मेरी मान्यता है कि शादि विवाह के पुराने रीति रिवाज ही आगे जाकर दहेज का रूप लेते गए | जाट समाज मे लड़की वालों से दहेज को रीतियों के रूप मे ही पिरोया जाता था | समान्यत: साधारण जाट परिवारों मे दहेज माँगने या चाहने का प्रचलन आम नहीं था; हाँ यदि कोई अच्छा खर्च करता था तो उसे मान बड़ाई जरूर मिलती थी व इसकी चर्चा आपस मे होती थी | बहुत पुराने समय की तो मुझे थोड़ी बहुत ही जानकारी है वह भी सुनी सुनाई लेकिन मैंने जो देखा वह सन 1965-70 के आसपास का है जब जाटों का शहरिकरण बहुत कम था | मुझे याद आता है उसमें लड़की का ताऊ/दादा आदि लड़की के लिए योग्य वर देखने जाते थे, योग्य लड़का व अच्छा घर मिलने पर लड़के के हाथ रुपया दे देते थे ओर सगाई के लिए घर जाकर विचार विमर्स के बाद दिन/तिथि की सूचना भिजवादेते थे | सगाई मे आमतौर पर चाँदी का एक रुपया या सामान्य करेंसी के 1,11;51;101; (कोई कोई-1100) रु व नारियल लड़के को दिये जाते थे | रीति रिवाजों के नाम पर लड़के के परिवार के सभी सदस्यों कि मान (गिफ्ट/भेंट) करनी होती थी जो 1 रु; 2 रु; 5 रु; प्रति सदस्य (बड़े नाते वालों को 5 रु सबसे छोटे नाते वालों को 1 रु) उस समय तक लड़की की गोद भराई का कोई विशेश रिवाज नहीं था लेकिन रीति अनुसार लड़की को पहनने के 2-3 जोड़ी कपड़े एकाध छोटा मोटा गहना आदि भेंट स्वरूप देते थे जिसमे लड़के की माता बहन चाचा/ताऊ अधिकतम 2-3 सदस्य जाते थे व ये लोग लड़की को 11/21/51 रु देते थे ओर लड़की वालों की तरफ से इसका दोगुना नगद कैश वापिस दिया जाता था तथा एक-एक सादी चद्दर आदमी को व सादा सूट जनानियों को |
उस समय तीन मुख्य भेंटे थी जो लड़की वालो को लड़के या लड़के के परिजनो को नकद रूप मे दी जाती थी, 1-सगाई, 2-टेवा या लग्न, 3-विदा या दान; बाद मे इसमे कुछ ओर जुड़ती गयी जैसे जय माला, मिलनी आदि | यह मान्यता थी कि इन तीनों रिवाजो मे नकद राशि एक समान होगी जैसे 101,501,1100 (या कोई कोई-5100) उस समय समान्यता यह राशि रु 101 होती थी | बाद मे सामाजिक लेवेल के अनुसार यह 1100 रु तक देखी गयी | इस समय फ़र्निचर इलैक्ट्रिक आइटम या वाहन आदि शादी मे कुछ नहीं दिया जाता था | दहेज के स्टेटस सिम्बल मे शामिल हुई घड़ी-अंगूठी-रेडियो-साइकल, इतने को चर्चा मे कहते थे बहुत खूब ब्याह कर दिया | सभी बरातियों को भेंट स्वरूप एक रुपया व गिलास लड़की वालों की तरफ से दिया जाता था | बारात के समय लड़के वालों की तरफ से लड़की के लिए साड़ी सूट शाल व अन्य कपड़े दिये जाते थे | लड़की के लिए समस्त गहने लड़के वालों की तरफ से दिये जाते थे जो परिवार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता था | एक , दो या तीन साल बाद लड़के का मुकलावा (गोणा/लड़की को ससुराल भेजने) का समय आता था जिसका अंतराल लड़की की उम्र व लड़की वालों के खर्च यौग्य प्रबन्ध पर निर्भर करता था | इसमे दी जाने वाली वस्तुए व घरेलू सामान दहेज कहलाता था | इसमे लड़की के खुद के पहनने के सूट/कपड़े ननद सास ससुर व देवेरों के 1-2 कपड़े चादर शाल आदि | लड़के के दादा, दादी, बुवा, मामी, मामा आदि को भी इसमे शामिल किया जाता था जिनके भी एक जोड़ी कपड़े या चादर या दोनों लडकी वालों की तरफ से दहेज मे दी जाती थी | उस समय लड़की वालों कि तरफ से लड़की को कोई गहना नहीं दिया जाता था, कोई-कोई परिवार नाक का कोका या कानो की बाली कन्यादान के रूप मे लड़की को दे देते थे | घरेलू सामान मे सन्दुक/पेटी पिड्ढा, चरखा जरूरी घरेलू बर्तन जैसे परांत, थाली, गिलास, कटोरी, पतीली, कढ़ाई टोकनी, बाल्टी व रसोई के जरूरी बर्तन कुल संख्या 20-25 तक व एक-दो बिस्तर/यानि रज़ाई गदेला |
मैंने बचपन मे इससे ज्यादा दहेज हिसार जिले के जाटों मे नहीं देखा था लेकिन सिरसा साइड मे कुछ इससे ज्यादा सुना जरूर था | यह भी सत्य है की साधारण जाट किसान परिवार को शादी व मुकलावे के इस खर्च के लिए भी बहुत जद्दोजहद व मेहनत करनी पड़ती थी | कई बार आकाल या कमजोर पैदावार के कारण शादी या मुकलावा आगे टहलाना पड़ता था |
मैंने देखा उस समय के दूल्हा व दुल्हन मुकलावे के बाद संसारिक समस्याओं से बहुत दूर अपनी अल्हड़ जवानी मे मस्त रहते थे | वो मस्ती व बेफिक्री मुझे आजकल कहीं भी नजर नहीं आ रही है |
क्रमश॥
धन्यवाद |