठर ये तय कर चुके थे की उनके सपनों की दुनिया मुबई की चकाचौंध में नही बल्कि हरियाणा की सख्त ज़मीनी धरातल पर बसेगी! यही सोचकर उन्होंने 1985 में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में
बतौर युवा एवं सांस्कृतिक निदेशक ज्वाइन कर लिया! तब कई जानने वालों और दोस्तों ने इनके इस फैसले को देखकर कहा की वो अपनी प्रतिभा की हत्या कर रहे हैं! वो सोचते थे की इस राज्य में कल्चर नही है सिर्फ़ एग्रीकल्चर है ऐसे में जो आज तक नही हुआ वो अब कैसे हो सकता है! लेकिन जो होने जा रहा था इसका आभास लाठर जी को था! इन्हे पता था की किसी भी चीज़ को तभी लोकप्रिय और जिंदा रखा जा सकता है जब इसे युवाओं के माध्यम से किया जाए! यही सोच आगे रखकर अनूप लाठर ने युवाओं को अपनी संस्कृति के बारे में जागरूक करना शुरू किया!जिस वक्त ये सब उन्होंने सोचना शुरू किया तब वो अकेले ही थे. लेकिन वो कहते हैं न ..

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग साथ मिलते गये और कारवां बनता गया!

1985 में उन्होंने हरियाणा के विभिन प्राचीन और लगभग ख़त्म होने की कगार पर पहुँच चुके वाद्य यंत्रों को लेकर हरियाणवी ओर्केष्ट्रा बनाया! इसकी पहली प्रस्तुति चंडीगढ़ में हुई. इस प्रस्तुति ने धूम मचा दी. इसके साथ ही दुनिया जान गई की जो अनूप लाठर ने सोचा है वो सही है और वो सही दिशा में बढ़ रहे हैं! इसी साल उन्होंने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में हरियाणा दिवस समारोह मनाना शुरू किया! इसमे पुरे प्रदेश से युवा प्रतिभागियों को बुला कर उनसे हरियाणवी में प्रस्तुतियां शुरू करवाई गई! कभी एक दिन और 4-5 प्रस्तुतियों का ये समारोह आज 4 दिन तक मनाया जाता है और 25 के करीब विधाएं इसमे शामिल होती हैं. सबसे खास बात ये है की इसमे हर उस विधा के दर्शन लोगों को हो जाते हैं जो किसी भी बोली या भाषा के बारे में सोची जा सकती है! इसमे सांग, रागनी, चुटकुला, भाषण, कविता, स्किट, नाटक, चित्रकला, नृत्य, ओर्केष्ट्रा, एकल वाद्य, हरियाणवी पॉप, गायन, के साथ सबसे अहम् है हरियाणवी ग़ज़ल. आप सोच ही सकते हैं की जिस बोली को तथाकथित पढ़ा लिखा तबका केवल फूहड़ता और मजाक की बोली मानता है उसमे ग़ज़ल जैसे संजीदा विधा कैसे हो सकती है लेकिन यहीं तो कमल है अनूप लाठर का जो आप संस्कृति के
बारे में सोच नही सकते वो वोही कर सकते हैं! हरियाणवी बोली में ग़ज़ल सुनकर इस प्रदेश की माटी की महक आप दिलो दिमाग पर महसूस कर सकते हैं!अपने बेमिसाल कम की बदौलत ही आज अनूप लाठर का नम कला के क्षेत्र में पुरे देश में सम्मान से लिया जाता है. ये अलग बात है की प्रदेश के लोगों और राजनेताओं ने आज तक न अपनी माती की कद्र की है न इसकी संस्कृति की न ही अनूप लाठर जैसे खेवनहार की! लाठर जी पर लगभग सभी हिन्दी, अंग्रेजी के अख़बारों, पत्रिकाओं में छाप चुका है, इंडिया टुडे ने तो इन्हे अपने २० साला अंक में देश की उन २० हस्तियों में शामिल किया था जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में मील का पत्थर बनकर मिसाल कायम की है! श्री अनूप लाठर के बारे में मैं कह सकता हूँ...

सच्चे शब्दों में सच के अहसास लिखते हैं...
वक्त पढ़े जिसको कुछ ऐसा खास लिखते हैं...
गीत ग़ज़ल इनपर लिखते हैं लिखने वाले..
ये जब भी कलम उठाते हैं तो इतिहास लिखते हैं..

I met him once in Jind. He is great person and amazingly passionate about Haryanvi culture..
 
Anoop Lather ji ka haryanvi bhasha aur sanskriti ke khetr mein karya sarahniye hai. Ye iss khetr ke ubharte kalakaron ke prerna-strot hein.
 
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